नमिता की बातें सुनकर ऋचा पलंग पर कटी पतंग की भॉंँति गिर पड़ी....साँॅंसें धांकनी की भॉंति चल रही थी....सिर दर्द की वजह से फटा जा रहा था....दिल इतनी तेज-तेज धडक रहा था मानो निकल कर बाहर ही आ जायेगा....आखिर उसके साथ ही ऐसा क्यों होता है....उसके हर अच्छे काम में बुराई निकाली जाती है या उसे ऐसे तोड़ मरोड़ कर पेष किया जाता है कि अच्छा भी बुरा बनकर रह जाता है....नमिता के वचन उसके मनमस्तिष्क पर प्रहार करते प्रतीत हो रहे थे....
‘ दीदी मंगलसूत्र और एक सेट के साथ विवाह के स्वागत समारोह का खर्च भी उठा रही हैं तो क्या हुआ, दिव्या उनकी भी तो बहन है, फिर जीजाजी के पास क्या कमी है, दो नंबर का पैसा है उसे जैसे भी चाहे खर्च करें....हमारे दो बेटियाँ हैं हमें उनके बारे में भी तो सोचना है, सब जमा पूँजी बहन के विवाह में ही खर्च कर दीजियेगा या उनके लिये भी कुछ बचाकर रखियेगा....।’
दिव्या के साथ उसके विवाह का सूटकेस लगाने के पष्चात्, अपने कमरे में सोने जा रही ऋचा के पैरों ने भाई के कमरे से आती फुसफुसाहट में अपना नाम सुनकर, अनायास ही आगे बढ़ने से मना कर दिया....नमिता की बात सुनकर वह अवाक रह गई थी....तथा बिना कुछ कहे सुने अपने कमरे में चली आई।
वैसे भी प्रतिवाद करने से होता भी क्या....व्यर्थ कटुता ही बढ़ती साथ में ही छिप-छिप कर बातें सुनने का आरोप अलग से जड़ दिया जाता....पर इस निराधार आरोप को वह सह नहीं पा रही थी....।
भाभी....नमिता तो दूसरे घर से आई है लेकिन भाई सुरेंद्र को तो प्रतिवाद करना चाहिये था, वह तो उसके और अमर के बारे में जानता है, यह ठीक है कि उसके पति अमरकांत एक ऐसे विभाग में अधीक्षण अभियंता हैं जिसमें नियुक्ति पाना, खोया हुआ खजाना प्राप्त करने जैसा है...। वैसे तो आज कोई भी विभाग भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रहा है लेकिन लोकनिर्माण विभाग वकुछ ज्यादा ही बदनाम है, लोग कहते हैं कि ये लोग सड़क, पुल, डैम इत्यादि बनाते ही टूटने के लिये है, यदि वे न टूटें तो इनकी जेबें कैसे गर्म हों....।
लेकिन सबको एक ही रंग में रंग लेना क्या उचित है....क्या आज वास्तव में सच्चे और ईमानदार लोग रह ही नहीं गये हैं....? बाहर वाले इस तरह के आरोप लगायें तो समझ में भी आता है क्यांकि उन्हें तो स्वयं को अच्छा सिद्ध करने वके लिये दूसरों पर कीचड़ उछालनी ही है पर जब अपने ही अपनों को न समझ पायें तो बात बरदाष्त से बाहर हो जाती है....एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है आज उसे यह कहावत अक्षरषः सत्य प्रतीत हो रही थी....वरना अमर का नाम, उन्हें जानने वाले लोग आज भी श्रद्धा से लेते हैं....स्थानांतरण के साथ ही कभी-कभी उनकी प्रसि$ उनके वहॉंँ पहॅँंचने से पहले ही पहुँच जाया करती है ।
ऐसा नहीं है कि उनका कोई दुष्मन नहीं है या अपनी ईमानदारी की वजह से उन्हें कोई तकलीफ नहीं उठानी पड़ी.....बार-बार स्थानांतरण, अपने ही सहयोगियों द्वारा असहयोग सब कुछ तो उन्होंने झेला है....कभी-कभी तो उनके सीनियर भी उनसे कह देते थे....भाई तुम्हारे साथ तो काम करना भी कठिन है....स्वयं को कुछ तो हालात के साथ बदला करो, या बदलना सीखो....अगर तुम नहीं खाना चाहते तो मत खाओ पर दूसरे के पेट पर लात तो न मारो....इसके साथ ही कभी-कभी ईमानदारी का दिखावा करने के आरोप भी लगे....पर अमर न जाने किस मिट्टी के बने थे कि उन्होंने दुर्गम से दुर्गम समय में परेषानियाँॅं सही, अपने सीनियरस का कोपभाजन बनना मंजूर किया पर हालात से समझौता नहीं किया....सच्चाई और ईमानदारी के मार्ग से विचलित नहीं हुए....यह बात अलग है कि उन जैसे विभाग के नवनियुक्त अधिकारी उनकी हिम्मत की दाद देते हुए उनसे प्रेरणा लेने की बातें करते रहे थे पर उनमें से ष्षायद चंद ही अमर की तरह भ्रष्टाचार की ऑंधी के थपेड़ों से बचकर निकल पाते थे....वस्तुतः भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा समाज, पूर्वाग्रह से प्रेरित होते हुए ऐसे चंद लोगों की जिजीविषा को, जानते बूझते हुए भी नकार देता हैं ।
मर्मातंक पीड़ा सहने के पष्चात् अगर कोई समय की धारा के साथ चलने को मजबूर हो जाए तो उसमें उसका नहीं वरन् परिस्थतियों का दोष होता है। परिस्थतियों को चेतावनी देकर समय की धारा के विपरीत चलने वाले पुरूष बिरले ही होते हैं....अमर को उसने परिस्थतियों से जूझते देखा था....यही कारण था कि अमर जैसे निष्ठावान व्यक्ति के लिये नमिता के वचन ऋचा को असहनीय पीड़ा पहुँचा गये थे तथा उससे भी ज्यादा दुख भाई सुरेंद्र की मौन सहमति पाकर हुआ था ।
एक समय था जब अमर की ईमानदारी और सदाश्यता पर वह स्वयं भी चिढ़ जाती थी खासतौर पर जब घर में सरकारी गाड़ी खाली खड़ी हो और उसे रिक्षे से या पैदल, बाजार या किसी अन्य काम से जाना पड़ता था, या आफिस में किसी की दुखित अवस्था देखकर अमर तन से, धन से तुरंत सहायता करने को तैयार हो जाते थे।
उसके विरोध करने पर या अपनी दूसरों से तुलना करने पर उनका एक ही कथन होता....‘ऋचा, यह मत भूलोे कि सच्ची ष्षांति मन की होती है, पैसा तो हाथ का मैल है जितना भी हो उतना ही कम है, फिर व्यर्थ की आपा धापी क्यों....वेवजह तलवार की नोंक पर टिके रहकर, व्यर्थ के तनाव से ग्रसित होकर नित नई बीमारियों को क्यों आमंत्रित करते रहे....वैसे भी सरकार से वेतन के रूप में हमें इतना तो प्राप्त हो ही जाता है कि रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के पश्चात् थोड़ा बहुत बचा सकें, और इसी बचत से हम किसी जरूरतमंद की सहायता कर सवकें तो मन को दुख नहीं प्रसन्नता ही होनी चाहिए.....इंसान को दो वक्त की रोटी के अलावा और क्या चाहिए ?’
‘ इंसान अगर इंसान के काम नहीं आ सवका तो इंसान नहीं जानवर ही कहलायेगा....वैसे भी पैसा नहीं, इंसान का स्वभाव ही उसे इंसान बनाता है....अगर ईष्वर ने हमें किसी की सहायता के लायक बनाया है तो हम हाथ क्यों खीचें....तुम मानो या न मानो लोगों के मुख से निकली दुआ ही हमें जीवन के कठिनतम क्षण से उबारने की ष्षक्ति प्रदान करती है, ऐसा मेरा मानना है....।’
अमर की बातें ऋचा को सदा ही आदर्षवाद से प्रेरित लगती रही थीं.... भला अपनी खून पसीने की कमाई को दूसरों पर लुटाने की क्या आवष्यकता है ? विषेषतया तब जब वह सहयोगियां की पत्नियों कोे गहने और कीमती वस्त्रोंं से लदे-फदे देखती....उनके घर को आधुनिक सामानों से सुसज्जित पाती तथा किटी पार्टियो में काजू, बादाम के साथ ष्षीतल पेय परोसते समय उसकी ओेर लक्ष्य कर व्यंगात्मवक मुस्कान फेंकती।
बाद में उसने स्वयं ऐसी बेमतलब की पार्टियों में जाना ही छोड़ दिया था....जहाँॅं काम की बातों से ज्यादा पैसों के प्रदर्षन के साथ-साथ दूसरों को हीनता के बोध से अवगत वकरवाया जाता है......पता नहीं क्यों उसे लगने लगा था कि ऐसी सि़्त्रयॉं गलत और सही, उचित और अनुचित में भेद नहीं कर पाती हैं....ष्षायद वह यह भी नहीं समझ पाती, कि उनका यह दिखावा, उनका ऐषोआराम उस काली कमाई से है जिसे देखना भी भले लोग पाप समझाते है....वास्तव में उसे स्वयं भी ऐसी मानसिक स्थिति से चिढ़ होने लगी थी....।
कभी-कभी की बात और है पर उसके संस्कारी मन ने सदा अमर की इस ईमानदारी कर्तव्यानिष्ठा की दाद ही दी है, उसे गर्व है उसकी पत्नी होने पर....क्योंकि वह जानती है जो दिन के उजाले में काली कमाई से अपने हाथ काले करते हैं वह रात के अॅंधेरे में सुख से सो नहीं पाते....अमर के विभाग के ही एक अधिकारी जिनकी अक्खड़ और अहंकारी स्वभाव की पत्नी जब तब ईमानदार लोगों की बखिया उधेड़ने से बाज नहीं आती थी, के घर जब रेड हुई तब लाखों रूपयो कैष और ज्वेलरी मिलने पर उनकी जो फजीहत हुई उसे देखने के बाद तो उसे भी लगने लगा है कि ऐसी आपाधापी किस काम की, जिससे कि बाद में किसी को मँॅुंह दिखाने काबिल ही न रहें....यह बात अलग है कि पकड़े वही जाते हैं जो इस खेल में कच्चे होते हैं....वरना लोग तो करोड़ों के वारे न्यारे करके भी ष्षान से कहते और रहते हैं।
आष्चर्या तो उसे तब हुआ जब उस अधिकारी के ईष्ट मित्र जो वफादारी का दम भरते थे, उस घटना के बाद उससे कन्नी काटने लगे....ष्षायद उन्हें लगने लगा था कि कहीं उसके साथ वह भी लपेटे में न आ जायें....उस समय उसकी पत्नी को अकेले ही उनकी जमानत के लियो भाग दौड़ करते देख सहज ही लगने लगा था देखी जमाने की यारी बिछड़े सभी बारी-बारी....वास्तव में परेषानी के क्षणों में ही अच्छे और बुरे की पहचान हो पाती है।
सच समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने स्वार्थ के लिये कभी जिनकी जी हजूरी करने से नहीं थकते वही मुसीबत के क्षण उनसे ऐसे विमुख हो जाते हैं जैसे उन्हें कभी जानते ही नहीं....ष्षायद व्यक्ति का स्वभाव, उसकी निष्पक्षता, अपने मातहतों को उचित सम्मान न दिये जाने की भावना भी इसके लिये दोषी हो....पर यह भी सच है कि अमर के मामूली एक्सीडेंट में घायल होने पर उसी आफिस का छोटे से छोटा कर्मचारी उनके साथ खड़ा नजर आया....तब उसे लगा था कोई माने या न माने आदमी की अच्छाई ही बुरे वक्त में काम आती है ।
पर आज नमिता की बातें उसे बेहद व्यथित कर गई, आज उसे दुख तो इस बात का था कि बाहर वाले तो बाहर वाले उसके अपने घर वाले ही अमर की ईमानदारी पर ष्षक कर रहे हैं....उन पर आज वही अंगुली उठाने पर बाज नहीं आ रहे हैं जिनकी जब तब वह सहायता करते रहे....लोग कहते हैं कि सदैव सच्चाई की जीत होती है, असत्य पर सत्य की विजय होती है, िंकतु आज सत्य को भी प्रमाण की आवष्यकता पड़ने लगी....आखिर वह अमर की ईमानदारी कैसे सिद्ध वकरे....दूसरों से तो इंसान लड़ भी ले पर जब अपने ही कीचड़ उछालने लगे तो इंसान जाए भी तो कहॉं जाए....वह तो अच्छा था कि अमर उसके साथ नहीं आये थे वरना उनके कानों में नमिता के ष्षब्द पड़ते तो....उसे नींद नहीं आ रही थी....अनायास ही अतीत उसके सामने चलचित्र की भॉंति गुजरने लगा....
ऋचा मध्यमवर्गीय परिवार में पली बढ़ी थी, उसके पिता एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे, अपने पढ़ाने की कला के कारण वह स्कूल के समस्त विद्यार्थियों में लोकप्रिय थे, वह षिक्षा वको व्यवसाय नहीं, समाज के उत्थान में अपना एक छोटा सा योगदान समझते थे, यही कारण था कि उन्होंने कभी टियूषन नहीं लिया था पर अपने विद्यार्थी की प्रत्येक समस्याओं के लिये, चाहे वह पढ़ाई से संबंधित हों या व्यक्तिगत, उनका द्वार सदैव खुला रहता था.....उनका मानना था कि गुजारे लायक वेतन तो स्कूल से मिल ही जाता है फिर टियूषन क्यों और किसलिये....विद्या धनोपार्जन वके लिये नहीं वरन् दान के लिये होती है....वस्तुतः ऐसा करके उन्हें आत्मसंतुष्टि मिलती थी।
अमर भी उनके ही विद्यालय में पढ़ते थे। पढ़ने में तीव्र, अंर्तमुखी तथा धीर-गंभीर तथा अन्य छात्रों से अलग, पढ़ाई में ही लगे रहते थे....पिताजी का स्नेह पाकर वह कभी-कभी अपनी समस्याओं के लिये उसके घर आया करते थे....न जाने क्यों उनका धीर गंभीर स्वभाव माँॅं को बेहद भाता था....कभी-कभी वह हम भाई बहनों को ष्षैतानी या लड़ते झगड़ते देखकर उनका उदाहरण भी दे देती थीं।
एक बार पिताजी नहीं थे....मॉं ने उनके परिवार के बारे में पूछ लियाष् माँॅं की सहानुभूति पाकर उनके मन का लावा फूट-फूटकर बह निकला....पता चला कि उनकी माँ सौतेली है तथा पिताश्री अपने व्यवसाय में ही इतना व्यस्त रहते हैं कि बच्चों की ओर ध्यान ही नहीं दे पाते थे.... सौतेली माँँ से उनके दो भाई थे, उनकी माँ को ष्षायद यह डर था कि उनके कारण उसके पुत्रों वको पिता की संपत्ति से पूरा हिस्सा नहीं मिल पायोगा इसी आव्रकोष वको वह जब तब याह कहकर निकालती रहती थी कि मरने वाली तो चली गई किंतु अपना बोझ मेरे सिर पर लाद गई।
मॉंँ उनकी आपबीती सुनकर द्रवित हो उठी थी....उसके बाद वह अक्सर ही घर आने लगे, अमर के बालमन पर माँ की कही बातें इतनी बुरी तरह से बैठ गई थी कि अनजाने ही वह अपना बचपना खो बैठे तथा उन्होंने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित कर लिया जिससे कुछ बनकर अपने व्यर्थ हो आये जीवन को नया आयाम, नया मकसद दे सकें....उसके पिताश्री के रूप में अमर को न केवल गुरू वरन् अभिभावक एवं संरक्षक भी मिल गये थे अतः जब-तब अपनी समस्याओं को लवकर उनके पास आने लगे थे....पिताश्री के द्वारा मार्गदर्षन प्राप्त कर उनका खोया हुआ आत्मविश्वास लौटने लगा था।
ऋचा अमर से मात्र चार वर्ष छोटी थी, अमर के बार-बार घर आने से दोनों में मित्रता हो गई, समय पंख लगाकर उड़ता रहा और समय के साथ ही उनकी मित्रता प्रगाढ़ता में परिवख्रिर्तत होती गई....अमर का परिश्रम रंग लाया प्रथम प्रयास में ही उनका रूड़की इंजीनियारिंग कालेज में सलेक्षन हो गया और वह चले गए।
अमर के पिता अमर का रूड़की में चयन सुनकर बेहद खुष हुए थे उन्होंने ने भी अमर की सफलता का श्रेय पिताजी को ही दिया था, अब भी उनको इस बात का ही दुख था कि वह अमर की परवरिष पर विषेष ध्यान नहीं दे पाये ं।
अमर के जाने के पष्चात् ऋचा को महसूस हुआ कि अमर ने उसके मन में अपनी ऐसी जगह बना ली है जहॉंँ से उसे निकाल पाना असंभव है पिताजी को भी उसकी मनः स्थिति का आभास हो चला था कितु वह अमर पर कोई दबाब डालकर कोई निर्णय नहीं करवाना चाहते थे और यही मत उसका था।
रूड़वी पहॅुंचकर उन्होंने एक संक्षिप्त पत्र पिताजी को लिखा था पिताजी के नाम तो हर महीने हीं उसके पत्र आते रहे जिसमें अपनी पढ़ाई के जिक्र के साथ घर भर की कुषल क्षेम पूछी जाती....वह हर पत्र ध्यान से पढ़ती ष्षायद कहीं उसके बारे में विषेष कुछ लिखा हो....पर हर बार निराषा ही मिलती....उसने अमर का यह रूख देखकर अपना ध्यान पढ़ाई में लगा दिया तथा अमर को भूलने का प्रयत्न करने लगी।
दिन बीतने के साथ स्मृतियाँॅं भी धँॅुंधली पड़ने लगी थी....तथा उसने भी धुंध हटाने का प्रयत्न न कर पढ़ाई में दिल लगा लिया। हायर सेकेंडरी वकरने के पश्चात् वह इंटीरियर डेवकोरेषन का कोर्स करने लगी थी एक दिन वह कॉलेज से लौटी तो एक लिफाफा छोटी बहन दिव्या ने उसे दिया।
उसे कोन पत्र लिखेगा सोचकर उत्सुकतावष उसने पत्र लिया, जानी पहचानी लिखावट देखकर चौंक उठी, धड़कते दिल से लिफाफा खोला, लिखा था....ऋचा इतने वर्षो पश्चात् मेरा पत्रा पाकर आश्चर्य कर रही होगी पर फिर भी आषा करता हॅंँ कि मेरी बेरूखी को तुम अन्यथा नहीं लोगी....यद्यपि हमने कभी इजहार नहीं किया पर हमारे दिल में एक दूसरे की चाहत की जो नन्हीं लौ जली थी, उससे मैं अनजान नहीं था....मुझे अपने प्यार पर विष्वास था....बस समय का इंतजार कर रहा था.....आज वह समय आ गया है.....तुम सोच रही होगी कि अगर मैं वास्तव में तुमसे प्यार करता था तो इतने दिनों तुम्हें पत्र क्यों नहीं लिखा.....तुम्हारा सोचना सच है पर उन दिनों मैं इन सब बातों से हटाकर अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाना चाहता था....मैं तुम्हारे योग्य बनकर ही तुम्हारे साथ आगे बढ़ना चाहता था....अब मेरी पढ़ाई समाप्त हो गई है तथा मुझे अच्छी नौकरी भी मिल गई है, आज ही ज्वाइन करने जा रहा हूँ....अगर तुम कहो तो अगले सप्ताह आकर गुरूजी से तुम्हारा हाथ मॉंँग लॅूंँ....लेकिन विवाह मैं एक वर्ष पश्चात् ही करूंँगा क्योंकि तुम तो जानती ही हो कि मेरे पास कुछ भी नहीं है तथा पिताजी से कुछ भी माँँगना या लेना मेरे सिद्धांतों के विरूद्ध है, मैं चाहता हूँ जब तुम हमारे घर में कदम रखो तो घर में कुछ तो रहे....घर गृहस्थी का थोड़ा बहुत आवश्यक सामान जुटाने के पष्चात् ही तुम्हें लेकर आना चाहॅूंँंगा...अतः मुझे आषा है कि मेरी भावनाओं का सम्मान करते हुए जहाँँ इतना इंतजार किया है वहीं कुछ दिन और करोगी पर याह कदम मैं तुम्हारी स्वीकृति के बाद ही उठाऊँॅंगा....एक पत्र इसी संदर्भ में मैं गुरूजी को लिख रहा हॅंँ अगर इस संबंध के लिये तुम तैयार हो दूसरा पत्र गुरूजी को दे देना....जब वे चाहेंगे मैं आ जाऊॅँंगा।’
अचानक मन के सुसुप्त तार झंकृत हो उठे थे....इंतजार की एक-एक घड़ी काटनी कठिन हो रही थी....पिताजी को पत्र दिया तो वह भी खुषी से उछल पडे....घर में सभी खुष थे, इतने योग्य दामाद की तो ष्षायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
और आखिर वह दिन भी आ गया । जब सीधे-सादे समारोह में मात्र दो जोड़ी कपड़ों में, वह विदा हो गई....उसकी माँ को उसे सिर्फ दो जोड़ी कपड़ों में विदा करना अच्छा नहीं लगा था, गरीब से गरीब माता-पिता भी बेटी को ऐसे तो विदा नहीं करते लेकिन अमर की जिद के सम्मुख सब विवष थे लेकिन पिताजी अपने षिष्य....दामाद के मनोभावों को जानकर गर्वोन्मुक्त हो उठे थे
उसके विवाह के कुछ वर्षो पश्चात् ही पिताजी का निधन हो गया था....सुरेंद्र उस समय मेडिकल के प्रथम वर्ष में था....दिव्या छोटी थी....माँॅं पर तो जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा था....फैमिली पेंषन फिक्स होने में देरी के साथ पी.एफ का पैसा भी नहीं मिल पाया था....घर का खर्च चलाना भी कठिन प्रतीत हो रहा था....उसके साथ ही सुरेंद्र की पढ़ाई का खर्चा....उस समय अमर ने ही मॉँं की सहायता की थी....वहीं सुरेंद्र उनका आर्थिक और मानसिक संबल प्राप्त कर मेडिकल की फाइनल परीक्षा में प्रथम दस छात्रों में अपना नाम अंकित कर पाया था....।ृ
अमर से सहायता लेने पर मॉंँ कभी झिझकती तो अमर कहते,‘ माँँजी, क्या मैं आपका बेटा नहीं हूँ , जब सुरेंद्र आपके लिये करेगा तो क्या आपको बुरा लगेगा.....?’
धीरे-धीरे संकोच का पर्दा हटता गया, माँँ को भी यदि कभी रूपयों की आवष्यकता होती तो वह निःसंकोच कह देती थीं....सुरेंद्र के विवाह में भी उन्हें कुछ रूपयों की आवष्यकता पड़ी थी तब अमर ने पी.एफ. से लोन लेकर उनकी आवश्यकता को पूरा करने का प्रयास किया था यद्यपि मॉंँ ने पिताजी का पैसा मिलने पर जब तब माँगी राषि को लौटाया था, लेकिन अमर को उनका ऐसे लौटाना अच्छा नहीं लगा था, उसकावकहना था वक ऐसी सहायता से क्या लाभ जिसका हम प्रतिदान चाहें....अतः जब-जब भी ऐसा हुआ, ऋचा मॉंँ के द्वारा लौटाई राषि को बैंक में दिव्या वके नाम से जमा करती गई, यह सुझाव भी अमर का ही था।
दिव्या उसके विवाह के समय मात्र सात वर्ष की ही थी....अमर ने उसे गोद में खिलाया था....वह उसे अपनी बेटी मानते थे, वह मॉंँ की स्थिति से परिचित थे...विवाह के स्वागत समारोह का भार उठाकर जहॉँं दिव्या के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति करना चाहते थे वहीं माँॅं का भार कम करने में अपना योगदान देकर उनकी मदद के साथ गुरूजी के प्रति अपनी श्रद्धा एवं सम्मान को अक्षुण रखना चाहते थे....वैसे भी उनके दो पुत्र ही हैं....पुत्री की चाह दिल में ही रह गई थी....ष्षायद ऐसा करके वह दिव्या के विवाह में पुत्री न होने के अपने अरमान पूरा करना चाहते थे।
लौटाई राषि से उसने दिव्या के लिये मंगलसूत्र के साथ एक सेट भी खरीदा था मगर स्वागत समारोह का खर्चा अमर दिव्या को अपनी पुत्री मानने के कारण कर रहे हैं....पर यह बात वह किस-किस को समझाये।
पिछले कुछ वर्षो से वह देख रही थी कि उसके आने पर यदि माँ या भाई घर की किसी समस्या पर उससे सलाह मषवरा करते तो नमिता कहती तो कुछ नहीं थी लेकिन उसका व्यावहार असहनीय होने लगता था, ष्षायद ऐसे अवसरों पर वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगती थी....घर की बहू होने के कारण वह इस दायित्व पर अपना अधिकार समझती थी उसकी मनःस्थिति को समझाते हुए माँ की ओर उसने इषारा करते हुए नमिता से भी सलाह मषविरा करने की पेषकष की थी तथा यथासंभव ऐसी वार्ताओं में वह उसे भी सम्मिलित कर उसकी सलाह लेने को प्रेरित कर स्वयं तटस्थ रहने की कोषिष करती लेकिन उसके मन में न जाने कैसी ग्रंथि जन्म ले चुवकी थी जिसे प्रयत्न करने पर भी दूर करने में असफल रही थी।
धीरे-धीरे अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारियों के कारण उसका मायके जाना भी कम होता गया था किंतु छोटी बहन दिव्या के विवाह के अवसर पर माँ के आग्रह पर दो हफ्ते पहले ही चली आई थी।
आज सुरेंद्र के मौन और नमिता की बातों ने उसे मर्मातंक पीड़ा पहुँचाई थी, कितना बड़ा आरोप लगाया है उसने अमर की ईमानदारी पर , सुनियोजित बचत व्यवस्था के कारण जिस धन से आज वह बहन के विवाह में सहायता कर पा रही है उसे दो नंबर का धन कह दिया....वैसे भी बीस वर्ष की नौकरी में क्या इतना भी नहीं बचा सकते कि कुछ ज्वैलरी के साथ एक स्वागत समारोह का खर्चा उठा सकें....इसमें दो नंबर के पैसे की बात कहाँॅं से आ गई....क्या इंसानी रिश्तों का....भावनाओं का कोई महत्व नहीं रह गया है आज की दुनिया में....ईमानदारी क्या गुजरे वक्त वकी दास्तां बनकर रह गई है जो सभी को एक ही पलड़े में तौला जाने लगा है। निज स्वार्थ में लोग इतने अंधे क्यों होते जा रहे हैं वि स्वयं को सही सिद्ध करने के प्रयास में दूसरों को वकठघरे में खड़ा करने में भी उन्हें हिचक नहीं होती....,उसका मन किया कि जाकर नमिता की बात का प्रतिवाद करे लेविन ऐसा करके क्या वह उनकी एकांतता को....गोपनीयता को तोड़ने वकी अपराधिनी नहीं बन जायेगी....और तो और ऐसा करने मात्रा से ही क्या वह अमर की ईमानदारी....सच्चाई को सिद्ध कर पायेगी ?
नमिता के मन में जो संदेह का कीड़ा कुलबुला रहा है, वह क्या उसके प्रतिरोध करने मात्र से दूर हो पायेगा....नहीं-नहीं वह अपनी तरफ से कोई सफाई पेष नहीं करेगी, यदि इंसान सच्चा है, उसका उदद्ेश्य पावन है, निस्वार्थ भाव से कर्म में लगा है, तो देर सबेर कभी न कभी तो सच्चाई दुनिया के सामने आ ही जायेगी....किसी संत के वचनों ने उसकी दुखती नस पर मलहम लगाया।
उहापोह की स्थिति में अचानक ऋचा ने एक निर्णय लिया....दिव्या के विवाह के पश्चात् वह इस घर से नाता तोड़ लेगी, जहाँ उसे तथा उसके पति को मानसम्मान नहीं मिलता वहाँ आने से क्या लाभ....उसने बड़ी बहन का कर्तव्य निभा दिया है, भाई पहले ही स्थापित हो चुका है तथा दो दिन पश्चात् छोटी बहन भी नये जीवन में प्रवेष कर जायेगी, अब उसकी या उसकी सहायता वकी किसी को क्या आवष्यकता....लेकिन क्या जब तक माँ है, भाई है, उसका इस घर से रिश्ता टूट सकता है, क्या वह अपने निर्णय पर कायम रह पायेगी....अंर्तमन ने झकझोरा....।
रिश्ते नाजुक होते हैं, उनमें दरार पड़ सकती है लेकिन तोड़े नहीं जा सकते....ठीक है आज नमिता ने बिना सच्चाई जाने अमर पर इतना बड़ा आरोप लगा दिया है, लेकिन जब उसे सच्चाई का पता चलेगा तो वह अवश्य ही पछतायेगी, वैसे भी बिना फल की आषा के अपने कŸार्व्य का निर्वाह करते जाना चाहिये तभी मन को सच्ची ष्षांति प्राप्त हो सकती है....। वह जैसे अब तक अपना कर्तव्य निभाती आई है वैसे ही आगे भी निभाती रहेगी, दूसरे निर्णय ने उसके तन मन का बोझ हल्का कर दिया था लेकिन एक प्रश्न उसके अंतः स्थल में चुभ-चुभ कर उसे अभी भी लहूलुहान किये जा रहा था....कर्तव्या की सलीब पर वह आखिर कब तक लटकती रहेगी....नींद नहीं आ रही थी पर फिर भी ऑंँख बंद कर सोने का प्रयत्न करने लगी।
आखिर वह दिन भी आ गया जब दिव्या को दूसरी दुनिया में कदम रखना था, वह भी ऐसे व्यक्ति के साथ जिसके साथ न तो उसकी आत्मीयता थी और न ही पूर्व परिचय...न जाने कैसे यह विधि के नियम हैं कि सिर्फ अग्नि के सात फेरे लेने मात्र से ही दो अजनबी तन मन से एवकावकार होकर, दुख-सुख में साथ निभाते हुए, जीवन में आये आँॅंधी तूफान को रोंदते हुए निरंतर चलते जाते हैं....सृष्टि के विकास की यह कैसी अनोखी एवं ष्षाश्वत प्रक्रिया है जो युगों-युगों से व्यवधानरहित चलती चली आ रही है।
जयमाल के पश्चात् दिव्या और दीपेष समस्त आमंत्रित स्नेही जनों से ष्षुभवकामनायें स्वीकार कर रहे थे। समस्त परिवार उन दोनों के साथ सामूहिक फोटोग्राफ लेने के लिये मंच पर एकत्रित हुआ था, तभी दीपेष के पिताश्री ने एक सज्जन से दीपेष के चाचा के रूप में परिचय करवाया, सबसे परिचय करवाते हुए जब अमर का परिचय करवाया तो वह एकाएक चौंक वकर कह उठे, ‘ अमर साहब, आपकी ईमानदारी के चर्चे तो पूरे विभाग में मषहूर हैं, आज आपसे मिलने का भी सौभाग्या? प्राप्त हो गया, हमें प्रसन्नता है कि ऐसे परिवार की बेटी हमारे परिवार की ष्षोभा बनने जा रही है....।’ दीपेष के चाचा जो अमर के विभाग मे ही उच्चपदाधिकारी थे, ने यह बात इतने जोर और गर्मजोषी के साथ कही कि अनायास ही मंच पर उपस्थित सबकी नजर उनकी ओर उठ गई।
एकाएक ऋचा के चेहरे पर चमक आ गई, उसने मुड़कर नमिता की ओर देखा तो उसे सुरेंद्र की ओर देखते हुए पाया....उसकी निगाहों में क्षमा का भाव था या कुछ और वह समझा नहीं पाई लेकिन उन सज्जन के इतना कहने मात्र से ही उसके दिलोदिमाग पर से पिछले कुछ दिनों से रखा बोझ हट गया। सुखद आष्चर्य तो उसे इस बात का था कि एक अजनबी ने पल भर में ही उसके दिल के उस दंष को कम कर दिया जिसे उसके अपनों ने दिया था। उसे महसूस हो रहा था कि आज भी ऐसे लोग इस दुनिया में है जो ईमानदार व्यक्ति को मान-सम्मान देते है, उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं।
आखिर सच्चाई सामने आ ही गई....ऐसा तो एक दिन होना ही था पर इतनी जल्दी और ऐसे होगा उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था....वास्तव में जीवन के नैतिक मूल्यों में कभी परिवर्तन नहीं होता, वह हर काल, परिस्थति और समाज में सर्वदा एक से ही रहे हैं और रहेंगे, यह बात अलग है कि मानव निज स्वार्थ हेतु मूल्यों को तोड़ता-मरोड़ता जा रहा है.....प्रसन्न्ता तो उसे इस बात की थी कि आज भी हमारे समाज में ईमानदारी जिंदा है तथा आषा है भविष्य में भी यह अमर या अमर जैसे लोगों के रूप में जीवित रहते हुए निष्प्राण होते विश्व को नवप्राण देते हुए आगे आने वाली पीढ़ियों के लिये एक आदर्ष के रूप में फलती फूलती रहेगी....उन्हें मार्गदर्शन प्रदान करती रहेगी....।

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.