नानी तो.

५ मई २००० या १ मई? हाँ १ मई क्योंकि हमें गाड़ी मिलने में बहुत दिक्कत हुई थी, लेबर्ज़ डे था ना। कोई सामान ले जाने को तैयार ही नहीं था। ले दे के एक टेम्पो मिला, कोलाबा से मालाड तक के २५०० रुपये तय हुए और दोपहर के एक बजे हम निकल पड़े। मई की भीषण गर्मी में हम सामान के साथ टेम्पो में ही निकल गए क्योंकि बहुत कोशिशों के बाद भी कार का इंतज़ाम नहीं हो पाया था। गर्मी से परेशान और पसीने से तर बतर हम शाम के करीब ३:३० बजे अपने नए घर पहुंच गए। चार माले की बिल्डिंग पर बिना लिफ्ट। कुछ और पैसे देकर हमने टेम्पो वालों से ही सामान चढ़वा लिया। काम खतम होते होते ६ बज गए। हम इतने थक चुके थे कि ब्रेड बटर खाया, जगह बनाई और फर्श पर ही सो गए।

अममम... अममम... अममम...मैं बोलने की कोशिश कर रही थी। आँखों में डर, गुस्सा और मुट्ठियाँ बंद जो गुस्से और डर से और कसती जा रही थी। नाखून हथेलियों में गड़े जा रहे थे। उसका सफ़ेद चेहरा, बड़ी बड़ी लाल घूरती आँखें, बिखरे हुए बाल, वो धीरे-धीरे मेरे और पास आती जा रही थी और मैं कुछ नहीं कर पा रही थी। कितनी कोशिश की कि मदद के लिए आवाज़ दूँ पर मुँह खुला ही नहीं। आखिरकार वो मुझ तक पहुँच गई, जैसे ही उसने अपना मुँह खोला मैंने डर के मारे आँखें मींच ली और मेरी नींद टूट गई। मैं पहली बार इस तरह डरकर नींद से जागी थी।

मैं बुरी तरह से हाँफ रही थी जैसे किसी मैराथौन में दौड़कर आई हूँ। चेहरा पीला पड़ गया था, गला सूख गया था और शरीर पसीने में तर। जब से इस नए घर में आए हैं इन डरावने सपनों ने मेरी नींद पर कब्ज़ा कर लिया है। समझ नहीं आ रहा है कि ये सब क्या है, क्या करूँ क्या नहीं कुछ नहीं सूझ रहा।

सबकुछ इतनी जल्दी में हुआ कि इस घर के बारे में कुछ पता ही नहीं लगा पाए। माँ को भी ये घर ठीक नहीं लगता पर उनकी वजह अलग है। घर बहुत गंदा है, माँ कहती हैं साफ़ करते करते ही एक हफ़्ता और लग जाएगा। अब तक तो सामान भी ऐसे ही बिखरा पड़ा है।

अचानक मेरा ध्यान घड़ी पर गया, साढ़े सात बज गए थे।

ओहो! आज फिर देर हो गई।

मैं उठी और ऑफ़िस के लिए तैयार होने लगी।

अच्छा माँ चलती हूँ। शाम को देर हो जाएगी, मीटिंग है। परेशान मत होना।

ओके। टेक केयर बेटा। ऑफ़िस से निकलते समय एक फोन कर देना। ठीक है?

हाँजी, ट्रेन में बैठते ही फोन करूँगी, आप मत करना। मीटिंग के बीच में उठा नहीं पाऊँगी।

ऑफ़िस में भी मैं सारे दिन उसी सपने के बारे में सोचती रही। काम में ध्यान ही नहीं लगा पा रही थी।

मीटिंग में चाय सर्व हुई तो स्टीवर्ड के चेहरे में भी फिरसे अचानक वही डरावना चेहरा दिखा और मैं डर के मारे चौंक गई। उसके हाथ से चाय गिरते गिरते बची।

शिखा पे अटेन्शन। यू आर इन अ मीटिंग। वौट इस रौंग विद यू?

मैं बहुत शर्मिंदा थी। गलती पर गलती हो रही थी पर दिमाग में क्या चल रहा था किसको बताती?

मीटिंग खतम होते ही शर्मा सर ने मुझे चिंता की नज़रों से देखा और बुलाया। वे अधेड़ उम्र के हैं पर उनके अनुभव और बिज़नेस सेन्स का सिक्का सारी इंडस्ट्री में छाया है।

वे प्यार से मुझे समझाते हुए बोले, "शिखा तुम्हारा परफौरमेंस बहुत अच्छा रहा है, प्रमोशन के पूरे-पूरे चांसिस हैं। ये बहुत इंपोर्टेंट मीटिंग थी। ऐसी मीटिंग में छोटी से छोटी गलती तुम्हारी पूरी मेहनत पर पानी फेर सकती है।"

मैं जानती हूँ सर। आय एम रियली सौरी, मैं पूरा खयाल रखूँगी कि आगे से ऐसा न हो।

Good. Now go home take rest and come back fresh tomorrow.

Sure. Good night Sir.

मैंने पीछे मुड़कर शर्मा जी का शुक्रिया अदा किया और स्टेशन के लिए टैक्सी ले ली। साढ़े आठ बज चुके थे। आठ छत्तीस की लोकल पकड़कर मैंने सबसे पहले घर पर फोन करके माँ को बता दिया कि मैं ऑफ़िस से निकल चुकी हूँ।

डेढ़ घंटे के सफर के बाद घर पहुँची तो भूख के मारे पेट में चूहों ने हड़कम्प मचा रखा था। माँ ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, किचन में पक रही कढ़ी में पड़े मेथी के तड़के की खुशबू ने सारी थकान मिटा दी। अब तो मुझे बस जल्दी मची थी कि कब मैं खाने बैठूँ और वो कढ़ी मेरे मुँह का रस्ता करे।

खाना खाते-खाते साढ़े दस बज गए। थाली में खाना खतम हो चुका था और दिमाग फिर उसी तरफ घूम चुका था। अब कुछ देर में मुझे सोना था और इस खयाल से भी मेरी धड़कने तेज़ होने लगी थी। कोई सामने हो तो दो दो हाथ कर किस्सा खतम करूँ पर सपने में तो मुँह भी नहीं खुलता। बहुत देर तक जागती रही पर आखिरकार दिन भर की थकान ने हिम्मत तोड़ दी और मुझे पता भी नहीं चला कब मेरी आँख लगी।

जिस उधेड़ बुन में नींद आई थी वैसी ही हालत में आँख खुली। पर सब कुछ अजीब सा लग रहा था। तेज़ धूंप खिड़कियों के परदों से छन कर पूरे कमरे में बिखरी पड़ी थी और पंखा फुल स्पीड पर चल रहा था। मैं हैरान थी- कोई सपना नहीं आया? मेरी आँख नहीं खुली और दोपहर भी हो गई?

इन सब चीजों से तो यही लग रहा था कि मैंने आज ऑफ़िस से छुट्टी मार ली है। पर ये सोच कर भी हैरान थी कि अबतक ऑफ़िस से किसी ने फोन नहीं किया? मैं हड़बड़ी में फोन की तरफ बढ़ी तभी दरवाज़े की घंटी बजी, टिंग-टौंग... टिंग-टौंग

माँ ने किचन से आवाज़ दी-

शिखा बेटा देखो तो कौन है, मेरे हाथ आटे में सने हैं।

मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने फौर्मल पैंट शर्ट पहने एक बंदा खड़ा था ।

जी आप कौन?

मैडम हमारी कंपनी ने ये नया औल पर्पज़ किचन अप्लायंस लौंच किया है। ये आपके किचन का घंटों का काम मिनटों में निप्टा देगा।

नो थैंक्स, हमें नहीं चाहिए।

मैम आप एक डेमो तो देख लीजिए।

मैं फिर से ना कहकर दरवाज़ा बंद करने लगी तो उसने हाथ अड़ाके दरवाज़ा खोल दिया और घर में कदम रखने ही वाला था कि अंदर से आवाज़ आई- वहीं रुक जा।

किचन में से नानी फुर्ती से गुस्से में दरवाज़े की तरफ आ रही थीं। उनके हाथ में फ्राइंग पैन था जिसमें लाल मिर्चियाँ जल रही थीं और बहुत धूआँ उठ रहा था। मैं हैरान थी। पिछली बार नानी को देखा था तो वे बहुत बीमार थीं और उनका इलाज चल रहा था।

नानी गुस्से में चिल्ला रही थी-

घर में घुसना चाहता है? मेरे घर में घुसेगा? ये कहते-कहते नानी ने पैन में से उठता धुआँ हाथ से सेल्स मैन के मुँह पर डाल दिया।

वो बेचारा ज़ोर-ज़ोर से खाँसने लगा।

नानी आप ये क्या कर रहे हो? ये सेल्स मैन है।

तुझे कुछ नहीं पता तू अंदर जा, इसे मैं देख लूंगी। इन्हें तो बस घर में घुसने का बहाना चाहिए।

जा....निकल यहाँ से। दोबारा यहाँ आने की कोशिश भी मत करना।

सेल्स मैन खाँसता- खाँसता धूँए में गुम हो गया। नानी भी अचानक से न जाने कहाँ चली गईं।

एक मिनट... नानी तो.... मेरी आँख खुल गई।

ये सब एक सपना था? ऐसा लग रहा था मानो मैंने इसे जिया है। पर नानी? नानी तो कई साल पहले गुज़र चुकी हैं।

मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

वो सेल्स मैन कौन था जिसे भगाने के लिए नानी को आना पड़ा?

मिर्ची के धूंए से बस उसी को धसका क्यों लगा। उसने दरवाज़ा धकेलकर जबरदस्ती अंदर आने की कोशिश क्यों की। उस दिन मुझे कुछ समझ नहीं आया। पर उस दिन के बाद मुझे उस घर में कभी वो डरावने सपने नहीं आए।

hindi@pratilipi.com
+91 8604623871
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.