कारगिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजराती कविता का अनुवाद


कारगिल पहले भी गया था,

टाइगर हिल पहले भी देखी थी।

तब राजाधिराज के श्वेत मौन को

जी भरकर देखा था!


आज, हर चोटी गरजती थी,

बम, बन्दुक की गूँज से।

बर्फ़ की शिलाओं पर

धधकते अंगारों जैसे

सेना के जवानों को देखा।

यहाँ हर जवान किसान था

जो अपने आज को बीज रहा था,

अपने खून से सींच रहा था

ताकि

हमारा कल मुरझा न जाए।

हर जवान की आँख में

उमड़ते सौ करोड़ सपने देखे।

अपनी आँख की पलक से

मौत को जकड़ने वाले वीर देखे

और यमराज को

इन वीरों के चरण चूमते हुए देखा!


धधकते अंगारे समान

वीर जवानों की गर्म साँसों से

पिघलती बर्फ़ झरना बन बहती थी।

झरने की गति में समाया था

सुजलाम्, सुफलाम्,

भारत का भाव और

झरने की कोख से फूट रहा था

वंदेमातरम् गान!

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