यह तो होना ही था....

ये मोबाईल जबसे चलन में आये हैं, लोगों की दुनिया ही बदल गई है। जो करम पहले नहीं होते थे, वे अब खुल्‍लमखुल्‍ला होने लगे हैं। पहले घर में एक फोन हुआ करता था और घर के लोगों की जानकारी में वे सभी फोन होते थे जो आते थे। अब तो ये मोबाईल पर ही पता नहीं क्‍या चटर-पटर होती है और एक मिनट में लोग दोस्‍त बन जाते हैं।


कनी मन ही मन भुनभुनाती जा रही है। जब अपने ही सोने में खोट हो तो दूसरे को क्‍या दोष दिया जाये? अपने मन की बात कही भी किससे जाय? क्‍या कहूं कि मेरे पति ज़रूरत से ज्‍य़ादा मॉडर्न हो गये हैं और सेक्‍स का लड्डू दोनों हाथों से दो औरतों के साथ खाना चाहते हैं। हुंह। मैं ऐसा होने दूंगी तब न। वैसे तो हो रहा है और मैं कुछ कर पा रही हूं? क्‍या इनके जैसी बशर्म हो जाऊं?

उसे अचानक अपनी सहेली जया की याद आ जाती है। सोचती है कि उसके आगे ही अपना मन खोला जाये। वह पढ़ी-लिखी है, नयी सोच की है तो शायद मेरी परेशानी समझ सके। वैसे तो मैं क्‍या कम पढ़ी-लिखी हूं? पर समस्‍या यही है कि छोटे शहर की होने के नाते सोच के मामले में इतनी खुल नहीं पाई हूं। नौकरी तो करती हूं। अब तो बड़े शहर में रहती हूं पर सोच बदलने में कुछ तो समय लगेगा न।

कुछ सोचने के बाद कनी ने जया का नंबर मिला ही लिया है। वहां से जया ने फोन उठा लिया है। कनी की आवाज़ सुनते ही वह खुशी से उछल पड़ती है, ‘इतने दिनों बाद मेरी याद आई? कभी सोचा भी नहीं कि मैं जीती हूं या मर गई हूं।‘ ‘अरे मेरी मां, तेरी आवाज़ अभी भी वैसी ही है? बिल्‍कुल बदली नहीं। एक मेरी आवाज़ है, मरगिल्‍ली सी हो गई है।‘

‘मेरी जानेमन को हो क्‍या गया है जो आवाज़ दब गई है। पतिदेव तो ठीक हैं?’ जया ने संभलते हुए पूछा है। वे ठीक होते तो बात ही क्‍या थी। बस ज़िन्‍दगी के एक दोराहे पर खड़ी हूं और सोच रही हूं कि क्‍या करूं? बस, तेरा ही खयाल आया। अग़र तेरे पास समय है तो अभी बात करती हूं नहीं तो कल सही।‘ कनी की विवशता उसकी आवाज़ में साफ सुनाई दी है जया को।

ज़रूर कोई ऐसी-वैसी बात होगी, नहीं तो वह फोन न करती। आज दस साल के बाद फोन किया है। ‘हां बोल कनी, क्‍या बात है?’ वहां से कनी की आवाज़ सुनाई दी, ‘जया, बहुत ज़रूरी बात करना है तुझसे। ज्‍य़ादा समय नहीं लूंगी।‘ जया ने कनी की आवाज़ में एक हड़बड़ी सुनी है मानो वह कोई निर्णय लेना चाहती है पर किसी असमंजस की स्‍थिति से जूझ रही है।

‘हां बोल कनी। क्‍या बात है। तेरी आवाज़ परेशान लग रही है। तू निश्‍चिंत होकर अपनी बात कह।‘अचानक फोन कट गया है और जया का मन किसी आशंका से भर गया है। कहीं कुछ ग़लत तो नहीं हो रहा उसके साथ जिससे वह बचने की कोशिश कर रही है। बिना वजह परेशान होना जया के स्‍वभाव में है। फिर से फ़ोन की घंटी बजी है। दूसरी तरफ़ कनी ही है।

‘हां, तो मैं कह रही हूं कि मुझे अपने पति से शिकायत है। और यह आज से नहीं, क़रीब पच्‍चीस सालों से है। घर के संस्‍कार बोलने से रोकते रहे। कब तक रोकूं खु़द को?’ कनी की तल्‍ख़ आवाज़ को सुनकर जया बोली, ‘तुम पूरी बात बताओ। हम हल खोज लेंगे।‘ इससे कनी की हिम्‍मत बढ़ी है। ‘ध्‍यान से सुनना, बात को हवा में मत उड़ाना। निर्णय तो लेना ही है।‘

‘मेरे और मेरे पति के बीच पिछले पांच वर्षों से कोई शारीरिक संबंध नहीं हैं। बहुत परेशान हूं। तू तो जानती है दो बच्‍चे हैं। मैं ख़ुद भी नौकरी करती हूं। तुझे क्‍या बताऊं और कैसे बताऊं, यही समझ नहीं पा रही।‘ इसके बाद एक लंबी चुप्‍पी पसर जाती है। ‘हां, बोल, मैं सुन रही हूं।‘ ‘हां, मैं कह रही थी कि पता नहीं, मेरे पति शायद मुझे शुरू से ही पसन्‍द नहीं करते हैं।

...पर अपने माता-पिता की मर्जी़ के आगे शायद बोल नहीं पाये और मुझसे ब्‍याह कर लिया। तुम तो जानती हो न कि हर लड़का अपने माता-पिता के आगे नंदी बैल होता है। सिर्फ़ ‘हां’ में गर्दन हिलाना जानता है। सो ये वही नंदी बैल की तरह रहे होंगे। शादी करके अपने घर ले तो आये पर निभाना भी तो होता है न।

‘‘तुम्‍हें जब तुम्‍हारे पति को दिखाया गया तब तुमको पसन्‍द आये थे?’ इस पर कनी तुनक गई, ‘तुम भी कैसी बात करती हो, हम जिस शहर में रहते थे वहां लड़की की पसन्‍द नहीं पूछी जाती। गईया की तरह खूंटे से बांध दिया जाता है। ...मैंने भी सोचा कि यह तो हर लड़की का नसीब है, सो चुप रह गई।

...हां, तो जब शादी के बाद पहली रात आई तो मैंने सोचा था कि प्‍यार-मनुहार करेगा पर जब रात के बारह बजे कमरे में आये तो इनकी आंखें लाल थीं। मैं तो उन आंखों को देखकर डर गयी थी और सोच रही थी कि इनको मैं ख़ुद को छूने भी दूं या नहीं। शराब का भभका जब मेरी नाक टकराया तो मुझे तो उबकाई सी आ गई। मैं डर के मारे थोड़ा सा पीछे हट गई।‘

फिर एक मिनट की चुप्‍पी मानो वह सोच रही हो कि आगे का किस्‍सा बताया जाये या न बताया जाये। फिर आवाज़ आई, ‘हां, तो बस, मुझ पर ऐसे टूट पड़े मानो भूखा शेर अपने शिकार पर टूट पडता है। नरम स्‍पर्श की जगह नोंच-खसोट। जगह-जगह काटाकूटी। मैं तो डर गयी कि यह सुहागरात है या नरक़ की रात। ये खर्राटे लेते रहे और मैं सुबह होने का इंतज़ार करती रही।

......अब तो हर रात यही होता और मैं एक दिन उल्‍टियां करने लगी तो पता चला कि गर्भ से रह गई हूं। उस पर भी इनका संसर्ग नहीं छूटा। मैं डरती थी कि कहीं गर्भ गिर न जाये। उसकी तोहमत भी मुझ पर ही आयेगी।‘ ‘तुम भी कमाल करती हो कनी, जब तुम्‍हारी अंडरस्‍टेंडिंग नहीं बन पा रही थी तो गर्भवती नहीं होना था।‘

‘अपनी बात जारी रखते हुए कनी ने कहा, ‘इतना आसान नहीं होता यह सब। ख़ैर...अब तो बच्‍चे बड़े हो गये हें दोनों में तीन साल का फर्क़ है। अब मेरा शरीर भी थोड़ा भरा सा है और इनको चाहिये ज़ीरो फिगर। मैं कहां से लाऊं यह फिगर? अब दिनभर तो जिम नहीं जा सकती न।

...नौकरी है, बच्‍चे बड़े हैं तो अलग तरह की ज़िम्‍मेदारी। घर का काम कम है क्‍या? इन सबको छोड़कर सिर्फ़ शरीर ही नापती रहूं, यह तो मुझसे नहीं होगा। सो इन्‍होंने अपना इंतज़ाम अलग कर लिया है। बस वही कलह की जड़ है।‘ यह सुनकर जया की त्‍योरियों पर बल पड़ गये।

‘अलग इंतज़ाम याने?’ अब क्‍या कहूं, बताने में भी शर्म आती है। ये किसी और के साथ रहने लगे हैं। वह आजकल जो लिव-इन-रिलेशनशिप चली है न, उसीमें रहने लगे हैं।‘ ‘यह कहते समय कनी की आंखें भर आई हैं। कनी वैसे भी खुश नहीं थी पर संभाले हुए थी ख़ुद को और परिवार को कि कभी तो उसके पति वापिस आयेंगे।

तो यह बात है। कनी के पति हदों को पार कर गये हैं। उनकी वापसी नहीं दिख रही कनी को। सच, बुज़ुर्ग ग़लत तो नहीं कहते थे कि दूध के उफ़ान और आदमी के स्‍वभाव का कोई भरोसा नहीं होता। ज़रा सी चूक होते ही दोनों नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं।

वही तो कनी के साथ हुआ है। पति को बहाना चाहिये था और उनको वह बहाना मिल गया। दोनों के बीच जानलेवा चुप्‍पी छा गई है। आख़िर जया ही बोली है, ‘बच्‍चे कितने बड़े हैं और वे क्‍या कहते हैं?’ इस पर कनी ने अपनी आंखों को पोंछते हुए कहा है, ‘बच्‍चे ब्‍याहने लायक हैं। लड़का पच्‍चीस साल का है और लड़की बाईस साल की है।

...जवानी इनको सूझ रही है। दिन-रात वहीं पड़े रहते हैं। ये बच्‍चों का क्‍या आदर्श बनेंगे, जबकि ख़ुद ही कीचड़ में धंसे हैं। बच्‍चों ने अपने पिताजी को समझाया है और यहां तक कह दिया है कि यदि उस औरत को नहीं छोड़ सकते तो घर छोड़ दें। समझ लेंगे कि वे पिताविहीन हो गये हैं। तुम फोन पर देख नहीं सकतीं। तनाव से मेरे चेहरे की मांसपशियां तनी हुई हैं।‘

यह सुनकर जया के रोंगटे खड़े हो गये हैं और सोच रही है कि यह सुनकर भी कनी के पति पर कुछ असर नहीं हुआ है, आश्‍चर्य है। ‘कनी, ‘मैं फोन पर भी तुम्‍हारी हालत समझ सकती हूं। बच्‍चों की इस प्रतिक्रिया का तुम्‍हारे पति पर क्‍या असर हुआ है?’ कनी की डूबती सी आवाज़ सुनाई देती है, ‘अब दिनभर उस औरत के साथ मज़े लूटते हैं, ऐश करते हैं और शाम को घर आ जाते हैं।‘

जया का मानो सिर एकदम भारी हो गया है। उसने कहा, ‘कनी, साढ़े पांच बज गये हैं। तुम्‍हारा घर जाने का समय हो रहा है। हम कल बात कर लेंगे। आज तुमने बहुत लंबा फोन कर लिया है। कल मैं कर लूंगी।‘ इसके साथ ही फोन काट दिया गया है। जया का दिल बेचैन है और साथ ही यह धुकधुकी भी कि अगले फोन पर कनी क्‍या कहेगी, पता नहीं। कहीं वह अपनी आत्‍महत्‍या का निर्णय न सुना दे।

एक दिन बीत गया है पर कनी ने फोन नहीं किया है। उसने कहा तो था। हां याद आया फोन तो जया करनेवाली थी। यह सोचते ही उसने मोबाईल में कनी का नंबर दबा दिया है। घंटी तो बजी है पर फोन काट दिया गया है।

कुछ देर बाद मोबाईल में मैसेज की घंटी बजी है। देखा तो कनी ने कल दिन में बारह बजे फोन करने के लिये कहा है और साथ ही यह अनुरोध भी कि जया खुद को एक घंटा फ्री रखे। फोन के बिल की चिंता न करे। ऑफिस मोबाईल का बिल देता है।

जया को तसल्‍ली हुई कि कनी ठीक है। अब वह कल का इंतज़ार कर रही है। उसका दिल अचानक तेज़ी से धड़कने लगा है। तेज़ हवा के झोंके ने मानो आनेवाले तूफान का संदेश दे दिया है। जया की रात कैसे कटेगी, जया को ही नहीं मालूम।

दूसरे दिन जया सुबह जल्‍दी उठ गई है। जल्‍दी-जल्‍दी सारे काम निपटा लिये हें ताकि कनी से फोन पर बात कर सके। ठीक बारह बजे जया का फोन घनघनाया। देखा तो कनी का ही है। समय की बड़ी पाबंद निकली।

‘हैलो कनी, कैसी हो?’ मुझे कैसी होना है जया। जिन झंझावातों से जूझ रही हूं और घिरी हूं, उसमें तो ‘न सावन हरे न भादों सूखे’ वाली स्‍थिति है। अब तो निर्णय लेना है। बीच मझदार में कब तक रहूंगी? मेरी भी ज़रूरतें हैं। अब मुझे सेक्‍स चाहिये। इसकी बहुत ज़रूरत महसूस कर रही हूं।‘

जया कनी की इस प्रगल्‍भता पर चकित होकर रह गई है, पर ख़ुद को संभालते हुए कहा है, ‘तुम्‍हारे पति अब तो शाम को घर आ जाते र्हैं। रात को तो तुम्‍हारे साथ होते हैं। उनसे अपने मन की बात कहो। उनको भी तो तलब होती होगी।‘

‘कहकर देखा है जया, लाज-शरम त्‍यागकर उनसे कहा है, मुझे सेक्‍स की ज़रूरत है, दिल करता है। भले ही नोचो, खसोटो, पर सेक्‍स दो मुझे। मैं गिड़गिड़ाई हूं उनके सामने। और कितना नीचे गिरूं?

...रात को कुरते की बांह पकड़कर उनको अपनी ओर खींचा है पर उन्‍होंने ख़ुद को झटके से छुड़ाकर करवट बदल ली। ज्‍य़ादा ज़िद की तो मुझे पलंग से धक्‍का दे दिया। मेरी सारी चूड़ियां टूट गईं। मैं अपने शरीर को कब तक भूखा रहने दूं? तुम्‍हीं बताओ।‘ यह कहते- कहते कनी के सुबकने की आवाज़ आने लगी।

‘कनी, शान्‍त हो जाओ। किससे सेक्‍स करोगी? कोई तुम्‍हारी नज़र में है?’ यह पूछने पर कनी की की आवाज़ में मुलायमियत आ जाती है। कहती है, ‘जी, एक हैं मेरे मित्र। बहुत अच्‍छे हैं। वे मेरी बहुत इज्‍ज़त करते हैं। मेरा बहुत खयाल भी रखते हैं। ‘जी, थोड़ा-बहुत वे मेरे घर और मेरे हालात के बारे में जानते हैं।‘ वे भी मेरी हालत से परेशान हैं। उनकी आंखों में मैंने अपने लिये चाहत का भाव देखा है। ‘

अब एक बहुत ही निजी सवाल पूछ रही हूं कनी। क्‍या तुम्‍हारा मैनापॉज हो चुका है? ऐसा न हो कि तुम यह कर बैठो और पता चले कि गर्भ ठहर गया है और एक ज़रूरत पूरी करने के चक्‍कर में लेने के देने पड़ गये हैं।‘

इस सवाल पर कनी की विश्‍वासभरी आवाज़ सुनाई देती है, ‘जी, वह तो कबका हो चुका। इसीलिये सोचा कि जिस सेक्‍स की कमी से मैं बेसमय बूढ़ी दिखाई देने लगी हूं, तनाव में रहती हूं, मेरा सिर लगातार दुखता है, दिमाग़ की नसें तड़कती हैं, इन्‍हें दूर करने का कुछ तो इलाज़ सोचूं।‘

‘जो तुम अपने मित्र के साथ करने की सोच रही हो, क्‍या तुम्‍हें यह नहीं महसूस हो रहा कि तुम भी वही करने जा रही हो जो तुम्‍हारे शब्‍दों में तुम्‍हारे पति की रखैल तुम्‍हारे परिवार के साथ कर रही है याने परिवार को तोड़ने का प्रयास।

..सोच लो। एक ओर तुम्‍हारी शारीरिक ज़रूरत और दूसरी ओर तुम्‍हारे मित्र के परिवार द्वारा तुम पर परिवार तोड़ने का लगाया जानेवाला लांछन। इन बातों का ध्‍यान रखना होगा। क्‍या तुम इन सबके लिये तैयार हो?’ जया ने नैतिकता का हवाला देते हुए कहा।

‘बस, यहीं आकर थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती हूं।‘ कनी की आवाज़ अचानक क़मज़ोर पड़ जाती है। ‘अच्‍छा एक बात बताओ, तुमने कभी अपने पति की उस महिला मित्र से बात की है इस विषय में? यदि की है तो उसका क्‍या रुख़ है? जया ने यह जानना चाहा है।

‘आपको क्‍या लगता है कि मैंने उससे नहीं कहा होगा कि मेरा परिवार न उजाड़े? इस पर वह बड़ी निर्लज्‍जता से बोली, ‘अपने पति को समझाओ। वह तुम्‍हारे वश में नहीं है तो यह मेरा क़सूर है? मैं उन्‍हें प्‍यार करती हूं और अब तो और भी करूंगी।


...वह औरत सब जगह से सिम्‍पथी कार्ड बटोर रही है। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि वह औरत मेरे पति से उम्र में बड़ी है और उसीका वह फायदा उठा रही है। मेरे दफ्तर मुझसे मिलने आई थी पर मैंने मिलने से मना कर दिया।

...वह मेरा दफ्तर हे जहां मेरी इज्‍ज़त है। इनकी नौटंकी की मुझे कोई ज़रूरत नहीं है वहां। बाहर मिल सकती थी। क्‍या मैं तुम्‍हें इतनी बेवकू़फ लगती हूं कि ऐसी औरतों को ऑफिस आने दूं?’

जया ने कनी का मूड ठीक करने के इरादे से कहा है, ‘देखो, आज फोन काफी लंबा हो गया है। हम कल सुबह दस बजे फिर बात करेंगे। आख़िर तुम एक ऐसा कदम उठाने जा रही हो जिसमें हर तरह से सोचना है।

...कुछ मिनटों की क़मज़ोरी कोई गुल न खिला दे।‘ ‘ठीक है, कल दस बजे फोन करती हूं तुमको। लेकिन मैं अपनी इस बात पर अटल हूं कि मुझे सेक्‍स की सख्‍त़ ज़रूरत है। तुम मेरी हालत समझ सकती हो।‘ दोनों ओर से फोन रख दिया गया है।

सुबह जया उठी है। पति और बच्‍चों को रवाना करने में हड़बड़ी देखकर पति पूछ बैठे हैं, ‘क्‍या बात है जया, कोई आनेवाला है जो इतनी हड़बड़ा रही हो?’ उसने हंसकर उत्‍तर दिया है, ‘नहीं यार, आज एक कहानी लिखने का मूड बन रहा है।‘

उन्‍होंने हंसकर कहा है, ‘तुम्‍हारा मूड भी अजीब है। वैसे भी आजकल औरतों का ही बोलबाला है हर जगह’ और इस सुविचार के साथ ही वे चले जाते हैं और जया? फोन के बजने का इंतज़ार करने में व्‍यस्‍त।

ठीक सुबह के दस बजे जया का मोबाईल बजता है और स्‍क्रीन पर कनी का नाम चमक रहा है। जया सोचती है कि यह टाईम की बड़ी पक्‍की है। फोन कान पर लगाती है और वहां से आवाज़ आती है, ‘गुड मॉर्निंग। आज मैं ज़रा जल्‍दी आ गई हूं।‘

जया इशारा समझ गई है। ‘कनी, क्‍या सोचा तुमने?’ कनी की उधर से आवाज़ आई है, ‘तुम क्‍या कहती हो इस बारे में? मैं अपनी परेशानी बता चुकी हूं। मैं बेमौत और बेसमय नहीं मरना चाहती। जीना चाहती हूं। साथ ही मैं अपने पति और उनकी रखैल की तरह नंगई नहीं दिखा सकती समाज को। लेकिन अपनी ज़रूरत तो पूरी करना है।‘

कनी अपनी ही धुन में कहे जा रही है। ‘बस बात यही है कि मुझे सेक्‍स की तलब होती है और मांगने पर भी वह मुझे घर से नहीं मिलता। जब मेरे पति खुलेआम ऐश कर रहे हैं। मेरी ज़रूरत को नहीं समझ रहे हैं तो मुझे भी तो ज़िन्‍दगी जीने का अधिकार है। पति से सेक्‍स पाने का मुझे अधिकार है और जब यह अधिकार उन्‍होंने किसी और को दे दिया है तो मुझे भी यह अधिकार किसीको देना होगा।‘

जया को कनी के मोबाईल पर दरवाज़े की घंटी की आवाज़ सुनाई देती है। जया के पूछने पर कनी कहती है, ‘मैं अपने उन्‍हीं मित्र के साथ कहीं बाहर हूं। पर वह बोलती जा रही है, ‘मैं पर्दे के अन्‍दर और अपनी सीमा में रहकर ही कर रही हूं। जब तक बात दबी रहे तो ठीक है और यदि कल को खुल भी जाये तो इसके ज़िम्‍मेदार मेरे पति होंगे, मैं नहीं।‘

इसीके साथ फोन रख दिया गया है।


hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.