‘मम्मी! मुझे खिलौने नहीं चाहिए| मुझे नए कपड़े भी नहीं चाहिए| मुझे कुछ नहीं चाहिए…मम्मी, मैं किसी चीज़ के लिए ज़िद नहीं करूँगा … मुझे छोड़कर मत जाओ…मत जाओ…मम्मी…मम्मी…"

साहिल रो-रोकर अपनी माँ बेला को पुकारे जा रहा था| उसका रोना देखकर आसपास खड़े सभी लोगों की आँखें भर आईं और बेला का कलेजा मुँह को आने लगा |अमर से उसके पारस्परिक मतभेद ने साहिलका बचपन रौंद डाला |आज अमर और बेला ने तलाक़ लेकर सम्बन्धों से तो मुक्ति पा ली, किंतु माँ के प्रति संवेदनशील साहिल को अमर के पास रखने की शर्त के साथ |

तत्कालीन बेरोज़गार बेला को,इस शर्त को मानने के अतिरिक्त कोई चारा ना था|वह अमर से इतना ऊब चुकी थी कि एक-एक पल का साथ उसे दुरूह लगने लगा था |

साहिल का कसूर इतना था कि वह भिन्न मानसिकता वाले माता-पिता की सन्तान था , जिन्हें परम्परा ने वैवाहिक बंधन में बाँध तो दिया, वैचारिक तादात्म्य कभी स्थापित न हो पाया |समझौते की नींव पर टिके इस रिश्ते ने साहिल जैसे फूल को डाली से अलग कर माली के हाथ सौंप दिया| साहिल माँ –बाप के आपसी मतभेद की बलि चढ़ गया।

सामान्य बच्चे - सा दिखनेवाला साहिल अनदेखे खालीपन और संवेदनशून्यता की ओर बढ़ता जा रहा है ....

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