मन की जिस आकुलता को लेकर आज आपके बीच आई हूं, हो सकता है आपके लिए कोई नयी बात न हो - ऐसे नयेपन के फेर में रहने की फुरसत भी न हो शायद आपके पास! फिर भी इतनी बात जरूर कहना चाहती हूं कि मैं जिस घर-परिवार में पैदा हुई और आप सरीखे इन्‍सानों की दुनिया में आई, तो उसमें मेरा क्‍या कसूर? अगर इस दीन-दुनिया में मेरी कोई भूमिका मानी ही नहीं जाती, तो उसकी दशा पर मेरे असर की अकारथ चिन्ता क्यों? मैं इस घर-परिवार या जात-बिरादरी के नियम-कायदों में रहना-जीना सही मानती हूं या नहीं, जब इसके चुनाव की छूट मुझे कभी मिली ही नहीं, तो कोई कैसे इस बात का उलाहना मेरे सिर मांड सकता है कि मैं उनकी इस दशा को संवारने-सुधारने के लिए कुछ करती क्यों नहीं? उनकी अच्छी-बुरी में मेरी भागीदारी तो वैसे भी नहीं के बराबर है ना, तो एक बात आप तय मान लें कि एक इन्‍सान के रूप में मुझे जो करना है, वह मैं करती आई हूं और आगे भी करती रहूंगी -- बिना किसी से कुछ उम्मीद रखे, लेकिन किसने मुझसे क्या उम्मीद बांध रखी है और मैं उस पर खरी उतरी या नहीं इस बात की तसल्‍ली आप मुझसे ही क्यों मांगते हैं? दिखती बात है कि एक मनुष्य के रूप में कोई आराम या खुशी के साथ जीना चाहता है तो उसके लिए पूगता इंतजाम तो उसे खुद ही करना होगा - आराम और खुशी न कहीं मांगे मिलती है, न कोई लाकर हाथ में सौंपता - किसी और का हक मार कर हासिल करने का तो सवाल ही कहां?

गाने-बजाने के जरिए अपनी रोजी कमाने वाले परिवार में एक अनचाही औलाद, और वह भी लड़की ! वह अपने लड़कीपने की अवस्था तक पहुंचने को लेकर मां-बाप और घर-परिवार से आखिर कितनी-क उम्‍मीद रखती होगी? इस अवस्था तक लाने में वे उससे जो कुछ चाहते-कराते रहते हैं, उसको लेकर उनसे कुछ पूछने या उस पर ऐतराज करने की गुंजाइश ही कहां होती है लड़की के पास? अपने अधिकार और कर्तव्य के इस अंधे खेल में कौन- कहां अपने अधिकार या कर्तव्य की सीमा लांघ जाए, इसका कौन-कितना-क हिसाब रखता होगा? दीखती बात है कि ऊपर हाथ तो सदा मां-बाप का ही रहता है, इसलिए ऐसे मौकौ पर फैसला करने का हक भी उन्हीं के पास रहता है। यह आम-सी बात है कि मां-बाप ऐसे मौकों पर अमूमन अपनी सुविधा और सहूलियत पहले देखते हैं और वही बरताव उनकी आदत बन जाता है।

उस घर में जन्म लेने के बाद हम पांच भाई-बहनों को, जिनमें चार तो हम बहने ही थीं, कब क्या करना है, यह बात न कभी किसी को बतानी- समझानी पड़ी औ न किसी ने इस बारे में कभी पूछा ही। पिता अपनी जवानी के दिनों में अच्छे सारंगीसाज और गायक रहे, जिसकी बदौलत कुछ बरसों तक तो ठाकुर घरानों और रईसों के बुलावों पर उनके मांगलिक अवसरों पर वे रजवाड़ी गीत गाने जाते रहे, लेकिन पिछले सालों में ऐसे बुलावे घटकर अब गिनती के ही रह गये थे। हारमोनियम और कैश्यिो के जमाने में सारंगी का तो काम ही क्‍या, सो उन्होंने भी उसके तार उतार कर लटान पर रख दिया। पीने की आदत के कारण स्वर में भी वह सुरीलापन कहीं बिला गया। इन्हीं बरसों में आम घरों में ब्‍याह-सगाई के मौकों पर मां के गीतों की मांग जरूर बढ़ती गई और बड़ी बहनें यशोदा और गौरी अपना स्वर सम्हालते ही मां के साथ संगत में लग गईं थी। तीसरे पायदान पर आए भाई गणपत ने बचपन से कुछ अलग ही रुझान रखा और इस पुश्तैनी पेशे में उसका मन भी कम रमा। हां, अपनी मन-मरजी की मौज में ढोल जरूर अच्छा बजा लेता था।

मुझे तो लगता है कि एक के पीछे एक, जिस तरह हम सभी बच्चे इस घर में आते रहे और अपना आपा सम्हालते रहे, इस बारे में हमारे मां-बाप को यह सोचने की फुरसत शायद मिली ही नहीं कि हमारी जिन्दगी आखिर किस करवट में बैठेगी। अगर हुई होती तो वे इतना ध्यान तो जरूर रखते कि एक इनसान के रूप में जिन्दा रहने के लिए अपने पास कुछ गुंजाइशें और हौसला ज़रूर सहेजकर रखते। सभी के लिए रहने लायक घर, दो वक्त की पूगती रोटी, पहनने-ओढ़ने के लिए जरूरत भर के कपड़े और देने के लिए कोई एक छोटा-सा सपना तो जरूर होता। क्या कभी इन जरूरी बातों पर उन्होंने ठहर कर विचार किया होगा? मुझे तो नहीं लगता।

हमारी मां भी जैसे इन्‍सानी आकार में ढली कोई मशीन थी शायद, और हम उस सांचे में ढलते साज, जो आकार लेते ही अपने सुर-ताल में खुद बजने लगे थे। मैं इस बदलती सरगम का चौथा स्वर-साज थी - वाधू! शायद लोगों के दबाव में मां-बाप ने मेरा यही नाम कुबूल कर लिया था। जब तक मुझे इसका बोध होता, समूचे गांव और जान-पहचान के दायरे में मेरा यही नाम चलन में आ चुका था। आज सोचती हूं, अगर और बहनों की तरह मैं भी दबी-छिपी जी लेती, तो न यों नज़र में आती और न किसी को कोई उम्मीद या शिकायत ही रहती - नाम के अनुरूप अजानी वाधू (अतिरिक्त) ही रह जाती। यों मुझसे छोटी बहन बीना के बाद भी एक जिन्दगी के आने की उम्मीद फिर जगी थी, पर वह अधबीच में ही लोप हो गई। पर अजब बात ये कि उसका उलाहना भी आखिर बीना के सिर ही मंढ़ा गया कि वह आने वाले भाई को खा गई! बहाना यह कि उसने मां के गर्भवती होने के बाद तक उसका दूध पीना छोड़ा ही नहीं, उसकी देह का सारा ताप तो वही पी गई। भाई तो गया सो गया ही, पांच महीने बाद मां भी रुखसत हो गई। यों बीना का नाम भी मेरी ही तर्ज पर आयचुकी सुझाया गया था, लेकिन इस बार मां ही अड़ गई कि लड़कियों का नाम इस तरह न बिगाड़ा जाए, जो नक्षत्र के हिसाब से आए है, वही रख लिया जाए और इस तरह उसे बीना नाम नसीब हुआ। हम छोटी बहनों में तो इस बात का अहसास कभी पैदा ही नहीं हुआ कि मां का होना या न होना क्या मायने रखता है। हमारे लिए तो बड़ी बहन यशोदा ही मां जैसी थी। यदि गोद और कांधे का कोई मान-मतलब होता है तो उन दिनों वही हम छोटी बहनों और भाई का सबसे बड़ा सहारा थी। वह जब तक ब्‍याह करके अगले घर नहीं चली गई, हमेशा हमारी ढाल बनी रही।

यशोदा ने बचपन से ही मां के साथ रहते हुए वे सारे काम अपने जिम्मे सम्हाल लिये थे, जो घर चलाने के लिए जरूरी थे। वह औरतों के बीच बैठकर ढोल पर अकेली अच्छा गा-बजा लेती थी। रतजगे और विवाह की सारी रस्में वह जानती थीं। हम बहनों को भी वह अपने साथ जोड़ लेती थीं। एक विवाह में हम बहनों को साथ गाते देखकर गांव के स्कूल-मास्टर गिरिजाशंकर न जाने क्यों यशोदा को यह सलाह दे गये कि उसे हम छोटी बहनों को पढ़ने के लिए स्कूल जरूर भेज देना चाहिए। वह खुद तो सारे समय घर में और गांव में अपनी वृत्ति के काम में लगी रहतीं, लेकिन हम छोटी बहनों का मास्टरजी के कहे मुताबिक उन्‍हीं के स्कूल में दाखिला जरूर करवा दिया। शुरू में यह उसकी परेशानी भी रही होगी कि उसे सारा दिन घर में हम सब की सार-संभाल करनी होती थी, ऐसे में मास्टरजी की इस सलाह में उसे राहत ही दिखी होगी कि स्कूल में हम दो आखर सीख लेंगे और उसे भी घर संभालने में थोड़ी राहत मिलेगी। मेरे साथ गणपत और बीना भी स्कूल तो जरूर जाते, पर पढ़ाई में उनका मन कम ही लगता था।

मास्टर गिरिजाशंकर मेरे लिए इस दुनियां में एक ही आला दरजे के इनसान बनकर सामने आए। अपने नाम के अनुरूप नेक और संगीत के अच्छे जानकार। हारमोनियम बजाने में तो उनकी जोड़ का आस-पास कोई मिलना ही असंभव था। इस लिहाज से वे समूचे हलके में बहुत सधे हुए कलाकार के रूप में जाने जाते थे। गांव में किसी के यहां रात्रि-जागरण होता तो उन्हें बहुत आदर से बुलाया जाता। जितना मधुर स्वर उतनी ही असरदार वाणी के पाठ की व्याख्या। अच्छे-अच्छे भागवतकारों को पीछे बिठाते थे, लेकिन वे पूजा-पाठी पंडित नहीं थे। सरकारी स्कूल में हिन्दी और संगीत के सर्वप्रिय अध्यापक थे। स्कूल में बच्चों को अक्षर-ज्ञान तो कराते ही थे, जिस बच्चे में रुझान दिखाई देता, उसे अलग छांटकर घंटों उससे अभ्यास कराते। मुझे तो उन्होंने शुरू से ही अपनी देखरेख में रख लिया था। पहली बार जब मुझे अपने पास बुलाकर कोई गीत सुनाने को कहा तो मैं तो इतना घबरा गई कि एकबारगी तो जैसे मेरा स्वर ही बंद हो गया, लेकिन फिर उन्होंने धीरे-धीरे मेरा हौसला बढ़ाया और जाने उन्हें मेरे स्वर में ऐसा क्या मिल गया कि उन्होंने तो स्कूल में गाने वाले बच्चों में मुझे जैसे हमेशा के लिए अलग ही छांट लिया। स्कूल में जो भी आयोजन होता, और कोई बच्चा गाये या न गाये मेरा गाना तो तय था। वे घंटों मुझे अभ्यास में लगाये रखते, गाना ही जैसे मेरी पढ़ाई थी। मुझे भी सूखी पढ़ाई की बनिस्पत इसमें ज्यादा आनंद आता और पगली की तरह रागोलियां करती रहती। गीत तो हम बचपन से ही सांझ-सवेरे गाया ही करती थीं और विवाह-सगाइयों में यशोदा को सहारा भी देती थीं, लेकिन गांव की लड़कियों की देखा-देखी थोड़े हाथ-पांव भी घुमाना सीख गई। इससे सगाई-ब्याह के बुलावों में घोल की अच्छी उवांरगी भी मिलने लग गई। स्कूल से पांचवें दर्जे तक आते-आते तो सारे गांव और आस-पास के हलके में यह हल्ला मच गया कि वाधूड़ी के जोड़ की गाने वाली और नाचने वाली लड़की सारे जिले में मिलनी मुश्किल है। पांचवां दर्जा पास करने से पहले मास्टरजी ने मुझ पर एक अहसान और किया - उन्होंने स्कूल रिकार्ड में मेरा नाम वाधू से बदलवा कर वसुधा करवा दिया, ‘वसुधा पंवार’, और इसी नये नाम से स्कूल में और बाहर कई अच्छे आयोजनों में इनाम-इकरार भी पा लिये। इससे निश्चय ही मेरे हौसले में अपूर्व बढ़ोत्तरी हुई।

स्कूल और बाहरी जलसों में भले ही मेरे गाने की सराहना होती रही हो, पर घर में बापू की मनोदशा पर इसका ज्यादा अनुकूल असर नहीं पड़ा। अच्छी उवांरगी और नेग के लालच में उनकी पूरी कोशिश यही रहती कि मेरे स्कूल पहुंचने में भले विघ्न पड़ जाय, लेकिन गांव में और बाहर से आने वाले बुलावों में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए, जिससे उनको होने वाली आमदनी में इजाफा हो। मुझे ऐसे बुलावों पर जाना कभी अच्छा नहीं लगता, जो मेरे स्कूल पहुंचने में बाधा बनते हों। कई बार ऐसे बुलावों पर बापू के हामी भर लेने के बाद भी मैं जाना टाल देती, जिसका नतीजा यह होता कि बापू अगले दिन मेरे साथ बेतरह गाली-गलौच करते और कभी-कभी तो मुझे उनकी मार भी झेलनी पड़ती। उनका मानना था कि मैं ब्याह-सगाइयों के बुलावों में अपने गायन और नृत्य-कला में जितना निखार ला सकती हूं, उतना स्कूल में नहीं। स्कूल तो उनकी नजर में हम पेशेवर कलाकारों का एक तरह से वक्त ही बरबाद करता है और पढ़ाई के नाम पर फालतू की चीजें सिखाता है। मैंने कई बार अपने गुरूजी को भी अपनी परेशानी बताई, लेकिन वे मेरे घरेलू मामलों में ज्यादा दखल देने की स्थिति में नहीं थे। मेरी परेशानी को देखते हुए उन्होंने इतनी मदद जरूर कर दी कि पांचवें दर्जे की परीक्षा के दौरान ही उन्होंने मेरी ओर से एक आवेदन नवोदय विद्यालय में दाखिले के लिए जरूर पहुंचवा दिया।

यह उनकी सीख और स्नेह का ही सुफल रहा कि पांचवी पास करते ही मेरा नवोदय के लिए चयन हो गया, जहां गांव के चुनिन्दा जरूरतमंद बच्चों को सरकार की ओर से सारी सुविधाओं के साथ स्कूल के हॉस्टल में रखकर पढ़ाया जाता है, ऊपर से सरकार कुछ जरूरतमंद बच्चों को वजीफा भी देती है। मुझे नहीं मालूम कि मुझमें कोई प्रतिभा थी या नहीं, लेकिन मुझे ये सारी सुविधाएं मिल गई और मेरे लिए तो यह व्यवस्था एक तरह से वरदान ही साबित हुई, लेकिन बापू को यह बात कतई पसंद नहीं आई। वे तो अड़कर ही बैठ गये कि मुझे घर से बाहर कहीं नहीं जाने देंगे। मास्‍टरजी ने उन्हें बहुत समझाया कि इससे लड़की का भविष्य सुधरेगा, लेकिन उनके तो दिमाग में बात बैठी ही नहीं। आखिर मुझे यशोदा का सहारा लेना पड़ा। शुरू में तो वह भी बापू की ही तरह थोड़ी अनमनी और उदासीन बनी रही। लेकिन बड़ी बहन होने के नाते उसने यह कभी नहीं चाहा कि हम छोटी बहनों के साथ कोई जोर-जबरदस्ती करे। जब मैंने उसे अपना पक्का इरादा बता दिया कि मेरे नवोदय जाने का यदि ज्यादा विरोध किया गया तो मैं सभी को छोड़कर कहीं निकल जाऊंगी, फिर भले ही ढूंढ़ते रहना। मेरी यह धमकी काम आई और उसने रात में बापू को राजी कर लिया। दूसरे ही दिन वह खुद मुझे जयपुर के करीब पावटा के नवोदय विद्यालय पहुंचा आई।

नवोदय में जब मैं आई तो मेरी उम्र बारह-तेरह के बीच की रही होगी, लेकिन कद-काठी ठीक होने से मैं खासा बड़ी लगती थी। पहने-ओढे़ तो जैसे पूरी युवती ही। रंग-रूप में भी दिनो-दिन निखार आता जा रहा था। नवोदय के पहले बरस में जब दो-चार स्कूली आयोजनों में मुझे भी गाने का अवसर मिला तो अपने मीठे स्वर और बेहतर प्रस्तुति के कारण तुरंत ही मेरी गिनती अच्छा गाने वाले बच्चों में होने लगी और स्कूल के अध्यापकों की नजर भी मुझ पर टिक गई। संगीत की अध्यापक अनीताजी यों तो मुझे पहले कार्यक्रम से ही पसंद करने लगी थी, लेकिन एक बार जयपुर में गिरिजाशंकरजी से हुई मुलाकात के दौरान जब उन्हें यह जानकारी मिली कि लोक-गायन और नृत्य में मैं अच्छी तैयारी रखती हूं, तो उन्होंने जयपुर से वापस लौटते ही मुझे अपने संरक्षण में ले लिया। वे खुद भी कत्थक की अच्छी नर्तक रह चुकी थीं। नृत्य के साथ शास्त्रीय संगीत का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था, जबकि मेरा तो पारंपरिक लोक-गायन और लोक-नृत्य में ही थोड़ा-बहुत अभ्यास था। लोग कहते हैं, मेरी देह में गजब की लोच थी। साथी नृत्यांगना के साथ लूहर लेने में तो मैं स्टेज पर फिरकी की तरह घूमने लगती थी।

इन पांच-छः वर्षों में मुझे पढ़ने और अपनी रुची को निखारने के जो अवसर मिले, उनमें मैं ऐसी मगन रही कि कब मैंने हाई स्कूल और सीनियर सेकेण्डरी पास कर ली और कब एक नयी कलाकार के रूप में मैं चर्चित हो गई, उस पर कभी ध्यान ही नहीं गया। इन वर्षों में मेरी प्रस्तुतियों से स्कूल का नाम और रुतबा तो बढ़ा ही, प्रदेश और देश के बाहरी मंचों पर भी मेरी लोक-गायकी और नृत्य-कला को अच्छी इमदाद मिली। जिन दिनों मैं सीनियर सेकेण्डरी में पढ़ रही थी, उन्हीं दिनों ऑल इंडिया रेडियो से स्वर परीक्षा के लिए बुलावा आने पर मैं उसमें भी शामिल हुई और बाद में उसका परिणाम आने पर मुझे आश्चर्य हुआ कि मुझे सीधे बी-हाई ग्रेड में पास कर लिया गया है। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था और उसके कारण रेडियो, टी.वी., पर्यटन के आयोजनों में मुझे लगातार बुलावे आने लगे।

इसी दौरान जब मुझे दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में आकाशवाणी के सालाना उत्सव में अपना एकल-नृत्य प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया, तो मैंने इस अवसर के लिए बहुत मेहनत से तैयारी की, हालांकि मैं बहुत आशंकित थी, लेकिन अनीताजी की हौसला-अफजाई और उनके साथ से मैंने उस आयोजन में अपने लोक-नृत्य और भवाई के अलग-अलग रूपों में ऐसे करतब दिखाए कि लोगों की आंखें खुली की खुली रह गईं। दूसरे ही दिन दिल्ली के सारे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में मेरी नृत्य मुद्राओं की ऐसी रंगीन तस्वीरें छपीं कि मैं तो जैसे रातों-रात सारे मुल्क में चर्चित हो गई। मैं अनीताजी की बहुत अहसानमंद हूं कि ऐसी तमाम जगहों पर वे मेरी संरक्षक की तरह साथ खड़ी रहीं और मेरी हरेक प्रस्तुति को उन्होंने खुद अपनी देखरेख में तैयार करवाया।

नवोदय से सीनियर सेकेण्डरी पास करने के बाद मेरे पास इतनी गुंजायश बन गई थी कि मैं जयपुर में कॉलेज की पढ़ाई के लिए निर्णय ले सकती थी। खुद अनीताजी ने मेरे साथ जयपुर आकर कॉलेज में दाखिला करवाया और लड़कियों के हॉस्टल में मेरे लिए रहने का पूरा बंदोबस्त करवा दिया। पढ़ाई के साथ एक पेशेवर कलाकार के रूप में मेरा जुड़ाव संस्कृति मंत्रालय, पर्यटन विभाग, संगीत नाटक अकादमी और रेडियो-टी.वी. से पहले ही हो चुका था, जिसकी वजह से उनके कार्यक्रमों में मेरी हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही थी। इन्ही आयोजनों की वजह से मेरी आर्थिक जरूरतें भी आराम से पूरी हो जाती थी। पं. गिरिजाशंकरजी, अनीताजी, संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्षा सुधाजी और कई बड़े कलाकारों की सलाह और संरक्षण तो मेरा पुख्ता आधार था ही।

कॉलेज के इन वर्षों में घर से मेरा संपर्क बहुत कम रह गया था। जयपुर आने के बाद दो-तीन बार बीना के बुलावे पर जब भी जाना पड़ा, उसे लगातार किसी न किसी परेशानी में ही पाया। यों नवोदय में दाखिले के दो बरस बाद यशोदा और गौरी के विवाह के अवसर पर तो गांव आना हुआ ही था, उससे अगले बरस गनपत की सगाई के मौके पर भी आना हुआ, लेकिन जितनी बार भी गांव आई, बापू की एक ही रट रहती कि मैं पढ़ाई समेटकर तुरन्त वापस गांव आ जाऊं। वे मेरा और बीना का जल्दी से जल्दी ब्‍याह कर देना चाहते थे। मुझे उनके इस रवैये से चिढ़-सी होने लगी थी। अजीब पिता हैं, उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि मैं उन पर बिना कोई बोझ रखे अपनी पढ़ाई करने में लगी हुई हूं, या कि प्रदेश में एक नयी कलाकार के रूप में अपना नाम कमा रही हूं। एक शिकायत उन्हें यह भी थी कि इन वर्षों में मैंने कलाकार के रूप में जो कुछ कमाया है, वह उन्हें क्यों नहीं सौंप दिया। यह सही है कि बाहर के आयोजनों में मुझे कुछ आर्थिक लाभ जरूर होता था और वह सारी बचत मैं एक बैंक खाते में अपनी भावी जरूरतों के लिए संचित कर रही थी। मैं यह बात अच्छी तरह जानती थी कि आने वाले दिनों में कॉलेज और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के समय मुझे इस बचत की बहुत जरूरत पड़ेगी।

बापू और भाई के अटपटे व्यवहार के कारण घर से मेरी दूरी लगातार बढ़ती जा रही थी। इन वर्षों में मेरा घर में आना-जाना काफी कम हो गया था। यशोदा और गौरी के विवाह के बाद तो घर की हालत और भी बिगड़ गई थी।

पिछली बार मैं गणपत की शादी में घर से बुलावा आने के समय गई थी। उन दिनों मेरी बी.ए. की परीक्षा सिर पर थी, इसलिए सिर्फ शादी के मुख्य आयोजन में शरीक होकर दो दिन बाद ही वापस जयपुर लौट आई थी। बड़ी बहनें और बाकी रिश्तेदार भी आए थे और मेरे पहनावे को देखकर सभी ऐसे घूर रहे थे, जैसे मैं कोई अजूबा होऊं। दबे स्वर में कुछ लोगों ने मुझे अपने कब्जे में लेने के लिए बापू को ललचाने वाले प्रस्ताव भी दिये, ऐसे में जल्दी ही मेरा वहां से मन उचट गया और शादी की रस्म पूरी होने के दूसरे दिन ही मैं अपनी परीक्षा का बहाना लेकर वहां से लौट आई थी। लेकिन इन दो दिनों में भी घर की दुर्दशा मुझसे छिपी नहीं रह सकी।

गणपत की शादी के डेढ़ बरस बाद इस बार सिर्फ बीना की चिन्ता को लेकर गांव आई हूं, सो भी बिना बुलाए। जबकि इसी डेढ़ बरस में बापू ने कई बार बुलावा भिजवाया था, लेकिन मेरी घर आने की कोई इच्छा नहीं रह गई थी। जानती थी कि मुझे गांव क्यों बुलाया जा रहा है, जबकि मेरी बापू के प्रस्तावों और उस माहौल में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी। लेकिन इन्हीं दिनों जब मुझे बीना के साथ हुए एक हादसे की उड़ती-सी जानकारी मिली, तो मुझे लगा कि उसकी मदद के लिए मुझे जरूर जाना चाहिए। मुझे दो बातें जानकर बेहद तकलीफ हुई - पहली तो यह कि बापू जरूरत से ज्यादा पीने लगे हैं और दूसरी उससे भी बड़ी चिन्ता की बात यह कि बीना का चाल-चलन गांव वालों के लिए चर्चा का विषय बनता जा रहा था। घर पहुंचकर जब मैंने उसे अकेले में अपने पास बिठाकर हकीकत जाननी चाही तो पहले तो वह इसी बात पर बिफर गई कि मैं भी गांव वालों की सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करके उससे बात करने आई हूं और अगर उसके साथ कुछ बुरा हुआ है तो मैं उसकी क्या मदद कर सकती हूं? जब मैंने बहुत जोर देकर कहा कि मैं किसी के कुछ कहने से कोई धारणा नहीं बना रही हूं, मैं तो स्वयं उसी के मुंह से उसकी परेशानी जानना चाहती हूं, मदद क्या कर पाऊंगी, इसका फैसला तो सारी बात जानने के बाद ही हो सकेगा। मेरी हमदर्दी से आखिर उसका कठोर चेहरा थोड़ा नर्म पड़ा और कुछ ही क्षणों में उसकी आंखों से आंसू बह निकले। उसकी शिकायत थी कि घर में कोई उसकी परवाह नहीं करता, घर में अगर खाने-पीने का सामान निवड़ जाए तो उसी को भाग-दौड़ करके इंतजाम करना पड़ता है, बाप और भाई दोनों छककर दारू पीते हैं और कभी-कभी तो उस पर हाथ भी उठा देते हैं। ऐसी हालत में पड़ौस में हमारी चाची के पास जाकर रात बितानी पड़ती है।

और फिर उसने ज्यादा कुरेदने पर वह वाकया भी बताया, जिसने उसकी सारी उम्मीदें हिलाकर रख दी हैं। उसने बताया कि पिछले दिनों एक सेठ के घर उनके लड़के की शादी के समय रतजगे की रस्म में गीत गाने वह भी चाची के साथ उनके घर गई थी। वहीं रात को गाने दौरान किसी ने उसे शरबत में कुछ ऐसा मिलाकर पिला दिया कि उसे चक्कर आने लगे। जब तबियत बिगड़ने लगी तो सेठ के लड़के ने यह कहकर कि वह उसे घर पहुंचा देगा, उसे अपनी गाड़ी में बिठाकर निकल गया। रास्ते में कब उसे बेहोशी ने घेर लिया, उसे इसकी कुछ जानकारी नहीं रही। शायद दो-ढाई घंटे बाद जब उसे होश आया तो उसने अपने को एक अनजान जगह पर किसी और लड़के के साथ पाया। कमरे में लैंप की मद्धिम-सी रोशनी थी। उसने लड़के की ओर देखा तो वह बेशर्मी से हंस रहा था। अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों और शरीर की दुर्दशा से लगा था कि उसके साथ जो अकाज होना था, वह हो चुका है। वह उसे परे धकेलकर पलंग से उठ खड़ी हुई और जगह को पहचानने की कोशिश की। ज्यों ही लड़के ने उससे बात करनी चाही, उसने पलटकर एक चांटा उसके मुंह पर जड़ दिया और गालियां देती हुई वहां से बाहर निकल आई। बाहर आते ही वह इलाके को पहचान गई, यह उसी सेठ का फार्म-हाउस था, जो गांव के पास ही एकान्त में पड़ता था। खुद सेठ का लड़का बाहर ही खड़ा था। बाहर निकलने पर सेठ के लड़के ने उसे राजी करने की पूरी कोशिश की, उसे हर तरह के प्रलोभन दिये, यह भी कहा कि वह उसे उसके घर के पास छोड़ देगा लेकिन वह उसे हिकारत से देखती हुई बिना वक्त गंवाए, पैदल ही आधी रात को अपने घर की ओर रवाना हो गई। जब घर पहुंची तो देखा कि बाप और भाई दोनों नशे में बेहोश पड़े थे, ऐसे में वह किसके आगे फरियाद करती। सुबह जब देर से उसकी आंख खुली, तब तक उनका कहीं अता-पता नहीं था। दूसरे दिन किसी ने उनके आगे न जाने क्या बात बनाकर बहका दिया कि वे दोनों उल्टे उसी पर लांछनों की बौछार लेकर आ चढ़े, उसके साथ वास्तव में क्या-कुछ घटित हुआ, यह जानने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। कोई कह रहा था कि सेठ ने पहले ही उन्‍हें खिला-पिलाकर अपने वश में कर लिया था और तब से लगातार उल्टे उसी को बदनाम करने की कोशिशें की जा रही हैं। ऐसे में उसका गांव में जीना दूभर हो गया है।

‘‘अब तू ही बता, मैं किसके आगे पुकार करूं? और यहां कौन है मेरा धणी-धोरी? मैं तो लाठी और भींत के बीच में आ गई हूं, जीने के लिए जो जरूरी लगता है वह काम कर लेती हूं, हालांकि ऐसे जीने में कोई सार है नहीं, पर तू विश्वास रख, मैं अपनी जांण में ऐसा कोई काम नहीं करती, जिससे खुद मुझे ही शर्म आने लगे, लोगों को तो बातें करने का मौका मिलना चाहिए...! यों घर में मुझे कोई खाता नहीं, लेकिन इन बाप-भाई के नाम से तो मुझे चिढ़ ही हो गई है। ज्यादा भली चाची भी नहीं है... वह भी अपनी सारी बेगारें निकलवा कर ही पीछा छोड़ती है, लेकिन इन दोनों से तो वही ठीक है... कम-से-कम रात-विरात उसके पास डर तो नहीं है!’’

‘‘पर तेरी तो सगाई भी हो रखी थी न, फिर शादी का क्या हुआ? गणपत के साले से ही तो होनी थी?’’ इस हालत में मुझे यही उपाय सूझ रहा था।

‘‘लड़का तैयार है, पर उसके बाप को रोकड़े चाहिएं। उनकी बेटी की शादी हो गई, सो अब वह गरज भी मिट गई। इन बाप-बेटों की हालत तू देख ही रही है! अगर किसी के ब्याह-सगाई में कुछ गा-बजाकर बचा लूं, तो ये मुझे पकड़ कर लूम जाते हैं। बीरे के पीछे जो भाभी आई है वह इनसे भी आगे निकलने को तैयार बैठी है, उसे तो मैं फूटी आंख नहीं सुहाती! उसने हारे हुए स्वर में उत्तर दिया था।

घर में पहली बार लगा कि बीना को वाकई मेरी जरूरत है। मैं इस घर के लिए और कुछ कर पाऊं या न कर पाऊं, बीना की मदद तो करनी ही होगी। मैंने उसी दिन अपने गुरू गिरिजाशंकरजी को उनके घर जाकर बीना की सारी परेशानी बताई, उन्होंने अगले दिन सुबह ही मेरे साथ रामगढ़ चलकर लड़के के बाप से बात करने का आश्वासन दिया और मुझे वापस घर भेज दिया। रात को घर में बापू और भाई ने मुझसे कोई बात नहीं की। अगले दिन सुबह ही मैं गुरूजी को साथ लेकर रामगढ़ चली गई। संयोग से बाप-बेटे घर में ही थे। लड़का भी गुरूजी का शिष्य रह चुका था। सभी उनका बहुत आदर-सम्मान करते थे। लड़का चूरू में एक बैंड-बाजे के समूह में ट्रम्पेट बजाने का काम करता है, वह बीना को खूब पसंद करता है। मेरे पास पंद्रह-बीस हजार तक खर्च करने की गुंजाइश थी, जो मैंने गुरूजी को पहले ही बता दी थी। गुरूजी ने समधी जी से एक महीने बाद शादी की तारीख पक्की कर ली, बीना के लिए और कोई रास्ता नहीं बचा था। उनसे बात पक्की कर हम उसी शाम फतहपुर वापस आ गये।

शाम को घर के कमरे में बैठकर बाप, भाई और भोजाई को जब मैंने यह खबर दी कि मैं बीना की शादी की तारीख पक्की कर आई हूं, तो बापू तो कुछ नहीं बोले, लेकिन भाई गणपत बुरी तरह से झल्ला गया। उसे यह अपना अपमान लग रहा था। बात सुनकर भोजाई भी मुंह बिचकाए उल्टी घूमकर बैठ गई। एतराज यही कि उनसे बगैर पूछे या बिना सलाह किये मैं तारीख पक्की करने वाली कौन होती हूं। उनका यह रवैया देखकर उन्हें यह याद दिलाना व्यर्थ था कि मैं भी उनकी सगी बहन हूं और बीना का भला-बुरा सोचने का मुझे भी उतना ही हक है जितना कि उनको। पर यह बात मेरे मुंह पर आने से पहले ही गणपत अपने आपे से बाहर आ गया। वह चिढ़ते हुए बोला, ‘‘तूने जब घर से कोई तालमेल रखना ही छोड़ दिया तो यह फैसला लेने का हक तुझे किसने दिया कि तू बीना के मामले में कोई पंचायती करे?’’

‘‘क्यों भाई, मैंने ऐसा क्या गुनाह कर दिया, बीना की सगाई तो तुम्हीं लोगों ने तय की थी न! फिर मैंने अगर समधी को शादी के लिए राजी कर लिया तो तुम्हें कहां कष्ट हो गया?’’ मैंने ठंडे स्वर में उत्तर दिया।

‘‘तूने तो यों ही बिरादरी में हमारा जीना हराम कर रखा है, हर कोई हमें भौंडता फिर रहा है कि तुम्हारी बहन तो सारी दुनियां में नाचती-गाती फिरती है, न कोई लाज-शर्म और न घर-परिवार की चिन्ता!’’ उसने गुस्से में आते हुए मुझ पर पहला आरोप ताना।

मैंने उसका भी धैर्य से उत्तर दिया, ‘‘लोगों के कहने और घर-परिवार की चिन्ता को तो एकबारगी अलग रख, वह तो तू भी जानता है कि कौन-कितनी-क चिन्ता रखता है, मुझे तो यही समझा दे कि मंचों पर गाना और नाचना तुम्हारे लिये लाज-शर्म की बात कब से हो गई। अपने बाप-दादा का तो यह खानदानी पेशा रहा है, जबकि मैंने तो बहुत इज्जत के साथ इसे अपनाया है और इसके जरिये सभ्य समाज में इज्जत और इमदाद ही पाई है, फिर तुम्हारे लिए यह लाज-शर्म की बात कैसे हो गई?’’

‘‘मैं तुझसे बहस नहीं करना चाहता... मुझे तो यही कहना है कि तू जब हमारी वाधू रही ही नहीं, तू तो वसुधा बन गई है... खुद इतनी मन-मरजी करने लगी है कि बाप और भाई को तो किसी गिनती में ही नहीं मानती तो फिर घर में पंचायती किस नाम की करना चाहती है.... तू अपना भला-बुरा देख न... बीना का ब्याह कब होना है, इससे तुझे क्या लेना-देना... वह हम जानें और यह जाने...’’

गणपत के इतने सपाट और रूखे बोल सुनकर एकबारगी तो मैं अचरज में पड़ गई.... मन में गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन उससे अधिक चिन्ता इस बात की हो रही थी कि कहीं बनी हुई बात बिगड़ न जाए... मैं इसी दुविधा में बैठी कुछ जवाब सोच ही रही थी कि इतने में गुस्से से भरी हुई बीना फुंफकार उठी, ‘‘तो अब तू रह गया है मेरा भला-बुरा देखने वाला, ये मेरी मां-जाई बहन है और कुछ भला करने लायक है तो इसके करने से तो तेरी इज्जत उतर रही है.... जिन बहनों के तुझ जैसे भाई और वैसा ही पीछे बाप हो तो उन्हें तो जल्दी ही कोई कुआं या खाड देख लेनी चाहिए! आया बड़ा मेरा भला सोचने वाला... इन पिछले बरसों में देखी नहीं क्या तुम्हारी भलाई.... घर में दो टंक रोटी तो दूर रही, इज्जत से दो घड़ी आंगन में खड़ी रह जाउं वही बहुत बड़ी बात है... तुम लोग मुझे कितना-क सहारा देते हो, वह मैंने अच्छी तरह जान लिया है... मेरी जुबान मत खुलवाओ... मुंह छुपाने को ढक्‍क्‍न नहीं मिलेगा...!’’ गुस्से और अवसाद में बीना की सांस धौंकनी-सी बजने लगी थी और आंखों में आंसू छलछला आए थे, उसका गला अवरुद्ध हो रहा था। मैं बात संभालना चाह रही थी, उससे पहले ही गणपत उठा और गुस्से से पैर पटकता हुआ घर से बाहर निकल गया। बापू वैसे ही नशे में संज्ञाहीन-से बैठे थे और भोजाई भी उठकर कमरे के भीतर चली गई।

यों बात को बीच ही में छोड़कर चले जाने के उपरान्त यह तो स्पष्ट था कि भाई से इस स्तर पर बात करने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया था। बापूजी की हालत को देखते हुए और कुछ कहने-सोचने की गुंजायश बची ही नहीं थी। मैं यह भी जानती थी कि भाई की यह रीस उसकी अपनी कमजोरियों को ढकने का एक मिथ्या बहाना भर हैं - न वह तय की हुई तारीख में कोई विघ्न डाल सकता है और न होते हुए काम में उसकी ओर से कोई सहारा। मैं उससे कोई सहारा मांग भी नहीं रही.... मैंने बीना को ही यह समझाने का यत्न किया कि वह धीरज रखे और यह समझ ले कि जिन लड़कियों के मां-बाप और भाइयों में अपनी जिम्मेदारी उठाने का माद्दा नहीं होता, उन पर ज्यादा निर्भरता दिखाने से कुछ नहीं होता। उन्हें अपना आपा खुद संभाल लेना चाहिए। यों बात-बात पर कुए-खाड की बात सोचना तो एक तरह से अपनी ही कमजोरी उजागर करना है....!

बस, इसी ऊहापोह और आकुलता में मेरा कलेजा भीतर-ही-भीतर छटपटा रहा है कि आज घर-परिवार नाम की संस्था में कमजोरियां इतनी गहरी क्‍यों पैठ गईं कि उस ढंग-ढांचे में कोई हल निकालना ही दुश्‍वार। अपने घर-परिवार और समाज में अगर मनुष्य इतना अकेला और अनसुहाता हो जाए तो फिर किससे बेहतर की उम्मीद बांधें हम.....!

मुझे यह देखकर तसल्‍ली थी कि बीना अब संयत थी और उसकी आंखों में एक आश्‍वस्ति का भाव। अनायास हम दोनों की नजर उस जर्जर कमरे के भीतरी लटान पर धूल से सनी सारंगी पर जा टिकी, जिसमें अब कोई तार-स्वर साबुत नहीं था, उसी कमरे के कोने में रखा वह ढोल, जिस पर मां, यशोदा और और हम बहनों के स्वर कभी परवान चढ़ते थे, उसकी मंढ़ी हुई खाल अब जगह-जगह से चिर गई थी, लेकिन हम बहनों के बीच एक अरसे से बनती-बदलती नयी सरगम उस घर के अंधेरे कोनों-अंतरों में अब भी गूंज रही थी....

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नन्‍द भारद्वाज

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