क्या यह सच था

मैं एक रेलवे अधिकारी हूं और लखनऊ में तैनात हूं । मेरा पुश्तैनी गांव धौरहरा यहां से 200 किमी. दूर लखीमपुर - खीरी जिले के तराई क्षेत्र में हैं । वहां पर हमारे पुरखों की काफी बड़ी जमींदारी थी । जमींदारी और उसकी शानौ-शौकत तो अब रही नहीं लेंकिन एक पुरानी हवेली और खेती - बाड़ी अभी भी शेष है । फसल की कटाई के समय, साल में दो बार मैं धैारहरा अवष्य जाता हूं ।


गेहूं की फसल कटने वाली थी । भाईसाहब के कई संदेश आ चुके थे किन्तु मुझे छुट्टी नहीं मिल पा रही थी । कल - परसों दूसरा शनिवार और रविवार का अवकाष था । मैनें इन्हीं दो दिनों में गावं हो आने का कार्यक्रम बनाया । वहां आने - जाने में पूरा दिन खराब हो जाता है अतः मैने रात में सफर करने का निश्चय किया ताकि अपने काम के लिये पूरे दो दिन मिल सके ।


लखनउ से लालकुआं तक जाने वाली नैनीताल एक्सप्रेस रात्रि साढे नौ बज चल कर करीब बारह बजे लखीमपुर पहुंचती है । वहां से धौरहरा तक का 60 किमी. का सफर उबड़ - खाबड़ सड़क द्वारा तय करना पड़ता है । मेरे एक मित्र रज्जू शेखर लखीमपुर में कपड़े के व्यवसायी है । मैनें फोन पर उनसे बात की तो उन्होने स्टेशन पर अपनी जीप भेज देने का आष्वासन दिया । इस तरह मैं सुबह होने से पहले धौरहरा पहुंच सकता था ।


नैनीताल एक्सप्रेस के प्रथम श्रेणी के कूपे में मेरा सहयात्री एक विदेशी था, जो टेृन छूटने के समय लगभग दौड़ता हुआ डिब्बे में चढ़ा था ।


अपनी सीट पर बैठते हुये उसने मुझसे पूछा,‘‘आप कहां तक जाईयेगा ?’’


‘‘लखीमपुर तक और आप ?’’ मैने सम्मानित स्वर में पूछा ।


‘‘इस टेृन से लालकुंआ तक और फिर टैक्सी द्वारा जिम कार्बेट नेशनल पार्क जाउंगा ’’ विदेषी ने शुद्व हिंदी में बताया ।


उसके उच्चारण की शुद्वता देख मुझे बहुत आश्चर्य हुआ । मैनें कहा,‘‘ आप बहुत अच्छी हिन्दी बोल लेते हैं । कहां से सीखी ?’’


‘‘कुछ अपने वतन इंग्लैंड में और कुछ आपके देश में ’’ उसने अपने सुनहरे बालों में उंगलियां फिरायी फिर मुस्कराते हुये बोला,‘‘वैसे मेरा काम ऐसा है कि हिंदी सीखे बिना काम ही नहीं चल सकता था ।’’


‘‘क्या काम करते हैं आप ?’’


‘‘मैं पिछले पांच वर्षो से भारतीय नागों पर शोध कर रहा हूं ।’’


‘‘आपका आशय नागा साधुओं से है या नागालेंड में रहने वाली जाति से ?’’ मैने जिज्ञासा प्रकट की ।


‘‘मेरा आषय आपके पौराणिक ग्रंथों के पूजनीय नाग - नागिनों से है ’’ वह अपने होठों को टेढा कर हल्का सा मुस्कराया ।


उसकी मुस्कराहट में छुपे व्यंग्य को मैं समझ गया था । किन्तु मेरे मन में नागों के प्रति बहुत श्रद्वा है अतः उत्सुकतावश पूछा,‘‘आपका शोध ग्रंथ कहां तक पहुंचा है ?’’


‘‘पिछले पांच वर्षो में मैं काश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा भारत घूम चुका हुं । बंगाल, आसाम, मणिपुर, से लेकर दक्षिण भारत और पंजाब तक की संस्कृतियों का अध्ययन कर चुका हूं । उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि आप लोगों की भाषा, संस्कृति और यहां तक कि शक्लें भी भले ही अलग - अलग क्यूं न हों किन्तु आप सभी लोगों में एक अद्भुत समानता है और शायद यही कारण है कि आप सब एकता के सूत्र में बंधे हुये हैं ’’ उस विदेशी ने गंभीर स्वर में कहा ।


‘‘कैसी समानता ?’’ मैने उत्सुकतावश पूछा । उस विदेषी की बातो में अब तक मेरी रूचि जागृत हो चुकी थी ।


‘‘अंध-विश्वाश के मामले में तुम सब भारतवासी एक जैसे ही हो ’’ विदेशी ठहाका लगाते हुये हंस पड़ा ।


मेरा चेहरा अपमान से लाल हो उठा । मैने तेज स्वर में पूछा,‘‘क्या मतलब है आपका ?’’


‘‘मतलब बिल्कुल साफ है । इस देश के चाहे जिस कोने में चले जाओ, नाग - नागिन के बारे में लोग तरह - तरह की बातें करते मिलेंगें । कोई उनकी उम्र हजारों वर्ष बतायेगा तो कोई उनके पुर्न-जन्म और नागिन के बदले की कहानी सुना रहा होगा । कुछ लोग तो जबरदस्ती नाग-नागिन को इच्छाधारी जीव साबित करने में जुटे होगें । यह भी नहीं सोचते कि जमीन पर रेंगने वाला जीव भला अपना रूप कैसे बदल सकता है । हद तो यह है कि उन्हें देवता मान कर पूजा भी की जाती है ’’ विदेषी मजाक उड़ाने वाले स्वर में बोला ।


‘‘मिस्टर, क्या नाम है आपका ?’’लाख रोकने पर भी मेरा स्वर कटु हो गया था । हमारी आस्था और मान्यताओं का उसने जिस ढंग से मजाक उड़ाया था उससे मैं उत्तेजित हो उठा था ।


‘‘जेम्स ! जेम्स डिसूजा ’’ मेरी उत्त्ेजना से बेपरवाह उसने अपने कंधे उचकाते हुये बताया ।


‘‘मि0 जेम्स, इच्छाधारी नागों के किस्सों से हमारे धार्मिक ग्रंथ भरे पड़े हैं । वे गलत नहीं हो सकते ’’ मैने तीव्र स्वर में प्रतिवाद किया ।


‘‘समुच बहुत भोले हैं आप लोग । किसी लेखक ने कुछ काल्पनिक किस्से - कहानियां लिख दीं और आप सब आंख मुंद कर उस पर विष्वाष करने लगे । आज के वैज्ञानिक युग में इन सब बातों को मानना कोरी मूर्खता कहलायेगी ’’ जेम्स ने भी तेज स्वर में कहा ।


‘‘ऐसा नहीं हैं.....’’


‘‘क्यों नहीं है । क्या आपने किसी इच्छाधारी नाग को देखा है जो फालतू की बहस कर रहे हैं ’’ जेम्स ने मेरी बात काटी ।


‘‘इच्छाधारी नाग को देखने का सौभाग्य तो मुझे नहीं मिला है किन्तु मैं एक ऐसे नाग के दर्षन कई बार कर चुका हूं जो अमर है अर्थात जिसकी मृत्यु कभी नहीं होती है ’’ अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया । हालांकि यह रहस्य मैं किसी को बतलाना नहीं चाहता था ।


‘‘अमर का क्या अर्थ होता है इतनी हिन्दी मैं जानता हूं ’’ जेम्स व्यंगयपूर्वक मुस्कराया फिर बोला,‘‘ नाग दीर्घायु होते हैं लेकिन वे अमर नहीं हो सकते ।’’


‘‘मैं जिस नाग की बात कर रहा हूं वो अमर है ’’ मैने जोर दिया ।


‘‘कहां रहते हैं वे आपके अमर साहब ’’ जेम्स ने पुनः व्यंग्य कसा ।


‘‘हमारे खानदान में नाग की पूजा की जाती है । हमारी हवेली के पिछले प्रांगण में एक पुराना मंदिर है, प्रत्येक वर्ष वैषाख की अमावस्या की रात मंदिर में पूजा के बाद कटोरे में दूध रख दिया जाता है । अर्धरात्रि के बाद नाग देवता आकर दूध पी जाते है । हम लोगों ने कई बार उनके दर्शन किये हैं ’’न चाहते हुये भी मुझे रहस्य खोलना पड़ा ।


‘‘असंभव, ऐसा नहीं हो सकता । वैज्ञानिक साबित कर चुके हैं कि नाग दूध नहीं पीते हैं और अगर गल्ती से पी लें तो हजम नहीं कर पाते हैं ’’जेम्स ने सीट पर घूंसा मारते हुये कहा । उसे लगा कि मैं झूठी कहानी गढ़ कर उस पर हावी होने की कोशिश कर रहा हूं ।


‘‘संयोगवश कल ही अमावस्या की रात है । क्या आप उन नाग देवता के दर्शन करना चाहेगें ?’’ मैनें प्रस्ताव रखा ।


मेरी बात सुन जेम्स सोच में पड़ गया तो मैने टोंका,‘‘अभी तक तो बड़ी - बड़ी बातें कर रहे थे लेकिन अब असलियत का सामना करने से क्यूं घबड़ा रहे हैं । मेरे साथ चलिये, जब सब कुछ अपनी आंखों से देख लेगें तो विश्वाश हो जायेगा ।’’


‘‘आप उस सांप को कब से देख रहे हैं ? ज्यादा से ज्यादा अपने बचपन से । हो सकता है कि आपके बड़े बजुर्ग भी उसे अपने बचपन से देख रहे हों लेकिन इससे उसकी अमरता नहीं सिद्व हो जाती । नागों की आयु मनुष्यों से ज्यादा होती है । बचपन से देखते रहने के कारण आप लोगों ने उसे अमर मान लिया होगा ’’ जेम्स ने अपनी विचार-धारा की तर्कपूर्ण व्याख्या की जो काफी हद तक अकाट्य थी ।


‘‘वह नाग वैषाख की अमावस्या को ही क्यूं आता है ? क्या इस बात का कोई जवाब है आपके पास ?’’ मैने पुनः जेम्स को घेरने का प्रयास किया ।


‘‘यह एक संयोग मात्र हो सकता है ।’’


‘‘वाह बहुत अच्छी थ्योरी है आपकी । जिस बात का उत्तर न सूझे उसे संयोग की संज्ञा दे दीजये ’’ मैंने प्रतिवाद किया ।


‘‘नहीं ऐसा नहीं है ’’ जेम्स ने मेरी बात काटी फिर पल भर सोचने के बाद बोला,‘‘प्रकृति के बहुत से रहस्य अनसुलझे से हैं । एक देष ऐसा भी हैं जहां प्रति वर्ष एक निष्चित तिथि पर लाखों चूहें एक साथ समुद्र में कूद कर आत्महत्या कर लेते हैं । दक्षिण भारत के एक कस्बें में भी प्रति वर्ष एक निश्चित तिथि पर अनेकों पक्षी आत्महत्या करते हैं । ऐसा क्यूं होता है? कौन उन्हें उस तिथि की सूचना देता है ? कोई नहीं जानता । शायद किसी निश्चित तिथि पर वातावरण में कुछ ऐसा परिर्वतन होता होगा जिससे इन प्राणियों के मन में संवेदनायें जागृत हो जाती होंगी । ऐसा ही कुछ आपके उन तथाकथित अमर नाग महाशय के साथ होता होगा । या फिर उस मंदिर के आस-पास कई नाग होंगे । आप लोगों ने अंधेरे में अलग-अलग नागों को देखा होगा और भ्रम पाल लिया होगा’’जेम्स ने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया फिर एक क्षण रूक कर बोला,‘‘लेकिन कुछ भी हो मैं उसे देखने अवश्य चलूंगा ।’’


जेम्स ने आगे की यात्रा स्थगित कर लखीमपुर में उतरने का निर्णय ले लिया था, इससे मुझे काफी राहत महसूस हो रही थी । मैं उस अमर नाग के दर्शन करवा कर इस अंग्रेज का घमंड तोड़ना चाहता था । वह बिना किसी कारण हमारी मान्यताओं का मजाक उड़ाने पर तुला हुआ था ।


सीतापुर निकल चुका था । लखीमपुर आने में करीब 45 मिनट शेष थे । इस बीच जेम्स अपने शोध के बारे में गंभीरतापूर्वक बताता रहा । उसने भारतवर्ष में पाये जाने वाले लगभग सभी तरह के नागों के मृत शरीरों का संग्रह कर रखा था । उसने मुझे उनके फोटो भी दिखाये । सिर्फ तराई क्षेत्र में पाये जाने वाले हिमालियन किग कोबरा का शरीर उसे अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था । भारत में पाये जाने वाले नागों में हिमालियन किंग कोबरा सबसे विषैला होता है ।


लखीमपुर स्टेषन पर रज्जू भाई अपनी जीप लेकर हमारा इन्तजार कर रहे थे । उनके घर पर एक - एक कप काफी पीकर हम और जेम्स धौरहरा की तरफ चल दिये ।


अंधेरी रात में उबड़ - खाबड़ सड़कों पर गाड़ी चलाना बहुत मुश्किल कार्य था किन्तु डृाईवर को ऐसे रास्तों की आदत थी । रह - रह कर हमारा शरीर उछल पड़ता था जिससे थोड़ी ही देर में हमें थकावट होने लगी । रज्जू भाई ने थर्मस में काफी भरवा दी थी । जेम्स ने काफी निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दिया । काफी पीने से थोड़ी राहत महसूस हुयी ।


धौरहरा पहुंचते - पहुंचते साढ़े तीन बज चुके थे । विशाल हवेली दूर से ही चमक रही थी । मरम्मत के अभाव में जगह - जगह से प्लास्टर उखड़ने लगा था किन्तु हवेली की भव्यता अभी भी किसी को प्रभावित करने में सक्षम थी । जीप के रूकते ही जेम्स किसी पुरातत्ववेता की तरह हवेली के वास्तुशिल्प का अवलोकन करने लगा ।


मैंने लोहे के विशाल गेट की सांकल खड़खड़ायी तो भीतर से हवेली के पुराने नौकर मैकू की आवाज सुनायी पड़ी,‘‘कौउन है ।’’


‘‘मैं हूं काका, दरवाजा खोलो ’’ मैने कहा ।


थोड़ी ही देर में लालटेन थामे मैकू काका दरवाजा खोल कर बाहर निकले और आश्चर्यपूर्वक बोले,‘‘अरे भईया सरकार, इत्ते समय आप कहां से आ रहे हैं ?’’


‘‘सीधे लखीमपुर से आ रहा हूं । साथ में मेहमान भी हैं । इनका सामन मेहमानखाने में रखवा दो ’’ मैने बताया फिर उनकी लालटेन को देखते हुये बोला,‘‘आज कल बिजली नहीं आती क्या ?’’


‘‘आती क्यूं नहीं है । तीज - त्योहार दर्शन जरूर हो जाते हैं ’’ मैकू काका ने यह बात ऐसे अंदाज में कही कि जेम्स भी हंसे बगैर न रह सका ।


‘‘वेल्कम सर ’’ मैकू काका ने जेम्स का स्वागत किया फिर उसका सामान उतारने लगे । वे बचपन से ही हमारी हवेली में थे । जमींदारी के समय अंग्रेज अफसरों को देख चुके थे अतः उन्हें मालुम था कि साहब लोगों को क्या पसंद है और क्या नहीं ।


जेम्स को मेहमानखाने में पहुंचा मैं हवेली के उपरी हिस्से में आ गया जहां परिवार के अन्य सदस्य रहते थे । जेम्स इस देहाती क्षेत्र के सफर में काफी थक गया था इसलिये अगले दिन ग्यारह बजे तक घोड़े बेच कर सोता रहा । इस बीच मैं खेतों के चक्कर काट आया था और अपने किसानों से भी मिल चुका था ।


मैकू काका ने बताया कि रात में मेरे जाने के बाद जेम्स काफी देर तक उनसे नाग के बारे में पूछताछ करता रहा था । उनके कसम खाने पर भी वह नाग की अमरता पर विश्वाश करने के लिये तैयार नहीं था ।


दोपहर का भोजन करने के बाद हम और जेम्स घूमने निकल पड़े । रास्ते भर वह मुझे सांपों के बारे में तरह - तरह की जानकारियां देता रहता । तमाम सैद्वान्तिक विरोधो के बावजूद भी मुझे स्वीकार करना पड़ा कि सांपो के बारे में उसे जबरदस्त ज्ञान था ।


शाम होने के साथ - साथ जेम्स की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी । भाईसाहब से इजाजत लेकर वह मंदिर के आस - पास कई चक्कर भी काट आया था । उसे विश्वाश था कि वहां कई सांप रहते होंगें जिनमें से हम लोगों ने कभी-कभार किसी को दूध पीते देख लिया होगा । सांपो की तलाश में उसने आस - पास की घनी झाड़ियों को भी खंगाल डाला किन्तु सब व्यर्थ रहा ।


बिजली आज भी नहीं आयी थी जिसके कारण रात होते ही पूरा वातावरण स्याह अंधेरे में डूबने लगा था । हवेली में इधर - उधर जल रही चंद लालटेनें जुगनुओं की भांति मालूम पड़ रही थीं ।


जेम्स की पूजा-पाठ में कोई रूचि नहीं थी । हम लोग जब पूजा करने हवेली के पिछवाड़े में बने पुराने मंदिर में गये तो वह अपने कमरे में लेटा उपन्यास पढ़ता रहा । नाग देवता की पूजा करने के बाद एक बड़े कटोरे में दूध रख कर हम सब वापस लौट आये ।


खाने की मेज पर सभी लोग शांत बैठे थे । वातावरण में एक अजीब से तनाव का एहसास हो रहा था । अचानक जेम्स ने शांति भंग करते हुये कहा,‘‘आप लोग मंदिर में दूध रख कर चले आये हैं पीछे से कहीं कोई दूध पी न जाये ।’’


‘‘आप हमारे देवता का अपमान कर रहे हैं’’ भाईसाहब का चेहरा तमतमा उठा । जेम्स के आगमन से वे प्रसन्न नहीं थे । नाग के रहस्य की हवेली में रहने वालों के अलावा और किसी को जानकारी नहीं थी । एक अन्जान व्यक्ति को यह रहस्य बताने के लिये वे सुबह मुझे डांट भी चुके थे ।


जेम्स भी उनकी नाराजगी को भांप गया था । अतः बात संभालते हुये बोला,‘‘मेरा यह आशय नहीं था । मैने सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि हम लोग यहां बैठे रहे और वहां नाग देवता आकर दुग्धपान कर जायें ।’’


‘‘ऐसा नहीं होगा । वे अर्धरात्रि के पश्चात ही आयेगें’’ भाई साहब ने गंभीर स्वर में कहा । वे जेम्स की चालाकी समझ गये थे लेकिन बात आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे इसलिये खामोश हो गये ।


उनका गंभीर चेहरा देख कर फिर किसी की कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुयी । खाना खाने के बाद जेम्स मेरे साथ बैठक कक्ष में आ गया । अंदर ही अंदर वह काफी उत्तेजित था । अपनी व्यग्रता छुपाने के लिये उसने सिगार सुलगा लिया और धीरे - धीरे कष लगाने लगा । समय भी धीरे - धीरे खिसक रहा था ।


बारह बजने में जब 10 मिनट शेष रह गये तब मैनें जेम्स को उठने का ईशारा किया । वह निःशब्द मेरे पीछे - पीछे चल पड़ा । हवेली के पिछले भाग में पूर्ण निस्तब्धता छायी हुयी थी । रात के अंधेरे में मंदिर के आस - पास उगी हुयी झाड़ियां बहुत डरावनी मालुम पड़ रही थीं ।


मेरे हाथ में एक टार्च थी जिसकी रौषनी में हम दोनों खामोशी से आगे बढ़ रहे थे । मंदिर के अगले हिस्से में एक दरवाजा था और पिछले हिस्से में एक खिड़की । हम दोनों चुपचाप खिड़की के पास जाकर खड़े हो गये । मंदिर के के्रन्द्रीय स्थान पर नाग-देवता की मूर्ति स्थापित थी । मूर्ति के पास एक छोटा सा दिया जल रहा था, उसके समीप ही एक कटोरे में दूध रखा हुआ था। दिेये की झिलमिलाती रौशनी में अंदर का दृष्य साफ दिखायी पड़ रहा था ।


मैं जेम्स को इसी शर्त पर वहां लाया था कि वह बिल्कुल चुप रहेगा । चाहे कैसा भी दृश्य दिखायी क्यूं न पड़े कोई प्रतिक्र्रिया व्यक्त नहीं करेगा । एक - एक क्षण मुश्किल से बीत रहा था । सन्नाटें में हमें अपने दिल की धड़कन तक स्पष्ट रूप से सुनायी पड़ रही थी । आधे घंटे बाद अचानक एक फुंफकार सी सुनायी पड़ी । मेरा दिल तेजी से धड़क उठा । प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हो चुकी थीं । जेम्स ने भी बेचैनी से अपना पहलू बदला ।


हमारे देखते ही देखते मूर्ति के पीछे से एक विषालकाय काला नाग निकला और दूध के कटोरे के पास कुण्डली मार कर बैठ गया । उसकी लंबी जीभ लपलपा रही थी । अपने विशाल फन को फैला कर वह लहरा रहा था । कोई और स्थान होता तो इतने विकराल नाग को देख कर मैं भय से चीख पड़ता । किन्तु ये तो हमारे कुल देवता थे । इनसे भला भय कैसा ?


थोड़ी देर तक हवा में अपना फन लहराने के बाद नाग कटोरे में रखा दूध पीने लगा । मैने श्रद्वा पूर्वक अपनी आंखे बंद कर लीं और हाथ जोड़ कर प्रणाम करने लगा ।


धांय....धांय.....धांय.....अचानक सन्नाटा भंग हो गया । मैने घबरा कर अपनी आंखे खोलीं । मेरे बगल में खड़े जेम्स के हाथ में दबा रिवाल्वर धुंआ उगल रहा था और उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान तैर रही थी ।


मैने धड़कते दिल से मंदिर के भीतर देखा तो कलेजा मुंह को आ गया । लहुलुहान नाग फर्ष पर बुरी तरह तड़प रहा था । मुझे जेम्स से इतने बड़े धोखे की उम्मीद न थी । उसका गिरेबान पकड़ मैं हिस्टीरयाई अंजाज में चीख पड़ा,‘‘तूने मेरे नाग देवता पर गोली चलाई है, मैं तुझे नहीं छोडूंगा ।’’


जेम्स मुझसे काफी लंबा चैड़ा था । उसने अपना गिरेबान छुड़ाने की बहुत कोशिश की लेकिन मुझमें जाने कहां की शक्ति समा गयी थी । मैनें उसे उठा कर पटक दिया और उसके सीने पर सवार हो गया । उसके हाथ का रिवाल्वर छिटक कर दूर जा गिरा था ।


गोली की आवाज पूरी हवेली में गूंज गयी थी तभी भाईसाहब और मैकू काका दौड़ते हुये चले आ रहे थे । हमें देख कर वे दूर से ही चिल्लाये,‘‘ये क्या हो रहा है ।’’


‘‘भाई साहब, पकड़िये इसे, वरना ये मुझे मार डालेगा’’ जेम्स ने चिल्लाते हुये याचना की ।


भाई साहब और मैकू काका ने मुझे जबरदस्ती घसीटकर जेम्स से अलग किया ।

अपने को छुड़ा कर मैं फिर तेजी से उसकी ओर लपका तो भाई साहब ने डपटा,‘‘ पागल हो गये हो क्या ?’’


‘‘हां..हां.. मैं पागल हो गया हूं । इस दुष्ट ने नाग देवता पर गोली चलाने का पाप किया है । मैं इसे छोडूंगा नहीं ’’ मैं चिल्ला उठा ।


यह सुन भाई साहब चैंक पड़े । उन्होनें मंदिर के भीतर झांका तो उनके मुंह से चीख निकल गयी । वहां नाग का निर्जीव शरीर पड़ा हुआ था । उसके चारों ओर खून बिखरा हुआ था । उनका चेहरा भय से पीला पड़ गया । उन्होने जेम्स को आग्नेय दृष्टि से घूरते हुये कहा,‘‘तुमने नाग देवता पर गोली चला कर अच्छा नहीं किया । अब बहुत बड़ा अनर्थ होगा ।’’


जेम्स ने कमीज की बांह से अपना मुंह पोंछा फिर बोला,‘‘क्या आप अब भी उसे देवता मान रहे हैं ? अरे जो अपनी रक्षा नहीं कर पाया वो देवता कैसे हो सकता है । फिर आप लोग तो इसे अमर बता रहे थे, अगर यह अमर था तो मर कैसे गया ?’’


जेम्स की बातों में दम था और हमारे पास कोई उत्तर न था । वह नाग अमर था यह बात हमने घर के बड़े बुजुर्गो से सुनी थी लेकिन वह मर चुका है यह हमने अपनी आंखों से देखा था । तो फिर सत्य क्या था ? हमने आज तक जो कुछ भी सुना था वो झूठ था ? हमारी सारी मान्यतायें और विष्वाष व्यर्थ थीं ?


‘‘किस सोच में पड़े हो दोस्त ?’’ तभी जेम्स ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुये कहा,‘‘तुम्हारी वर्षो पुरानी मान्यतायें आज टूट गयीं हैं , इसलिये तुम्हारे दुख को, तुम्हारी भावनाओं को मैं समझ सकता हूं । लेकिन जो कुछ भी हुआ अच्छा ही हुआ । व्यर्थ के अंधविश्वाशो में जीने से क्या फायदा ?’’


जेम्स शायद सही कह रहा था लेकिन मैने उसकी बातों का कोई उत्तर नहीं दिया । तभी वह पुनः बोला,‘‘यह खरतरनाक हिमालियन किंग कोबरा है । इसके काटे का कोई ईलाज नहीं होता है इसीलिये मैनें इसे मार दिया । तुम्हें याद होगा कि मैनें बताया था कि मेरे संग्रह में बस हिमालियन किंग कोबरा की ही कमी है । अतः इसके मृत शरीर को मैं लेता जाउंगा और केमिकल लगा कर अपने संग्रहालय में रख लूंगा ।’’


‘‘नहीं, तुम हमारे देवता को हाथ भी नहीं लगा सकते ’’भाई साहब जबड़े भींचते हुये चीख पड़े । क्रोध की अधिकता से उनकी आंखे लाल अंगार हो उठी थीं ।


‘‘भाई साहब, सच्चाई आपके सामने है फिर भी आप उसे स्वीकार क्यूं नहीं करना चाहते ? यह कोई देवता नहीं बल्कि साधारण सांप था जो कि आपके सामने मरा पड़ा है ’’ जेम्स ने शांत स्वर में समझाने की कोषिष की ।


‘‘मैं तुमसे कोई बहस नहीं करना चाहता । तुमने इस नाग का खून कर दिया है लेकिन तुम हमारी भावनाओं का खून नहीं कर सकते । तुम इस नाग के करीब भी नहीं जाओगे यह हमारी आज्ञा है ’’इतना कह कर भाई साहब मैकू की तरफ मुड़े और बोले,‘‘कल सुबह पंडित जी को बुला लाना । वे शास्त्र - सम्मत विधि से कुल - देवता का अंतिम संस्कार कर देगें ।’’


इसके बाद सभी लोग हवेली के भीतर लौट आये । जेम्स मेहमानखाने में चला गया और मैं उपर अपने कक्ष में आकर लेट गया । जेम्स ने जो कुछ भी कहा था वह सत्य लग रहा था लेकिन उसने जो कुछ भी किया था वो अच्छा नहीं था । मन बहुत उदास हो गया था । मैं जानता था कि भाई साहब अब जेम्स की यहां मौजूदगी बर्दाष्त नहीं कर पायेंगे इसलिये मैंने कल सुबह ही उसके साथ यहां से वापस जाने का निष्चय कर लिया ।


रात के दो बज चुके थे । नींद आंखो से कोसों दूर थी । अचानक ‘धम्म’ की आवाज सुनायी पड़ी । ऐसा लगा जैसे कोई फर्ष पर गिर पड़ा हो । लेकिन इतनी बड़ी हवेली में यह आवाज किधर से आयी थी, मैं समझ नहीं पाया । अतः अपने कानों को सतर्क कर चुपचाप लेटा रहा ।


थोड़ी देर बाद हल्की सी आहट फिर सुनायी दी । ऐसा लगा जेसे कोइ्र फर्श पर तड़प रहा हो । मैं उठ कर अपने कक्ष से बाहर आ गया । तभी मेज के घसीटे जाने की आवाज सुनायी पड़ी । मैं चैंक पड़ा, यह आवाज मेहमानखाने की तरफ से आ रही थी । तो क्या जेम्स ने फिर कोई गड़बड़ी की है । मैं तेजी से मेहमानखाने की तरफ बढ़ा ।


जेम्स के कमरे में दो खिड़कियां थीं । एक अंदर दालान की तरफ खुलती थी और दूसरी मंदिर की तरफ । दालान के भीतर खड़े हो कर मैने कमरे के भीतर झांका तो आश्चर्यचकित रह गया । जेम्स फर्श पर पड़ा बुरी तरह तड़प रहा था और सामने रखी बड़ी सी मेज को घसीटने की कोशिश कर रहा था लेकिन अपने प्रयास मंे सफल नहीं हो पा रहा था ।


क्या हो गया है इसे ? मैं आवाज देने जा ही रहा था कि मेरी दृष्टि मेज पर रखे शीशे के जार से चिपक कर रह गयी । जार में कोई द्रव भरा हुआ था और उसके भीतर उस नाग का मृत शरीर रखा था । इसका मतलब मना करने के बाद भी वह मंदिर से नाग को उठा लाया था । मेरे अंदर जेम्स के प्रति घृणा की लहर दौड़ गयी । उसकी यह हरकत सरासर हमारी मान्यताओं का अपमान था ।


भाई साहब ने सही कहा था, एक अंजान व्यक्ति को अपना रहस्य बता कर मैने भारी भूल की थी । उन्हें अगर जेम्स की इस हरकत के बारे में पता चल गया तो अनर्थ हो जायेगा । इसलिये मैने जेम्स को दवा खिला कर फौरन यहां से बिदा कर देने का निश्चय किया । मुझे लग रहा था कि उसकी तबियत कुछ खराब हो गयी है जो दवा खाने से ठीक हो जायेगी ।


मैं दरवाजा खुलवाने के लिये उसे आवाज देने जा ही रहा था कि उसका शरीर जोर से तड़पा और उसके मुंह से ढेर सारा झाग निकलने लगा । उसके गले से अजीब सी घरघराहट और गों...गों....की आवाज आ रही थी । वह दोनों हाथों से अपने गले को बेचैनी से मल रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे उसे बहुत जलन महसूस हो रही हो ।


इसका मतलब जब वह दोबारा मंदिर गया था तब किसी विषैले जीव ने उसे काट लिया था और अब उसका विष अपना प्रभाव दिखाने लगा था । कहीं नागिन द्वारा नाग की मौत का बदला लेने की कहानी सच तो नहीं हो गयी ? मेरा दिल बुरी तरह धड़क उठा ।


कुछ भी हो मुझे उसकी मदद करनी चाहिये । मैं एक इन्सान को इस तरह मरते नहीं देख सकता । इससे पहले कि मैं कुछ कर पाता जेम्स ने अपना मुंह उपर उठाया । उसके होंठ बुरी तरह फड़फड़ाये और उसकी दंत पंक्तियां चमक उठीं । उसने हाथ बढ़ा कर अपने जबड़ों को भींच लिया । ऐसा लग रहा था कि उसके मुंह के भीतर से कोई चीज बाहर निकलने वाली है और वह उसे रोकने की कोशिश कर रहा है ।


किन्तु वह ज्यादा देर तक अपने प्रयास में सफल नहीं हो सका । उसका उपरी जबड़ा हल्का सा उपर उठा और उसकी जीभ बाहर निकल आयी । लंबी, काली , लपलपाती हुयी जीभ । लेकिन यह क्या ? उसकी जीभ आश्चर्यजनक ढंग से बीच से विभक्त थी । ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने बीच से उसे चीर दिया हो ।


जेम्स अपने सिर को हवा में लहराते हुये अपनी जीभ को अंदर - बाहर लपलपाने लगा था । जीभ की ऐसी लपलपाहट मैनें पहले भी कहीं देखी थी । लेकिन कहां ? कुछ याद नहीं आ रहा था ।


मैने दिमाग पर जोर डाला तो हृदय कांप उठा । ऐसी लपलपाहट तो आज रात मैनें मंदिर के भीतर देखी थी । दूध पीने आये नाग और जेम्स की जीभ की लपलपाहट में अद्भुत समानता थी । नहीं ऐसा नहीं हो सकता ! मेरा रोम - रोम सिहर उठा । आंखे जो देख रही थीं दिमाग उसे स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं था , पर सत्य सामने था । मुझे अपना दिमाग चकराता हुआ मालुम पड़ा । घबराकर मैने खिड़की की सलाखों को पकड़ लिया ।


इसी के साथ जेम्स के शरीर पर चकत्ते उभरने लगे थे और उसका शरीर फर्श पर लहराने लगा था । उसके हाथ और पैर एक अजीब सी धुन में बेचैनी के साथ मचल रहे थे । तभी उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ गयी । उसकी आंखों में वेदना, याचना, पीड़ी और करूणा के मिले - जुले भावों का सम्मिश्रण था । शायद वह मुझसे मदद की भीख मांगना चाहता था किन्तु उसकी जुबान उसका साथ नहीं दे रही थी ।


उसकी आंखो में जैसे भाव छाये हुये थे वैसा दारूण दृष्य मैने पहले कभी नहीं देखा था । मुझे उस पर छाये खतरे का आभास हो गया था । मैं उसकी मदद भी करना चाहता था किन्तु किसी अज्ञात शक्ति के वशीभूत हो मेरा दिमाग संज्ञाशून्य सा हो गया था और हाथ - पैर जड़ । मैं खामोशी से अपनी जगह खड़ा होकर जेम्स के शरीर में हो रहे परिर्वतनों को देख रहा था ।


उसके शरीर पर उभरे चकत्तों के बीच अब धारियां भी उभर आयी थीं । उसका शरीर कुछ पतला सा होने लगा था जिसके कारण उसके कपड़े ढीले हो गये थे । फर्श पर पड़ा - पड़ा जेम्स आगे की तरफ खिसका जिससे उसकी गर्दन कमीज से बाहर निकल आयी । वह गर्दन आश्चर्यजनक ढंग से लम्बी थी । किसी इन्सान की गर्दन इतनी लंबी नहीं हो सकती थी । जैसे सांप अपनी केंचुल छोड़ देता है, मेरे देखते ही देखते बिल्कुल वैसे ही जेम्स का शरीर अपने कपड़ों को छोड़ कर बाहर निकल आया था । अब वह फर्श पर रेंगते हुये मंदिर की तरफ खुलने वाली खिड़की की ओर बढ़ रहा था ।


खिड़की फर्श से 3 फुट उंची थी । उसके नीचे पहुंच जेम्स अपने मुंह को उपर उठा कर दीवार पर चढ़ने का प्रयत्न करने लगा । किन्तु एक - डेढ़ फुट उपर उठने के बाद उसका शरीर नीचे गिर पड़ता था और फिर वह दोबारा कोशिश करने लगता था । शायद वह उस खिड़की के उस पार कुछ देखना चाहता था, लेकिन वह अपने हाथ आगे बढ़ा कर खिड़की की सलाखें क्यूं नहीं पकड़ लेता ? मेरे मन में प्रष्न कौंधा, किन्तु अगले ही पल मुझे उसका उत्तर भी मिल गया । मैने देखा उसके हाथ निस्तेज होकर लुंज से हो गये हैं ।


जेम्स का शरीर अब तक काफी पतला हो गया था । थोड़ी देर के प्रयास के पश्चात उसका मुंह खिड़की तक पहुंच गया था । अपने दांतों से खिड़की की सलाखों को पकड़ कर उसने अपने शरीर को संभाला और अपना मुंह खिड़की के उस पार लटका दिया ।


अब जेम्स के शरीर का आधा हिस्सा कमरे के बाहर लटका हुआ था और आधा कमरे के भीतर था । उसके शरीर में रबड़ जैसा लोच आ गया था । जैसे कोई रस्सी खींची जाती है वैसे ही धीरे - धीरे सरकते हुये उसका शरीर बाहर जाने लगा ।


मैं आंखे फाड़े - फाड़े सब देख रहा था । जब उसकी कमर के नीचे तक का हिस्सा बाहर लटक गया तो उसके सरकने की गति बढ़ने लगी और यह मेरी आंखो का भ्रम नहीं हो सकता, मैने स्पष्ट रूप से देखा था कि उसके पैरों के स्थान पर किसी लंबे सांप की पूंछ खिड़की से बाहर जा रही थी ।


यह सब क्या हो रहा है ? कहीं मैं कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा ? मैने अपने एक हाथ से दूसरे पर जोर से चुटकी काटी तो तेज दर्द का एहसास हुआ । इसका मतलब मैं जाग रहा था और जो कुछ भी मैनें देखा था वह स्वप्न नहीं हकीकत था ।


मैने कमरे के भीतर दोबारा दृष्टि दौड़ायी तो धक्क रह गया । जार के भीतर से मृत नाग का शरीर गायब हो चुका था । फर्ष पर पड़े हुये जेम्स के कपड़े उसके साथ हुयी किसी अनहोनी की गवाही दे रहे थे ।


तो क्या जो कुछ भी मैं सोच रहा था वह सच था ? नहीं वो सच नहीं हो सकता ! तो फिर जेम्स कहां गया ? मैने अपने सिर को जोर से झटका और दौड़ कर बाहर निकला । पीछे वाली खिड़की के करीब पहुंच कर मैनें टार्च की रौशनी डाली । वहां कच्ची मिट्टी में किसी इन्सान के गिरने के कोई चिन्ह नहीं थे । हां एक लकीर सी अवश्य बनी हुयी थी जो झाड़ियों के भीतर तक गयी थी ।


संजीव जायसवाल ‘संजय’


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