"मंदिर रखने के लिए यह दिशा ठीक नहीं हैअमित, "मेघना अमित को समझाते हुए कह रही थी।
क्यों?इसमे क्या खराबी है।? अमित ने पूछा।
मेघना कुछ जबाब दे पाती उसके पहले ही अमित की मम्मी ने अंदर आते हुए कहा,"
"इतनी बड़ी जगह खाली पड़ी है,यहाँ रखने में क्या परेशानी है?
"मम्मी जी !मैंने पढ़ा है कि मंदिर पूर्व दिशा में होना चाहिए। "मेघना ने हल्के स्वर में कहा।
हाँ! माना पर पूर्व में जगह न हो तो ?मेघना की सास ने प्रश्न किया। मेघना ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसे लगा कि उसके कुछ भी कहने से माहौल गर्म हो जाएगा।
यहीं ठीक है, मम्मी कह रहीं है न,तुम्हें पता नहीं क्यों परेशानी हो रही है "अमित को गुस्सा आने लगा। "पर मैं तो बस वास्तु की वजह से कह रही हूँ "मेघना ने धीरे से कहा।
"क्या जब देखो कोई न कोई अडंगा लगा देती हो,अमित ने जोर से बोले।
"जाने दो बेटा, बहू जहाँ कह रही है वहीं रख लो"। मेघना की सास ने उपहास उड़ाते हुए स्वर में कहा ,पर मेघना जानती थी कि वह सिर्फ दिखावा कर रहीं हैं क्योंकि होगा वही जो वह चाहेंगी। मेघना की बात मानना तो दूर सुनना, समझना भी उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता था।
बात ज्यादा न बढ़े यह सोच कर मेघना चाय का कप हाथ में पकड़े चुपचाप बगीचे में आ गई।
गुलाब की सुंदर क्यारियों को देखते ही उसका मन खिल गया। भीनी भीनी खुश्बू से पूरा बगीचा महक रहा था। फूलों के पास कुर्सी डाल कर मेघना अपने मन को हल्का करने का प्रयास करने लगी।
यह लगभग हर दिन की कहानी हो गई थी। मेघना की सास को घर के किसी भी काम में मेघना का दखल देना जरा भी पसंद नहीं था। छोटे मोटे काम से लेकर हर काम उन्हीं की मर्जी से होता था। कोई भी उनकी बात को नकार नहीं पाता। उसके ससुर कभी कभी मेघना पक्ष ले लेते तो वह उन पर भी झल्ला कर कहतीं,"हाँ! बहू ही पढ़ी लिखी है हम तो बेवकूफ हैं।" ससुर चुप होने में ही भलाई समझते। मेघना की हर बात उसकी सास काट देती चाहे वह मेघना के बेटे प्रशांत के लिए क्यों न हो। मेघना इन सबसे बहुत आहत होती थी। परअमित को कोई फर्क नहीं पड़ता था वह तो बस मम्मी की हर बात सिर माथे पर लगाते और मेघना की भावनाओं को नजरअंदाज करते रहते। बात सही हो या गलत हो या मेघना का मन कितना भी खराब हो जाए पर अमित अपनी मम्मी का विरोध नहीं कर पाते थे। यदि मेघना किसी बात पर बहस करती तो घर में जैसे भूचाल आ जाता। सास ससुर के साथ साथ अमित का भी मुँह फूल जाता और जब तक वह माफी नहीं माँगती तब तक अमित का मुँह बना ही रहता।
आज भी कुछ ऎसा हो गया था।
अमित ने नया मंदिर बनवाया था , उसको रखने के लिए घर में जगह बना रहे थे। मेघना वास्तु पर थोड़ा बहुत विश्वास करती थी इसलिए वह चाह रही थी कि मंदिर वास्तु के अनुरूप ही मंदिर रखा जाए,पर उसकी सास खाली स्थान का उपयोग करना चाह रहीं थी। बस इतनी सी बात पर अमित इतना गुस्सा हो गए थे। अमित का किसी के भी सामने उस पर नाराजगी दिखाना मेघना को बहुत व्यथित कर जाता था।उसने कई बार अलग से अमित को कहा था कि वह सबके सामने उस पर नाराज न हुआ करें अकेले में चाहें कुछ भी कह लें पर अमित जैसे सब भूल जाते।
चाय पीते हुंए मेघना सोच रही थी कि कौन सा घर उसका अपना घर है, जहाँ वह थोड़ा बहुत अपने मन का कर सके। जहाँ उसकी बातों को भी महत्व दिया जाए। अभी दो दिन पहले की ही बात है बाजार से वह एक सुंदर सी दीवार घड़ी लाई थी। बड़े ही मन से उसने ड्राइंगरूम में टाँग दी थी पर शाम को हमेशा की तरह उसकी सास ने कहा- "अरे बहू !नई घड़ी क्यों लगा दी ?अभी तो पहले वाली ही सही चल रही थी। ऎसा करो इसे अपने कमरे में लगा लो। " अमित सामने थे इसलिए मेघना ने चुपचाप घड़ी उतार ली पर उसे बहुत बुरा लगा था।
घर में अपने आप को मेघना हमेशा उपेक्षित सा महसूस करती कभी कभी तो उसे लगता जैसे वह काम वाली बाई की तरह है कि चुपचाप मुँह बंद करके काम करते रहो। मायके में कुल सलाह दो तो अमित टोक देते "अब यह तुम्हारा घर नहीं है अपनी मत चलाया करो "। ससुराल में कुछ कहना चाहे तो कहते "छोड़ो मम्मी पापा जो कह रहे हैं ठीक है "
घर में किसी का विरोध करना मेघना की मंशा नहीं थी पर उसे इस बात का अफसोस होता कि न तो कभी किसी मामले में उसकी राय ली जाती न ही उसकी कोई बात सुनी जाती थी । उसका मन भी तो घर को अपनी तरह से सजाने का करता , पर जरा भी कोई सामान इधर से उधर कर दो तो सासू माँ तुरंत रोक देती "वहीं रहने दो बहू " , हाँ घर के काम की सारी जिम्मेदारी जरूर उस पर यह कह कर डाल दी गई थी कि "तुम्हारा घर है तुम सम्हालो"। और कोई गलती होने पर दुनिया भर की बातें सुनने को मिलती।
पिछले महीने जब बड़ी ननद अपने परिवार के साथ कुछ दिनों के लिए आयीं थी तो मेघना ने बहुत मन से सबका आदर सत्कार किया था। ननद बहुत खुश हुईं थी, पर सासू माँ ने तारीफ तो की नहीं उल्टे तमाम कमियाँ निकाल दी।यह बना देती,वह बना देती। बच्चों को उपहार दिए तो यह नहीं कुछ और देती। कभी कभी मेघना सोचती कि कौन सा घर उसका है जहाँ वह अपनी मर्जी से खुलकर साँस ले सके ,अपनी छोटी छोटी ख्वाहिशों को पूरा कर सके ,जहाँ पति संग प्यार, मनुहार करे तो यह डर न हो ,कोई आ जाएगा, कोई सुन लेगा। आखिर कहाँ है उसका अपना घर? अमित से कभी बातें साझा करना चाहती तो अमित कहते "तुम तो बेकार ही परेशान होती हो घर में सब तुम्हें कितना प्यार करते हैं। "
चाय खत्म हो चुकी थी ,मेघना ने ठंडी साँस छोड़ कर दोबारा खूबसूरत फूलों को निहारा। न जाने क्यों मेघना को लगा जैसे महकते हुए खूबसूरत फूल उससे कुछ कह रहे हैं,वह ठिठक कर फिर फूलों के बीच जा बैठी,उसे लगा मानो फूल बोल उठे थे,"क्यों दुखी होती हो मेघना ,हमारी तरफ देखो न! हम कितने खुश हैं ।जहाँ भी ,जैसे भी लगा दिए जाते हैं बस महकने लग जाते हैं। इतनी सुंदरता और महक के बावजूद भी हमें तोड़ दिया जाता है तो क्या हम खिलना औरं महकना छोड़ देते हैं ? हमारा भी तो कोई अपना घर नहीं है पर जहाँ लगा दिए जाते हैं वहाँ जी भर के खिलते हैं। और अपनी उपस्थिति अपनी महक से साबित करते हैं। मतलब यह कि मुश्किल से घबरा कर हथियार डाल देने बेहतर है कि हम मुश्किल से निकलने का रास्ता खोजें। "
मेघना जैसे नींद से जागी ,उसे महसूस हुआ मानो बिना कुछ बोले ही फूलों ने उसका सामना जीवन के यथार्थ से करा दिया हो। उसने बड़े ही प्रेम से फूलों पर हाथ फेर कर उनको धन्यवाद दिया और घर के भीतर आ गई। अपने अंतर्मन में अचानक वह एक नई स्फूर्ति, और नई ताजगी का अनुभव कर रही थी। एक नई आशा,एक नए विश्वास के साथ के मेघना अपने जीवन के फूलों को सहेजने के जतन में लगने जा रही थी। आखिर उसे भी तो अपना घर फूलों सा महकता हुआ जो बनाना था।

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