मौन स्वीकृति

तुम इन कागजात पर दस्तखत कर दो "।

रात की नीरवता भंग करता हुआ, विवेक का कुछ कंपकंपाता, कुछ स्थिर सा स्वर आसपास के वातावरण में गूंज गया।

कैसे हैं ये पेपर "? क्या लिखा है इनमें "?

स्वयं ही पढ़ लो "।पढी़ लिखी हो "।

रीना ने जल्दी से पढ़ा और उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वह बेहोश कर गिर गई। विवेक घबरा गया। आनन -फानन में उसे होश में लाने की कोशिश करने लगा होश में आने तक उसने अपने आप को और भी मजबूत कर लिया था। क्योंकि लाख चाहने पर भी वह अपनी रीना का साथ नहीं निभा सकता था। वह गहरी सोच में डूब गया।

उसे वह दिन याद हो आया जब उसने नन्ही कलि को जन्म दिया था। देखभाल के लिए सीमा उसकी सलहज उनके पास आई थी। वह और सीमा मिलकर देखभाल करते इसके चलते उनकी कामवाली नौकरानी कमला ने अपने अनुभवों से काफी कुछ भाँप लिया था। पर यह चुप रही। एक दिन विवेक को जल्दी जाना था तैयार हो कर नाश्ता माँगा। सीमा नाश्ता बना रही थी तो उसने कहा _जीजा जी ज़रा प्लेट तो उठा दो"।_अरे सलहज साहिबा इतना तो हमारी घरवाली हमसे नहीं कहती। चलो आपने पहली बार कहा तो ठीक है। हल्की -फुल्की बातचीत के बाद वह नाश्ता करके चला गया।

सीमा ने सोचा कि क्या हुआ गहर -गंभीर जीजा जी का मिजाज कुछ बदला सा था। खैर अब आगे से कोई मौका नहीं देगी। क्योंकि एेसा न हो कि कुछ का कुछ हो जाए।

औफिस में विवेक का मन जाने कैसा हो रहा था। अपने आपमें कुछ दरक गया था। उसने सोचा, नहीं मुझे अपने आप को संभलना होगा। सीमा किसी की अमानत है और मैं भी रीना के प्रति विश्वासघात नहीं करूँगा।

रीना एक दिन बच्ची के साथ सो रही थी कि फुस्फसाहटा से उसकी नींद खुल गई। उसने आवाज लगाई। सीमा पानी

"-अभी लाई। "

"-क्या विवेक आ गये।"

उसके उत्तर देने से भावी समय के आसार का अंदेशा हो गया था।

धीरे -धीरे वक्त बीता बच्ची सवा महीने की हो गई थी। सीमा को विवेक घर पहुंचा आए थे।

समय अपनी चाल से आगे बढ़ रहा था। विवेक आजकल घर सजाने में मगन हो रहा था। आये दिन नई -नई चीजें लाता और सजाता। घर के लिए उसने लोन भी ले लिया। विवेक को अचानक सीमा के शहर उसके काम से जाना पड़ा। हालांकि रीना भी जाना चाहती थी पर विवेक ने बहाना बनाकर मना कर दिया।

विवेक दो दिन के लिए गया था पाँच दिन लग गए। रीना इस बीच घर सजाने के सपने देखने लगी।

भोली रीना को ज़रा शक नहीं हुआ।

अब अक्सर टूर के बहाने वह गायब रहने लगा।

इधर रीना अकेले ही घर व बच्ची को संभालती। इसे लेकर कई बार मन मुटाव हो जाता था। रीना अपने खिलाफ पक रही खिचड़ी से पूर्णतः अनभिज्ञ थी। इधर सीमा भी छुप -छुप मिलने से उक्ता गई थी। उसके दो टूक बात करने से विवेक बुरी तरह बौखला गया था। बोला क्या दिक्कत है तुम्हें। सब कुछ तो दे रहा हूँ। इतना सब सुनने के बाद वह शेरनी की तरह गरज कर बोली तुम्हारे इरादे क्या हैं।

पल भर को सहम गया। सोचा कि अब निर्णय लेने का वक्त आ गया है। तुरंत बोला बस मुझे दो दिन का समय दो। विवेक के मन में उथल -पुथल मची थी। न तो अपनी रीना व बच्ची को छोड़कर रह सकता है न सीमा को। उसकी हालत ऐसी थी मानो इधर कुआँ उधर खाई।

अगली सुबह दोनों की परीक्षा की घड़ी थी। विवेक भावशून्य सा हो कर उठा औफिस जाने के तैयार हो कर नाश्ता माँगा, रीना ने जल्दी से चुपचाप परोसा और विवेक के हावभाव देखने लगी। बिना कुछ बोले विवेक जा चुका था और वह कटे वृक्ष की मानिंद गिर गई। उसकी सारी दुनिया उजड़ चुकी थी। जीते जी उसे अकेले ही रहना होगा। अचानक उसे कुछ सूझा।

उठी और पेपर पर दस्तखत किए, घर से निकल पड़ी। कहाँ गई शाम को विवेक ने देखा टेबल पर दस्तखत किए हुए पेपर रखे हुए हैं। न चाहते हुए भी उसकी आँखों से आँसू बह चले थे।

अब उसका मन नहीं लगता था। कुछ समय के बाद उसने सीमा से विधिवत विवाह किया और नए घर में शिफ्ट हो गया।

समय अपनी चाल से आगे बढ़ रहा था। एक सुबह दोनों बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे कि सामने रखे समाचार पत्र पर पड़ी। खबर बड़े _बड़े अक्षरों में छपी थी। विवेक को अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हो पा रहा था कि क्या ये वही रीना है। लिखा था डॉ.रीना को उसकी लिखी पुस्तक पर पुरुस्कार दिया जा रहा है। साथ ही उसने पुरुस्कार लेते हुए अपने कुछ सांझे भी किये थे। उसने कहा कि यदि मैं अपने जीवन से हार मान लेती तो आज मैं फख्र से यहाँ न खडी होती। धन्यवाद।

इस तरह उसने हिम्मत नहीं हारी और विवेक को मौन स्वीकृति दी।

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