आज सुबह जब बिसना उठा तब उसकी खोली का माहौल रोज से अलग था I माँ और बप्पा खोली के अगले हिस्से में बैठे कुछ काम करते हुए धीरे धीरे बतिया रहे थे I और दिन जब उसकी नींद खुलती थी, तब तक उसकी माँ बस्ती के नल में पानी भरने जा चुकी होती थी I बप्पा या तो पास में सोया होता था, या बाहर बैठा रात की कच्ची शराब की खुमारी उतार रहा होता था I खोली कच्ची शराब और पसीने की गंध से भरी होती थी I उसकी माँ रोज, खुद पूरी भीगी, पानी की आधी भरी बाल्टियां लिए नल से लौटती थी I नल की लाइन में मुहँ अँधेरे से ही लगी हुई माँ, पानी की धक्कामुक्की में रोज पीछे धकेल दी जाती थी I सात साल के बिसना की आँखों में बस एक ही सपना था, खोली से सटा हुआ नल और सबसे पहले पूरा पानी भरती हुई माँ I कभी कभी वो देखता था कि वो जवान और तगड़ा हो गया है और उन सारी औरतों और उनके आदमियों को डंडा मार कर भगा रहा है जो उसकी माँ को पानी नहीं भरने देती हैंI

आँखें मलते हुए बिसना ने आस पास देखा I खोली के छोटे से झरोखे से आती धूप, माँ बप्पा के चेहरे पर पड़ रही थी I माँ का चेहरा रोज सवेरे जैसा थका और परेशान नहीं था I बप्पा बिरजू भी बदला सा था I

‘’ जाग गया मेरे सेर , आजा देख हम क्या कर रहे हैं I‘’ बिरजू लाड में उसे शेर ही बुलाता था I वैसे लाड दिखाने की हालत में बिरजू कम ही रहता था I

उनके आस पास फैली चीज़ देख, बिसना की नींद झड़ गई I अलग अलग रंग और डिजाइन के गुब्बारे फैले हुए थे उनके आस पास I बगल वाले टीवी में बिसना ने देखा था कि अमीर माँ बाप बच्चों का जनम दिन गुब्बारे सजा कर मनाते हैंI “ तो क्या सच में ! और इत्ते सारे ! “ वो सोचने लगा I अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था उसे I

“ तेरे बप्पा को मेले में दुकान लगाने की जगह मिल गई है I दिन में ही निकल जाना है हमें मेले के लिएI हम ये छोटे पानी और कंकड़ भरे गुब्बारे बेचेंगेI वो ही जिनमे रब्बर का धागा बंधा रहता है I एक ऊँगली से धप्प करके ऊपर फिर नीचे I“ माँ के चेहरे का बच्चों जैसा कौतुहल, बिसना को अच्छा लग रहा था I

“ ले खा ले , कल रात तेरे लिए लाया था, तू तो सो ही गया थाI” बिरजू ने बिसना की तरफ कागज़ की थैली बढ़ा दी जिसमे कचौड़ी और जलेबी थी I

‘’ बप्पा! मुझे भी देगा गुब्बारे I‘’ गुब्बारों में धागा बाँधते बिरजू से हिम्मत करके पूछ लिया उसने

“ एक क्यों चार लेना , मेले में पूरी सब्जी भी खिलाऊंगा I बस सारे गुब्बारे बिक जाएँ I पर अभी हमें ये गुब्बारे तैयार करने दे महाराज !” बिरजू ने नाटकीय अंदाज़ में बिसना के आगे हाथ जोड़ दिए और अम्मा फिस्स से हँस दीI

“ अम्मा सही कहती है, बप्पा को रोजगार मिलेगा तो सराब भी नहीं पिएगा और सब कुछ ठीक हो जाएगा फिर I“ बिसना सोचने लगा I


दिन को मेले के लिए निकलते हुए बिसना हवा में सवार था I फूल वाली शर्ट निकर और बालों में ढेर सारा तेल Iअम्मा ने बड़ी सी बिंदी लगाईं थी और आँखों में सुरमा भी I

“ बड़ी मुश्किल से मिली है रधिया की चाय पकौड़े की दुकान के आगे जगह I पचास रूपये रोज रधिया को देने होंगे I रधिया यार है जो जगह दे दी, वर्ना इत्ते बड़े मेले में कौन पूछता है I पंद्रह दिन के इस मेले के बाद भी काम देगा उसने वादा किया हैI” बिरजू बतियाये जा रहा था I

“ पर ..पर तुम अब “ अम्मा झिझकते हुए बोल रही थी I

“हाँ हाँ तू डर मत, नहीं पियूंगाI पागल हूँ क्या?”


मेले की जगह में रौनक शुरू नहीं हुई थी I दुकानें धीरे धीरे जम रही थींI

“भौजाई और छोरे को भी लाया है I चल बढ़िया I अब झाडू लगा ले और जमा ले अपने गुब्बारे I“ भजियों का बेसन फेंटते रधिया ने उनका स्वागत किया I


धीरे धीरे मेले की रौनक बढ़ने लगी I अम्मा से चिपककर बैठे बिसना को लग रहा था वो किसी दूसरे संसार में आ गया है I

गुब्बारों की बिक्री, धीरे धीरे रफ़्तार पकड़ने लगी थी I बिरजू खुश था I बिसना ने मन ही मन अपना गुब्बारा चुन लिया था I वो लाल रंग का था और ऊपर पीली धारियां थीं I अम्मा को उसने अपनी मंशा बताई कि अपना गुब्बारा अभी ही संभाल लेता हूँ पर अम्मा ने धीरे से उसे सब्र रखने को कहा I

धीरे धीरे सारे गुब्बारे बिक गए, बस तीन बचे I बिरजू के चेहरे पर विजेता वाले भाव थेI

’‘बलून कितने का ?’’ एक भारी भरकम चेहरे वाला आदमी खड़ा था I साथ में ऊँची एड़ी की चप्पल पहने कटे बालों वाली औरत और एक मोटा बच्चा था, लगभग बिसना की ही उम्र का I मोटे बच्चे ने जो कमीज़ पहनी थी उसपर बहुत बड़ा शेर बना था I

“ साहब दस का एक है दो बचे हैं दोनों ले लो हम भी फारिग हों I “ बिरजू ने देख लिया था कि बिसना ने अपना गुब्बारा झट से उठाकर हाथों को पीछे कर लिया था I

उनके जाते ही बिरजू ने बिसना के कंधे पर हाथ रख दिया “ बड़ा होसियार है तू मेरा सेर ! चल तुझे मेला घुमाऊँI “

गुब्बारे को अपने हाथ में महसूसते बिसना की भूख प्यास सब गायब थीI

“ सुनों! एक गुब्बारा और दो I बाबा ने दोनों फोड़ दिए हैं I एक और की जिद कर रहा है I” मोटा आदमी और औरत अपने बच्चे के साथ लौट आये थेI

“नहीं साहब, अब तो उठ गई दुकान I” बिरजू अचकचा गया था I शेर की शर्ट वाला बच्चा, बिसना के हाथों के गुब्बारे की घूर रहा था I

“ वो दे दे जो तेरे बच्चे के पास है I “ मोटा बिसना बिरजू दोनों को घूर रहा थाI

“ नहीं नहीं साहब! कल और लाऊँगा I इससे अच्छे, वो बच्चे का है I ” माँ के पीछे छिपे बिसना को देख बिरजू को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे I

“ गिव हिम सम मोर मनी I“, औरत बोली I अब वो तीनों बिसना को घूर रहे थे I मोटे आदमी ने बिरजू के हाथ में जबरदस्ती बीस रूपये रख दिए I

बिरजू कुछ कहता, उसके पहले शेर की शर्ट वाला लड़का बिसना की तरफ बढ़ने लगा I बिसना ने घबरा कर अपना हाथ पीछे कर लिया I पर तभी बिसना को लगा कि शर्ट वाला शेर ज़िंदा हो गया है और उसका गला दबोच कर र्जोर से दहाड़ रहा है I

“ क्यों बे ! पानी के गुब्बारे से खेलेगा .? तेरी माँ मुहँ अँधेरे पानी की लाइन में लग जाती है और घंटों बाद पूरी भीगी हुई ,आधी बाल्टी पानी भर कर लाती है और तू ..तू गुब्बारे से खेलेगा ? तेरा बाप कच्ची पीकर पड़ा रहता है , कुत्ते उसका मुहँ चाटते हैं, और तू गुब्बारे से खेलेगा ? क्यों? बोल! तेरे सपने घर के पास नल तक के ही हैं, और तू.. तू I “

“ नहीं .. नहीं छोड़ दो नहीं चाहिए गुब्बारा नहीं चाहिएI “ बिसना ने चीख कर गुब्बारा पटक दिया और माँ से चिपक गया I


सुबह बिसना की नींद खुली तो सब कुछ रोज़ जैसा ही था I पास में कच्ची की गंध मारता बप्पा पड़ा था और माँ झुग्गी में नहीं थी I बिसना को याद आया, कैसे कल रात उसके गुब्बारे की खातिर, मोटे और उसके बाप से लड़ पड़ा था बप्पा I ये बात अलग है कि रधिया ने गुस्से में उन्हें मेले से भगा दिया था I तो क्या ! बप्पा तो मिल गया उसे I पास पड़े कपड़े से बिसना ने बिरजू के मुहँ से गिर रही लार. धीरे से पोंछ दी I

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