प्रिये, सोचता हूँ तुम्हें मढ़ दूँ

मूल कविता – प्रकाश गणपत जाधव

सच बेगम,

शाहजहाँ ने मुमताज़ के लिए ताजमहल बनवाया

मगर मैं तुम्हारे लिए कुछ भी न कर सका

छत के लिए कम से कम

चार खंभे भी ठीक से न ठोंक सका

ना ही चार लकीरें खींच पाया चौपाटी की रेत पर

यह अफ़सोस अक्सर मन को सालता है

इसलिए सोचता हूँ कि तुम्हें मढ़ दूँ......

मगर इन तंग हाथों से मैं भला क्या क्या कर सकता हूँ

यह एक गंभीर समस्या

अक्सर सवाल बनकर सूखे की तरह खड़ी हो जाती है

और

चार अंकों की तनख्वाह पाने के बावजूद

मैं तुम्हें दो कौड़ी भी नहीं दे पाया

ना ही तुम्हारे गेसुओं में

फूलों का मामूली गजरा सजा पाया

सच प्रिये,

तुम्हारी इन बड़ी बड़ी आँखों में

बबूल का यह स्पर्श ही तो था

सब कुछ जानते, समझते हुए भी

जीवन की महफिल को तुम

सप्त सुरों से साजाती रही

और मैं

उसी तरह अंदर ही अंदर

लपेटता चला गया

एक सौ बीस, तीन सौ, कच्चा पक्का सुपारी, थंडक, इलायची

चूना कम पान की तरह..........


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