फादर घोस्ट

रात गहरा रही थी सुदूर पूर्वोतर भारत के एक आदिवासी इलाके के एक छोटे से गांव मैं इमली चूल्हे मैं आग जलाती हुई परेशान सी थी उसका बापु बहुत बीमार था और उसकी माँ सुबह से जड़ी बूटिया बेचने शहर गई हुई थी इमली का घर लकड़ी से बना हुआ था चारो तरफ जंगल से घिरा हुआ उसके गांव मैं बस १४-१५ ऐसे ही घर थे जो एक दुसरे से काफी दुरी पर थे ! उसकी माँ गांव के कुछ लोगो के साथ नजदीक के शहर मैं लगने वाले साप्तहिक हाट मैं गई हुई थी जब से उसके बापू ने खाट पकड़ी है उसकी माँ ही मेहनत से घर चला रही थी कुल तीन जनों का पेट तो जैसे तैसे भर जाता पर उसके बापु का इलाज नहीं हो पा रहा था बस देसी दवाइया और ओझा के झाड फूंक से ही काम चलाया जा रहा था !

आज दोपहर बाद से ही इमली का बापु शांत पड़ा हुआ है ना एक बार भी खांसा ना दर्द से करहाया इमली घर के काम निपटाने के बाद शाम तक जंगल मैं कंद मूल खोजती रही थी जब वो वापिस आई तो ठण्ड बड़ गई थी उसने बापू के पास अंगीठी जला कर रख दी आज कितने दिनों बाद उसका बापु शांत है आराम से सो रहा है यह सोचते हुए इमली खाना पकाने की तैयारी करने लगी अँधेरा घिर आया था और तेज बर्रिश भी शुरू हो गई थी पर इमली की माँ का कुछ पता नहीं था इमली की परेशानी बढने लगी थी उसने कई बार आवाज दी पर बापू बोला नहीं किसी को पड़ोस से कैसे बुला के लाये बाहर बारिश तेज़ थी और पड़ोस कोई आधा किलोमीटर दूर खाना कब का बन चूका था वो १५ वर्षीया बालिका चुप चाप चूल्हे के आगे बैठी हुई किसी अनिष्ट की आशंका से काँप रही थी तभी दरवाजे पर दस्तक हुई इमली लगभग भागते हुए दरवाजे के पास पहुची उसे लगा माँ आ गई – अपने इलाके की रीत वो भूल गई जब तक रात मैं कोई तीन बार दस्तक ना दे या तीन बार तुम्हारा नाम ना पुकारे तब तक ना दरवाजा खोलो ना आवाज का उतर दो – उसने पहली दस्तक पर ही दरवाजा खोल दिया सामने सफ़ेद कपड़ो मैं गले मैं क्रॉस टांगे एक आदमी खड़ा था चेहरा बड़ी सी गोल टोपी के अन्दर सपष्ट रूप से नजर नहीं आ रहा था इमली ने पूछा आप कौन है वो खरखराती हुई आवाज मैं बोला फादर – फादर घोस्ट, गांव मैं सुना है की यहाँ एक आदमी बहुत बीमार है मैं उसे देखने आया हु इमली ने दरवाजा पूरा खोलते हुए उसे अन्दर आने का रास्ता दिया वो आदमी अजीब सी चाल से चलता हुआ अन्दर आ गया इमली ने खाट की तरफ इशारा करते हुए कहा मेरे बापू बहुत बीमार है वो इमली के बापु के सिरहाने पड़े मुड़े पर बैठ गया फिर इमली की और देखते हुए बोला तुम्हारा बापु का आखरी टाइम आ गया है मैं इनके पास रुक कर परमपिता का नाम लेता हु इमली को कुछ समझ नहीं आ रहा था उसने गर्दन हिलाई और फिर से चूल्हे के पास जा बैठी वो सोचने लगी फादर को किसने भेजा होगा बाहर कितनी बारिश है पर फादर के कपडे गीले नहीं है पेरो मैं कीचड़ भी नहीं लगा तभी उसे कुछ चटकने की आवाज सुनाई दी वो सतर्क हो इधर उधर देखने लगी चटकने की आवाज फिर से आई चटाक – और फिर जैसे कोई जानवर हाफ रहा हो और जैसे कोई जानवर शिकार खा रहा हो इमली सहमी सी उठ खड़ी हुई वो कान लगा कर सुनने लगी बाहर सिर्फ बारिश की ही आवाज थी हजार आशंकाओ से घिरी वो कमरे की तरफ बड़ी वहा वो फादर उसके बापु के ऊपर झुका हुआ था और लगातार चबाने की आवाज उसके पास से ही आ रही थी इमली कापते हुए बोली हे तुम क्या कर रहे हो वो आदमी मुड़ा उसकी शकल किसी भेड़िये जैसी थी उसके मुह से खून टपक रहा था उसकी आँखे लाल गहरी लाल थी और इमली के बापु की छाती खुली पड़ी थी खून बह कर जमीन पर आ गया था इमली चीख मारते हुए बाहर भागी तेज़ बारिश मैं पागलो की तरह दोडते हुए वो किसी तरह पड़ोस मैं पहुची और अचेत हो कर गिर पड़ी

जब गांव के लोग उसके घर पहुचे तो इमली की बापू की अधखाई लाश और फादर के सफ़ेद चोंगे के अलावा उन्हें कुछ भी नहीं मिला.

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