परिंदे...

रोज़मर्रा के अपने काम में व्यस्त धरा ने बहुत बार रिंग होने पर कॉल रिसीव किया,दूसरी ओर से मयंक की आवाज़ आई- "मैंने तो सुना था कि सगाई के बाद लड़कियाँ सारा दिन अपने होने वाले पति को मिस कॉल देती हैं और कॉल आने पर दो ही रिंग में कॉल रिसीव भी कर लेती हैं पर मेरे साथ तो उल्टा ही है धरा, चार दिन हुए हमारी सगाई को तुमने एक बार भी कॉल करना तो दूर मिस कॉल भी नहीं किया।धरा धीरे से बोली- एक प्रोग्राम में व्यस्त थी इसलिए समय ही नहीं मिल पाया।मयंक ने कहा- क्या हम रात को डिनर पर साथ चल सकते हैं? काफ़ी गहरी सोच से बाहर निकलते हुए धरा ने कहा- फ़ुरसत होते ही मेसेज करती हूँ। कॉल रखने के बाद बहुत देर तक हाथ में मोबाइल पकड़े सोचती रही और अपने आप से बोली ये जो कुछ भी हो रहा है इसमें मयंक का क्या दोष? मेरी नाराज़गी मयंक से तो नहीं, फिर क्यों मैं हर बार उसके साथ ऐसा व्यवहार करती हूँ?

धरा ने मयंक को मेसेज किया- 'आज का डिनर मैं ही बनाने वाली हूँ तो 8 बजे मिलते हैं मेरे घर पर।घर जल्दी पहुँचकर धरा ने खाना बनाया और मयंक का इंतज़ार करने लगी।मयंक के आते ही सब साथ खाने के लिए बैठे। जैसे-तैसे मयंक ने खाना खाया और वापस घर चला गया।

देर रात धरा ने जैसे ही नेट ऑन किया तो एक नोटिफिशन आया था। मेल देखने पर पता चला हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी 2009 से 2013 बैच से पास आउट सभी छात्रों को आमंत्रित करती है रीयूनियन में।अपनी डायरी चेक करने के बाद उसने मयंक को कॉल किया। एक भरभराती सी आवाज़ आई, धरा ने जब मयंक से उसकी तबीयत के बारे में पूछा तो वह कहने लगा- 'मैं ठीक हूँ दरअसल मुझे केसर से एलर्जी है और ज़ाफरानी पुलाव की वज़ह से थोड़ा बीमार हूँ। धरा ने उससे कई बार माफ़ी माँगी तो मयंक ने धीरे से कहा- 'बुरा मत मानना धरा, तुमने इतने मन से खाना बनाया था सो मैंने खा लिया पर न तो मुझे दम आलू पसंद है न ही कोफ़्ते और केसर से तो एलर्जी है मुझे मीठा मैं बिल्कुल नहीं खाता।' कुछ देर की चुप्पी के बाद धरा बोली- 'मुझे तुमसे तुम्हारी पसंद पूछ लेनी चाहिए थी, गलती हो गई दोबारा ऐसा नहीं होगा।' धरा ख़ामोश थी, उसकी ये चुप्पी...मयंक को हमेशा अन्दर तक भेद जाती।थोड़ी देर बाद धरा बोली- 'तुमसे अनुमति चाहिए थी मुझे मयंक'।मयंक अपने बिस्तर से उठते हुए बोला- 'कैसी अनुमति?' धरा कहने लगी- 'मेरी यूनिवर्सिटी में रीयूनियन है,अभी मेसेज आया है,मैं तीन-चार दिन के लिए समर हिल्स शिमला जाना चाहती हूँ।' मयंक कहने लगा- 'इसमें मेरी क्या अनुमति चाहिए तुम्हें? तुम स्वतंत्र हो धरा कहीं भी जाने के लिए।' गहरी ख़ामोशी के बाद धरा बोली- 'बहुत कुछ ऐसा है जिसे हमेशा के लिए अपने साथ ले जाकर शिमला में छोड़ आना चाहती हूँ।' अब मयंक गहरी ख़ामोशी के बाद बोला- 'किसे? मेरे रक़ीब को, तुम्हें लगता है कि तुम उसे छोड़ पाओगी धरा।' धरा चुप थी तो मयंक ने कहा- 'जाओ एक आखरी बार ये कोशिश भी कर के देख लो...'।धरा ने असमंजस की स्थिति में अपने बैग पैक किये। अगली सुबह जब उसने अपने पिता को समर हिल शिमला जाने के लिए पूछा तो उन्होंने अनमने मन से कहा-'अब भी कुछ बाकी रह गया है? जो फिर से जाना चाहती हो...' धरा का चेहरा देख उन्होंने भी हामी भर दी और मन ही मन प्रार्थना करते हुए बोले- 'इस बार इसे हिम्मत देना जिसे ये भूलना चाहती है उसे भूलकर ही लौटे।मेरी बच्ची के चेहरे पर वही मुस्कान लौटा देना।'

धरा ने दिल्ली से कालका ट्रेन पकड़ी।अलसाई सी सुबह कालका पहुँच धरा टॉय ट्रेन के खुलने का इंतज़ार करती रही।ट्रेन में चढ़ते ही न जाने क्यों बार-बार उसे महसूस हो रहा था कि एक जोड़ी आँखें उसका पीछा कर रही हैं।

ट्रेन में भीड़ के बढ़ते ही धरा ने खिड़की वाली सीट पर कब्ज़ा जमा लिया। कालका से शिमला बाई रोड तो बहुत कम समय लगता है पर बाई ट्रेन वक़्त ज्यादा लगता है फिर भी समय की परवाह किये बगैर टॉय ट्रेन का ये सफ़र हमेशा से धरा को भाता आया है।ट्रेन की छुक-छुक के साथ धरा ने अपना प्रोफेशनल कैमरा निकाल लिया वह हर पल को अपने साथ आखरी बार कैद कर ले जाना चाह रही थी।पहाड़ों से झाँकती सूरज की रश्मियाँ और बलखाती टॉय ट्रेन सभी ने उसके कैमरे में अपना स्थान बना लिया था। शिमला स्टेशन पर पहुँचकर एक गहरी साँस ली धरा ने और बाहर आते ही टैक्सी पकड़ मॉल रोड के किनारे बने रिसोर्ट में आ गई।कुछ देर आराम करने के बाद अपने कदमों को रिज की ओर बढ़ा दिया। मॉल रोड काफ़ी बदल गया था। बहुत देर तक अकेली खड़े शून्य में निहारती रह गई थी धरा। हाथों में जब आइस क्रीम ली तो उसे याद आया कि उसने तो दो आइस क्रीम ली है जबकि वह अकेली है। पास मूंगफली बेचते बच्चे के हाथों में उसने दोनों कोन थमा दिए और बुझे मन से वापस रिसोर्ट लौट आई। बिस्तर पर पड़ते ही सबसे पहले घर फोन कर उसने कहा- 'तीन दिन फोन बंद रहेगा मेरा।' फोन को बंद कर खुली आँखों से जाने किस दुनिया में विचरण करती रही।

अगली सुबह कपड़ों से लेकर झुमकों तक से मशक्कत करने के बाद धरा की सवारी समर हिल शिमला की ओर बढ़ चली। यूनिवर्सिटी के गेट के बाहर ही उसने गाड़ी छोड़ दी और पैदल ही चलने लगी। यूनिवर्सिटी में चहल-पहल बहुत थी। धरा यूनिवर्सिटी के गेट को पकड़े उसे छूकर महसूस करते खड़ी रही। थोड़ी दूर आगे बढ़ी कि उसका सामना चार साल पहले की धरा से हो गया।बेबाक,बातूनी, फैशन में सराबोर जब कॉलेज के पहले दिन वह सीनियर के हत्थे चढ़ने से बच गई थी,उसके बाद तो ये उसका रोज़ का काम हो गया था।अपने साथ-साथ नए आये लोगों को सीनियर से बचाना।

धरा ने खुद को पेड़ की ओट में खड़ा कर लिया और गौर से देखने लगी उस चार साल पहले की धरा को। जीन्स-टॉप, जैकेट के साथ हाथ में रंग-बिरंगी रेशमी धागों की चूड़ियाँ,माथे में काली बिंदी,खुले घुँघराले बाल क्लिप से फँसे हुए,कानों में झुमके,स्लिंग बैग,पैरों में मजबूत बाटा की फ्लैट चप्पल पहनकर भागती-भागती रुक गई।अपने आगे खड़े लड़के से उसने पूछा- 'फर्स्ट इयर'।लड़के के हामी भरते ही धरा ने उसका हाथ पकड़ा और चीखी तो फिर भागो मेरे साथ।लड़का हैरानी से धरा को देखता रह गया उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे? ठहरे या इस पल को जी ले।धरा उसे खींचती, भागती हुई,मोड़दार सीढियाँ चढ़ती हुई लाइब्रेरी पहुँच गई और लड़के से बोली- 'यहाँ हम सुरक्षित हैं।' लड़के ने हैरानी से कहा- किससे? धरा ने जैसे ही कहा- सीनियर्स से। लड़के ने अपना माथा पकड़ लिया और बोला- 'मैं तुम्हारा सीनियर हूँ...'। धरा की हालत काटो तो खून नहीं वाली थी।धीरे से बोली- तो फिर मेरे साथ भागे क्यों... लड़के ने कहा- तुम्हें बचाने के लिए। अपने सर पर थपकी मारते हुए धरा क्लास की ओर चल दी।

क्लास छूटने पर एक बार फिर सीनियर जूनियर को घेरने की फ़िराक में थे तभी उस लड़के ने क्लास के बाहर आती धरा का हाथ पकड़ा और उससे बोला- 'गर्ल्स हॉस्टल'... धरा के हाँ कहते ही- उसने कहा तो फिर भागो मेरे साथ।धरा का हाथ पकड़कर लाइब्रेरी होते हुए शार्ट कट रास्ते से उसे गर्ल्स हॉस्टल पहुँचा दिया उसने। हॉस्टल पहुँचते ही धरा ने उससे कहा- 'धन्यवाद ये शार्ट कट बतलाने के लिए।' उस लड़के ने कहा- 'हम लड़के गर्ल्स हॉस्टल तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता ज़रूर जानते हैं।वैसे क्या नाम है तुम्हारा? उसने गर्ल्स हॉस्टल के अंदर झाँकते और एक लड़की को हाथ हिलाकर धरा की ओर इशारा करते हुए उससे पूछा? उस लड़की को देख धरा बोली- 'धरा अवस्थी'... और आप...? उस लड़के ने कहा- 'सीनियर के नाम पूछे नहीं पता किये जाते हैं। अब तुम्हें कल सुबह तक मेरा नाम पता करना होगा और यहाँ से शुरू होती है तुम्हारी रैगिंग।' जाते-जाते उस लड़के ने धरा को परेशान देखा तो बोला- 'वैसे तुम्हारे नाम के आस-पास ही है मेरा नाम... बिल्कुल विपरीत पर फिर भी तुम्हारी तरह ही।'

सारी रात असमंजस में कटी धरा की। सुबह-सुबह अपनी खिड़की से बाहर सूरज का उजाला देखते हुए अचानक धरा के मुँह से निकला- 'धरा माने पृथ्वी तो धरा का विपरीत आकाश पर धरा की तरह ही तो आकाश नहीं अम्बर ज्यादा जमेगा।'

अगली सुबह जब शार्ट कट रास्ते से धरा बचते हुए लाइब्रेरी की ओर से गुज़री तो उसने उस लड़के को किताबों में व्यस्त देखा। उसके पास जाकर धीरे से बोली- 'अम्बर सर'... लड़के के मुड़ते ही धरा ने कहा- 'देखा पहचान लिया न धरा का विपरीत और धरा की तरह भी'।मुस्कराकर अम्बर ने जब अपना सर हिलाया तो धरा कुछ पल के लिए उसे ध्यान से देखते रह गई और मासूमियत से बोली- धरा की तरह कैसे हुए आप? अम्बर ने कहा- 'तुम्हारी ही तरह पंडित हूँ मैं भी।' धरा ने जब मुस्कराकर अम्बर की ओर देखा तो पाया एक जोड़ी खूबसूरत आँखें जिनमें खो ही गई थी धरा पर लाइब्रेरी वाली मैडम के डाँटते ही दोनों वहाँ से बाहर निकाल दिए गए और अपनी-अपनी क्लास में चले गए।

शाम होते ही जब धरा अपने हॉस्टल को लौटती तो अम्बर को अपनी खूबसूरत आँखों में चश्मा चढ़ाए किताबों में मग्न पाती। आखिर एक दिन धरा सीनियर के हत्थे चढ़ ही गई।उसकी रैगिंग में जब उसे हिदायतें दी जा रही थीं अम्बर पहुँच गया और जब धरा का हाथ पकड़कर वहाँ से लेकर जाने लगा तो एक लड़के ने आवाज़ दी- 'एक दिन यहाँ से भी भगा दिया जाएगा भगोड़े और हँसने की आवाज़ें आने लगीं। अम्बर ने धरा का हाथ पकड़ा और लेकर जाने लगा- 'पीछे से उन लड़कों का शोर आ रहा था तेरे तो घरों पर भी कालिख पोत कर लिख दिया गया था भगोड़ा पंडित।' धरा उसे खींचकर ले जाते अम्बर को देख रही थी आज उसके चेहरे और आँखों पर मुस्कान की जगह गहरी मायूसी महसूस की थी उसने। आँखें क्रोध से धधक रही थीं पर उसका मन उसे शांत रहने को कह रहा था। हॉस्टल के पास पहुँचकर जैसे ही अम्बर ने धरा का हाथ छोड़ना चाहा तो धरा ने दोनों हाथों से मजबूती से उसके हाथों को थामकर कहा- 'मीठा खाने से मन शांत हो जाता है,माँ ने लड्डू बनाए थे मैं अभी लेकर आती हूँ।' भागते हुए जाकर धरा लड्डू का डब्बा उठा ले आई और अम्बर की ओर बढ़ाते हुए बोली- 'माँ का प्यार है इसमें।' अम्बर ने डब्बे से कुछ लड्डू निकाले और धरा के हाथ में पकड़ाते हुए बोला- इसे तुम रख लो और अब ये डब्बा मेरा हुआ, माँ का प्यार बहुत मुश्किल से मिलता है। धरा ने सारे लड्डू डब्बे में डालकर डब्बा अम्बर को पकड़ा दिया और उसकी थोड़ी लाल और थोड़ी भीगी आँखें देख उसके हाथों को थामकर बोली- 'आप बहुत बहादुर हैं जो आपको भगोड़ा समझे वह मूर्ख है।' अम्बर चला गया और धरा उसे जाता देखती रही।

इंट्रो सेशन के बाद रैगिंग भी थम गई और धरा को अब भागना नहीं पड़ता था और अब अम्बर को धरा को बचाना नहीं पड़ता था। धरा हमेशा अम्बर को क्लास में कम और लाइब्रेरी में ज्यादा पाती थी।धरा का अम्बर के साथ क्या रिश्ता था ये धरा कभी नहीं समझ पाती थी बस जब भी अम्बर से कहीं टकरा जाती तो अपने आप उसके मुँह से कुछ शब्द फूट पड़ते जो शायद उसके सिवा कभी किसी को सुनाई भी न देतें हों।अभी वह सीढियां चढ़ ही रही थी कि सीढ़ी से उतरते अम्बर को देख कहने लगी- 'कितनी खूबसूरत होती हैं न कॉलेज की ये सीढियाँ जिनमें चढ़ते-उतरते कितने अपने टकरा जाया करते हैं।'मुस्कराते हुए अम्बर जब उसके बाजू से निकला तो धरा को तो मानो उसके शब्दों का पारितोषक मिल गया हो।

सेमेस्टर खत्म हुए धरा छुट्टियों में अपने घर चली गई इस बार घर पर उसका मन नहीं लगा।वह छुट्टियों के खत्म होने के दिन गिनती रहती। माँ जब लड्डू बना रही थीं तो बहुत सारे लड्डू उसने अलग पैक करवाए और भागते हुए हॉस्टल पहुँची।हॉस्टल पहुँचकर लड्डू का डब्बा थामे सीधा लाइब्रेरी पहुँची।वहाँ अम्बर पढाई कर रहा था।अम्बर को देख धरा की आँखों में चमक आ गई।उसके पास पहुँचकर उसका हाथ पकड़कर अपने साथ नीचे बगीचे में ले आई। अम्बर ने जब सबको उसे देखता पाया तो धरा से बोला- 'ये क्या बचपना है? सब देख रहे हैं, शर्म नहीं आती तुम्हें इस तरह हाथ पकड़कर लेकर आने में।' धरा को एक झटका लगा, दिल्ली में न जाने उसकी आँखों ने कितने सपने देख लिए थे अम्बर को लेकर और आते ही सब चूर।' डबडबाती आँखों और काँपते हाथों में थामे डब्बे को अम्बर की ओर बढ़ाते हुए बोली- 'माँ का प्यार लाई थी आपके लिए।' अम्बर के डब्बा थामते ही जब धरा जाने लगी तो अम्बर ने धीरे से उसका हाथ थामा और गुनगुनाने लगा- 'चले ही जाना था जब नज़र मिलाकर यूं, फिर थामी थी साजन तुमने मेरी कलाई क्यों? किसी को अपना बनाकर छोड़ दे ऐसा कोई नहीं करता... बाहों में चले आओ...' धरा की आँखें तो आज सूर्या बल्ब को भी मात दे रही थीं गज़ब की चमक थी उनमें।उसके होंठों पर कँपकँपाती मुस्कान देख अम्बर ने कहा- 'चलो कहीं चलते हैं?' धरा की सहमती पाते ही अम्बर उसे जाखू मन्दिर ले गया। हनुमान जी की विशाल मूर्ती के सामने मुस्कराते हुए धरा हाथ जोड़े खड़ी थी उसे मुस्कराता देख अम्बर ने कहा- 'ऐसा क्या माँगा जो इतनी हँसी आ रही है।' धरा हँसते हुए बोली- बजरंगबली के पास लोग शक्ति मांगने आते हैं, बजरंग बली ने सदैव ब्रम्हचर्य व्रत का पालन किया विवाह नहीं किया और मैं उनसे ही... आगे कुछ कहती उससे पहले ही अम्बर ने उसके होंठों पर ऊँगली रख दी ये कहकर की अगर किसी को बता दो क्या माँगा तो कभी नहीं मिलता।मंदिर से टैक्सी स्टैंड तक दोनों पैदल ही उतरे।पहाड़ियों से उतरते हुए जब एक बन्दर के दौड़ाने पर धरा गिरने लगी तो अम्बर ने उसे थाम लिया।डर से धरा की धडकनें तेज़ हो गई थीं। अम्बर ने मुस्कराते हुए कहा- 'बड़ी प्रतापी जगह है,तुरंत सुन ली बजरंगबली ने।' उससे अलग होते हुए थोड़ा झिझकते हुए धरा बोली- 'आप मुझे गिराना चाहते थे।' अम्बर ने कहा- 'नहीं पागल मैं तो तुम्हें हमेशा थामना चाहता हूँ, जब भी और जहां भी तुम गिरो वहाँ पर।' अम्बर की चमकती आँखें और शरारती मुस्कान ने धरा के अरमानों को पंख लगा दिए। अब बिना किसी झिझक के उसने जब अम्बर के हाथों को मजबूती से थामा तो अम्बर ने भी उसकी हथेलियों को चूमकर उसे ये अधिकार दे दिया।हॉस्टल के गेट पर धरा को छोड़कर अम्बर अपने हॉस्टल वापस आ गया। धरा अपने रूम पर पहुँचती उसके पहले ही उसे श्वेता की आवाज़ आई- 'रुको धरा, ये तुम्हारे साथ अम्बर ही था न?' धरा मुस्कराकर हाँ बोलती हुई अपने कमरे में आ गई।

अगली सुबह अम्बर को देखने जब भागती हुई लाइब्रेरी पहुँची तो उसने पाया अम्बर किताबों में व्यस्त है। उसने उसका ध्यान भटकाने की खूब कोशिश की पर लड़कों के समूह के बीच में सबसे घिरा अम्बर सबको पढ़ाने में मग्न था।उदास मन से हॉस्टल आ गई और अगली सुबह सज-धज कर कानों में बड़े-बड़े झुमके पहनकर जब वह लाइब्रेरी पहुँची तो सब उसके झुमके की तारीफ़ कर रहे थे सिवाय अम्बर के,वह अभी भी अपनी किताबों में मग्न था।अम्बर के बाजू में बैठ गई धरा।लाइब्रेरी में आती सूर्य की रौशनी जब उसके झुमके में लगे काँच को छू रही थीं तो उसकी चमक अम्बर के चेहरे और आँखों में पड़ रही थी। अम्बर का ध्यान भंग होकर बार-बार उन झुमकों पर जा रहा था। झुँझलाते हुए अम्बर बोला- 'अगर पूरी यूनिवर्सिटी ने झुमके देख लिए हों तो उन्हें उतार दो,मुझे पढने में विघ्न पड़ रहा है। गुस्से से धरा ने झुमका निकालकर टेबल पर पटक दिया और किताब निकालकर पढने लगी।लेक्चर की बेल बजने पर क्लास चली गई। अम्बर जब जाने लगा तो उसके हाथ लगने पर झुमके नीचे गिर गए। उसने उठाकर अपने जेब में रख लिए।धरा पागलों की तरह झुमके ढूँढती रही पर उसे नहीं मिले।

19 जनवरी धरा का जन्मदिन था वह ख़ुशी-ख़ुशी अम्बर से जब मिलने गई तो पता चला वह यूनिवर्सिटी के ऑडी में किसी प्रोग्राम में भाग ले रहा है।ऑडी स्टूडेंट की भीड़ से भरा था अम्बर की सहपाठी श्वेता प्रोग्राम की होस्ट थी।26 जनवरी से पहले संविधान के औचित्य पर एक सेमीनार रखा गया था।सबने बहुत अच्छे से संविधान की व्याख्या,विशेषता बताई अम्बर का नाम जब लिया गया तो धरा बड़ी ही तन्मयता से सुन रही थी, अम्बर ने कहा-

26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ तो स्वतंत्रता दिवस के दिन मिली हमारी स्वतंत्रता पर नियम लगा दिए गए।अब संवैधानिक रूप से हम कितने स्वतंत्र हैं और अपनी स्वतंत्रता का कितना उपभोग कर सकते हैं। ये थोडा विवादस्पद है। हमारे संविधान की उद्देशिका है-

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तरीख 26 नवम्बर 1949 ई. (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छ विक्रमी) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत,अधिनियमित और अतामर्पित करते है।

इसे पढने के बाद आप हमें मिली संवैधानिक स्वतंत्रताओं का अंदाज़ा लगा सकते हैं। उपरोक्त में से किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता के हनन के लिए हम न्यायालय के दरवाज़े खटखटा सकते हैं। अब न्याय कितनो को और कैसे मिलता है... वो भी छुपा नहीं है बात आती है सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक न्याय की तो इनके लिए लडते रहिये आप केस,अगर केस किसी अमीर के विरूद्ध है तो आप को न्याय मिलेगा? और कब मिलेगा? ये बड़ी ही संशय वाली परिस्थिति है। अब बात आती है विचार, अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता की तो प्रकट करते रहिये आप अपने विचार,जिस दिन किसी बड़े नेता के खिलाफ बोला आपने,बस उसी दिन से अपने उलटे दिन गिनने शुरू कर दीजिये। अब बात आती है धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की तो ये मुद्दा तो इतना संवेदनशील है कि बोलते ही आग लग जाती है। प्रतिष्ठा और अवसर की समता अब किसको कितना प्राप्त हुआ सर्वविदित है। अब इससे व्यक्तिगत की गरिमा कितनी बढ़ी और हम एक हैं का दंभ भरने वाले,हम सभी अगर अपना गिरेबान झांकेंगे तो सच्चे दिल से कह सकेंगे की हम कितने एक हैं।

पिछले कई सालों से हम तिरंगा फहरा कर नारे लगा कर अपने स्वतंत्र होने और गणतंत्रात्मक राष्ट्र होने का उदघोष करते हैं और इस दिन को बड़े ही शानदार तरीके से मनाते है।हर साल हम ये सोचते हैं की आज इतने साल हो गए हमारा संविधान बने पर सत्य तो ये है कि हमें ये सोचना चाहिए कि कितने साल हो गए हमें हमारे संविधान की धज्जियाँ उड़ाते हुए। संविधान सभा के निर्मात्री सदस्य जब ऊपर बैठकर हमें संविधान की धज्जियाँ उड़ाते देखते होंगे तो सोचते होंगे कि हमने तो कुछ और सोच कर निर्माण किया था और भारत की जनता और उसके कर्णधारों ने अपने आप को बचाने के लिए ये क्या कर दिया। उन सभी के साथ मेरी सहानुभूति हैं।अम्बर जब जाने लगा तो कुछ लड़के चिल्लाए ये तो भगोड़ा है इसे क्यों आस्था होगी हमारे संविधान में। धरा ने गुस्से से उन लड़कों की ओर देखा। आज अम्बर के सब्र का बाँध टूट गया था वह माइक से बोला- "हाँ हूँ मैं भगोड़ा, जानना नहीं चाहोगे कि कैसे बना मैं भगोड़ा।" वादियों की जन्नत कश्मीर... ऋषि कश्यप का कश्मीर,कल्हण का कश्मीर, कश्मीरी पंडितों का कश्मीर।जिसने कश्मीर को बसाया आज कहाँ हैं वे सब? कहाँ हैं कश्मीर के वो हजारों मन्दिर? धर्म और उपासना की स्वतंत्रता है न देश में। कश्मीर माँगे आज़ादी... अरे किससे आज़ादी चाहिए तुम्हें? उन लोगों से जिन्होंने कश्मीर को बनाया।अचानक से घाटी से उन्हीं लोगों का सफाया शुरू हो गया।धीरे-धीरे कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के नेता गायब होने लगते हैं। उनकी लाश टुकड़ों में झेलम में मिली तो कुछ के सर पर कील ठोकी गई थी।कोई कुछ नहीं कहता और न ही करता क्योंकि हमारे देश में तो तुष्टिकरण की राजनीति होती है न।बर्बरता से कश्मीरी पंडित मार दिए गए,भगा दिए गए पर सब मौन... सबने चुप्पी साध ली... क्या सत्ता धारी और क्या विपक्ष किसी में आज भी इतना साहस नहीं कि वह बोले खुलकर हमारे हक के लिए क्योंकि आज भी हम वोट बैंक नहीं हैं न, न ही हमारे साथ कोई कोटा लगता है, जो हम किसी के लिए ज़रूरी हूँ।

एक दिन अचानक मस्ज़िदों से ज़ोर-ज़ोर से आवाजें आती हैं- "हम लेकर रहेंगे आज़ादी,कश्मीर हमारा हिस्सा है उसे हम भारत से आज़ाद कराकर रहेंगे,आज़ाद करा दो काफ़िरों से कश्मीर या तो इस्लाम क़ुबूल कर लो या भाग जाओ... कश्मीर की आज़ादी हमें कश्मीरी पंडितों के बिना और उनकी पत्नियों के साथ चाहिए। ये कहलाती है कश्मीरियत?" कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर भाग जाओ अपने बच्चों के साथ और अपने समुदाय की बहू बेटियों को यहीं छोड़ दो और चले जाओ।" जो लोग पहले पलायन कर गए वह तो अपने साथ रुपये पैसे ले गए पर जिन्होंने 19 जनवरी 1990 की रात कश्मीर छोड़ा अंदाज़ा लगा सकते हैं उस सर्द रात के दर्द का आप सब।मस्ज़िदों से आ रहा कोलाहल, कश्मीरी पंडितों के घर के बाहर शोर कितनी दहशत रही होगी उस रात की। कश्मीरी पंडितों की पत्नी बेटियों ने खुद को घर के तहखाने में बंद कर लिया अपनी इज्ज़त पर खतरा देख कुछ ने नसें काट लीं तो कुछ ने फाँसी के फंदों को अपना लिया।बेगैरतों ने उनकी लाश तक को नहीं बख्शा। दो महीने के बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया। मैं पूछता हूँ ये कैसा आज़ादी का नंगा नाच था जो घाटी में खेला गया था। वह रात... वह चीखें आज भी मुझे सुनाई देती हैं... 19 जनवरी 1990 की रात मैं तीन साल का था... जब मेरे माँ-बाबा में बहस हुई,माँ ने मुझे और बाबा को घर से निकाल दिया और बोलीं अम्बर जब बड़ा हो जाएगा तब यहाँ एक बार भेज देना इसे।खुद को घर में बंद कर आग लगा ली उन्होंने।मेरी माँ और चाची घर के अंदर जल रही थीं और मेरे पिता-चाचा मुझे लेकर नंगे पैर बेतहाशा भाग रहे थे।ट्रक के तिरपालों में छुपकर हम जम्मू पहुँचे।वहाँ से रिफ्यूजी कैंप में कुछ साल बिताये।एक आलीशान कोठी का मालिक आज तम्बू में कुछ दिन नहीं,कुछ महीने नहीं,बल्कि कई साल गुज़ारने को मजबूर था।जहां आप सबके लिए एक दिन बिताना दूभर होगा वहीँ उस तम्बू में हमने सालों बिताये, बहुत तकलीफ़ हुई थी जब सब कुछ खोने के बाद भी हमें आतंकी समझ हम पर शक किया गया।

हमारा हाल पूछने वाला कोई नहीं,हमारे लिए लड़ने वाला कोई नहीं। आँखों में उदासी और दिल में अपने अपनों से बिछड़ने,अपनी सरज़मीन को छोड़ने का गम लिए जब हम देश के कई शहरों में गए तो हमें 'भगोड़ा और विस्थापित' कहा गया। अपने ही देश में विस्थापित होने की पीड़ा को काश कोई समझ पाता।कल रात को मेरे पिता ने मुझे एक कविता लिख कर भेजी- ज़रूर सुनियेगा शायद आप अंदाज़ा लगा सकें-


‌ "सुनो बर्फ़ पसंद थी न तुम्हें

कई सालों बाद कश्मीर में भारी बर्फ़बारी

जानती हो इस बार भी जब बर्फ जमी होगी तो कुछ स्नो मेन बनाए गए होंगे...

गरम्-गरम् कहवे से उठता धुँआ

अंगीठी में जल रही लकडियाँ

डल झील का जमा हुआ पानी

प्रवासी पक्षियों का कलरव

सफ़ेद दुशाला ओढ़े खड़े पेड़

सब कुछ वैसा ही होगा सिवाय हमारे...

जिस रात तुम्हें खोया था

वह भी बड़ी सर्द रात थी...

खून मानो पत्थर हो गया था...

जब बर्फ़ पिघलेगी फिर से घाटी पर से सफेद चादरें हटेंगी...

काश एक चादर कोई मेरे दर्द पर से भी हटा पाता कभी...

मुझे भी कोई मेरा हक दिला पाता कभी...

एक विस्थापित कश्मीरी से

फिर एक बार कश्मीरी पंडित बना पाता कोई"...


आप सबको इससे क्या जब तक आप पर नहीं बीतती आप किसी की पीड़ा का अंदाज़ा नहीं लगा सकते। हमें कश्मीर में भगोड़ा घोषित कर दिया गया। हमारे घर के बाहर कालिख़ पोतकर बड़े अक्षरों में लिख दिया गया 'भगोड़ा पंडित'।आप सब मुझे भगोड़ा कहें या विस्थापित समझें मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।कहते हैं न 'जननी,जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी' न तो अब जननी रहीं मेरी और न ही जन्मभूमि,स्वर्ग का कोई शौक नहीं बस एक कोशिश करूँगा कि मेरे वे अपने जो अपनी जगह से बिछड़ गए हैं उन्हें उस स्थान तक पहुँचाना है और बाबा भोलेनाथ और माँ खीर भवानी इसमें मेरी मदद करेंगी। जानता हूँ मुश्किल है क्योंकि हमारे पास पैसा भी नहीं है लड़ने के लिए इसलिए पहले अपने आप को आर्थिक रूप से मजबूत बनाऊँगा।जब दो भाई महज़ दो गज़ ज़मीन के टुकड़े के लिए लाठियाँ भांज लेते हैं तो हम तो अपने पीछे अपना पूरा घर,अपनी संस्कृति,अपनी धरोहर छोड़कर आये हैं और ईश्वर की कृपा से एक दिन हम सारे परिंदे वहाँ ज़रूर लौटेंगे।"

अपनी आँखों के कोर पोंछते हुए अम्बर ऑडिटोरियम से बाहर निकल गया और सीधे लाइब्रेरी पहुँच गया।लाइब्रेरी खाली थी किताबों के रैक के पास अम्बर ज़मीन पर अपने घुटनों पर सर रखकर बैठ गया।धरा भी उसके पीछ भागी। लाइब्रेरी में जब उसे कहीं अम्बर नज़र नहीं आया तो कोने से किसी की सिसकी सुनाई दी उसे। रैक के पास कोने में जाकर जब धरा ने उसे देखा तो अपने हाथों से मजबूती से उसने अम्बर के कंधों को थाम लिया। उसके हाथों का स्पर्श पाकर अम्बर ने खुद को धरा की गोद में छुपा लिया। धरा की आँखें भी फूट पड़ीं।अम्बर सिसकते हुए बोला आज की ही रात अपनी माँ को खोया था मैंने।आज भी उनकी सिसकियाँ और चीखें सुनाई देती हैं मुझे। धरा उसके सर को सहलाते हुए बोली- आप भगोड़े नहीं हैं, आप बहुत बहादुर हैं।बहुत देर तक अम्बर सिसकता रह गया जब उसके दोस्त उसे ढूँढते आए तो उन्होंने उन दोनों को साथ पाया। सबको देखकर अम्बर वहाँ से निकलकर अपने कमरे में चला गया। धरा सारी रात हॉस्टल की खिड़की के कोने को पकड़े दूर आसमान में निहारते हुए बहती आँखों के साथ अम्बर के दर्द को महसूस कर रही थी। अम्बर की माँ और चाची की चीखें उसके कानों में गूँज रही थीं।

अगली सुबह सूजी हुई आँखों के साथ चुपचाप लाइब्रेरी पहुँची और कोना पकड़ कर पढ़ने लग गई। अम्बर के आते ही उसका हाथ पकड़कर जाखू मन्दिर ले गई। मन्दिर से पैदल लौटते समय अम्बर से बोली- 'मैं दूँगी आपका साथ।' अम्बर ने एक बार धरा के चेहरे को देखा और बोला- 'जानती हो धरा हमारे पास कुछ भी नहीं है, तुम कैसे साथ दोगी मेरा।एक घर है जम्मू में उसमें हम छ: आदमी रहते हैं वह भी हमारा अपना नहीं। किसी तरह गुज़र बसर होती है बस हमारी। मेरे ख्व़ाब मेरे नाम की तरह ही ऊँचे हैं और वे सब एक नामुमकिन ख़्वाब है। उसे पूरा करने के लिए मुझे नहीं पता अभी कितना जलना होगा। मेरी वज़ह से अपनी ज़िन्दगी खराब मत करो।

अम्बर के हाथों को अपने हाथों में बंद करते हुए धरा बोली- "हम क्यों मिले? कभी सोचकर देखियेगा।मेरा जन्म 19 जनवरी 1990 को रात को एक बजे हुआ था,मैं कॉलेज के पहले दिन किसी का भी हाथ थाम सकती थी पर मेरे हाथों में सिर्फ़ आपका ही हाथ आया? सारी रात मैं इसी सवाल का जवाब ढूँढती रही और सुबह की पहली किरण ने मुझे जवाब दे दिया। कल आप मेरी गोद में इस तरह सिमट गए थे जैसे बच्चा माँ की गोद में और आपको सुकून मिलता देख मेरे मन में बस यही चल रहा था कि आपका दर्द जो मैं इतने अंदर तक महसूस कर सकती हूँ कहीं ऐसा तो नहीं न कि वह वेदना पिछले जन्म में मैंने ही सही हो। आप विश्वास नहीं करेंगे पर अक्सर नींद से मैं चीखते हुए उठ जाती हूँ और आस-पास अग्नि की जलन महसूस करती हूँ। माँ-पापा के अलावा इस बात को कोई नहीं जानता। अम्बर ने कहा- 'इसका मतलब तुम कहना चाह रही हो कि तुम मेरी माँ का पुनर्जन्म हो।' धरा बोली- 'वह तो मैं नहीं जानती पर इतना यकीन से कह सकती हूँ कि जब एक माँ अपने बच्चे के लिए सच्चे दिल से कुछ माँगती है तो भगवान को भी उसे देना होता है।'

टैक्सी स्टैंड पर कुछ देर सुस्ताने के बाद रिज के पास पहुँचकर अम्बर ने जब धरा से अपने हाथ छुड़ाने चाहे तो धरा गुस्से से बोली- 'कोशिश भी मत करना मुझसे दूर जाने की।' अम्बर के हाथों को कसकर थामे धरा हॉस्टल आ गई।

अम्बर और धरा अब साथ ही लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ते। अम्बर धरा को गाइड करता पर धरा का तो सारा मन अम्बर में रमा हुआ था। अम्बर ने धरा को झिड़कते हुए उससे परीक्षा तक दूरी बना ली जिससे वह खुद भी पढ़ सके और धरा भी अपना मन पढ़ाई में लगाए। अम्बर ने कड़े नियम बना दिए जिसका पालन दोनों को करना था।

अब अम्बर लाइब्रेरी के एक कोने में तो धरा दूसरे कोने में बैठती।एक दिन किताबों के रैक में से किताबें निकालकर उसने एक पर्ची अम्बर की ओर बढ़ा दी- "जितनी हसरत से आप लाइब्रेरी की किताबों को तकते हैं और जब आपकी ऊंगलियाँ उलझ जाती हैं न किताबों को चुनने में... उस वक़्त मेरी निगाहें आपको रास्ता दिखा देतीं पर आपकी कमबख्त नज़रें किताबों को छोड़ किसी पर भी नहीं पड़तीं...

काश मैं भी एक किताब होती..."

पर्ची मोड़कर जेब में रखते हुए मुस्कराते हुए अम्बर ने धरा को देखा तो उसकी आँखों में चमक आ गई।

अक्सर अब दोनों लाइब्रेरी में ही टकराते एक दिन अम्बर को जेन ऑस्टेन की पिक और प्राइड एंड प्रेज्यूडिस में मग्न देखा धरा ने। दो दिन बाद उसने भी बुक इशू करवा ली और उसे पढ़कर लाइब्रेरी में किताब जमा करते हुए एक पर्ची उसने अम्बर की ओर बढ़ा दी- " उस दिन आपको जेन ऑस्टेन को पढ़ते देखा था... रमे हुए थे आप किताब में... आपको मग्न देख आखिर हमने भी सौत को इशू करवा लिया और डारसी से मोहब्बत कर बैठे...

कोशिश कर रहे हैं आपके लिए एलिज़ाबेथ बेनेट बनने की...

मुस्कराते हुए अम्बर ने पर्ची जेब में रखी और धरा को पढाई करने का इशारा किया। इसी तरह अब दोनों पढाई में रम गए थे। अम्बर कैट की परीक्षा दे रहा था और धरा फोटोग्राफी में कैरियर बनाने का सोच रही थी। परीक्षा देकर अनमने मन से धरा अम्बर को शिमला छोड़कर दिल्ली वापस आ गई,अम्बर से दिल्ली आने का वादा लेकर।

कुछ दिनों बाद अम्बर ने जब दिल्ली पहुँचकर धरा को कॉल किया तो मारे ख़ुशी के सारा घर सर पर उठा लिया धरा ने। सुबह से वह अम्बर के पसंद की चीज़ें बनाने लगीं। मम्मी के स्कूल और पापा के ऑफिस के लिए निकलते समय उसने कहा- जल्दी आईयेगा शाम को अम्बर को वापस निकलना भी है। कुछ देर बाद जब अम्बर घर आया तो मुस्कराते हुए धरा ने उसका स्वागत किया। अपने साथ बिठाकर उसे अपने हाथों से कश्मीरी दम आलू, कोफ़्ते, ज़ाफ़रानी पुलाव, रोटियाँ खिला रही थी। मन भर कर खाने के बाद मुस्कराते हुए अम्बर बोला- 'तुमने बनाया था न'।धरा हैरानी से बोली- आपको कैसे पता? अम्बर मुस्कराते हुए बोला- इतना सारा भर-भर कर प्यार जो उड़ेला है खाने में।

खाने के बाद धरा अम्बर को अपने कमरे को दिखा रही थी। उसके कमरे को देख अम्बर हैरानी से बोला- 'इतने बड़े कमरे में हम छ लोग रहते हैं।' धरा ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपने पास बिठा लिया।बिस्तर पर बैठे-बैठे धरा घंटों बोलती रही और अम्बर ख़ामोशी से सुनता रहा और उसके कमरे को देखता रहा।धरा ने जब उसके चेहरे के सामने चुटकियाँ बजाईं तब उसकी तन्द्रा टूटी। अम्बर को परेशान देख धरा ने जब उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में थामा तो अम्बर धीरे से बोला- 'मैं शायद कभी तुम्हें इतनी सुविधाएँ न दे पाऊँ धरा। धरा ने अपने होंठ अम्बर के माथे पर रख दिए और बोली- 'शांत...मुझे बस आपके जीवन में थोड़ी सी जगह और आँखों में सुकून चाहिए अम्बर, 0रही बात रहने की तो मेरा परमानेंट एड्रेस आपका दिल है। धरा से अपने आप को अलग करते हुए अम्बर आईने के सामने खड़ा हो गया। अपने अक्श को निहार रहा था तभी धरा ने कसकर उसे गले से लगा लिया और बोली- 'देखो हमारे प्यार को नज़र मत लगाना कभी।' अम्बर ने कसकर गले लगा लिया धरा को और बोला- 'मुझे कभी छोड़कर मत जाना धरा,जब भी मेरे कदम कमज़ोर पड़ें मुझे इसी तरह थाम लेना। मैं लौट आऊँगा धरा।तुम मेरे लिए एलिज़ाबेथ बेनेट मत बनना कभी... मेरे लिए हमेशा कैंडिडा की तरह ही रहना।'मेरी कैंडिडा' मेरे लिए मेरे सारे रिश्तों को खुद में संजो कर। अम्बर के चेहरे से खेलते हुए धरा बोली- 'मतलब अब हमें एक और किताब पढ़नी होगी।' अम्बर मुस्कराते हुए बोला- 'ये किताब तुम्हें पढने की ज़रूरत नहीं है धरा, तुम पहले से ही कैंडिडा की तरह ही हो इसलिए तो तुमसे मोहब्बत है मुझे।' धरा खुद को अम्बर की बाहों में समाते हुए बोली- 'आज जान ले लेंगे क्या आप हमारी ये सब कहकर।' धरा प्यार से अम्बर से बोली- 'आप इतना पढ़ते हैं कभी कुछ लिखते नहीं?' अम्बर मुस्कराते हुए बोला- 'मैं तो मेरी धरा के लिए लिखता हूँ।' धरा धीरे से बोली- कुछ तो सुना दीजिये।अम्बर ने ठीक है कहकर धरा को बिस्तर पर बिठाया और उसकी गोद में सर रखकर लेट गया और धरा की जुल्फों से खेलते हुए गाने लगा-

कैसे कहूँ मैं तुझसे ओ जानां

कितना है मुश्किल यूँ दूर जाना...

दिल की डगर संग जिस पर चले

राह में तन्हा तुझे छोड़ जाना...

कैसे कहूँ मैं तुझसे ओ जानां


पैरों में बेडी सी चुभती वो कसमें

बड़ी नासमझ हैं ये दुनिया की रस्में

कसमों को अपनी तुम भूल जाना

दुनिया की रस्मों को हँस कर निभाना...

कैसे कहूँ मैं तुझसे ओ जानां...


कुर्बतों से फासलों तक

ख़ामोशी से आहटों तक

राब्तों से चाहतों तक

तुमको ही बस अपना माना

कैसे कहूँ मैं तुझसे ओ जानां

कितना है मुश्किल यूँ दूर जाना


हर दुआ में तुझको माँगा

हर नज़र में तुझको ढूँढा

जो भी हूँ मैं तुझ से ही हूँ

तू मिले फिर क्या है पाना

कैसे कहूँ मैं तुझसे ओ जानां

कितना है मुश्किल यूँ दिल का लगाना


मोहब्बत में वादों की कीमत नहीं है

तुम्हें पाऊँ ऐसी तो किस्मत नहीं है

मुकद्दर में उसने लिखा बस यही है

तुम्हें याद करना तुम्हें भूल जाना

कैसे कहूँ मैं तुझसे ओ जानां

कितना है मुश्किल यूँ वादा निभाना।।


अम्बर के चुप होते ही धरा ने उसके पूरे चेहरे को चूम लिया ये कहकर- कि अब यकीन आया कि मैं कहीं नहीं जाने वाली। उसकी बाहों में लेटी धरा बहुत देर तक खुद भी सपने देखती रही और अम्बर को भी दिखाती रही।अम्बर और धरा एक-दूसरे में खो गए थे।

दरवाज़े पर बज रही घंटी ने दोनों को यथार्थ पर ला खड़ा किया।धरा के माँ-पापा थे, दोनों अम्बर से ख़ुशी-ख़ुशी मिले।धरा की मम्मी ने जाते समय अम्बर के हाथ में लड्डू का डब्बा थमा दिया और पापा उसे स्टेशन तक छोड़ने गए।

धरा आज बहुत खुश थी, रास्ते में उसके पापा अम्बर से उसके परिवार के बारे में पूछते जा रहे थे। अम्बर के बताने पर हैरानी से उसका चेहरा देखते हुए बोले- 'धरा बच्ची है, अभी उसे अच्छे-बुरे की समझ नहीं है, तुम शायद मेरी बात समझोगे धरा से मिलना कम कर दो, जिसके भविष्य का कुछ ठिकाना न हो उसके साथ अपनी बेटी का भविष्य एक पिता नहीं देख सकता, उम्मीद है मेरी बातें समझोगे तुम।' जो अम्बर धरा के कमरे को देख महसूस कर रहा था वह उसके पिता ने कह दिया था। जाते समय धरा के पापा ने अम्बर को रोका उसे गले से लगाया और उसके माथे को चूमते हुए बोले- 'मेरा बहादुर बच्चा।' जब कभी ज़रूरत पड़े मुझे याद कर लेना।

ट्रेन में निराशा के भाव लिए अम्बर चल दिया। शिमला पहुँचकर न तो उसने धरा से बात की और न ही किसी और से।चुपचाप अपने कमरे में पड़े अपने अस्तित्व को लेकर सोचता रहता। धरा का रो रो कर बुरा हाल था। जब वह शिमला पहुँची तो अम्बर का ये आखरी सेमेस्टर था और उसने अपने आपको पढाई और श्वेता तक सीमित कर लिया था। श्वेता के साथ बातें अम्बर, धरा को खुद से दूर रखने के लिए करता। जब भी धरा, श्वेता और अम्बर को साथ देखती तो मुरझा जाती।एक शाम पूरी यूनिवर्सिटी में हल्ला हो गया कि अम्बर रैना ने कैट निकाल लिया है और जहाँ तक है उसे आई आई एम् अहमदाबाद मिल जाएगा। धरा के पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। भागते हुए अम्बर के पास पहुँचकर बधाई देते हुए उसने अम्बर को गले से लगा लिया।अम्बर उसे झिड़कते हुए बोला- 'कैट निकालने के बाद अब तुम्हारे पिता को मेरा भविष्य और मेरे भविष्य के साथ तुम्हारा भविष्य भी अब दिखने लगा न, तुम सब स्वार्थी हो, चली जाओ मुझसे दूर धरा, ये सफलता मेरी है इस पर किसी का कोई अधिकार नहीं। डबडबाती आँखों से मूक दर्शक बनी धरा अम्बर को निहारती रही और चुपचाप वहाँ से चली गई। अब अम्बर हमेशा लोगों से घिरा रहता, कई लोगों का आदर्श बन गया था और धरा धीरे-धीरे सबसे कटते चली गई। हमेशा उसके चेहरे पर फैले रहने वाली मुस्कान की जगह ख़ामोशी ने ले ली थी।अहमदाबाद जाने से पहले अम्बर जब एक आखरी बार लाइब्रेरी में आया तो किताबों के रैक के पास ज़मीन पर अकेले बैठी धरा को पाया उसने।उसके सर पर हाथ फेरकर अपना ख्याल रखने का कहकर जब जाने लगा तो धरा ने उसके हाथों में लड्डू थमा दिए ये कहकर कि माँ का प्यार है, इसके लिए मना मत करना। अपनी भरी आँखों में धरा का बुझा चेहरा लिए अम्बर चला गया हमेशा के लिए धरा की ज़िन्दगी से। न तो धरा ने उसे रोका और न ही वह रुका।

धरा ने अपना सारा ध्यान फोटोग्राफी और डाक्यूमेंट्री बनाने में लगा दिया। अम्बर अपनी नई किताबों की दुनिया में व्यस्त हो गया था और धरा किताबों से रिश्ता बनाकर खुद को अम्बर की दुनिया की ओर ले जा रही थी। दो साल के एम् बी ए के बाद आज अम्बर रैना देश का युवा उद्योगपति है।बड़ी-बड़ी मैगज़ीन इस कश्मीरी पंडित की कामयाबी से भरी रहती हैं। पहले जिससे दोस्ती करने से पहले लोग सोचते थे आज उससे अपना रिश्ता बताते नहीं थकते थे। इन सबसे बहुत अलग धरा, अपनी ही बनाई हुई दुनिया में खोई हुई थी। कुछ दिन पहले वह जम्मू गई थी अम्बर के पिता से मिलने उसका नाम सुन उन्होंने धरा के सर पर हाथ रख दिया और बोले- मेरा बेटा बेवकूफ है धरा। उनके साथ ही उन सभी विस्थापित कश्मीरियों से मिली धरा जिन्होंने अपना घर खो दिया था। धरा उन पर डाक्यूमेंट्री बना रही थी।बहुत बड़ा जोखिम उठाकर धरा कश्मीर गई थी। कश्मीरी पंडितों के घरों की तस्वीरों को कैद कर उसने बी बी सी के लिए एक रिकॉर्डिंग बनाई थी।जब वह अम्बर के घर के सामने पहुँची तो जले हुए घर को देख डर गई। उसने घर के पैर छुए, अम्बर की माँ को प्रणाम किया और उनकी सिसकियाँ उस घर में महसूस कर रही थी धरा। बुझे मन से उसने डाक्यूमेंट्री बनाई- कि आखिर कब कश्मीर के परिंदे अपने घरों को लौटेंगे।प्रसिद्ध कश्मीरी पंडितों को उसने उनके घरों के साथ नामांकित किया था।

धरा की बनाई हुई डाक्यूमेंट्री ने फिर से एक बार कश्मीरी पंडितों के दिलों में वही जुनून भर दिया था घर वापसी का।


धरा... धरा... धरा... की आवाज़ ने धरा की तन्द्रा तोड़ी और वह अतीत से बाहर वर्तमान में आ गई। उसकी सहेलियाँ उसे कांफ्रेंस हॉल की ओर ले जाने लगीं।भारी भीड़ में धरा की नज़रें एक चेहरे की तलाश में पूरे हॉल में भटक आई थीं।वह चेहरा उसे कहीं नहीं दिखा। धरा ने अपने कदमों को लाइब्रेरी की ओर बढ़ा दिया।

लाइब्रेरी पूरी खाली थी। धरा जैसे ही उस कुर्सी की ओर बढ़ी जिस पर अम्बर बैठता था उसे कान के झुमके रखे मिले।हाथ में उठाकर देखा तो ये उसी के थे। बेचैनी से चारों ओर देख रही थी। टेबल के एक कोने पर उसे उसकी लिखी पर्चियाँ मिलीं जिसमें लिखा था-"लाइब्रेरी में घंटों बैठकर जिन शब्दों की अदला-बदली होती है न अक्सर बिखर जाते हैं वे रिश्ते कॉलेज छूटने के बाद।"धरा पागलों की तरह लाइब्रेरी में उन आँखों को ढूँढ रही थी जिनके पास होने का अहसास उसे दिल्ली से था।धरा की बनाई रिकॉर्डिंग में एक नाम अम्बर रैना का भी था।रिकॉर्डिंग देख अम्बर की आँखें भर आईं थीं।जब उसने डाक्यूमेंट्री बनाने वाली का नाम पढ़ा- 'धरा अवस्थी'।अम्बर भी सब कुछ छोड़कर रीयूनियन के लिए शिमला पहुँच गया था। कुछ देर बाद लाइब्रेरी में एक आवाज़ गूँजी- 'इतनी मोहब्बत धरा, तुम्हारे आगे तो मैं भी हार गया।'

जब धरा पलटी तो सामने उसका अम्बर था। कुर्सी के कोने को पकड़े धरा सालों बाद अपने अम्बर को देख रही थी।होंठों पर मुस्कान के साथ आँसू की धारा फूट पड़ी थीं। आज धरा ख़ामोश थी और अम्बर बोल रहा था- 'जानती हो मैं जब छोटा था तब माँ हमेशा कहती थीं कि एक दिन एक परी आएगी और तुझे बहुत प्यार करेगी तेरे घबराते हाथों को मजबूती से थाम लेगी बस तू उसे मत छोड़ना। मुझसे गलती हो गई धरा माफ़ कर दो। धरा आज फूटकर रो रही थी। अम्बर ने भागकर उसे गले से लगा लिया। सिसकते हुए धरा बोली- "आपके और पापा के बीच में मैं हमेशा पिसती रही और आप दोनों ही ने कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि मैं क्या चाहती हूँ? मेरी ख़ुशी किसमें है? एक छोड़कर चला गया तो दूसरे ने किसी और के साथ बाँधने की कोशिश की।

अम्बर ने हैरानी से धरा को देखा तो वह बोली- मैं तो चाबी से चलने वाली गुडिया हूँ न जिसने जैसी चाबी भर दी बस वैसे ही चलना है। धरा के हाथों को अपने हाथों में मजबूती से थामकर उसे चूमते हुए अम्बर ने कहा- 'अब कभी ये हाथ मेरी गिरफ़्त से आज़ाद ही नहीं हो पाएँगे।' धरा ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो अम्बर बोला- अब हमारे बीच कोई भी नहीं आ सकता धरा,तुम्हें क्या लगता है कि कोई एक अंगूठी पहना कर तुम्हें मुझसे दूर कर सकता है। जिनका मिलना किस्मत ने तय कर रखा हो उसे कोई नहीं बदल सकता। जानती हो अंत समय में मेरी माँ ने मेरे लिए खुशियाँ माँगी होंगी भगवान से और तब तुम्हारा जन्म हुआ।तुमसे मेरी सारी खुशियाँ हैं,अब तुम चाह लो तब भी मुझसे दूर नहीं जा पाओगी।धरा मासूमियत से बोली- फिर श्वेता का क्या होगा? अम्बर बोला क्या होगा? अभी परसों बिटिया हुई है उसके यहाँ। श्वेता मेरे अंकल की बेटी है और मेरी ही तरह वह भी कश्मीरी पंडित है।

अम्बर ने धरा के हाथों को थाम लिया और लाइब्रेरी के रैक के चारों ओर परिक्रमा करते हुए बोला- "तुम तो जानती हो कि इस दुनिया में यदि कोई मेरे लिए शाश्वत सत्य हैऔर अग्नि के समान ही पवित्र है तो वह हैं ये किताबें और आज इन किताबों को साक्षी मानकर मैं तुम्हारे साथ सात फेरे ले रहा हूँ। धरा उसे हैरानी से देखती रह गई और सात फेरे लेने के साथ-साथ वह सातों वचन भी बोलता जा रहा था और धरा की ऊँगली में पहनी हुई अँगूठी उसने दूर निकाल फेंकी। सात फेरे लेने के बाद वह बोला- 'आज के बाद आप श्रीमती धरा रैना हुईं।' मैं तो इसे ही पवित्र बंधन मानता हूँ पर तुम्हारे घरवाले ऐतराज़ करेंगे इसलिए उनके सामने तुमसे विधिवत शादी करूँगा और रही बात मयंक की तो उसकी तुम चिंता मत करो, वही एकलौता दोस्त है मेरा जिसे तुमने केसर खिला खिला कर बीमार कर डाला। धरा ने हैरानी से अम्बर को देखा तो वह बोला- 'मयंक के अलावा और किसी पर भरोसा नहीं कर सकता था मैं और तुम्हारे पिता रुकने को तैयार ही नहीं थे।धरा ने खुद को अम्बर की बाहों में छुपा लिया तो उसे किसी के खखारने की आवाज़ आई, पलटने पर पता चला कि मयंक था। तीनों साथ ही दिल्ली लौट आये।

धरा के पिता को मनाकर विधिवत धरा और अम्बर का विवाह सम्पन्न कराया गया। शादी के बाद अम्बर ने धरा से कहा- 'आज के बाद तुम भी कश्मीरी पंडित हो गई और कुछ समय बाद हमारे घर के आँगन में खूब सारे कश्मीरी पंडित खेलेंगे। धरा अम्बर के कान मरोड़ते हुए उसके हाथ में छ टिकट रख देती है।

अम्बर और उसके अपनों के साथ, धरा अम्बर के घर जा रही थी। जले हुए एक लकड़ी के मकान के सामने पहुँचकर उसने सबसे पहले 'भगोड़े पंडित' को मिटाकर अम्बर पंडित लिख दिया। अम्बर के चेहरे पर दर्द और ख़ुशी दोनों थी। धरा ने बैग से इंडक्शन और सामान निकालकर अपने ससुराल में अपनी पहली रसोई बनाई। अम्बर खुश था पर बार-बार उस खौफ़नाक मंजर को याद कर घबरा जाता आज भी उसे चीखें सुनाई दे रही थीं और वह मन ही मन सोचने लगा-

'काश सारे परिंदे अपने घरों को लौट पाते, और ये मुर्दा बस्ती फिर से एक बार बस जाती, काश विस्थापित कश्मीरी पंडित पुनः इन वादियों में स्थापित हो पाते।' कुछ पल उस वीरान बस्ती में बिताकर अम्बर दिल्ली लौट आया इस उम्मीद के साथ कि कभी अपने पूरे घर को नए सिरे से बनवाकर वहाँ बस पायेगा...


© अभिधा शर्मा...

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