नींद खुली सुबह तो
कुछ अजीब कश्म-कश था;
संवर के वो सपने मे जब आई
वो अतुलनीय श्रंगार-रस था |

ह्रदय से देखा उस श्रंगार को
क्योकि नयन बंधे थे परहेज से;
विंदिया उसके माथे पे
चमक रही थी तेज से |

अपलक देखना उसका
दिल की धड़कन बढाता था;
काजल उसके नयन सौन्दर्य में
चार-चांद लगाता था |

क्रोध था या शर्मो-हया थी
उस लाल चेहरे ने उलझाया बहुत;
नयन प्रेम-निमंत्रण पाकर
मैं भी इठलाया बहुत |

था रोम-रोम प्रसन्न
उससे मित्रता ज़्यादा करके;
ह्रदय ने कहा अब खोलो नयन
पवित्रता का वादा करके |

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