ममत्व

रात भर गाय बोलती रही। मैं-मैं में बिगडेल की पल भर को भी आँख नहीं लगी। सुबह मुँह अंधेरे ही उठ कर वह अपने घर और पडौस के बाडे के चक्कर लगाने लगी थी। नींद से उसकी आंखें जल रही थीं और शरीर दर्द से टूट रहा था। उसे गाय और उसके मालिकों पर गुस्सा आ रहा था।

शूर्य निकलते-निकलते एक सुन्दर सी महिला गाय कीदेख-भाल के लिए आई। उसने बिगडेल को देखकर अपना घूँघट कुछ और नीचे को खींच लिया और बाडे का फाटक खोल कर अन्दर जाने लगी।

“अपने जानवरों को भी सम्भाल कर नहीं रख सकते तुम लोग ? गाय को न जाने क्या आग लगी है,सारी रात मैं-मैं करती रही।“ बिगडेल नेदो कदम महिला की ओर बढ कर कहा।

“जानवर है, जरूरत पडने पर ही बोलता है। तुम्हारी तरह रात दिन.....

“रात दिन क्या.....? “ महिला की बात पूरी होने से पहले ही बिगडेल ने ऊँचे स्वर में पूछा और कुछ है भी तो, तुमसे मतलब। मेरा शरीर है, मैं जो चाहूँ सो करूँ। “

“मगर औरत की कोई मान-मर्यादा होती है,समाज में उसकी इज्जत-आबरू होती है। “

“इज्जत ! हूँ !! बडी-बडी इज्जत मेरी ऐडी के नीचे हैं। गाँव का हर बडा आदमी मेरी चौखट पर नाक रगडता है।“ बिगडेल ने अहंकार पूर्वक कहा।

“ कितने बच्चे हैं तुम्हारे ? “ महिला ने पूछा

“ बच्चे ! बच्चा-वच्चा कोई नहीं है । “

“ हुए ही नहीं या......?” महिला ने वाक्य अधूरा छोड दिया ।

“ मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया।“

“ फिर तुम्हे क्या मालूम कि ममता क्या होती है। गाय के बोलने का मर्म तुम्हें क्या पता।“ महिला ने अपने उभरे पेट को आँचल से ढाँपते हुए कहा

“मतलब...... ? “

“मतलब यह कि यह गाँव-गाँव भटकना छोड कर किसी भले आदमी का पल्ला थाम ले और इज्जत

आबरू से घर बसा कर बैठ। यह रंग-रूप चार दिन का है।आज तो रामू उस्ताद तुम्हें उठा लाया। लेकिन साल दो साल में कोई तुम्हे धेले धडी भी नहीं पूछेगा।“ महिला ने उत्तर दिया और गाय की ओर बढ गई।***


-प्रभु मंढइया विकल

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