किस्सा उन दिनों का है जब मोबाइल फोन का चलन तो था ही नही , घर में टेलीफ़ोन का होना ही एक गर्व की बात हुआ करती थी . मै अपने गॉव से सैकडों मील दूर एक सरकारी नौकरी के बूते शहर में डेढ कमरे के मकान में अपनी पत्नि सावित्री और दो बच्चों के साथ रहा करता था . बच्चे अ‍ॅग्रेज़ी स्कूल में पढ रहे थे और सावित्री बिना शिकायत के घर को व्यवस्थित रखने की ज़ुम्मेदारी का निर्वहन किए जा रही थी.

जब गॉव छोडा तो वहॉ भी स्थित कुछ ऐसी ही थी . पिताजी, बडे भाई, भाभी, उनके दो बच्चे और ग्रेजुएट होकर भी बेरोज़गार छोटे भाई के बीच ज़मीन का इतना टुकडा सलामत था कि साल भर की दाल रोटी निकल ही जाती थी, बशर्ते मौसम साथ दे. मगर मौसम अक्सर साथ नही देता था. फलस्वरूप ,धीरे धीरे अतिवृष्टि ,अनावृष्टि,सूखा-बाढ, साहूकार से उधारी और कटाई के समय ही कर्ज़ के कारण औने-पौने में बिचौलियों द्वारा अनाज हथिया लिए जाने की पीडा, उनके रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक अभिन्न अंग बनने लगा था . हमारा घर तब और असंतुलित हो गया जब पिताजी पक्षाघात के कारण खाट पकड लिए और बडे भैया अकेले पड गए. अब कमाने वाला एक और खाली पेट छै !ऊपर से दवा-दारू का खर्च अलग ! रहा सवाल छोटे का ,तो उसके लिए इतना कहना ही काफी है कि एक शिक्षित नौजवान यदि ज़्यादा समय तक निठल्ला रहे, तो एक कटखने कुत्ते की तरह बर्ताव करने लगता है. उसे हर समझाइश उलहने सी चुभती है.लिहाज़ा भाई ने ऐसे निठल्ले लोगों की एक टोली बना ली जिनसे कॉलेज के दिनों में, वह बात तक करना पसंद नही करता था . अब वही उसके रातो- दिन के साथी थे जो यद-क़दा रंगदारी भी वसूल कर लिया करते थे.

मै करीब 10 वर्ष पहले गॉव छोड चुका था. मेरा वहॉ आना-जाना जो तीज-त्योहारों में प्राय: हो जाता था, शादी के बाद शनै:शनै: घटता गया. इसके कई कारण थे.मसलन: दूरी,,दुर्गम पहुंच मार्ग, समय, छुट्टी, बच्चों की पढाई और खर्च.किंतु इन सबसे बडा कारण था: मेरी उन विषम परिस्थितियों से कछुये की भॉति अपना मुंह छुपए रहने की प्रवित्ति !हालॉकि जब बडे भैया का पत्र आता तो मन बहुत उद्दिग्न हो जाता था किंतु बस ‘श्मशान-वैराग्य’ की तरह. शीघ्र ही वह भाव तिरोहित भी हो जाता. भाभी के पत्र भी आते थे किंतु वो मै नही पढता था. कारण !उसमें वही सब बुढिया पुराण हुआ करता था. मसलन: गॉव का हाल, मौसम की मार, उधार की किस्त, बाबू जी की दवा-दारू ,बैल का मरना और दूसरा खरीदने की समस्या , भतीजी का बांस की तरह बढना , भैया के पॉव की चोट , छोटे की बढती उद्दंडता और समापन में बाबू जी को कुछ दिन अपने पास रखकर इलाज़ कराने की सलाह. यह प्राय: हर पत्र के मूल तत्व हुआ करते थे, अत: उन्हें सावित्री पढती और किस्तों में, सुना दिया करती थी.

सावित्री ज़रूरत से ज़्यादा भावुक औरत थी. वह भाभी के इस इमोशनल-अत्याचार से मर्माहत हो जाती थी.दरअसल भाभी को इस बात की ईर्ष्या थी कि हम लोग शहर में अपने परिवार के साथ मज़े मे हैं और उनकी ज़िंदगी वहॉ गोबर-कंडे में नरक जैसी कट रही है.दद्दा की सेवा-सुश्रुषा अकेले उन्हीं के मूडे पड गई है और हम किंचित भी अपना फ़र्ज नही निभा रहे हैं.भाभी अपनी इस चाल में सफल भी हो जाती थीं. क्योंकि सावित्री पत्र पढकर अक्सर उन्हें कुछ रुपए मॅनिऑर्डर कर दिया करती थी.

यह जब मुझे ज्ञात हुआ तो उसकी नादानी पर बेहद तरस आया और सोचा कि इसके पहले कि पानी सर के ऊपर से जाने लगे, उसका मोहभंग कर देना चाहिए. लिहाजा एक दिन माकूल मौक़ा पाकर मैंने उससे कहा ,” देखो, भैया भाभी कोई अनूठे नही हैं वह वही कर रहे जो प्राय:गॉव के लोग करते हैं. भई, गॉव का घर,खेत ढोर-डांगर, सब में हमारा भी अधिकार है पर लाभ तो केवल वही लोग उठा रहे हैं,ना ! उस आय का हम एक पैसा भी नही मॉगते उल्टे शहर में अपनी इस सीमित कमाई में अपना परिवार चला रहे हैं. हमने तो कभी नही पूछा कि कितने का गल्ला बिका ! वो बडे हैं तो बड्डप्पन निभाएं ! उचित यही है कि सब अपना-अपना खर्च उठाएं. अब खेत से इतना गल्ला तो आ ही जाता है कि दोनो जून भर पेट खाना मिल जाय...और इसके अलावा उनका खर्च ही क्या हैं ?द्ददा की दवाई के लिए तो उनकी पेंशन ही बहुत है. अब यहॉ शहर में देख ही रही हो... मॅहगाई में हम कैसे गुज़ारा कर रहे हैं ! इसलिए तुम नाहक फ़िजूलखर्ची में मत पडा करो ,अभी आगे बडा खर्च है...”

समय यूंही गुज़र रहा था कि एक दिन जब ऑफ़िस से लौटा तो सावित्री को द्वार पर मुहं लटकाए देखकर आशंकित हो गया. कारण पूछा तो पल्लू में बॅधा एक टेलीग्राम पकडा कर भीतर चली गई. उन दिनों टेलीग्राम का आना एक ‘शोक-पत्र’ के कुछ कम न होता था. उसे देखते ही औरतें रोना शुरू कर देती थीं, खैर !लिखा था- “दद्दा का आखिरी समय आगया लगता है, मुंह देखना हो तो आ जाओ‌‌‌- भैया.”

तार पढकर मेरा जी भी धक से हो गया .सावित्री चाय लेकर आई तो उसकी ऑखें नम दिखीं.वह धीरे से बोली- “चलिए दो दिन के लिए हो आते हैं क्या पता ....” और फिर सुबकने लगी.

“ तुम...तुम वहॉ जाकर क्या करोगी ? बच्चों की पढाई का क्या होगा ? और फिर क्या पता वहॉ कैसी स्थिति हो ! ऐसा करता हूँ...मै जाता हूँ.भैया का क्या !क्या पता मुझे बुलाने का नाटक हो !” मैंने उसे तसल्ली दी .,हालॉकि मै जानता था कि उसका मन बहुत दिनों से गॉव जाने को कुलबुला रहा था .अब मैंने तो स्वयं के जाने का निर्णय मज़बूरी में लिया था कि कही वास्तव में कुछ ऊंच नीच हुई तो भैया तो यह कहकर बच लेंगे कि ‘मैंने तो समय से खबर दे दी थी’. और मै ! मै,सब की नज़रों में और बुरा बन जाऊंगा .

मैने घडी देखी. एक घंटे बाद मेल थी. अगर वह पकड लूं तो अलसुबह कटनी पहुंच जाऊंगा .वहॉ से कोई न कोई बस दोपहर-शाम तक गॉव पहुंचा ही देगी. . ब्रीफकेस में दो जोडी कपडे डलवाये और तैयार हो गया . सावित्री ने रास्ते के लिए चार पूरियॉ भी रख दीं और चलते-चलते एक लिफाफा थमाते हुए कहा – “ इसमें पॉच हज़ार रुपए हैं. जाते ही भैया को पकडा देना...तबियत ज़्यादा खराब हो तो खुद होकर किसी अच्छे डॉ. को दिखा देना ...नही तो यहीं ले आना ,... हम लोग भी कुछ दिन सेवा कर लेंगे...बच्चों ने भी जाने कब से उन्हें नही देखा ...फिर पता नही...” कहते कहते वह अंदर भाग गई.

ट्रेन में बैठा मै सोचने लगा कि सावित्री अब भी भैया भाभी कि चाल को नही समझ रही. भैया, माना कि अकेले खेत में खटते हैं और भाभी घर में...लेकिन इसमें हमारा क्या दोष है ? न तो मै नौकरी छोडकर वहॉ रह सकता और न ही सावित्री बच्चों को छोडकर भाभी का हाथ बटा सकती .रहा सवाल दद्दा के शहर लाने का ...तो घर इतना छोटा है कि उनके लिए न तो अलग से कुछ इंतज़ाम हो सकता और न बच्चों को साथ रहने दिया जा सकता ! .हॉ ये छोटे ज़रूर आवारा हो गया है...उसे खींचना पडेगा .अरे खेती-बाडी में मन नही लगता तो दो-चार ट्युशन ही कर ले...कम से कम अपना खर्च तो निकाल लेगा. आज कल तो यह कमाई का अच्छा ज़रिया है ...लोग नौकरी छोड कर, कर रहे हैं. पर उसे तो हरामखोरी की लत लग गई है.भैया ने लिखा था कि पिछली बार नये आए तहसीलदार को ही घेर लिया था ... उसे देखता हूँ. .सोचते-सोचते ऑख लग गई.

***

घर का दरवाजा उढका हुआ था जो हल्का सा धक्का देते ही खुल गया . अंदर कोई हलचल नही दिखी, सिवाय एक थप-थप की धीमी आवाज़ के.मेरा मन आशंका से भर गया .मैने हौले से आवाज़ दी-“भैया !” और अंदर की ओर बढा. देखा कि ऑगन के दूसरे सिरे पर भौजी कंडे थाप रही हैं और वह आवाज़, उसी की थी.

” पाय लागूं भौजी. कैसी हो !” अचानक आवाज़ सुनकर वह चौंक गईं.घूंघट परे कर मुझे देखा और बाल्टी में हाथ धोकर पल्लू से मुंह का पसीना पोंछते हुए ‘ बैठो,अभी आयी ’ कहकर रसोईं की ओर बढ गईं. मै अभी अंदर की टोह ले ही रहा था कि भाभी एक हाथ में पानी का लोटा और दूसरे हाथ में गुड की तश्तरी लिए सामने आ गईं .अब मैंने उन्हें गौर से देखा तो लगा ‘भौजी’ शब्द अब मात्र संबोधन तक ही रोमांचकारी होकर रह गया है. चेहरे पर पडी झुर्रियों और बालों में चढ आई चांदी ने वक़्त से बहुत पहले उन्हें प्रौढता की चादरओढा दी .मुझे निहारते हुए उनकी ऑखों में घिर आई नमी साफ झलक रही थी. मैने पैर छूते हुए पूछा –“ भैया कहॉ है ?”

“ ऊं तो भुनसारे से खेते कैती निकल गे हें.”

“और दद्दा !”

“ऊं... कोठरी छॉड के कहॉ जैइहैं ! चला अपने ऑखिन से देख ला –का हॉल है.”

मै उनके पीछे पीछे चल पडा. कोठरी खुलते ही अचानक टट्टी-पेशाब का मिला जुला एक जोर का ऐसा भभका निकला कि मेरा हाथ यांत्रिक गते से जेब में रुमाल टटोलने लगा किंतु निकालते-निकालते हिचक गया .

मै पैर छूने के लिए झुका ही था कि भौजी ने मना कर दिया.तब याद आई बचपन में दी हुई दद्दा की नसीहत कि ‘लेटे या सोये हुए इंसान के पैर नही छुए जाते....अशुभ होता है.’

“ दद्दा ,पैर छूता हूँ.” मैंने आवाज देकर अपनी उपस्थिति का उन्हें आभास कराना चाहा .

कोई प्रतिक्रिया न होते देख भाभी ने उनके कान के पास झुककर जोर से कहा –

“मझले आए हैं .”

इसबार शरीर में हल्की सी सिहरन हुई... लगा कि वे ऑख खोलने का प्रयास कर रहे हैं.वे असफल रहे, यह पलकों के कोर से लुढक आए दो ऑसू साफ बयॉ कर रहे थे.

भाभी वहो से चली गईं थी. मैने इधर उधर देखा और कोई और बैठने की कोई अन्य उपयुक्त जगह न पाकर खाट में उनके पैतॉने बैठ गया .अब जब मैंने करीब से उनकी समूची काया निहारी तो लगा कि इस ढॉचे में अब भी अगर कहीं जीवन का अंश शेष है तो वह बस... उनके चेहरे तक ही !

बिना संवाद के आखिर कोई ऐसी जगह कितनी देर तक बैठा रह सकता है जहॉ स्वच्छ हवा और रोशनी भी प्रवेश करने में सकुचाती हो ! मै वहॉ से उठ गया .भाभी शायद मेरी ही टोह में थीं, बोलीं,- “ हाथ-मुंह धोय ला , टठिया लगाइत हैंन.”

“और भैया...छोटू !”

“ उनकर कउनौ ठिकाना है !...आय जैयहीं त खाय लेहीं...नही तो संझा के देखा जई .” उत्तर शायद दोनों पर लागू था अत: मैंने बात को आगे न खींचते हुए थाली अपनी ओर खींच ली. भूंख जमकर उभर आई थी. खाना खाकर मै उसी तख्त पर लेट गया ,और लेटते ही सो गया.

भैया की आवाज़ से नींद खुली. पैर छूते ही उन्होंने सीने से लगा लिया .अब तक छोटू भी आ गया था .कई साल हो गए थे उसे देखे... एकदम गबरू ज़वान हो गया था.उसकी सेहत देखकर लगा कि अब ये शरीर रंगदारी ना करे तो और करे क्या ! भाभी सबके लिए चाय ले लाईं और स्वयं भी एक पीढा लेकर बैठ गईं. चाय का स्वाद और कप प्लेट की हालत देखकर मुझे यह समझने मे ज़रा भी देर न लगी कि इनका उपयोग विशेष अवसरों पर ही किया जाता होगा.

चंद औपचारिक बातों के बाद वातावरण में एक मौन सा पसर गया . यूं लगा कि हर व्यक्ति कहना तो बहुत कुछ चाहता है पर सिरा नही पकड पा रहा कि कहॉ से शुरू करे या पहल कौन करे ! आखिर भैया ने मौन तोडा ,- “ देख मझले,हमने जितनी दवा दारू, सेवा टहल हो सकती थी...की. अब यहॉ के तो बैद डॉ. सभी ज़वाब दे चुके हैं,तार इसीलिए भेजा था कि तुम भी अपने तईं जो कर सकते हो ,करलो. सरपंच कह रहे थे शहर में किसी बडे डॉ. को दिखाने से शायद सुधार आ जाय !”

“ शहर के इलाज़ कौउनौ मज़ाक है का ! 4-5 हज़ार से कम खर्चा न लगी. हिंया रोज़ खाय के पडी रहत है...अनाज़ के कुठला सॉय-सॉय करत है.रुपिया कहॉ से पौउबे ?” भौजी मुखातिब तो भैया की ओर थीं मगर निशाने पर था, मै .

“ रुपिया दा तो हम अबहिन लइ जई दद्दा का .बिना प्रायवेट मॅ दिखाये काम न बनी.” अबे दद्दा के ऐसन कौनो उमरौ नही भै कि....” इसबार छोटे बोला और ऑखें मलने लगा .

मै मूर्ख नही था ...जानता था कि ये सारी हॉका मेरे लिए ही लगाया जा रहा है .किंतु मुझे दद्दा की हालत सुधरने के लेशमात्र भी आसार नज़र नही आ रहे थे... बस ये लोग दद्दा के बहाने पैसे ऐंठना चाहते थे .मै भी कच्ची गोलियॉ नही खेला था. अब कुछ तो ज़वाब देना ही था .मैने कहा ,-“ मुझे तो कल शाम टेलीग्राम मिला और मिलते ही तुरंत मेल से निकल पडा .रुपये-पैसे के इंतज़ाम का मौका ही नही था ...भागा चला आया कि कुछ दिन दद्दा की सेवा कर लूं !

इतना सुनते ही तीनों के चेहरे एकदम बुझ गए. छोटू भीतर की कोठरी में चला गया और भौजी फिर कंडे थापने लगीं. भैया तख्त पर पसर गए. सभा बिना किसी निर्णय के विसर्जित हो गई . वातावरण अचानक दमघोटू हो चला अत: मैने भी भीतर जाकर लेटने का मन बनाया . भीतर खूंटी में कोट टॉगकर जब खाट की तरफ नज़र डाली तो वहॉ छोटू लेटा था .वह मुझे देखकर उठने लगा. मैंने उसे रोक दिया और ‘ गॉव का चक्कर लगाकर आता हूँ’.कहकर बाहर निकल आया.

गॉव में अधिकांश अपरिचित चेहरे नज़र आ रहे थे कि अचानक रामखिलावन गुरूजी दिखे . मैने उन्हें प्रणाम किया तो छूटते ही बोले ,” बेटा ,इस बार बहुत दिनों बाद चक्कर लगाया .अब आए हो तो दद्दा के इलाज़ मे थोडा ध्यान दो,बडका कितना करेगा ! नही तो अपने साथ ले जाओ ,हवा पानी बदलेगा तो शायद कुछ हालत सुधर जाए.”

उनकी बातें मुझे तीर की भॉति चुभ रही थीं किंतु बस, ‘ जी ,देखता हूँ ’ कहकर आगे बढ लिया. एक दो और पुराने चेहरे दिखे पर अब उनसे मिलने का उत्साह जाता रहा.कन्नी काटकर लौट पडा . घर पहुंचा तो भौजी ने खाना लगा दिया. मैंने भैया को आवाज़ दी तो उन्होंने ‘मेरा पेट चल गया है,तुम खाओ ’, कहा और करवट बदल ली. छोटू भी तीर की तरह निकला और मुझे अनदेखा कर दद्दा की कोठरी में घुस गया .भौजी बडबडा रही थीं - “ दिनभर गॉव के शोहदों के साथ मटरगश्ती करेगा और घर आएगा तो बस दद्दा की कोठरी में घुस जायेगा.काम का न काज का...ढाई मन अनाज़ का .”

मै समझ गया कि उलहना मुझे भी है अत: मैंने भी सब को सुनाते हुए कहा ,” भैया,मै आया तो था यह सोच कर कि कुछ दिन यहॉ रह कर दद्दा की सेवा करूंगा ,किंतु यहॉ की परिस्थिति देखकर लगता है उससे भी कहीं अधिक ज़रूरी है... पैसे का इंतज़ाम . तो मै कल दोपाहर में लौट जाता हूँ और पैसों का इंतज़ाम करके या तो स्वयं आता हूँ नही तो मॅनीऑर्डर कर देता हूँ.”

“जैसा ठीक समझो .” अनमने भाव से भैया बस इतना ही बोले.

सुबह छोटू की आवाज़ से ऑख खुल गई.वह चिल्ल रहा था ,-“ मै दद्दा को शहर ले जा रहा हूँ...इलाज़ के लिए.”

“अरे, अकेले ! और इस तरह... अचानक !” अंदर हुक्का पी रहे भैया का स्वर गूंजा .

“नही,फ़िरोज़ और सदानंद है ना !” ये दोनो उसके बचपन के मित्र थे.

“और रुपया...वो कहॉ से आयेगा ?” अब तक दोनो आमने सामने आ चुके थे.मै भी कोठरी से निकल आया था .

“ कुछ होइगा है,कुछ करब .अब ट्रैक्टर के जुगाड है त हमका रोकी जिन.” इतना कहते हुए वह दद्दा को दोनो हाथ से उठाए बाहर आ गया .उसकी ज़ल्द्वाजी देखकर हमें त्वरित कुछ और न सूझा और हमने सहारा देकर उन्हें ट्राली में बिछे पुआल के ऊपर लिटा दिया.

“मै साथ चलूं!” मैंने दबी ज़वान में पूछा.

“ आप नाहक हलाकान होंगे.ये दोनो हैं ना !” उसने दोस्तों की ओर गर्व से देखते हुए कहा .

ट्रैक्टर स्टार्ट हो गया था. मैंने रिश्ते की फ़र्ज़ अदायगी करते हुए छोटू से कहा,- “ ठहर कुछ रुपये लाकर देता हूँ.”

“ रहने दो भैया ,आपको अभी सफर करना है... और आप कह भी रहे थे कि जल्दी जल्दी में कुछ इंतज़ाम कर नही पाया. आप फिकर न करें,सब हो जाएगा.”

मुझे लगा, छोटा मुझे तमाचा मार कर चला गया. बस तसल्ली थी तो केवल यह कि फिलहाल सब शांति से निबट गया.

मेरी ट्रेन 11बजे की थी. स्टेशन गॉव से दूर था अत: जल्दी जल्दी तैयार होकर दद्दा के कमरे में गया .अचानक उनका खाली बिस्तर देखकर जी धक से हो गया.सुबह घटी घटना एक बार फिर जीवंत हो उठी. चलते वक़्त दरवाजे पर वो दो जोडी उदास ऑखें मुझे उसी तरह निहार रही थीं जैसे सुबह जाते हुए ट्रैक्टर के धुंये को. मुझे लगा कि सावित्री के दिये हुए पॉच हज़ार, भैया के हाथों में दे ही दूं तभी याद आया कि मै तो यह कह चुका हूँ कि रुपयों का इंतज़ाम नही हो पाया है , धर्म संकट था,किंतु जल्दी से पैर छूकर आगे बढ गया .

जाडे की कुनमुनी धूप और रास्ते के दोनों ओर लहलहाते खेतों ने मन को थोडा सुकून दिया तो लगा कि एक सिगरेट पी जाय ...जब से गॉव में कदम रक़्खा था तब से नही पी थी. कोट के अंदर वाली जेब में हाथ डाला तो जी धक से हो गया .सिगरेट तो थी किंतु रुपयों वाला लिफाफा नदारद था. सारी जेब देख लीं... वह नही मिला, मुझे अच्छी तरह याद था कि कल कोठरी में कोट टॉगते वक़्त वह जेब में ही था... उसे टटोला भी था, और उसके बाद तो उसे पहना ही नही !

मै समझ गया कि यह छोटू की ही करामात है ,घर में ही रंगदारी दिखा गया ...बडा श्रवणकुमार बना है . अभी भैया को जाकर बताता हूँ कि वो किसके दम पर इलाज़ कराने की शेखी बघार रहा था ! मै पलटा किंतु दो तीन कदम चल कर ठिठक गया . आखिर किस मुंह से अब यह इलज़ाम छोटू पर लगाऊंगा . सबसे तो रुपये का इंतज़ाम न कर पाने का राग अलापा था....अब कौन मेरी बातों का यकीन करेगा !

मै फिर स्टेशन की ओर मुड़ गया .

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