यह अवमानना है की जब जब कोई नया दर्शन/पंथ या चाहे धर्म कह ले आता है तो वह किसी स्थापित दर्शन से निकल कर ही आता है. मैं धर्म शब्द पर जरा उलझन महशुस करता हूँ, क्योंकि भारत में जितने भी तथाकथित धर्म हैं वे एक सोच हैं विचारधारा हैं एक दर्शन है परन्तु धर्म तो कदापि नही, सामान्यतः धर्म जो आज के परिवेश में परिभाषित है वह है कर्म काण्ड की विधि और पूजा अर्चना की विधि जो की सरासर गलत अवधारणा है. हजारों वर्ष पूर्व शायद विश्व का सबसे पुराना दर्शन एवं चिंतन वैदिक दर्शन है, युगांतर में लोग इसके कई विभाग से असहमत हुए एवं इसको परिमार्जित करते हुए अपना दर्शन दिए जिसे पंथ भी कहा जा सकता है. ईशा से छठी–पांचवी सदी पूर्व सबसे बड़ा दार्शनिक परिवर्तन हुआ, शायद यह संक्रामक काल था, ब्राह्मणों ने वेदों उपनिषदों पर अधिपत्य जमा लिया था एवं इसका भाष्य अपने अनुकूल करने लगे थे, पुरानो का लेखन भी शायद इसी काल में हुआ. गरुड़ पुराण जैसा पुराण जो मात्र मानव को डरा कर भावुकता से ब्राह्मण वाद में धकेलता है, इन सब बुराईयों को देख कर, इस काल में कई पंथ एवं विचारधाराएँ उत्सर्जित हुई, जिसमे गौतम बुद्ध, महावीर जैन, चर्वार्क, गौशाल इत्यादि प्रमुख थे, जिन्होंने बुद्ध दर्शन , जैन दर्शन, चार्वार्क दर्शन एवं आजीविक पंथ का प्रारंभ किया. इन सब पंथों की मान्यता विचार दर्शन मूल रूप से वेदों को नकारते हुए भीं वेदों की कई बातों का समर्थन करती हैं. कालांतर में आठवीं सदी में नाथ सम्प्रदाय १५वी सदी में सिख संप्रदाय का प्रादुर्भाव हुआ. एक बात हम आप देखेंगे की जैसे जैसे समय बीता उनके दर्शन में भी समयानुसार परिवर्तन हुआ एवं जिस दर्शन से निकल कर ये आये उन दर्शनों में बहुत कुछ परिमार्जित किया गया, उदहारण के रूप में सिख दर्शन के ग्रन्थ गुरु ग्रथ साहब को लें , इसके पढने से बहुत कम विवादस्पद बाते मिलती हैं. जितने भी छंद लिखे गए हैं सभी सनातन छंदों में हैं, एवं वेदों की निति शतक इत्यादि की अच्छी बातों को संगृहीत कर के लिखा गया है.

मैंने कुरान को भी पढ़ा है वह भी ईशा के ४०० वर्ष बाद लिखा गया है, एक दर्शनशास्त्र के शोध विशेषग्य से चर्चा के मध्य यह पता चला कि ३९% आयते विशुद्ध वेद की ऋचाओं का रूपांतर हैं. कुरान की प्रथम आयत अल फातिहा कहती है

“ शुरू करता हूँ खुदा के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहमवाला है, सब तारीफ खुदा के लिए ही सजावार है. और सारे जहाँ को पालने वाला बड़ा मेहरबान रहमवाला है. खुदाया हम तेरी इबादत करते हैं और तुझसे मदद चाहते है. मुझे सीधी राह पर साबित रख”

मैंने कुरान को भी पढ़ा है वह भी ईशा के ४०० वर्ष बाद लिखा गया है, एक दर्शनशास्त्र के शोध विशेषग्य से चर्चा के मध्य यह पता चला कि ३९% आयते विशुद्ध वेद की ऋचाओं का रूपांतर हैं. कुरान की प्रथम आयत अल फातिहा कहती है

“शुरू करता हूँ खुदा के नाम से जो बड़ा मेहरबान निहायत रहमवाला है, सब तारीफ खुदा के लिए ही सजावार है. और सारे जहाँ को पालने वाला बड़ा मेहरबान रहमवाला है. खुदाया हम तेरी इबादत करते हैं और तुझसे मदद चाहते है. मुझे सीधी राह पर साबित रख”

अब आईये हम देखते हैं गायत्री मन्त्र को जिसका अर्थ है :

“सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।“

दोनों में शब्दों के हेरफेर के अलावा मूल तत्व में कितना सामंजस्य है. दोनों सृष्टि के एक रचियेता होने को स्वीकार करते हैं, दोनों उसके वर्चस्व को स्वीकार करते हैं, दोनों उसकी अर्चना करते हैं, दोनों उससे सद्बुद्धि की अपेक्षा करते हैं. दोनों उस परमपिता परमेश्वर के अस्तित्व को मानते हैं एव सद्मार्ग चाहते हैं.

इसी तरह प्रायः सभी परवर्ती दर्शनों में वेदों की ऋचाओं की छाप मिलती है.

एक बात यहाँ स्पष्ट करना चाहूँगा की वेदों में मूर्ति पूजा का उल्लेख कहीं नही है एवं जो दर्शन बुद्ध के हों या जैन के या चर्वार्क के या आजीवक के सभी ने सनातन धर्म से लग होने का मुख्य आधार मूर्तिपूजा माना है हालाँकि आज विश्व में सबसे ज्यादा मूर्तियाँ भगवान् बुद्ध की ही मिलेंगी, महावीर जैन की मूर्तियाँ भी सब जैन देरासर में मिलेंगी, डॉ मेक्स्मुल्लर जो भारतीय धार्मिक एवं शास्त्रों के सबसे बड़े शोधार्थी रहे हैं, ने माना है की ईशा से २०० वर्ष पूर्व तक सनातन धर्मी मूर्ति पूजा में मात्र शिव की पूजा ही करते थे, यह तो जैन एवं बुद्ध के अनुयायियों के बढ़ते वर्चस्व को रोकने के लिए सभी पोराणिक देवी देवताओं की मूर्ति पूजा करने लगे. सनातन धर्म का सबसे ज्यादा अहित ईशा के बाद तीसरी सदी तक ब्राहमण समुदाय ने किया, और यह समय था जब सनातन वैदिक धर्म लुप्त होता जा रहा था, यह तो भला हो आदि शंकराचार्य का जिनका जन्म ७वी सदी में बताया गया है , आकर सनातन धर्म को जीवन प्रदान किया. १५वी सदी भक्तिकाल की सदी मानी जाती है जब नामदेव, वल्लभाचार्य, तुलसी, सुर, मीरा, रहीम, रसखान जैसों ने आकर सगुन भक्ति का प्रसार किया एवं यह भक्ति घर घर पहुंची. भक्तिकाल के बारे में मैंने परवर्ती अध्यायों में विस्तार से उल्लेख किया है.

लगभग 600 ई.पू. भारत में एक धार्मिक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ जिसने भारतीय जनमानस को बौद्धिक रूप से आन्दोलित कर दिया। ईसा पूर्व छठी सदी का काल बौद्धिक चिंतन का युग माना जाता है। इस काल में यूनान में पाइथागोरस, ईरान में जरथ्रुष्ट, चीन में कन्फूसियस और लाआोत्से और भारत में बुद्ध और महावीर जैसे चिंतक हुए। इस काल में परंपरागत लौकिक धर्म अपनी गति से चल रहा था और इसमें इंद्र देवता को प्रधान माना जाता था। उसे शक्र और मधवा कहा जाता था। बौद्ध ग्रंथ में ब्रह्मा (बम्मा) का भी उल्लेख है। रूद्र शिव के रूप में जाने जाते थे। पाणिनी ने वासुदेव संप्रदाय की चर्चा की है जो भागवत धर्म से जुड़ा हुआ था। महाभारत में भी कृष्ण पूजा का उल्लेख है। उनके भाई बलदेव (लांगुलिन) के नाम का उल्लेख है। जैन ग्रन्थ में स्कंदकी चर्चा है जो शिव के पुत्र थे। इस युग में भी नाग पूजा की चर्चा होती है। गरुड़ पूजा भी प्रचलित थी। बौद्ध और जैन ग्रंथों में यक्ष पूजा के भी दृष्टांत मिलते हैं। यक्षों के राजा को वेसवन कहा जाता था। उदार एवं परोपकारी यक्ष मणिभद्र था।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व उत्तर भारत के गांगेय प्रदेश (पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार) के जनजीवन में सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से नगरीयकरण, शिल्प समुदाय के विस्तार, व्यवसाय और वाणिज्य में तीव्र विकास, तत्कालीन धर्म एवं दार्शनिक चिन्तन में होने वाले परिवर्तनों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध थे। परम्परागत रूढ़िवादिता एवं नगरों में उभरते नये वर्गों की आकांक्षाओं में होने वाले संघर्ष ने इस प्रक्रिया को गतिशील बनाया होगा जिससे चिन्तन के क्षेत्र में ऐसी एक नवीन शक्ति एवं अद्भुत सम्पन्नता का आविर्भाव हुआ जिसने भारत ही नहीं विश्व के बड़े जनसमुदाय को प्रभावित किया। इस बौद्धिक गतिविधि का केन्द्र मगध था। मगध में इस काल में एक विशाल साम्राज्य की नींव भी पड़ रही थी।

इस आन्दोलन के कई प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कारण थे जो तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिवर्तनों में निहित थे। कुछ विद्वानों ने सामाजिक स्तर पर आर्य-अनार्य, ब्राह्मण-क्षत्रिय तथा परम्परागत वर्ण व्यवस्था एवं विभिन्न जातियों में परस्पर संघर्ष की कल्पना की है। वैदिक आर्य नितान्त प्रवृत्तिमार्गी थे, वे सदैव श्रेष्ठ धन एवं ऐश्वर्य की कामना करते थे। इस विचारधारा के प्रति विरोध का आभास समाज के एक प्रबुद्ध वर्ग में रिग्वेग कल से ही देखने को मिलता है जिसकी अभिव्यक्ति एकेश्वरवादी धरना में देखि जाती है। प्रगार्य इस निवृत्तिमूलक विचारधारा के प्रणेता थे, ऐसी कुछ विद्वानों की धारणा है।

एक बौद्ध ग्रंथ में विशुद्ध यज्ञ की चर्चा मिलती है, राजा महाविजित के यज्ञ में गायें नहीं मारी गई, बकरी-भेड़े नहीं मारी गई, मुर्गे-सूअर नहीं काटे गये, न नाना प्रकार के प्राणियों की ही हत्या की गई। घी, तेल, मक्खन, दही, मधु और गुड़ से ही यज्ञ समाप्त हुआ। मज्झिमनिकाय में उल्लेख आया है कि में यज्ञ प्रक्रिया सरल थी। अट्ठक आदि ऋषियों ने हिंसाविहीन मंत्रों की रचना की थी कितु परवर्ती ब्राह्मणों ने प्राणी हिंसा का प्रावधान किया। बौद्ध साहित्य में रुधिर होम के विवरण भी मिलते हैं।

जैन एवं बौद्ध धर्म के अभ्युत्थान से पूर्व (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) अनेक मतमतान्तरों का प्रादुर्भाव हो रहा था। किंतु यह युग मुख्य रूप से निवृतिवादी विचारधारा से विशेषत: दिखाई पड़ता है। इस युग में क्रान्तिकारी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिवर्तन भी हुए। दूसरी ओर धार्मिक क्षेत्र में घटित परिवर्तनों को सर्वथा असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता। जहाँ कुछ लोगों ने सहज आध्यात्मिक प्रेरणा से निवृतिवादी धर्म को स्वीकार किया होगा वहीं अन्य लोगों ने सामाजिक हीनता तथा आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति पाने का मार्ग पाया होगा। कठिन सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों से त्रस्त लोगों का ऐसे धार्मिक आन्दोलनों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था जिसमें इन कठिनाइयों से मुक्ति के उपाय निहित हों। इस प्रकार महावीर एवं बुद्ध द्वारा प्रवर्तित जैन एवं बौद्ध धर्म का उदय इस युग की महत्त्वपूर्ण घटना है। बुद्ध और महावीर के अलावा इस युग में कई चिंतक हुए जिन्होंने इस धार्मिक आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, जहां इस काल में 62 धार्मिक संप्रदाय अस्तित्व में थे, वहीं जैन ग्रंथ सूत्र कृतांग के अनुसार, कुल धार्मिक संप्रदायों की संख्या 363 थी।

अजित केशकंबीलन– भारत का सबसे पहला भौतिकवादी चिंतक अजित केशकंबीलन था। अजित केशकंबीलन ने एक पक्के भौतिकवादी चिन्तन का प्रचार किया। उनका मानना था कि अच्छे या बुरे कर्मों का कोई फल नहीं होता। आदमी चाहे जो करे उसका सार भूत में विलीन हो जाता है। दान या दया का मनुष्य की नियति से कोई संबंध नहीं होता। उसका मानना था कि प्रत्येक घटना अपने स्वभाव के अनुरूप होती है। अत: जो इच्छा है वही करो। इसे यदृच्छावादी कहा गया है। आगे चलकर इससे लोकायत दर्शन का विकास हुआ। इसका प्रतिपादक चार्वाक था।

पुरण कश्यप- सुमंगल विलासिनी के अनुसार, वह एक दास पुत्र था जो अपने स्वामी के घर से भाग गया था। एक बौद्ध जनश्रुति के अनुसार, उसने बुद्ध के परिनिर्वाण के 16वें वर्ष में श्रावस्ती के निकट जलसमाधि ले ली। उसका मानना था कि- न तो कर्म होता है और न पुनर्जन्म। उसे अक्रियावादी कहा जाता है। संभवत: पुरण कश्यप ने ही सांख्य दर्शन की नींव डाली। इसके अनुसार आत्मा शरीर से पृथक है। आगे चलकर पुरण कश्यप के संप्रदाय का मक्खलि गोशाल के संप्रदाय में विलय हो गया।


मक्खलि गोशाल- वह छः वर्षों तक महावीर के साथ रहा। फिर उसने आजीवक संप्रदाय की स्थापना की। कुछ पुस्तकों में इसका संस्थापक नंदवच्छ को माना गया है। मक्खलि गोशाल का मत था कि आत्मा को अनेकानेक पुनर्जन्मों के पूर्व निर्धारित अटल चक्र से गुजरना ही पड़ता था और फिर प्रत्येक जन्म में वह जिस शरीर से संबंधित होता है वह होगा ही, चाहे उसने कर्म कैसा भी क्यों न किया हो। उसे नियतिवादी कहा जाता है। बिंदुसार ने इस धर्म को संरक्षण दिया और अशोक एवं दशरथ ने इसे गुफाएं प्रदान कीं।

पकुध कात्यायन- यह भी नियतिवादी था। वह भी कर्म और पुनर्जन्म में आस्था नहीं रखता था। उसके विचार में सात वस्तुएं पृथ्वी, जल, तेज, वायु, सुख, दुख और जीव न तो पैदा किए जा सकते हैं और न ही नष्ट। अत: न तो संसार में कोई किसी को मारता है और न ही कोई मारा ही जाता है। अत: यदि कोई किसी को हथियार से काटे भी तो वह नहीं कटता है। इससे परवर्ती वैशेषिक दर्शन का उद्गम माना जा सकता है। इस धर्म के अनुयायी मक्खलिपुत्र गोसाल के संप्रदाय से जुड़ गए।

संजय वेलट्टपुत्त- इसे अनिश्चयवादी भी माना जाता है। इसका मानना है न तो यह कहा जा सकता है कि स्वर्ग या नरक हैं, या फिर नहीं हैं।

चार्वाक- उसे बृहस्पति का शिष्य माना जाता है और उसने बृहस्पति सूत्र (ग्रंथ) भी लिखा है। चार्वाक, भौतिकवादी दार्शनिक है। उसका मानना है कि प्रत्यक्ष अनुभव ही एक मात्र ज्ञान का साधन है। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के रूप में, अचेतन अवस्था में प्राप्त, द्रव्य एकमात्र वास्तविकता है। भौतिक तत्वों से बना शरीर मानव का एक मात्र सार है। राजा एक मात्र देवता है। मृत्यु मानव का एक मात्र अन्त है। ऐन्द्रिक आनन्द ही जीवन का एक मात्र उद्देश्य है। मृत्यु के बाद न तो स्वर्ग है और न नरक। इसलिए कर्म और पुनर्जन्म अपना अर्थ नहीं रखता है।

संभवत: इन अतिवादी तथा सामाजिक नैतिकताविहीन चिंतन में कार्यकारण सम्बंधी प्रकृति के नियम की धारणा कार्य कर रही थी, जिससे इस विचार का विकास हुआकि प्रकृति में सदैव कार्यकारण सम्बन्ध कार्यरत है, जिसे न ईश्वर ही बदल सकता है न कर्मकाण्ड या यज्ञों से ऐसा संभव है। इस विचारधारा का विकास उपनिषदिकचिंतन के साथ ही हुआ होगा जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व में नास्तिकवादी सम्प्रदायों का प्रेरक बन गया।

आज भी प्रचलित कुछ शब्दों से हम प्राचीन भारत में प्रचलित बौद्धधम्म जैन धर्म ब्राह्मणधर्म और उनसे प्रेरित राजनीतिक वर्चस्व की खुनी लड़ाई को महसूस कर सकते हैं , जैसे:

त्यौहार : तुम्हारी हार

दशहरा : दस पीढ़ियों की हार (बौद्ध सम्राट अशोक महान की दस पीढ़ियां )

भंगी: हिंसक यज्ञ को भंग करने वाली सेना

राक्षस : रक्षा करने वाली सेना

असुर : अ+सुर जो ब्राह्मण धर्म के सुर में सुर न मिलाये मतलब साथ न दे

बुद्ध ही बुत है, बुत ही भूत हैं, इसीलिए कहा जाता है कि पीपल ( बोधिवृक्ष ) में भूत बसते हैं।भूत काल अर्थात बुद्ध काल!!!


बेहद खुनी संघर्ष और जबरदस्त षडयंत्र का युग था, हम आज भी पौराणिक नाटकों फिल्मों में असुर राक्षस आदि देख सुन सकते हैं, आज भी इनके द्वारा स्थापित बौद्ध मूर्तियां खंडित रूप में संग्रहालयों में देख सकते हैं.

कालांतर में समाज सुधारकों एवं धर्माधिकारियों ने विद्वता का परिचय दिया एवं सनातन वैदिक शाखाओं से निकले पंथों/धर्मों/दर्शनों में अब आपसी टकराव बंद हुआ, मतभेद होते हैं चर्चाएँ भी होती हैं परन्तु अब वह खुनी संघर्ष नही होता.

उपरोक्त विवरण में लिखा जा चूका है की ईशा से पूर्व छठी शताब्दी में तक़रीबन ३०० मत या सम्प्रदाय मौजूद थे. आईये आज के दिन के प्रमुख दर्शनों के बारे में विस्तार से चर्चा करें :

मेरे अनुसार जो मुख्य दर्शन सनातन वैदिक दर्शन से उभर कर आये चाहे उसे नकार कर या संसोधित कर वे हैं...१. जैन दर्शन २. बौध दर्शन ३. चार्वाक दर्शन ४. आजीवक दर्शन तदपुरांत नाथ सम्प्रदाय एवं सिख सम्प्रदाय |

आईये सबसे पहले हम जाने चावार्क दर्शन को, जो की भौतिक सुखों को प्रधानता देता है एवं अनीश्वर वाद को मानता है, नास्तिकवाद का प्रबल समर्थक है, लीजिये विस्तार से जानते हाँ.

अगर हम वैदिक शास्त्रों को दर्शन न मानें तो शायद मानव जीवन का सबसे प्राचीन दर्शन (philosophy of life) चार्वाक दर्शन है, जिसे लोकायत या लोकायतिक दर्शन भी कहते हैं । लोकायत का शाब्दिक अर्थ है ‘जो मत लोगों के बीच व्याप्त है, जो विचार जनसामान्य में प्रचलित है ।’ इस जीवन-दर्शन का सार निम्नलिखित कथनों में निहित है:

यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।।

त्रयोवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिशाचराः ।

“मनुष्य जब तक जीवित रहे तब तक सुखपूर्वक जिये । ऋण करके भी घी पिये। अर्थात् सुख-भोग के लिए जो भी उपाय करने पड़ें उन्हें करे । दूसरों से भी उधार लेकर भौतिक सुख-साधन जुटाने में हिचके नहीं । परलोक, पुनर्जन्म और आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करे । भला जो शरीर मृत्यु पश्चात् भष्मीभूत हो जाए, यानी जो देह दाहसंस्कार में राख हो चुके, उसके पुनर्जन्म का सवाल ही कहां उठता है । जो भी है इस शरीर की सलामती तक ही है और उसके बाद कुछ भी नहीं बचता इस तथ्य को समझकर सुखभोग करे, उधार लेकर ही सही । तीनों वेदों के रचयिता धूर्त प्रवृत्ति के मसखरे निशाचर रहे हैं, जिन्होंने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों का भ्रम फैलाया है ।“

नास्तिकवाद दर्शन चार्वाक

( यह आलेख विभिन्न शोध शास्त्रियों के शोध पर आधारित है.)

चार्वाक सिद्धांत का कोई ग्रंथ नहीं है, किंतु उसका उल्लेख अन्य विविध दर्शनों के प्रतिपादन में मनीषियों ने किया है । उपरलिखित कथन का मूल स्रोत क्या है इसकी जानकारी अभी मुझे नहीं हैं । ‘ज्ञानगंगोत्री’ नामक ग्रंथ में इसका विवरण है ।

माना जाता है कि ‘लोकायत’ विचार का कोई प्रणेता नहीं है, लेकिन इसे दर्शन रूप में स्थापित करने का श्रेय आचार्य बृहस्पति को दिया जाता है, जो कदाचित् देवगुरु बृहस्पति से भिन्न थे । चार्वाक को उनका शिष्य बताया जाता है, जिसने इस विशुद्ध भौतिकवादी विचारधारा को प्रचारित-प्रसारित किया । शायद इसीलिए उसका नाम इस दर्शन से जुड़ गया । यह भी माना जाता है कि चार्वाक नाम भी उसका मौलिक नाम नहीं था ।

चारुः लोकसम्मतो वाको वाक्यं यस्य (सः चारुवाकः)

(संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, वामन शिवराम आप्टे, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, 2006)

डेनमार्क की प्रसिद्द संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी में चार्वाक को देहात्म्वाद एवं अहेतुवाद बताया है.

अर्थात् लोकलुभावन और आम जन को प्रिय लगने वाले वचन कहता हो, प्रचारित करता हो, वह चारुवाक। कालांतर में यही बदलकर चार्वाक हो गया। जो सीधे तौर में समझ आये और सुविधाजनक लगे जीवन का वैसा रास्ता जो दिखाये वह चार्वाक।

चार्वाक दर्शन नास्तिकवादी एवं अनीश्वरवादी है । इस दर्शन के अनुसार जो भी इंद्रियगम्य है, जिसके अस्तित्व का ज्ञान देख-सुनकर अथवा अन्य प्रकार से किया जा सकता है, वही वास्तविक है । जिस ज्ञान को चिंतन-मनन से मिलने की बात कही जाती है, वह भ्रामक है, मिथ्या है, महज अनुमान पर टिका है । आत्मा-परमात्मा जैसी कोई चीज होती ही नहीं है, अतः पाप-पुण्य नर्क-स्वर्ग का कोई अर्थ ही नहीं है ।

चार्वाक सिद्धांत चार तत्वों, ‘पृथ्वी’, ‘जल’, ‘अग्नि’, एवं ‘वायु’ को मान्यता देता है । समस्त जीव-निर्जीव तंत्र/पदार्थ इन्हीं के संयोग से बने हैं । स्थूल वस्तुओं/जीवों की रचना में ‘आकाश’ का भी कोई योगदान नहीं रहता है, अतः उसे यह पांचवें तत्व के रूप में नहीं स्वीकारता है । (ध्यान रहे कि कई दर्शन पांच महाभूतों को भौतिक सृष्टि काआधार मानते हैं:‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’ । चार्वाक के अनुसार मनुष्यों एवं अन्य जीवों की चेतना इन्हीं मौलिक तत्वों के परस्पर मेल से उत्पन्न होती है । जब शरीर अपने अवयवों में बिखर जाता है तो उसके साथ यह चेतना भी लुप्त हो जाती है । इस विचार को स्पष्ट करने के लिए चार्वाक का अधोलिखित कथन विचारणीय है:

जडभूतविकारेषु चैतन्यं यत्तु दृश्यते ।

ताम्बूलपूगचूर्णानां योगाद् राग इवोत्थितम् ।।

(स्रोत: भारतीय दर्शनशास्त्र का इतिहास, लेखक: हरिदत्त शास्त्री, साहित्य भंडार, मेरठ, 1966, पृष्ठ 63)

अर्थात् जिस प्रकार पान के पत्ते तथा सुपाड़ी के चूर्ण के संयोग से लाल रंग होंठों पर छा जाता है, उसी प्रकार इन चेतनाशून्य घटक तत्वों के परस्पर संयोग से चेतना की उत्पत्ति होती है । यानी चेतना आत्मा या तत्तुल्य किसी अन्य अभौतिक सत्ता की विद्यमानता से नहीं आती है । विभिन्न पदार्थों के सेवन से चेतना की तीव्रता कम-ज्यादा हो जाती है, जिससे स्पष्ट है कि ये ही पदार्थ चेतना के कारण हैं ।

चार्वाक दर्शन वस्तुतः आज का विज्ञान पोषित भौतिकवाद है, जिसकी मान्यता है कि समस्त सृष्टि भौतिक पदार्थ और उससे अनन्य रूप से संबद्ध ऊर्जा का ही कमाल है । पदार्थ से ही जीवधारियों की रचना होती है । उसमें किसी अभौतिक सत्ता की कोई भूमिका नहीं है । विशुद्ध चेतनाहीन पदार्थ से ही जटिल एवं जटिलतर जीवों की रचना हुई है । जीव-रचना की जटिलता के ही साथ चेतना का भी उदय हुआ है । ऐसी संरचना के निरंतर विकास के फलस्वरूप मानव जैसा चेतन और बुद्धियुक्त जीव का जन्म हुआ है । वैज्ञानिकों का एक वर्ग इस विचारधारा का पक्षधर है कि चेतना का मूल कारण भौतिकी के ही प्राकृतिक नियमों में छिपा है । चेतना का उदय कब और कैसे होता है यह अवश्य इन विज्ञानियों के लिए अभी अबूझ पहेली है ।

आधुनिक विज्ञान पदार्थमूलक है । अध्यात्म से उसका कोई संबंध नहीं है । आज के विज्ञानमूलक भौतिक दर्शन, जिसमें सब कुछ पदार्थगत है, को चार्वाक दर्शन का परिष्कृत दर्शन कह सकते हैं, क्योंकि यह भौतिक तंत्रों/घटनाओं की तर्कसम्मत व्याख्या कर सकता है । अवश्य ही यह चार्वाक के चार तत्वों पर नहीं टिका है । सभी वैज्ञानिक चार्वाक सिद्धांत को यथावत् नहीं मानते हैं । उनमें कई ईश्वर तथा जीवात्मा जैसी चीजों को मानते हैं ।

‘लोकायत’ के मतावलंबियों को अक्सर ‘चार्वाक’ भी कहते हैं । चार्वाकों को दो श्रेणियों में बांटा जाता है: (1) धूर्त, एवं (2) सुशिक्षित । ‘यह शरीर जब तक है, तभी तक सब कुछ है, उसके बाद कुछ नहीं रहता’ के सिद्धांत के कारण लोकायत में पाप-पुण्य, नैतिकता आदि जैसी बातों का कोई ठोस आधार न होते हुए भी ‘सुशिक्षित’ चार्वाक सुव्यवस्थित मानव समाज की रचना के पक्षधर होते हैं । दूसरी तरफ ‘धूर्त’ चार्वाकों के लिए ‘खाओ-पिओ मौज करो, और उसके लिए सब कुछ जायज है’ की नीति पर चलते हैं । उनके लिए सुखप्राप्ति एकमेव जीवनोद्येश्य रहता है । कोई भी कर्म उनके लिए गर्हित, त्याज्य या अवांछित नहीं होता है । और ऐसे जनों की इस धरती पर कोई कमी नहीं होती है ।

मेरा अपना आकलन है कि इस दुनिया में 90 प्रतिशत से अधिक लोग चार्वाक सिद्धांत के अनुरूप ही जीवन जीते हैं । यद्यपि वे किसी न किसी आध्यात्मिक मत में आस्था की बात करते हैं, किंतु उनकी धारणा गंभीरता से विचारी हुई नहीं होती, महज सतही होती है, एक प्रकार का ‘तोतारटंत’, एक प्रकार की भेड़चाल में अपनाई गयी नीति । चूंकि दुनिया में लोग ऐसा या वैसा मानते हैं, अतः हम भी मानते हैं वाली बात उन पर लागू होती है । अन्यथा तथ्य यह है कि प्रायः हर व्यक्ति इसी धरती के सुखों को बटोरने में लगा हुआ है । अनाप-शनाप धन-संपदा अर्जित करना, और भौतिक सुखों का आनंद पाना यही लगभग सभी का लक्ष्य रह गया है । मानव समाज में जो भी छोटे-बड़े अपराध देखने को मिलते हैं वे अपने लिए सब कुछ बटोरने की नियत से किये जाते हैं । हमारे कृत्य से किसी और को क्या कष्ट होगा इसका कोई अर्थ नहीं है । मेरा काम जैसे भी निकले वही तरीका जायज है की नीति सर्वत्र है । इस जीवन से परे भी क्या कुछ है इस प्रश्न को हर कोई टाल देना पसंद करता है । और कर्मकांडों के तौर पर कहीं कुछ होता है तो वह भी अपने, अपने परिवार, अपने लोगों के सुखमय जीवन एवं सुरक्षा की कामना से किया जाता है । यहां तक कि आधुनिक धर्मगुरु भी अपने सुख के लिए चेलों का संगठन तैयार करते हैं; वे अपने परलोक के लिए उतना चिंतित नहीं रहते जितना दूसरों के परलोक के लिए (धोखा देना) । वस्तुतः इस समय सर्वत्र चार्वाक सिद्धांत की ही मान्यता है; हम आप इस वास्तविकता को मानें या न मानें ।

चार्वाक दर्शन को विभिन्न ज्ञानकोष एवं शोधकर्ताओं ने यूँ परिभाषित किया है:

चार्वाक दर्शन एक भौतिकवादी नास्तिक दर्शन है। यह मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है तथा पारलौकिक सत्ताओं को यह सिद्धांत स्वीकार नहीं करता है। यह दर्शन वेदबाह्य भी कहा जाता है।

वेदवाह्य दर्शन छ: हैं- चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक, और आर्हत। इन सभी में वेद से असम्मत सिद्धान्तों का प्रतिपादन है।

चार्वाक प्राचीन भारत के एक अनीश्वरवादी और नास्तिक तार्किक थे। ये नास्तिक मत के प्रवर्तक बृहस्पति के शिष्य माने जाते हैं। बृहस्पति और चार्वाक कब हुए इसका कुछ भी पता नहीं है। बृहस्पति को चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र ग्रन्थ में अर्थशास्त्र का एक प्रधान आचार्य माना है।

चार्वाक का नाम सुनते ही आपको ‘यदा जीवेत सुखं जीवेत, ऋण कृत्वा, घृतं पीवेत’ (जब तक जीवो सुख से जीवो, उधार लो और घी पीयो) की याद आएगी. ‘चार्वाक’ नाम को ही घृणास्पद गाली की तरह बदल दिया गया है। मानों इस सिद्धांत को मानने वाले सिर्फ कर्जखोर, भोगवादी और पतित लोग थे। प्रचलित धारणा यही है कि चार्वाक शब्द की उत्पति ‘चारु’+’वाक्’ (मीठी बोली बोलने वाले) से हुई है। ज़ाहिर है कि यह नामकरण इस सिद्धांत के उन विरोधियों द्वारा किया गया है कि जिनका मानना था कि यह लोग मीठी-मीठी बातों से भोले-भले लोगों को बहकाते थे। चार्वाक सिद्धांतों के लिए बौद्ध पिटकों तक में ‘लोकायत’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसका मतलब ‘दर्शन की वह प्रणाली है जो जो इस लोक में विश्वास करती है और स्वर्ग, नरक अथवा मुक्ति की अवधारणा में विश्वास नहीं रखती’. चार्वाक या लोकायत दर्शन का ज़िक्र तो महाभारत में भी मिलता है लेकिन इसका कोई भी मूल ग्रन्थ उपलब्ध नहीं. ज़ाहिर है कि चूंकि यह अपने समय की सत्ताधारी ताकतों के खिलाफ बात करता था, तो इसके ग्रंथों को नष्ट कर दिया गया और प्रचलित कथाओं में चार्वाकों को खलनायकों की तरह पेश किया गया।

माधवाचार्य रचित सर्वदर्शनसंग्रह में चार्वाक का मत दिया हुआ मिलता है। पद्मपुराण में लिखा है कि असुरों को बहकाने के लिये बृहस्पति ने वेदविरुद्ध मत प्रकट किया था। नास्तिक मत के संबध में विष्णुपुराण में लिखा है कि जब धर्मबल से दैत्य बहुत प्रबल हुए तब देवताओं ने विष्णु के यहाँ पुकार की। विष्णु ने अपने शरीर से मायामोह नामक एक पुरुष उत्पन्न किया जिसने नर्मदा तट पर दिगबंर रूप में जाकर तप करते हुए असुरों को बहकाकर धर्ममार्ग मे भ्रष्ट किया। मायामोह ने असुरों को जो उपदेश किया वह सर्वदर्शनसंग्रह में दिए हुए चार्वाक मत के श्लोकों से बिलकुल मिलता है। जैसे, - मायामोह ने कहा है कि यदि यज्ञ में मारा हुआ पशु स्वर्ग जाता है तो यजमान अपने पिता को क्यों नहीं मार डालता, इत्यादि। लिंगपुराण में त्रिपुरविनाश के प्रसंग में भी शिवप्रेरित एक दिगंबर मुनि द्वारा असुरों के इसी प्रकार बहकाए जाने की कथा लिखी है जिसका लक्ष्य जैनों पर जान पड़ता है। वाल्मीकि रामायण अयोध्या कांडमें महर्षि जावालि ने रामचंद्र को बनबास छोड़ अयोध्या लौट जाने के लिये जो उपदेश दिया है वह भी चार्वाक के मत से बिलकुल मिलता है। इन सब बातों से सिद्ध होता है कि नास्तिक मत बहुत प्राचीन है। इसका अविर्भाव उसी समय मे समझना चाहिए जव वैदिक कर्मकांड़ों की अधिकता लोगों को कुछ खटकने लगी थी।

चार्वाक ईश्वर और परलोक नहीं मानते। परलोक न मानने के कारण ही इनके दर्शन को लोकायत भी कहते हैं। सर्वदर्शनसंग्रह में चार्वाक के मत से सुख ही इस जीवन का प्रधान लक्ष्य है। संसार में दुःख भी है, यह समझकर जो सुख नहीं भोगना चाहते, वे मूर्ख हैं। मछली में काँटे होते हैं तो क्या इससे कोई मछली ही न खाय ? चौपाए खेत पर जायँगे, इस डर से क्या कोई खेत ही न बोवे ? इत्यादि। चार्वाक आत्मा को पृथक् कोई पदार्थ नहीं मानते। उनके मत से जिस प्रकार गुड़, तंडुल आदि के संयोग से मद्य में मादकता उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार पृथ्वी, जल, तेज और वायु इन चार भूतों के संयोगविशेष से चेतनता उत्पन्न हो जाती है। इनके विश्लेषण या विनाश से 'मैं' अर्थात् चेतनता का भी नाश हो जाता है। इस चेतन शरीर के नाम के पीछे फिर पुनरागमन आदि नहीं होता। ईश्वर, परलोक आदि विषय अनुमान के आधार पर हैं।

पर चार्वाक प्रत्यक्ष को छोड़कर अनुमान को प्रमाण में नहीं लेते। उनका तर्क है कि अनुमान व्याप्तिज्ञान का आश्रित है। जो ज्ञान हमें बाहर इंद्रियों के द्वारा होता है उसे भूत और भविष्य तक बढ़ाकर ले जाने का नाम व्याप्तिज्ञान है, जो असंभव है। मन में यह ज्ञान प्रत्यक्ष होता है, यह कोई प्रमाण नहीं क्योंकि मन अपने अनुभव के लिये इंद्रियों का ही आश्रित है। यदि कहो कि अनुमान के द्वारा व्याप्तिज्ञान होता है तो इतरेतराश्रय दोष आता है, क्योंकि व्याप्तिज्ञान को लेकर ही तो अनुमान को सिद्ध किया चाहते हो। चार्वाक का मत सर्वदर्शनसंग्रह, सर्वदर्शनशिरोमणि और बृहस्पतिसूत्र में देखना चाहिए। नैषध के १७वें सर्ग में भी इस मत का विस्तृत उल्लेख है।

चार्वाक केवल प्रत्यक्षवादिता का समर्थन करता है, वह अनुमान आदि प्रमाणों को नही मानता है। उसके मत से पृथ्वी जल तेज और वायु ये चार ही तत्व है, जिनसे सब कुछ बना है। उसके मत में आकाश तत्व की स्थिति नही है, इन्ही चारों तत्वों के मेल से यह देह बनी है, इनके विशेष प्रकार के संयोजन मात्र से देह में चैतन्य उत्पन्न हो जाता है, जिसको लोग आत्मा कहते है। शरीर जब विनष्ट हो जाता है, तो चैतन्य भी खत्म हो जाता है। इस प्रकार से जीव इन भूतो से उत्पन्न होकर इन्ही भूतो के के नष्ट होते ही समाप्त हो जाता है, आगे पीछे इसका कोई महत्व नही है। इसलिये जो चेतन में देह दिखाई देती है वही आत्मा का रूप है, देह से अतिरिक्त आत्मा होने का कोई प्रमाण ही नही मिलता है। चार्वाक के मत से स्त्री पुत्र और अपने कुटुम्बियों से मिलने और उनके द्वारा दिये जाने वाले सुख ही सुख कहलाते है। उनका आलिन्गन करना ही पुरुषार्थ है, संसार में खाना पीना और सुख से रहना चाहिये।

चार्वाक दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, तेज तथा वायु ये चार ही तत्त्व सृष्टि के मूल कारण हैं। जिस प्रकार बौद्ध उसी प्रकार चार्वाक का भी मत है कि आकाश नामक कोई तत्त्व नहीं है। यह शून्य मात्र है। अपनी आणविक अवस्था से स्थूल अवस्था में आने पर उपर्युक्त चार तत्त्व ही बाह्य जगत, इन्द्रिय अथवा देह के रूप में दृष्ट होते हैं। आकाश की वस्त्वात्मक सत्ता न मानने के पीछे इनकी प्रमाण व्यवस्था कारण है। जिस प्रकार हम गन्ध, रस, रूप और स्पर्श का प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए उनके समवायियों का भी तत्तत इन्द्रियों के द्वारा प्रत्यक्ष करते हैं। आकाश तत्त्व का वैसा प्रत्यक्ष नहीं होता। अत: उनके मत में आकाश नामक तत्त्व है ही नहीं। चार महाभूतों का मूलकारण क्या है? इस प्रश्न का उत्तर चार्वाकों के पास नहीं है। यह विश्व अकस्मात भिन्न-भिन्न रूपों एवं भिन्न-भिन्न मात्राओं में मिलने वाले चार महाभूतों का संग्रह या संघट्ट मात्र है।

आत्मा

चार्वाकों के अनुसार चार महाभूतों से अतिरिक्त आत्मा नामक कोई अन्य पदार्थ नहीं है। चैतन्य आत्मा का गुण है। चूँकि आत्मा नामक कोई वस्तु है ही नहीं अत: चैतन्य शरीर का ही गुण या धर्म सिद्ध होता है। अर्थात यह शरीर ही आत्मा है। इसकी सिद्धि के तीन प्रकार है- तर्क, अनुभव और आयुर्वेद शास्त्र।

तर्क से आत्मा की सिद्धि के लिये चार्वाक लोग कहते हैं कि शरीर के रहने पर चैतन्य रहता है और शरीर के न रहने पर चैतन्य नहीं रहता। इस अन्वय व्यतिरेक से शरीर ही चैतन्य का आधार अर्थात आत्मा सिद्ध होता है।

अनुभव 'मैं स्थूल हूँ', 'मैं दुर्बल हूँ', 'मैं गोरा हूँ', 'मैं निष्क्रिय हूँ' इत्यादि अनुभव हमें पग-पग पर होता है। स्थूलता दुर्बलता इत्यादि शरीर के धर्म हैं और 'मैं' भी वही है। अत: शरीर ही आत्मा है।

आयुर्वेद जिस प्रकार गुड, जौ, महुआ आदि को मिला देने से काल क्रम के अनुसार उस मिश्रण में मदशक्त उत्पन्न होती है, अथवा दही पीली मिट्टी और गोबर के परस्पर मिश्रण से उसमें बिच्छू पैदा हो जाता है अथवा पान, कत्था, सुपारी और चूना में लाल रंग न रहने पर भी उनके मिश्रण से मुँह में लालिमा उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार चतुर्भूतों के विशिष्ट सम्मिश्रण से चैतन्य उत्पन्न हो जाता है। किन्तु इन भूतों के विशिष्ट मात्रा में मिश्रण का कारण क्या है? इस प्रश्न का उत्तर चार्वाक के पास स्वभाववाद के अतिरिक्त कुछ नहीं है। ईश्वर-न्याय आदि शास्त्रों में ईश्वर की सिद्धि अनुमान या आप्त वचन से की जाती है। चूँकि चार्वाक प्रत्यक्ष और केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है अत: उसके मत में प्रत्यक्ष दृश्यमान राजा ही ईश्वर हैं वह अपने राज्य का तथा उसमें रहने वाली प्रजा का नियन्ता होता है। अत: उसे ही ईश्वर मानना चाहिये।

ज्ञान मीमांसा

प्रमेय अर्थात विषय का यथार्थ ज्ञान अर्थात प्रमा के लिये प्रमाण की आवश्यकता होती है। चार्वाक लोक केवल प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं। विषय तथा इन्द्रिय के सन्निकार्ष से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है। हमारी इन्द्रियों के द्वारा प्रत्यक्ष दिखलायी पड़ने वाला संसार ही प्रमेय है। इसके अतिरिक्त अन्य पदार्थ असत है। आँख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा के द्वारा रूप शब्द गन्ध रस एवं स्पर्श का प्रत्यक्ष हम सबको होता है। जो वस्तु अनुभवगम्य नहीं होती उसके लिये किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं होती। बौद्ध, जैन नामक अवैदिक दर्शन तथा न्यायवैशेषिक आदि अर्द्धवैदिक दर्शन अनुमान को भी प्रमाण मानते हैं। उनका कहना है कि समस्त प्रमेय पदार्थों की सत्ता केवल प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध नहीं की जा सकती। परन्तु चार्वाक का कथन है कि अनुमान से केवल सम्भावना पैदा की जा सकती है। निश्चयात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष से ही होता हैं। दूरस्थ हरे भरे वृक्षों को देखकर वहाँ पक्षियों का कोलाहल सुनकर, उधर से आने वाली हवा के ठण्डे झोके से हम वहाँ पानी की सम्भावना मानते हैं। जल की उपलब्धि वहाँ जाकर प्रत्यक्ष देखने से ही निश्चित होती है। अत: सम्भावना उत्पन्न करने तथा लोकव्यवहार चलाने के लिये अनुमान आवश्यक होता है किन्तु वह प्रमाण नहीं हो सकता। जिस व्याप्ति के आधार पर अनुमान प्रमाण की सत्ता मानी जाती है वह व्याप्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं है। धूम के साथ अग्नि का, पुष्प के साथ गन्ध का होना स्वभाव है। सुख और धर्म का दु:ख और अधर्म का कार्यकारण भाव स्वाभाविक है। जैसे कोकिल के शब्द में मधुरता तथा कौवे के शब्द में कर्कशता स्वाभाविक है उसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये। जहाँ तक शब्द प्रमाण की बात है तो वह तो एक प्रकार से प्रत्यक्ष प्रमाण ही है। आप्त पुरुष के वचन हमको प्रत्यक्ष सुनायी देते हैं। उनको सुनने से अर्थ ज्ञान होता है। यह प्रत्यक्ष ही है। जहाँ तक वेदों का प्रश्न है उनके वाक्य अदृष्ट और अश्रुतपूर्ण विषयों का वर्णन करते हैं अत: उनकी विश्वसनीयता सन्दिग्ध है। साथ ही अधर्म आदि में अश्वलिङ्गग्रहण सदृश लज्जास्पद एवं मांसभक्षण सदृश घृणास्पद कार्य करने से तथा जर्भरी तुर्फरी आदि अर्थहीन शब्दों का प्रयोग करने से वेद अपनी अप्रामाणिकता स्वयं सिद्ध करते हैं।

आचार मीमांसा

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि चार्वाक लोग इस प्रत्यक्ष दृश्यमान देह और जगत के अतिरिक्त किसी अन्य पदार्थ को स्वीकार नहीं करते। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थ चतुष्टय को वे लोग पुरुष अर्थात मनुष्य देह के लिये उपयोगी मानते हैं। उनकी दृष्टि में अर्थ और काम ही परम पुरुषार्थ है। धर्म नाम की वस्तु को मानना मूर्खता है क्योंकि जब इस संसार के अतिरिक्त कोई अन्य स्वर्ग आदि है ही नहीं तो धर्म के फल को स्वर्ग में भोगने की बात अनर्गल है। पाखण्डी धूर्त्तों के द्वारा कपोलकल्पित स्वर्ग का सुख भोगने के लिये यहाँ यज्ञ आदि करना धर्म नहीं है बल्कि उसमें की जाने वाली पशु हिंसा आदि के कारण वह अधर्म ही है तथा हवन आदि करना तत्त्द वस्तुओं का दुरुपयोग तथा व्यर्थ शरीर को कष्ट देना है इसलिये जो कार्य शरीर को सुख पहुँचाये उसी को करना चाहिये। जिसमें इन्द्रियों की तृप्ति हो मन आन्दित हो वही कार्य करना चाहिये। जिनसे इन्द्रियों की तृप्ति हो मन आनन्दित हो उन्हीं विषयों का सेवन करना चाहिये। शरीर इन्द्रिय मन को अनन्दाप्लावित करने में जो तत्त्व बाधक होते हैं उनको दूर करना, न करना, मार देना धर्म है। शारीरिक मानसिक कष्ट सहना, विषयानन्द से मन और शरीर को बलात विरत करना अधर्म है। तात्पर्य यह है कि आस्तिक वैदिक एवं यहाँ तक कि अर्धवैदिक दर्शनों में, पुराणों स्मृतियों में वर्णित आचार का पालन यदि शरीर सुख का साधक है तो उनका अनुसरण करना चाहिये और यदि वे उसके बाधक होते हैं तो उनका सर्वथा सर्वदा त्याग कर देना चाहिये।

मोक्ष

चार्वाकों की मोक्ष की कल्पना भी उनके तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा के प्रभाव से पूर्ण प्रभावित है। जब तक शरीर है तब तक मनुष्य नाना प्रकार के कष्ट सहता है। यही नरक है। इस कष्ट समूह से मुक्ति तब मिलती है जब देह चैतन्यरहित हो जाता है अर्थात मर जाता है। यह मरना ही मोक्ष है क्योंकि मृत शरीर को किसी भी कष्ट का अनुभव मर जाता है। यह मरना ही मोक्ष है क्योंकि मृत शरीर को किसी भी कष्ट का अनुभव नहीं होता। यद्यपि अन्य दर्शनों में आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उसी के मुक्त होने की चर्चा की गयी है और मोक्ष का स्वरूप भिन्न-भिन्न दर्शनों में भिन्न-भिन्न है, तथापि चार्वाक उनकी मान्यता को प्रश्रय नहीं देते। वे न तो मोक्ष को नित्य मानते हुए सन्मात्र मानते हैं, न नित्य मानते हुए सत और चित स्वरूप मानते हैं न ही वे सच्चिदानन्द स्वरूप में उसकी स्थिति को ही मोक्ष स्वीकार करते हैं।

चार्वाक लोकायत

चार्वाक दर्शन वह दर्शन है जो जन सामान्य में स्वभावत: प्रिय है। जिस दर्शन के वाक्य चारु अर्थात रुचिकर हों वह चार्वाक दर्शन है। सभी शास्त्रीय गम्भीर विषयों का व्यावहारिक एवं लौकिक पूर्व पक्ष ही चार्वाक दर्शन है। सहज रूप में जो कुछ हम करते हैं वह सब कुछ चार्वाक दर्शन का आधार है। चार्वाक दर्शन जीवन के हर पक्ष को सहज दृष्टि से देखता है। जीवन के प्रति यह सहज दृष्टि ही चार्वाक दर्शन है। वास्तविकता तो यह है कि, विश्व का हर मानव जो जीवन जीता है वह चार्वाक दर्शन ही है। ऐसे वाक्य और सिद्धान्त जो सबको रमणीय लगें लोक में आयत या विश्रुत आवश्य होंगे। सम्भवत: यही कारण है कि हम चार्वाक दर्शन को लोकायत दर्शन के नाम से भी जानते हैं। यह दर्शन बार्हस्पत्य दर्शन के नाम से भी विद्वानों में प्रसिद्ध है। इस नाम से यह प्रतीत होता है कि यह दर्शन बृहस्पति के द्वारा विरचित है।

चार्वाक दर्शन के प्रणेता बृहस्पति

बृहस्पति भारतीय समाज में देवताओं के गुरु के रूप में मान्य हैं। परन्तु भारतीय साहित्य में बृहस्पति एक नहीं हैं। चार्वाक दर्शन के प्रवर्तक आचार्य बृहस्पति कौन हैं, यह निर्णय कर पाना अत्यन्त कठिन कार्य है। आङिगरस एवं लौक्य रूप में दो बृहस्पतियों का समुल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है। अश्वघोष के अनुसार आङिगरस बृहस्पति राजशास्त्र के प्रणेता हैं। लौक्य बृहस्पति के मत में सत पदार्थ की उत्पत्ति असत से मानी जाती है। इसी प्रकार असत पदार्थ की उत्पत्ति सत से मानी गयी है। जड़ पदार्थों को ही असत कहा जाता है। चेतन पदार्थों को इस मान्यता के अनुसार सत कहा जाता हैं।

एक बृहस्पति का निर्देश महाभारत के वन पर्व में भी प्राप्त होता है। यह बृहस्पति शुक्र का स्वरूप धारण कर इन्द्र का सरंक्षण एवं दानवों का विनाश करने के उद्देश्य से अनात्मवाद या प्रपंच विज्ञान की संरचना करता है। इस प्रपंच विज्ञान के फलस्वरूप शुभ को अशुभ एवं अशुभ को शुभ मानते हुए दानव वेद एवं शास्त्रों की आलोचना एवं निन्दा में संलग्न हो जाते हैं। अन्य प्रसंग में महाभारत में ही एक और बृहस्पति का वर्णन मिलता है जो शुक्राचार्य के साथ मिल कर प्रवंचनाशास्त्र की रचना करते हैं। विभिन्न शास्त्रों के आचार्यों की माने तो चार्वाक मत दर्शन की श्रेणी में नहीं माना जा सकता क्योंकि इस दर्शन में मात्र मधुर वचनों की आड़ में वंचना का ही कार्य किया गया है। यह बात और है कि यदि चार्वाक की सुनें तो वह भी विभिन्न शास्त्रज्ञों को वंचक ही घोषित करता है।

एक ऐसे बृहस्पति का तैत्तरीय ब्राह्मण ग्रन्थ में वर्णन मिलता है जो गायत्री देवी के मस्तक पर आघात करता है गायत्री देवी को पद्म पुराण के अनुसार समस्त वेदों का मूल माना गया है। इस दृष्टि से यह बृहस्पति वेद का विरोधी माना जा सकता है। सम्भवत: वेद का विरोध प्रति पद करने के कारण इस बृहस्पति को चार्वाक दर्शन का प्रणेता भी माना जाना युक्तियुक्त होगा।

विष्णु पुराण में भी बृहस्पति का प्रसंग प्राप्त होता है। बृहस्पति की इस मान्यता के अनुसार वैदिक कर्मकाण्ड बहुवित्त के व्यय एवं प्रयास से साध्य हे। विविध सुख के साधक ये वैदिक उपाय कुछ अर्थ लोलुप स्वार्थ केन्द्रित धूर्तों का ही विधान है। तार्किक बृहस्पति का भी कहीं कहीं वर्णन मिलता है। ये बृहस्पति वेद के अनुगामी तो अवश्य हैं पर तर्कसम्मत अनुष्ठानों का ही समर्थन करते हैं। इनकी दृष्टि से तत्त्व निर्णय शास्त्र पर आधारित अवश्य होना चाहिए परन्तु यह शास्त्रीय अनुसन्धान तर्क पोषित होना नितान्त आवश्यक है। तर्क विरहित चिन्तन धर्म के निर्धारण में कभी भी सार्थक नहीं हो सकता है।

वात्स्यायन मुनि ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ कामसूत्र में अर्थशास्त्र के रचयिता के रूप में बृहस्पति का उल्लेख किया है। बृहस्पति द्वारा विरचित अर्थशास्त्र के एक सूत्र के अनुसार शास्त्र के रूप में मात्र लोकायत को ही मान्यता दी गयी है। फलत: अर्थशास्त्र के प्रणेता बृहस्पति एवं लोकायत शास्त्र के प्रवर्त्तक में अन्तर कर पाना अत्यन्त दुरूह कार्य है। कुछ समालोचकों ने अर्थशास्त्र के एवं लोकायत शास्त्र के निर्माता को अभिन्न मानने के साथ-साथ कामसूत्रों के प्रणेता भी बृहस्पति ही हैं, यह माना है। यदि लौकिक इच्छाओं को पूर्ण करना ही चार्वाक दर्शन का उद्देश्य है तो कामशास्त्र के प्रवर्त्तक मुनि वात्स्यायन ही बृहस्पति हैं, यह मानना उपयुक्त ही है।

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लोकायत दर्शन का सहज प्रतिपादन किया है। इस प्रकार अर्थशास्त्र के रचनाकार कौटिल्य एवं लोकायत दर्शन के प्रणेता बृहस्पति एक ही हैं ऐसा माना जा सकता है। कोषकार हेमचन्द्र के अनुसार अर्थशास्त्र, कामसूत्र, न्यायसूत्र-भाष्य, पंचतन्त्र एवं चाणक्य नीति के रचयिता एक ही है।

इतनी विवेचना के बाद जो बृहस्पति वैदिक वाङमय में विभिन्न प्रसंगों में चर्चित हैं उनके यथा क्रम नाम इस प्रकार स्पष्ट होते हैं।

लौक्य बृहस्पति

आंगिरस बृहस्पति

देवगुरु बृहस्पति

अर्थशास्त्र प्रवर्त्तक बृहस्पति

कामसूत्र प्रवर्त्तक बृहस्पति

वेदविनिन्दक बृहस्पति

तार्किक बृहस्पति।

पद्म पुराण के सन्दर्भ में अंगिरा ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। आंगिरस बृहस्पति अंगिरा के पुत्र एवं ब्रह्मा के पौत्र हैं। फलत: इनकी देवों में गणना होती है। इस प्रकार देव गुरु बृहस्पति एवं आंगिरस बृहस्पति में कोई भेद नहीं माना जा सकता। देवों की संरक्षा के लिए देवताओं के गुरु द्वारा असुरों को प्रदत्त उपदेश विभिन्न लोकों में आयत हो गया यह कथन देव गुरु बृहस्पति के सन्दर्भ में विश्वसनीय नहीं हो सकता। असुर अपने गुरु शुक्राचार्य के रहते देवगुरु के उपदेश को क्यों आदर देंगे? अत: देवगुरु से अतिरिक्त कोई चार्वाक दर्शन का प्रवर्त्तक होना अपेक्षित है।

कुछ समालोचकों ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि चार्वाक के गुरु बृहस्पति, स्वर्ग के स्वामी इन्द्र के आचार्य विश्वविख्यात बृहस्पति नहीं हैं। ये बृहस्पति किसी राजकुल के गुरु हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से देंखे तो वसिष्ठ, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य आदि का किसी राजकुल का गुरु होना इस मान्यता को आधार भी दे रहा है।

चार्वाक के सिद्धान्त

जिस प्रकार आस्तिक दर्शनों में शंकर दर्शन शिरोमणि के रूप में स्वीकृत है उसी प्रकार नास्तिक दर्शनों में सबसे उत्कृष्ट नास्तिक के रूप में शिरोमणि की तरह चार्वाक दर्शन की प्रतिष्ठा निर्विवाद है। नास्तिक शिरोमणि चार्वाक इसलिए भी माना जाता है कि वह विश्व में विश्वास के आधार पर किसी न किसी रूप में मान्य ईश्वर की अलौकिक सर्वमान्य सत्ता को सिरे से नकार देता है। इनके मतानुसार ईश्वर नाम की कोई वस्तु संसार में नहीं है। नास्तिक शिरोमणि चार्वाक जो कुछ बाहरी इन्द्रियों से दिखाई देता है अनुभूत होता है, उसी की सत्ता को स्वीकार करता है। यही कारण है कि चार्वाक के सिद्धान्त में प्रत्यक्ष प्रमाण को छोड़ कर कोई दूसरा प्रमाण नहीं माना गया है। जिस ईश्वर की कल्पना अन्य दर्शनों में की गई है उसकी सत्ता प्रत्यक्ष प्रमाण से सम्भव नहीं है। इनके मत से बीज से जो अंकुर का प्रादुर्भाव होता है उसमें ईश्वर की भूमिका को मानना अनावश्यक एवं उपहासास्पद ही है। अंकुर की उत्पत्ति तो मिट्टी एवं जल के संयोग से नितान्त स्वाभाविक एवं सहज प्रक्रिया से सर्वानुभव सिद्ध है। इस स्वभाविक कार्य को सम्पन्न करने के लिए किसी अदृष्ट कर्त्ता की स्वीकृति निरर्थक है।

ईश्वर को न मानने पर जीव सामान्य के शुभ एवं अशुभ कर्मों के फल की व्यवस्था कैसे सम्भव होगी? इस प्रश्न का समाधान करते हुए चार्वाक पूछता है कि किस कर्म फल की व्यवस्था अपेक्षित? संसार में दो प्रकार के कर्म देखे जाते हैं। एक लौकिक तथा दूसरा अलौकिक कर्म। क्या आप लौकिक कर्मों के फल की व्यवस्था के सम्बन्ध में चिन्तित हैं? यदि हाँ, तो यह चिन्ता अनावश्यक है। लौकिक कर्मों का फल विधान तो लोक में सर्व मान्य राजा या प्रशासक ही करता है। यह सर्वानुभव सिद्ध तथ्य, प्रत्यक्ष ही है। हम देखते हैं कि चौर्य कर्म आदि निषिद्ध कार्य करने वाले को उसके दुष्कर्म का समुचित फल, लोक सिद्ध राजा ही दण्ड के रूप में कारागार आदि में भेज कर देता है। इसी प्रकार किसी की प्राण रक्षा आदि शुभ कर्म करने वाले पुरुष को राजा ही पुरस्कार रूप में सुफल अर्थात धन धान्य एवं सम्मान से विभूषित कर देता है।

यदि आप अलौकिक कर्मों के फल की व्यवस्था के सन्दर्भ में सचिन्त हैं तो यह चिन्ता भी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि पारलौकिक फल की दृष्टि से विहित ये सभी यज्ञ, पूजा, पाठ तपस्या आदि वैदिक कर्म जन सामान्य को ठगने की दृष्टि से तथा अपनी आजीविका एवं उदर के भरण पोषण के लिए कुछ धूर्तों द्वारा कल्पित हुए हैं। वास्तव में अग्निहोत्र, तीन वेद, त्रिदण्ड का धारण तथा शरीर में जगह जगह भस्म का संलेप बुद्धि एवं पुरुषार्थ हीनता के ही परिचायक हैं। इन वैदिक कर्मों का फल आज तक किसी को भी दृष्टि गोचर नहीं हुआ है। यदि वैदिक कर्मों का कोई फल होता तो अवश्य किसी न किसी को इसका प्रत्यक्ष आज तक हुआ होता। अत: आज तक किसी को भी इन वैदिक या वर्णाश्रम-व्यवस्था से सम्बद्ध कर्मों का फल-स्वर्ग, मोक्ष, देवलोक गमन आदि प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं है अत: ये समस्त वैदिक कर्म निष्फल ही हैं, यह स्वत: युक्ति पूर्वक सिद्ध हो जाता है।

अदृष्ट एवं ईश्वर का निषेध

यहाँ यदि आस्तिक दर्शन यह कहे कि परलोक स्वर्ग आदि को सिद्ध करने वाला व्यापार अदृष्ट या धर्म एवं अधर्म है जिससे स्वर्ग की सिद्धि होती है तो यह चार्वाक को स्वीकार्य नहीं है। अलौकिक अदृष्ट का खण्डन करते हुए चार्वाक स्वर्ग आदि परलोक के साधन में अदृष्ट की भूमिका को निरस्त करता है तथा इस प्रकार आस्तिक दर्शन के मूल पर ही कुठाराघात कर देता है। यही कारण है कि अदृष्ट के आधार पर सिद्ध होने वाले स्वर्ग आदि परलोक के निरसन के साथ ही इस अदृष्ट के नियामक या व्यवस्थापक के रूप में ईश्वर का भी निरास चार्वाक मत में अनायास ही हो जाता है।

जीव एवं चैतन्य की अवधारणा

चार्वाक मत में कोई जीव शरीर से भिन्न नहीं है। शरीर ही जीव या आत्मा है। फलत: शरीर का विनाश जब मृत्यु के उपरान्त दाह संस्कार होने के बाद हो जाता है तब जीव या जीवात्मा भी विनष्ट हो जाता है। शरीर में जो चार या पाँच महाभूतों का समवधान है, यह समवधान ही चैतन्य का कारण है। यह जीव मृत्यु के अनन्तर परलोक जाता है यह मान्यता भी, शरीर को ही चेतन या आत्मा स्वीकार करने से निराधार ही सिद्ध होती है। शास्त्रों में परिभाषित मोक्ष रूप परम पुरुषार्थ भी चार्वाक नहीं स्वीकार करता है। चेतन शरीर का नाश ही इस मत में मोक्ष है। धर्म एवं अधर्म के न होने से चार्वाक सिद्धान्त में धर्म-अधर्म या पुण्य-पाप को, कोई अदृश्य स्वर्ग एवं नरक आदि फल भी नहीं है यह अनायास ही सिद्ध हो जाता है।


शरीरात्मवाद में स्मरण का उपपादन

चार्वाक मत में शरीर को ही आत्मा मान लेने पर बाल्यावस्था में अनुभूत कन्दुक क्रीडा आदि का वृद्धावस्था या युवावस्था में स्मरण कैसे होता है? यह एक ज्वलन्त प्रश्न सहज ही उठ खड़ा होता है। यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि बाल्यावस्था का शरीर, वृद्धावस्था का शरीर एवं युवावस्था का शरीर एक ही है। यदि तीनों अवस्थाओं का शरीर एक ही होता तो इन तीनों अवस्थाओं के शरीरों में इतना बड़ा अन्तर नहीं होता। अन्तर से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि शरीर के अवयव जो मांस पिण्ड आदि हैं इनमें वृद्धि एवं ह्रास होता है। तथा इन ह्रास एवं वृद्धि के कारण ही बाल्यावस्था के शरीर का नाश एवं युवावस्था के शरीर की उत्पत्ति होती है यह भी सिद्ध होता है। यदि यह कहें कि युवावस्था के शरीर में यह वही शरीर है, यह व्यवहार होने के कारण शरीर को एक मान कर उपर्युक्त स्मरण को उत्पन्न किया जा सकता है, तो यह कथन भी युक्तियुक्त नहीं हो सकता। क्योंकि यह वही शरीर है यह प्रत्यभिज्ञान तो स्वरूप एवं आकृति की समानता के कारण होता है। फलत: दोनों अवस्थाओं के शरीरों को अभिन्न नहीं माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में पूर्व दर्शित बाल्य-काल के स्मरण को सम्पन्न करने के लिए चार्वाक बाल्यकाल के शरीर में उत्पन्न क्रीड़ा से जन्य संस्कार दूसरे युवा-काल के शरीर में अपने जैसे ही नये संस्कार पैदा कर देते हैं। इसी प्रकार युवावस्था के शरीर में विद्यमान संस्कार वृद्धावस्था के शरीर में अपने जैसे संस्कार उत्पन्न कर देते हैं। एतावता इन बाल्यावस्था के संस्कारों के उद्बोधन से चार्वाक मत में स्मरण बिना किसी बाधा के हो जाता है। अन्तत: चार्वाक दर्शन में शरीर ही आत्मा है यह सहज ही सिद्ध होता है।

यदि शरीर ही आत्मा है तो चार्वाक से यह पूछा जा सकता है कि 'मम शरीरम्' यह मेरा शरीर है, ऐसा लोकसिद्ध जो व्यवहार है वह कैसे उत्पन्न होगा? इस व्यवहार से तो यह प्रतीत हो रहा है कि शरीर अलग है एवं शरीर का स्वामी कोई और है, जो शरीर से भिन्न आत्मा ही है। इस प्रश्न का समाधान करते हुए चार्वाक कहता है कि जैसे दानव विशेष के सिर को ही राहू कहा गया है, फिर भी जन-सामान्य 'राहू का सिर' यह व्यवहार बड़े ही सहज रूप में करता है, उसी प्रकार शरीर के ही आत्मा होने पर भी 'मेरा शरीर' यह लोकसिद्ध व्यवहार उपपन्न हो जायेगा। चार्वाकों में कुछ चार्वाक इन्द्रियों को ही आत्मा मानने पर इन्द्रिय के नष्ट होने पर स्मरण की आपत्ति का निरास नहीं हो पाता है। किन्हीं चार्वाकों ने प्राण एवं मन को भी आत्मा के रूप में माना है। शरीर ही आत्मा है यह सिद्ध करने के लिए चार्वाक इस वेद के सन्दर्भ को भी आस्तिकों के सन्तोष के लिए प्रस्तुत करता है। इस वेद वचन का तात्पर्य है कि 'विज्ञान से युक्त आत्मा इन भूतों से उत्पन्न हो कर अन्त में इन भूतों में ही विलीन हो जाता है। यह भूतों में शरीर स्वरूप आत्मा का विलय ही मृत्यु है।'

भारतीय दर्शन के इतिहास में भौतिकवाद और आदर्शवाद की दो परस्पर विरोधी धाराएँ एकसाथ चलीं हैं । दार्शनिक एक के बाद एक आते गए , लेकिन उन्होंने किसी नए मत का प्रतिपादन न करके सिर्फ किसी प्राचीन दार्शनिक संप्रदाय से सहमति जताते हुए उसे बल प्रदानकिया। उन्होंने स्वयंकिसी नए संप्रदाय की नीव न रखकर ऐसा लिखा की यह पहले से वर्णितऔर यहाँ सिर्फ इसका विस्तार अथवा खुलासा किया जा रहा है अर्थात मेरा कोई स्वतंत्रअस्तित्व है, ऐसा दावा किसी भी दार्शनिक द्वारा नही किया गया। उन्होंने अपने मत के संरक्षणके लिए उसे पोषित किया और विरोधी मत की आलोचना की. आज के कई आधुनिक विद्वानप्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विवरण के लिए माधवाचार्य के सर्वदर्शन संग्रह पर आश्रित है. हम इस आलेख में यह जानने का प्रयास करेंगे की क्या इस ग्रन्थ को आधार बनाकर हमें किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए? माधवाचार्य या माधव विद्यारण्य, विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक राजाओं के संरक्षक एवंदार्शनिक थे। उन्होने सर्वदर्शनसंग्रह की रचना की जो हिन्दुओं के दार्शनिक सम्प्रदायों के दर्शनोंका संग्रह है। इसके अलावा उन्होने अद्वैत दर्शन के 'पंचदशी' नामक ग्रन्थ की रचना भी की। उनका जन्म सन् १२६८ में पम्पाक्षेत्र (वर्तमान हम्पी) में मायणाचार्य एवं श्रीमतीदेवी के यहाँ हुआ था। माधवाचार्य विद्यारण्य नेलोकायत को सबसे निम्न कोटि का दर्शन बताया है और अद्वैत वेदान्त को सबसे उत्कृष्ट। हमारे प्राचीन दार्शनिकों ने लोकदर्शन और भौतिकवादी दर्शन जिसे लोकायत कहा जाता है, के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया वह है "चावार्क" या "बर्हस्पत्य" दर्शन। दार्शनिक माध्वाचार्य विद्यारण्य द्वारा लिखित भारतीय दर्शन के सारग्रन्थ सर्वदर्शन सग्रंह मे लिखे लोकायत के विवरणपर एक नजर डालने पर भौतिकवादियों के प्रति उनकी घृणा का हम स्पष्ट अवलोकन कर सकते हैं।


भौतिकवाद के विरोधियों ने जिन युक्तिओं से संदेहवादी और भौतिकवादी दर्शनों को भाववाद में प्रक्षिप्त करने का काम किया है, उनमें से एक यह भी है कि उसके सत्यापन के लिए वे यह तर्क देते हैं कि सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्य का साक्षात्कार शनै: शनै: ही करना उचित होता है इसलिए कई भाववादियों ने अपने ग्रंथों में दर्शन का विवरण भौतिकवाद के सिद्धांत से प्रारंभ करके अंततः तथा कथित "सर्वोंच्च आध्यात्मिक सत्य" तक पहुँचाने का मार्ग अपनाया है । यह एक चतुराई पूर्ण युक्ति है, जिससे की प्रतिपक्षी का तिरिस्कार करके उन्हें उपहास का पात्र बनाया जा सके। इसके पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि जिस दार्शनिक संप्रदाय का प्रतिनिधित्व लेखक कर रहा है उसे छोड़ कर शेष दार्शनिक मान्यताएं एक श्रृंखला के रूप में हैं, जिनमे पहली कड़ी से अधिक उच्च कोटि की अध्यात्मिक व्याख्या दूसरी कड़ी में उपस्थित है ।इसी प्रकार क्रमशः जो दर्शन अंत में है, वह सर्वोच्च है, शेष सब उस तक पहुचने के मार्ग भर है। माधवाचार्य के सर्वदर्शन संग्रह में भी यही युक्ति देखने को मिलती है उन्होंने वेदान्त को सबसे अंतिम में रखा है। कई आधुनिक विद्वान लोकायत मत के विवरण के लिए माधवाचार्य पर आश्रित रहे हैं। माधवाचार्य की लोकायत के प्रति मंसूबों में ईमानदारी है, इस तथ्य को मिथ्या साबित करनेके लिए हमारे पास कई प्रमाण हैं।

माधवाचार्य और लोकायत मत के मूल काल में करीब दो हजार वर्षों का अंतर है। प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथो कूटदंत सुत्त और ब्रह्मजाल सुत्त जैसे ग्रंथों में लोकायत मत का विवरण है, जिसमे शरीर और आत्मा को एक ही माना गया है, और इस मत का चलन बुद्ध के काल के पूर्व भी था। दूसरा जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है, माधवाचार्य विजय नगर के संस्थापकों के संरक्षक थे । यह समझा जाता है कि साम्राज्य स्थापित करने के लिए उन्होंने मध्य युग के एक मठ से धन प्राप्त किया था । अतः उनकी सहानूभूति का रुख शासक वर्ग के दर्शन अथवा वेदान्त के प्रति होना स्वाभाविक सा प्रतीत होता है।


माधवाचार्य ने अपने विरोधियों के प्रति जिस तर्क शैली का परिचय दिया है, वह विचित्र है । वेखुद को अपने विरोधियों का समर्थक बताते हुए उनकी तरफ से तर्क प्रस्तुत करते थे जबकि स्वयं उनके विचार भिन्न थे। इस प्रकार की शैली के कारण ही माधवाचार्य ने यह उल्लेख नहींकिया कि लोकायत मतानुयायी क्या तर्क प्रस्तुत करते हैं । वे इस बात में उलझे रहे की अगरवे लोकायतिक होते तो क्या कहते। उन्होंने वेदांती तर्क शैली को लोकयातिकों पर थोपा औरअपने इच्छानुसार निष्कर्ष निकाल लाये। उदहारण के लिए एक प्रसंग का उल्लेख करना उचितहोगा - स्वयं माधवाचार्य ने यह स्वीकार किया है कि लोकयातिओं ने "श्रुति" को पाखंडियों कीकपट रचना बताया है। आगे वे फिर कहते हैं की लोकयातिओं ने अपने विचारों के समर्थन केलिए उपनिषद का उद्धरण दिया। यह दोनों बातें परस्पर विरोधाभास लिए हुए हैं। यह नितांत हीकल्पनामूलक बात है कि किसी मत का विरोध करने वाला उस मत में प्रयुक्त युक्तिओं का सहारा अपने कार्य के लिए लेगा।

माधवाचार्य के आभामंडल से परे जाकर जब हम अन्य ग्रंथों वर्णित लोकायत मत पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो कई बातें सामने आती है। उदाहरण के लिए शुक्र नीति सार में स्पस्ट लिखा है की नास्तिकों (लोकयातिओं ) के तर्क बहुत प्रबल हुआ करते थे और उनका रचनात्मक पक्ष भी था। नास्तिकों की मान्यता "सर्व स्वाभाविक मत " अर्थात ऐसा सिद्धांत जिसके अनुसार सब कुछ प्राकृतिक नियमों के अधीन है, एक प्रकार की रचनात्मकता लिए हुए है न कि जैसा विवरण माधवाचार्य ने दिया है, वैसा विध्वंसकारी। इसके अलावा कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में सांख्य और योग के साथ लोकायत का उल्लेख किया और इसे तर्क का विज्ञान अथवा आन्वीक्षिकी कहा। मिलिंद में कहानी के नायक नागसेन को लोकायत का ज्ञान प्राप्त है। हर्षचरित (कवेल और थामस द्वारा अनुदित) में जिसमे उपनिषद के अनुयायियों औरलोकयातिओं को एक साथ संबोधित किया गया है। लोकयातियों को जिन विद्वानों के समकक्ष रखा गया है, उनमे उपनिषद के अनुयायिओं का होना यह प्रमाणित करता है कि विद्वजनो के मध्य लोकायत मत को वेदान्त दर्शन की तरह ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी। इसी प्रकार एक अन्य पुस्तक विनय पिटक के चुल्लवग्ग में एक दृष्टान्त है, जिसमे किसी महात्मा द्वारा भिक्षुओं कोलोकायत प्रणाली का अध्ययन करने से रोकने के लिए निर्देश दिए जा रहे

हैं । यहाँ एक तथ्य ध्यातव्य है कि उन्होंने निम्न कोटि की अन्य विद्याओं के साथ बलि देने कोभी रखा है। जो यह प्रमाणित करता है कि उपनिषद के अनुयायिओं को लोकयातिओं केसमकक्ष रखा जाता था। यह माधवाचार्य द्वारा वर्णित विध्वंसकारी वितंडावादिओं के चित्र से तोकदापि मेल नही खाता।

उपरोक्त कई कारणों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि माधवाचार्य द्वारा वर्णित लोकायत का विवरण प्रमाणिक नही है। माधवाचार्य लोकयातिओं को विध्वंसकारी बता रहे थे, वह तो कपोल कल्पित था ही, असल में उनका दृष्टिकोण स्वयं ही तर्क विज्ञान के प्रति विध्वंसकारी था। वे राजनितिक कारणों से ईश्वर, परलोक आदि की मान्यता को स्थापित करने के लिए बाध्य थे और उन्होंने यह बेहतर तरीके से किया भी है। हमथोडा ध्यान दें तो जान सकते हैं कि उस काल में जब शासक वर्ग को जनता को नियत्रण मेंरखने के उद्धेश्य से पौराणिक कथाओं और अन्धविश्वास का सृजन करना पड़ रहा था, माधवाचार्य इन सब से कैसे अछूते रहते, वह भी एक राज्य के राजा के संरक्षक के रूप में । यहाँ गौर तलब हो की लगभग सभी धर्मों में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधिबताया गया है और उससे विद्रोह को पाप। प्राचीन भौतिकवाद के समृद्ध इतिहास को जाननेका प्रयत्न किसी वेदांत दार्शनिक के ग्रन्थ के आधार पर करते वक्त, किसी निष्कर्ष पर पहुँचनेसे पहले इन दो विचारधाराओं के मध्य हुए संघर्ष का स्मरण रखना चाहिए।


आजीवक दर्शन


आजीविक एक प्राचीन भारतीय सम्प्रदाय था। 'आजिविक' शब्द के अर्थ के विषय में विद्वानों में विवाद रहा हैं किंतु "आजीविक" के विषय में विचार रखनेवाले श्रमणों के वर्ग को यह अर्थ विशेष मान्य रहा है। वैदिक मान्यताओं के विरोध में जिन अनेक श्रमण संप्रदायों का उत्थान बुद्ध पूर्वकाल में हुआ उनमें आजीविक संप्रदाय भी था। इस संप्रदाय का साहित्य उपलब्ध नहीं है, किंतु बौद्ध और जैन साहित्य तथा शिलालेखों के आधार पर ही इस संप्रदाय का इतिहास जाना जा सकता है।

बुद्ध और महावीर के प्रबल विरोधियों के रूप में आजीविकों के तीर्थकर मक्खली गोसाल (मस्करी गोशल) का उल्लेख जैन-बौद्ध-शास्त्रों में मिलता है। यह भी उन शास्त्रों से ही ज्ञान होता है कि उस समय आजीविकों का संप्रदाय प्रतिष्ठित और समादृत था। गोसाल अपने को चौबीसवां तीर्थंकर कहते थे। इस जन उल्लेख को प्रमाण न भी माना जाए तब भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि गोसाल से पहले भी यह संप्रदाय प्रचलित रहा। गोसाल से पहले के कई आजीविकों का उल्लेख मिलता है। शिलालेखों और अन्य आधारों से यह सिद्ध है कि यह संप्रदाय समग्र भारत में प्रचलित रहा और अंत में मध्यकाल में इस संप्रदाय ने अपना पार्थक्य खो दिया। आजीविक श्रमण नग्न रहते और परिव्राजकों की तरह घूमते थे। भिक्षाचर्या द्वारा जीविका चलाते थे। ईश्वर या कर्म में उनका विश्वास नहीं था। किंतु वे नियतिवादी थे। पुरूषार्थ, पराक्रम वीर्य से नहीं, किंतु नियति से ही जीव की शुद्धि या अशुद्धि होती है। संसारचक्र नियत है, वह अपने क्रम में ही पूरा होता है और मुक्तिलाभ करता है। आश्चर्य तो यह है कि आजीविकों का दार्शनिक सिद्धांत ऐसा होते हुए भी आजीविक श्रमण तपस्या आदि करते थे औ जीवन में कष्ट उठाते थे।

आजीवक ईशा से पांच शताब्दी पूर्व मख्खाली गोशाल द्वारा स्थापित नास्तिकवाद का दर्शन या संप्रदाय था, जिसके विचारक या अनुन्यक आज भी बहुत कम संख्या में दक्षिण भारत में पाए जाते हैं. जैन एवं बुद्ध दर्शन के प्रबल विरोधी के रूप में यह भी श्रमण आन्दोलन का हिस्सा था. इनके मत के मतावलम्बी में सम्राट बिन्दुसार एवं कुछ कुछ महान अशोक भी थे.


इनके सिद्धांतों में मुख्य थे


  • अजिविका विद्यालय अपने नियति सिद्ध सिद्धान्त के सिद्धांतों के लिए जाना जाता है, इनके अनुसार कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है, जो कुछ भी हुआ है, हो रहा है और हो जाएगा पूरी तरह से पूर्व निर्धारित है और ब्रह्मांडीय सिद्धांतों का एक कार्य है। आजीवक ने कर्म सिद्धांत को एक भ्रम के रूप में माना है |


  • अन्य समूहों का मानना है कि एक व्यक्ति आत्मा के पारगमन के दौरान अपनी दैहिक यात्रा को बेहतर कर सकता है, अजिविका ने अनुमान लगाया है कि पूरे ब्रह्मांड के मामलों को न्यति (नियति) नामक एक ब्रह्मांड बल द्वारा क्रमबद्ध किया गया था, जिसमें सभी घटनाओं को निर्धारित किया गया था एक व्यक्ति का भाग्य, आखिरी विवरण के लिए और जिसने किसी की आध्यात्मिक नियति को बदलने या बदलने के लिए व्यक्तिगत प्रयासों पर रोक लगा दी। मानव अवस्था के इस स्थैतिक और उदास दृश्य के परिणामस्वरूप, अजीविका ने किसी भी उद्देश्यपूर्ण लक्ष्य को आगे बढ़ाने की बजाय तपस्या का अभ्यास किया।


  • अन्य मत जहां मानते हैं कि व्यक्ति अपनी आत्मा के पारगमन के दौरान बहुत कुछ अच्छा कर सकता है, अजीविक मानते हैं कि ब्रह्माण्ड का चराचर एवं ब्रह्मांडीय बल का हर घटना क्रम नियति के चक्र से चलता है, यहाँ तक की व्यक्ति का अपना भाग्य भी. अंत में जिसने भी किसी की आध्यात्मिक नियति को बदलने या सुधार करने के लिए निजी प्रयासों को बाधित किया, मानव अवस्था के इस स्थैतिक और उदास दृश्य के परिणामस्वरूप, अजीविक ने किसी भी उद्देश्यपूर्ण लक्ष्य को आगे बढ़ाने की बजाय तपस्या का अभ्यास उत्तम मार्ग बतलाया.


  • आजीवक तत्वमीमांसा में, वैश्यशिका मत के समान, परमाणुओं का एक सिद्धांत शामिल था, जहां परमाणुओं से सब कुछ बना हुआ था, परमाणुओं के गुणों से उभरा हुआ गुण, लेकिन इन परमाणुओं के एकत्रीकरण और प्रकृति को वैश्विक बलों द्वारा पूर्व निर्धारित किया गया था।


  • अजिविक नास्तिक थे और उन्होंने वेदों के अधिकार को खारिज कर दिया था, लेकिन उनका मानना था कि हर जीवित जीवन में एक आत्मा है - हिंदू धर्म और जैन धर्म का यह एक केंद्रीय आधार है जो वे स्वीकारते थे ।


  • 4वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास मौर्य सम्राट बिंदुसार के शासन के दौरान अजविका अपनी लोकप्रियता की ऊंचाई पर पहुंच गया। उसके बाद दर्शन के इस विद्यालय को नकार दिया गया, लेकिन दक्षिणी भारतीय राज्यों कर्नाटक और तमिलनाडु में 14 वीं शताब्दी के माध्यम से लगभग 2,000 वर्षों तक यह दर्शन जीवित रहा।


  • अजिविका दर्शन, चार्वाक दर्शन के साथ, प्राचीन भारतीय समाज के योद्धा, औद्योगिक और व्यापारिक वर्गों के लिए सबसे ज्यादा माननीय था.


भगवती सूत्र में दिए गए आजीवक सिद्धांत का जैन संस्करण, दो मैग्गास के अलावा, इनमे में आठ गुणा महानमित्र शामिल हैं, जो स्पष्ट रूप से दुनिया के मान्यता और विचार पर उनके महत्व को दर्शाते हैं। यह फिर से आजीवक विश्वास के चार प्रमुख तत्वों में स्पष्ट है। चार भौतिक तत्वों में गुणधर्म गुण और प्रवृत्तियां थीं: पृथ्वी (नीचे की प्रवृत्ति के साथ कठोर), जल (एक समान प्रवृत्ति के साथ ठंडा), आग (जलता है, ऊपर की तरफ बढ़ जाती है) , हवा (एक क्षैतिज दिशा में गति) इन तत्वों और जीवन के परमाणु (भौतिक तत्वों से भिन्न) हवा या वायु द्वारा एक साथ आयोजित किए गए थे, वे 'अनन्त क्रिया' (सबसे शायद नियाती के लिए एक पर्याय) द्वारा एकजुट थे। ये सिद्धांत, एक ईश्वरवादी सोच के साथ, विकसित किये गए, मौर्य वंश के अंत के बाद द्रविड़, दक्षिण, मगध से धीरे धीरे आजीवक लुप्त होता गया.

यद्यपि माधवचार्य अपने सर्वदर्शनसंग्रह में चर्वार्क के साथ सोलह दर्शनों का का अध्ययन किया है, - जो स्कूल अपने विश्वासों से ग्रस्त है –वे 'नास्तिकों के शिखर रत्न' को आक्रामक रूप से आक्रामक बतलाते हैं, खुद में एक विश्वास के साथ, इनको विनोदी, निर्धारित, धार्मिक और दार्शनिक धोखाधड़ी की अवमानना सीधी और भौतिकवादी उन्हें संदेहवादी, अनुभववादी, सकारात्मकवादी और व्यावहारिक रूप में संदर्भित किया है अजिविका के बारे में लिखा है - विरोधी और समर्थक दोनों को सावधानी से विचार किया जाना चाहिए इस मत एवं दर्शन के बारे में.

हालांकि मुझे केवल कुछ इंटरनेट संदर्भों को उन परमाणु सिद्धांतों से जोड़ने के लिए मिल गया है, मैं उन्हें भौतिकवादी मानता हूं, जो कुछ दुसरे विश्व में भौतिकवाद पनप रहा है या है उसे मैं ख़ारिज करता हूँ,

जैसा कि द्वैता वेदांतवादी माधवचार्य (1238-1317 सीई) ने लिखा था: 'चार्वार्क के प्रयासों को वास्तव में समाप्त करना मुश्किल है, जो जटिल धार्मिक व्यवस्थाएं विकसित हो चुकी हैं उसमे कुछ भी बेहतर होना संभव नही लगता, शुद्ध नतीजों और नफरत के परिणामों की तुलना या सहानुभूति पर दार्शनिक और आध्यात्मिक चिंता का फोकस किया जाय तो पाएंगे की, विश्वास/आस्था की दो प्रणालियों का हर निशान, आज भी मौजूद हैं जो दो हजार वर्षों से चली आ रही हैं.”

अजीविकास और कार्वाक या लोकायत की ओर इस घृणा का मुख्य कारण था पूर्व के निर्धारकवाद और विशेष रूप से उत्तरार्द्ध का भौतिकवाद। भौतिकवाद का विषय उठाने में कोई एक विषय पर चर्चा नहीं कर रहा है जो अब समीक्षाधीन अवधि में भारत में था। पंद्रहवीं शताब्दी के रचनात्मक पित्त, चार्वाक के बारे में जैन गुररत्ना, Rhys Davids के शब्द अधिक गूंजते है, जिन्होंने तर्क दिया था कि 'लोकायत' और 'लोकायतिका' ऐसे खूंटे थे जिन पर कुछ लेखकों ने अपने विरोधियों को जिम्मेदार ठहराया था, घबराहट का द्योतक यह वाक्य कि ऐसा दर्शन शायद ही अस्तित्व में है, जैसे यूरोपीय पदार्थवादियों का दर्शन|

'भौतिकवाद' की मेरी परिभाषा सरल है - यह धारणा है कि जो चेतना और विचार से स्वतंत्र है - प्राथमिक है और यह चेतना और विचार भौतिवाद के लिए माध्यमिक और व्युत्पन्न है। दुनिया सबसे पहले यह आती है और हम स्वतंत्र रूप से मौजूद है। हम इसे उत्पाद के रूप में हमारी चेतना में प्रतिबिंबित करते हैं और सोचा करते हैं। भारत में भौतिकवादियों ने दर्शनशास्त्र की एक प्रणाली को स्थापित करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि केवल अन्य स्कूलों के मूर्खतावाद को खारिज करने के लिए साक्ष्य दिया है|

बाशम ने लिखा है कि आजीवक में न केवल पवित्र ग्रंथों का एक सिद्धांत है जिसमें उनके सिद्धांतों को संहिताबद्ध किया गया था, उनके पास विश्वास की पूरी तरह विकसित प्रणाली थी और उनके स्वयं के दार्शनिकि तर्कसंगत थी । उनकी मान्यताओं के मूल में नियति थी - जिसकी सार्वभौमिकता सभी घटनाओं और कार्यों को नियंत्रित करती थी और जिसने प्रयास को व्यर्थ बना दिया था। अजिविक ब्रह्माण्ड में जिस समय में अनंत था, वह परिमित सामग्री थी, अत्यधिक जटिल, आज्ञाकारी और भौतिक और भीतर जिसमें (स्ट्रिंग अन्व्रेलिंगिंग की एक गेंद की तरह) और कर्म (जो गोसाला के लिए प्रभावी ढंग से नियति द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था और बिना नैतिक बल) कार्य किया गया था। मौका (संगीता), प्रकृति (भव) और कार्यनीति नियति-नियाती के भ्रामक संशोधनों के माध्यम से प्रकट हुई थी उन्हें। अजिविक निर्वाण ने पूरी तरह से दुनिया को पार नहीं किया। बासम ने लिखा है कि अणुवीर पख्त कक्कायना और अमावसिक पुराण कस्पा, अजिविका के संस्थापकों में गोसाल के साथ थे और जब मिलिंद पान्ह में राजा ने पुराण को 'दुनिया को कौन शासन करता है ' पूछा तो उन्होंने कहा, 'पृथ्वी दुनिया पर शासन करती है'

उन्होंने यह मान लिया था कि दुनिया और इसमें सभी वास्तविक हैं, कि सब कुछ चार तत्वों - पृथ्वी, वायु, अग्नि और पानी से बना है; कि जैसे कुछ तत्वों के मिश्रण से शराब बना दिया जाता है, सब कुछ उन चारों से गठित होता है, जैसा कि शरीर की खुफिया जानकारी है जब तत्व अलग होते हैं, तो शरीर मर जाता है और खुफिया इसके साथ समाप्त होता है - हमारा केवल 'मुक्ति' मृत्यु के बाद हमारे शरीर का विघटन होता है। 'आत्मा' या 'स्वयं' केवल शरीर हैं उनउनका कहना था कि चेतना एक भौतिक निर्माण है और यह चेतना, सनसनी और धारणा शरीर पर निर्भर हैं, दोनों बिल्कुल तार्किक और शरीर और दुनिया के बीच के संबंध को समझने में बेहद परिष्कृत हैं।

चर्वार्क के लिए मूल सिद्धांत स्वभाव (स्वभाव) है। इसमें चार तत्व हैं जो अपने सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करते हैं, संयोजन करते हैं और घुलनशील होते हैं।

आग गर्म है, पानी ठंडा है,

सुबह की हवा ताज़ा है;

किसके द्वारा ये विविधता मिली?

वे अपनी प्रकृति से पैदा हुए थे


स्वभाववादी ब्रह्मांड में इससे अधिक उद्देश्य के अस्तित्व से इनकार करते हैं, लेकिन मनुष्य के हिस्से में जानबूझकर गतिविधि का विरोध नहीं करते| जैसा कि समंनफला सुता में नायक ने एक बेघर जीवन के फल की मांग की, चार्वाक ने तपस्या की निंदा की और तर्क दिया कि इस जीवन में पाए जाने वाले फलों में यह झूठ है कि हम इसे कैसे जीते हैं - भौतिक दुनिया के लिए हमारी सोच के साथ और सर्वोत्तम काम करने के लिए खुद के लिए और जीवन को पूर्ण करने के लिए मात्र जीवित हैं ।

मुझे दृढ़ता से संदेह है कि उनके विरोधियों द्वारा दोहराया प्रयासों का तर्क है कि चार्वाक को अस्वीकृत अस्वीकृत एवं अस्वीकार कर दिया गया, एक और विरूपण के निष्कर्ष के खिलाफ उनकी आपत्तियों को दिखाने के लिए कि निश्चितता नहीं (सत्य), लेकिन केवल एक व्यावहारिक संभावना (सच्चाई) की स्थापना की गयी| चार्वाक एवं आजीवक के निष्कर्ष पर मौलिक आपत्ति थी कि इसका इस्तेमाल भाग्य, आत्मा, एक और दुनिया और भगवान के अस्तित्व को स्थापित करने के लिए किया जाता है, कि उनकी आपत्ति एक उपकरण के रूप में तर्क नहीं करती थी। इसी तरह उनकी गवाही को अस्वीकार करना गवाही के संबंध में था, जो कि अनपेक्षित, विशेषकर धार्मिक रूप से संबंधित है फिर भी उनके विरोधियों के तर्कों के उत्तर तथा अनुमानों और गवाहीयों ने हर्वाक एवं आजीवक को जिम्मेदार ठहराया जिन अवधारणाओं के अक्सर महत्वपूर्ण अन्वेषण होने चाहिए.

थरवडा बौद्ध धर्म - द बिन्टी ऑफ व्यू, फुलर ने अपनी पुस्तक द द थिअंस ऑफ दिथथी में विभिन्न विचारों का एक खाता दिया है, जो चार प्राथमिक बौद्ध निकयेस में गलत-विचार हैं। वह लिखते हैं कि बौद्ध धर्म के लिए, हमारे कार्यों के परिणाम उत्पन्न होते हैं - 'विनाशवाद' का दृष्टिकोण (लोकयात / चर्वार्कों को जिम्मेदार ठहराया जाता है) कभी-कभी अनुलग्नक को समझाने के लिए किया जाता है (कामुकता को देखने के लिए, उपदेशों और प्रतिज्ञा करने और स्वयं के सिद्धांत के लिए) । 'उन कार्यों से इनकार करने के लिए परिणाम हैं ... एक निश्चित तरीके से, लालच, नफरत और भ्रम की अभिव्यक्ति।' उन्होंने लिखा है कि के एन जयंतीले का मानना है कि 'निहिलवाद' इस धारणा पर आधारित है कि अकेले धारणा केवल एक ही वैध साधन है। ज्ञान के और यह है कि जब से ऐसा है, 'उच्च धारणा' से इनकार किया है। चूंकि, 'निहिलिस्ट' के अनुसार, व्यक्ति को 'चार महान तत्वों' से बना है, कोई आत्म और नैतिकता के मूल्य नहीं हैं। उन्होंने टीसीसी का हवाला देते हुए कहा है कि 'निहिलवाद' के दृष्टिकोण का जरूरी भाग है 'कोई फल या अच्छे और बुरे कार्यों का नतीजा' वाक्यांश, और यह वास्तव में भारतीय भौतिकवाद का केंद्रीय विचार है 'निहिलवाद' का दृष्टिकोण परिवर्तन की संभावना से इनकार करता है और यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जो कार्रवाई की एक हानिकारक तरीके से पैदा करता है और यह गलत है।

अजिविक धार्मिक साधु थे, चार्वाक/लोकायत भौतिकवादवादी थे, ग्रीक एपिकुरेन्स के समान थे। दोनों बौद्धों (बौद्ध और जैन के रूप में) महान बौद्धिक उग्र के समय पैदा हुए थे। यद्यपि नियति की अजीविक सिद्धांत दक्षिणी अजीविक द्वारा 'अपरिवर्तनीय स्थायित्व' के एक परममेणियन की तरह की धारणा में विकसित किया गया था और उन यथार्थवादी तत्वों के साथ शामिल किया गया था, जो जैन धर्म में उनके अंतिम अवशोषण की सुविधा प्रदान करते थे, न्याति अपने निष्कर्ष पर रत लेते थे - आदेश की मान्यता ब्रह्मांड में। बाशम ने लिखा है कि ऐसा करके, गोसाला ने उन्नीसवीं शताब्दी के भौतिक विज्ञानी के बारे में दुनिया के दो हज़ार सालों से अनुमान जताया है। अजिविका सिद्धांत और चार प्राथमिक तत्वों में उनका विश्वास एक भौतिक ब्रह्मांड की अपनी मान्यता को दर्शाता है। उन ब्रह्मांड में परमाणु पर थ्योरीइंग शानदार था, लेकिन वे अभी भी एक धर्म थे - एक ऐसा संप्रदाय जिसके लिए धरती पर ब्रह्मांडीय बल के रूप में ग्रहण करते थे। सभी मतों में ये सब अद्वितीय थे।


“यदि स्वर्ग में प्राणियों की कृपा हमारी श्रद्धा से होती है, फिर क्यों खड़े हैं उन लोगों के लिए, भोजन नीचे न दें

सबसे उपरी मंजिल पर दे ? पृथ्वी, हवा, आग और पानी मूल सिद्धांत हैं अकेले ही, जब शरीर में परिवर्तित हो जाता है, बुद्धि का उत्पादन होता है। जब ये नष्ट हो जाते हैं, तो विद्वत्ता भी समाप्त हो जाती है।“

नाथ सम्प्रदाय


हिन्दुओं के मुख्‍यत: चार संप्रदाय है:- वैदिक, वैष्णव, शैव और स्मार्त। शैव संप्रदाय के अंतर्गत ही शाक्त, नाथ और संत संप्रदाय आते हैं। उन्हीं में दसनामी और 12 गोरखपंथी संप्रदाय शामिल है। जिस तरह शैव के कई उप संप्रदाय है उसी तरह वैष्णव और अन्य के भी। आयए जानते हैं कि किस तरह नाथ संप्रदाय की उत्पत्ति हुई।

प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने पहली बार व्यवस्था दी। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। गुरु और शिष्य को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रूप में जाना जाता है। आठवी सदी में 84 सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के महायान के वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे। सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे। उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चौरासी मानी गई है।

नौ नाथ गुरु :

  1. मच्छेंद्रनाथ2. गोरखनाथ 3.जालंधरनाथ 4.नागेश नाथ 5.भारती नाथ 6.चर्पटी नाथ 7.कनीफ नाथ 8.गेहनी नाथ 9.रेवन नाथ।

इसके अलावा ये भी हैं:

  1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3. गोरखनाथ 4.खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ 8.बिरुपक्षनाथ 9.भर्तृहरि नाथ 10.अईनाथ 11.खेरची नाथ 12.रामचंद्रनाथ।

ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ। सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ, दादाधूनी वाले, गजानन महाराज, गोगा नाथ, पंढरीनाथ और साईं बाब को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। उल्लेखनीय है कि भगवान दत्तात्रेय को वैष्णव और शैव दोनों ही संप्रदाय का माना जाता है, क्योंकि उनकी भी नाथों में गणना की जाती है। भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं।

परिव्राजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं।

इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर 'आदेश' या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतिधारी भी उक्त सम्प्रदाय से ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है। नाथ साधु-संत हठयोग पर विशेष बल देते हैं।

'नाथ' शब्द का प्रचलन हिन्दू, बौद्ध और जैन संतों के बीच विद्यमान है। 'नाथ' शब्द का अर्थ होता है स्वामी। वैष्णवों में स्वामी और शैवों में 'नाथ' शब्द का महत्व है। आपने अमरनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि कई तीर्थस्थलों के नाम सुने होंगे।

आदि का अर्थ प्रारंभ। भगवान शंकर को 'भोलेनाथ' और 'आदिनाथ' भी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। इस आदिश शब्द से ही आदेश शब्द बना है। 'नाथ' साधु जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं “आदेश”

भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया।

भगवान शंकर के बाद इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम भगवान दत्तात्रेय का आता है। उन्होंने वैष्णव और शैव परंपरा में समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। दत्तात्रेय को महाराष्ट्र में नाथ परंपरा का विकास करने का का श्रेय जाता है। दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है।

भगवान दत्तात्रेय के बाद सिद्ध संत गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने 'नाथ' परंपरा को फिर से संगठित करके पुन: उसकी धारा अबाध गति से प्रवाहित करने का कार्य किया। चौरासी नाथों की परंपरा में सबसे प्रमुख हैं। उन्हें बंगाल, नेपाल, असम, तिब्बत और बर्मा में खासकर पूजा जाता है।

गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के बाद उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ ने शैव धर्म की सभी प्रचलित धारणाओं और धाराओं को एकजुट करने 'नाथ' परंपरा को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया। उनके लाखों शिष्यों में हजारों उनके जैसे ही सिद्ध होते थे|

इसके अलावा 'नाथ' साधुओं में प्रमुख नाम है- भर्तृहरि नाथ, नागनाथ, चर्पटनाथ, रेवणनाथ, कनीफनाथ, जालंधरनाथ, कृष्णपाद, बालक गहिनीनाथ योगी, गोगादेव, रामदेव, सांईंनाथ आदि।

गोरखनाथ के संप्रदाय की मुख्य 12 शाखाएं- 1. भुज के कंठरनाथ, 2. पागलनाथ, 3. रावल, 4. पंख या पंक, 5. वन, 6. गोपाल या राम, 7. चांदनाथ कपिलानी, 8. हेठनाथ, 9. आई पंथ, 10. वेराग पंथ, 11. जैपुर के पावनाथ और 12. घजनाथ।

महार्णव तंत्र में कहा गया है कि नवनाथ ही 'नाथ' संप्रदाय के मूल प्रवर्तक हैं। नवनाथों की सूची अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग मिलती है। यथाक्रम- मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, गहनिनाथ, जालंधरनाथ, कृष्णपाद, भर्तृहरिनाथ, रेवणनाथ, नागनाथ, चर्पटनाथ।

नाथ सम्प्रदाय का उदय यौगिक क्रियाओं के उद्धार के लिए हुआ था। जब तान्त्रिकों और सिद्धों के चमत्कार एवं अभिचार बदनाम हो गये, मद्य, माँस आदि के लिए तथा सिद्ध, तान्त्रिक आदि स्त्री-सम्बन्धी आचारों के कारण घृणा की दृष्टि से देखे जाने लगे तथा जब इनकी यौगिक क्रियाएँ भी मन्द पड़ने लगीं, तब 'नाथ सम्प्रदाय' का उदय हुआ। इसमें नव नाथ मुख्य कहे जाते हैं : 'गोरक्षनाथ', 'ज्वालेन्द्रनाथ', 'कारिणनाथ', 'गहिनीनाथ', 'चर्पटनाथ', 'रेवणनाथ', 'नागनाथ', 'भर्तृनाथ' और 'गोपीचन्द्रनाथ'। गोरक्षनाथ ही 'गोरखनाथ' के नाम से प्रसिद्ध हैं।

अन्य सम्प्रदायों से सम्बन्ध

इस सम्प्रदाय के परम्परा संस्थापक आदिनाथ स्वयं शंकर के अवतार माने जाते हैं। इसका सम्बन्ध रसेश्वरों से है और इसके अनुयायी आगमों में आदिष्ट योग साधन करते हैं। अत: इसे अनेक इतिहासयज्ञ शैव सम्प्रदाय मानते हैं। परन्तु और शैवों की तरह न तो लिंगार्चन करते हैं और न ही शिवोपासना के और अंगों का निर्वाह करते हैं। किन्तु ये तीर्थ, देवता आदि को मानते हैं। शिव मन्दिर और देवी मन्दिरों में दर्शनार्थ जाते हैं। कैला देवीजी तथा हिंगलाज माता के दर्शन विशेषत: करते हैं, जिससे इनका शाक्त सम्बन्ध भी स्पष्ट है। योगी भस्म भी रमाते हैं, परन्तु भस्म स्नान का एक विशेष तात्पर्य है- जब ये लोग शरीर में श्वास का प्रवेश रोक देते हैं, तो रोमकूपों को भी भस्म से बन्द कर देते हैं। प्राणायाम की क्रिया में यह महत्व की युक्ति है। फिर भी यह शुद्ध योगसाधना का पन्थ है। इसीलिए इसे महाभारत काल के योग सम्प्रदाय की परम्परा के अन्तर्गत मानना चाहिए। विशेषतया इसीलिए कि पाशुपत संप्रदाय से इसका सम्बन्ध हल्का-सा ही दीख पड़ता है। साथ ही योग साधना इसके आदि, मध्य और अन्त में है। अत: यह शैव मत का शुद्ध योग सम्प्रदाय है।

तात्विक सिद्धान्त

इस पन्थ वालों की योग साधना पातञ्जल विधि का विकसित रूप है। उसका दार्शनिक अंश छोड़कर हठयोग की क्रिया छोड़ देने से नाथपन्थ की योगक्रिया हो जाती है। नाथपन्थ में ‘ऊर्ध्वरेता’ या अखण्ड ब्रह्मचारी होना सबसे महत्व की बात है। माँस-मद्यादि सभी तामसिक भोजनों का पूरा निषेध है। यह पन्थ चौरासी सिद्धों के तान्त्रिक वज्रयान का सात्विक रूप में परिपालक प्रतीत होता है। उनका तात्विक सिद्धान्त है कि, परमात्मा ‘केवल’ है। उसी परमात्मा तक पहुँचना मोक्ष है। जीव का चाहे उससे जैसा सम्बन्ध माना जाये, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से उससे सम्मिलन ही कैवल्य मोक्ष या योग है। इसी जीवन में इसकी अनुभूति हो जाए, पन्थ का यही लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रथम सीढ़ी काया की साधना है। कोई काया को शत्रु समझकर भाँति-भाँति के कष्ट देता है और कोई विषयवासना में लिप्त होकर उसे अनियंत्रित छोड़ देता है। परन्तु नाथपन्थी काया को परमात्मा का आवास मानकर उसकी उपयुक्त साधना करता है। काया उसके लिए वह यन्त्र है, जिसके द्वारा वह इसी जीवन में मोक्षनुभूति कर लेता है। जन्म-मरण जीवन पर पूरा अधिकार कर लेता है, जरा-मरण-व्याधि और काल पर विजय पा लेता है।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह पहले काया शोधन करता है। इसके लिए वह यम, नियम के साथ हठयोग के षट् कर्म (नेति, धौति, वस्ति, नौलि, कपालभाति और त्राटक) करता है कि काया शुद्ध हो जाए। यह नाथपन्थियों का अपना आविष्कार नहीं है; हठयोग पर लिखित ‘घेरण्डसंहिता’ नामक प्राचीन ग्रन्थ में वर्णित सात्त्विक योग प्रणाली का ही यह उद्धार नाथपन्थियों ने किया है।

अंत:क्रिया नियम

इस मत में शुद्ध हठयोग तथा राजयोग की साधनाएँ अनुशासित हैं। योगासन, नाड़ी ज्ञान, षट्चक्र निरूपण तथा प्राणायाम द्वारा समाधि की प्राप्ति इसके मुख्य अंग हैं। शारीरिक पुष्टि तथा पंच महाभूतों पर विजय की सिद्धि के लिए रसविद्या का भी इस मत में एक विशेष स्थान है। इस पन्थ के योगी या तो जीवित समाधि लेते हैं या फिर शरीर छोड़ने पर उन्हें समाधि दी जाती है। वे जलाये नहीं जाते। यह माना जाता है कि उनका शरीर योग से ही शुद्ध हो जाता है, उसे जलाने की आवश्यकता नहीं होती है।

प्रमाणिक ग्रन्थ

नाथपन्थी योगी अलख (अलक्ष) जगाते हैं। इसी शब्द से इष्टदेव का ध्यान करते हैं और इसी से भिक्षाटन भी करते हैं। इनके शिष्य गुरु के अलक्ष कहने पर ‘आदेश’ कहकर सम्बोधन का उत्तर देते हैं। इन मन्त्रों का लक्ष्य वही प्रणवरूपी परम पुरुष है, जो वेदों और उपनिषदों का ध्येय है। नाथपन्थी जिन ग्रन्थों को प्रमाण मानते हैं, उनमें सबसे प्राचीन हठयोग सम्बन्धी ग्रन्थ 'घेरण्डसंहिता' और 'शिवसंहिता' हैं। गोरक्षनाथ कृत हठयोग, गोरक्षनाथ ज्ञानामृत, गोरक्षकल्प, गोरक्षसहस्रनाम, चतुरशीत्यासन, योगचिन्तामणि, योगमहिमा, योगमार्तण्ड, योगसिद्धान्त पद्धति, विवेकमार्तण्ड, सिद्ध-सिद्धान्त पद्धति, गोरखबोध, दत्त गोरख संवाद, गोरखनाथजी रा पद, गोरखनाथ के स्फुट ग्रन्थ, ज्ञानसिद्धान्त योग, ज्ञानविक्रम, योगेश्वरी साखी, नरवैबोध, विरहपुराण और गोरखसार ग्रन्थ भी नाथ सम्प्रदाय के प्रमाण ग्रन्थ हैं।

आचार्य एवं उत्पत्ति

उपरोक्त सन्दर्भ से यह भ्रम होता है की नाथ पंथ के नव नाथ कौन थे एवं उनके आदि आचार्य क्कोउन थे, बहुत सी पुस्तकें पढने गूगल को खंगालने के पश्चात् एक आलेख हाथ आया, नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ती और उसके प्रारमिभक आचार्य यह आलेख किन्ही हुकुम सिंह द्वारा लिखा बताया गया है इसमें विस्तार से नाथ संप्रदाय के आचार्यों एवं सिद्धांतों उत्पत्ति को बताया गया है यह आलेख ज्यों का त्यों यहाँ दे रहा हूँ:


नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति किस प्रकार हुर्इ और कितने आचार्य हुए, इस विषय में विद्वदजन भ्रमित हैं क्योंकि वे इस सम्प्रदाय को जैन और बौद्ध सम्प्रदाय का पष्चातवर्ती मानते हैं। जबकि पूर्ववर्ती अध्याय में यह निषिचत हो चुका है कि, यह सम्प्रदाय आदिनाथ भगवान शंकर द्वारा प्रवर्तित सम्प्रदाय है और सर्वप्रथम उनके नाम के साथ यह पद प्रयुक्त हुआ है। इस सम्प्रदाय को नाथ सम्प्रदाय की संज्ञा से प्रसिद्ध होने से पूर्व इसे सिद्धमत, सिद्धमार्ग, योगमार्ग, योगी सम्प्रदाय, अवधूत मत, अवधूत सम्प्रदाय, कापालिक आदि नामों से जाना जाता रहा है और आज भी ये नाम प्रचलन में है। इनमे से कापालिक संज्ञा के स्थान पर कहीं-कहीं तानित्रक पद का प्रयोग किया जाता हैं, किन्तु इनमें सर्वाधिक प्रयोग होने वाले पद नाथ और योगी ही हैं।

हठयोग प्रदीपिका नामक ग्रन्थ में नाथ सम्प्रदाय के अनेक सिद्ध योगियों के नाम दिये गये हैं जिनके बारे मे विश्वास किया जाता है कि, वे सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड में भ्रमणषील हैं। नाथ सम्प्रदाय की मान्यता है कि, सर्वप्रथम नव नाथों की उत्पत्ति हुयी जिन्हे अ-योनिज अर्थात जन्म की साधारण प्रकि्रया मैथुन और योनि से उत्पन्न नहीं होने वाला बताया गया है। ‘महार्णव तन्त्र में कहा गया है कि, ये नवनाथ ही नाथ सम्प्रदाय के मूल प्रवर्तक हैं। इस ग्रन्थ में नवनाथों को अलग-अलग दिषाओं का अधिष्ठाता बताया गया है। इन नव नाथों की उत्पत्ति के बारे में ‘योगिसम्प्रदायविष्कृति (योगाश्रम संस्कृत कालेज हरिद्वार के योगी चन्द्रनाथ द्वारा अनुवादित) में बताया गया है कि, नव नारायण ने ही नव नाथ के रूप में अवतार लिया है। कथा के अनुसार सृषिट रचना के पष्चात जीवों को नाश की ओर जाते देखकर शिव ने जीवों को योगमार्ग का उपदेष देने के लिये नव नारायणों को आदेष दिया। इन नवनारायणों के नाम, उनके द्वारा लिये गये अवतार और कौन किसका शिष्य बना यह निम्नांकित तालिका से प्रकट होता है।

नवनारायण के नाम उनके द्वारा लिया गया अवतार उनके गुरु का नाम


  1. कविनारायण मत्स्येन्द्रनाथ शिव
    2. करभाजनारायण गहनिनाथ शिव
    3. अन्तरिक्षनारायण जालन्धरनाथ शिव
    4. हरिनारायण भृतहरिनाथ गोरक्षनाथ
    5. आविर्होत्रनारायण नागनाथ गोरक्षनाथ
    6. पिप्पलायननारायण चर्पटनाथ मत्स्येन्द्रनाथ
    7. चमसनारायण रेवानाथ मत्स्येन्द्रनाथ
    8. प्रबुद्धनारायण करणिपानाथ जालन्धरनाथ
    9. द्रुमिलनारायण गोपीचन्द्रनाथ जालन्धरनाथ


ऊपरोक्त तालिका के अध्ययन से प्रकट होता है कि, नवनारायणों द्वारा ही नाथ रूप में अवतार लिया गया और इस प्रकार नवनारायण ही नवनाथ हुए। इस तालिका का आगे अर्थ यह हुआ कि शिव तथा गोरक्षनाथ नवनारायण से नवनाथ बनने वालों के गुरु तो हैं, किन्तु वे न तो नवनारायणों में है और न ही नवनाथों में। यदि शिव तथा गोरक्षनाथ को इस सूची में समिमलित किया जावे तो नवनाथ के स्थान पर यह संज्ञा ‘एकादषनाथ होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि आदिनाथ शिव तथा योगी गोरक्षनाथ नवनाथों की उस श्रृंखला में शामिल नहीं हैं जो नवनारायण से नवनाथ बने हैं। इसका आगे अर्थ यह हुआ कि शिव और गोरक्षनाथ एक ही हैं और वे अपना मत नहीं बदलते, अपितु आवश्यकता होने पर योग मार्ग के प्रचार हेतु अन्य दिव्यात्माओं को योगमार्ग में दीक्षित कर उनका नेतृत्व करते हैं।


नवनाथों के नामों पर विचार करते हैं तो ग्रन्थों और विद्वानों को नवनाथों के नाम पर एकमत नहीं पाते। तुलनात्मक व सुगम अध्ययन और सुविधा के दृषिटकोण से हम इसे दो भागों में विभाजित कर लेते हैं। प्रथमत: अनावश्यक सूचि विंस्तार एवं आधुनिक विद्वानों के शोध के पुनरूद्धरण से बचने के लिये नाथ सम्प्रदाय से संबद्ध केवल कुछ प्राचीन और मान्य आधुनिक ग्रन्थों में दिये गये नवनाथों के नाम अगले पृष्ठ पर दी गयी तालिका में शामिल किये गये हैं, जिन्हें अध्ययन और सुविधा के दृषिटकोण से हमने सिद्ध नाथयोगियों को विभिन्न ग्रन्थों में उनकी उपस्थिति की आवृती द्वारा उनकी मान्यता को जांचने का प्रयास किया है। परिणाम निश्चय ही बहुत चौंकाने वाले हैं। यह स्थिति तो ग्रन्थों की एक लम्बी सूचि में से बहुत विचार विमर्श के पश्चात चयनित मात्र 9 ग्रन्थों के अध्ययन का परिणाम है। हमें विश्वास था कि महार्णव-तन्त्र, योगिसम्प्रदायाविष्कृति, सुधाकर चनिद्रका और गोरक्ष सिद्धान्त नामक ग्रन्थों में नवनाथों के नाम समान होंगें और आशंका थी, कि सोमन्न रचित ‘नवनाथ चरित्र, कृष्णकुमार बाली रचित ‘भारत में नाथ सम्प्रदाय, डा0 कृष्णलाल रचित ‘हिंदी साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास, मलिक मौहम्मद जायसी रचित ‘पदमावत और ढूंढीराज रचित ‘चिन्तामणी विजय में नवनाथों के नाम समान नहीं होगें।

अगले पृष्ठ पर अंकित तालिका अविश्वसनीय रूप से आश्चर्य की सीमा तक अनेक विचारों को उद्वेलित करती है। सामर्थ्य होने और अवसर मिलने पर नाथ संप्रदाय से संबद्ध सभी ग्रन्थों में से नवनाथों की एक वृहद तालिका बनाने का विचार प्रस्फुटित होता है। देखना यह है कि, अपने मत के समर्थन और अपने स्वामीगुरू को महिमामणिडत करने के लोभ में किसने किस महापुरूश का नाम नवनाथों में से हटा दिया और किसका नाम जोड दिया?

परंपरागत रूप से नाथयोगियों में निम्नांकित नवनाथ सूचियां प्रचलित हैं जो विभिन्न पंथों, स्थान और अन्य कारणों से पृथक पृथक जान पडती है किन्तु कुछ मूलभूत नाम सभी सूचियों में समान रूप से पाये जाते हैं।
नवनाथ तालिका

कर्म स:

ग्रन्थका नाम

लेखक

नवनाथों के नाम

महार्णव तंत्र

अभिनव गुप्त

गोरक्षनाथ,जालन्धर नाथ,नागार्जुन, सहस्त्रार्जुन, दतात्रेय, देवदत्त, जड्भरत, आदिनाथ, मत्स्येन्द्र नाथ

योगी सम्प्रदाय विष्कृति

योगी चन्द्रनाथ

मत्स्येन्द्रनाथ2, गाहनिनाथ1, जालन्धरनाथ2, भृतहरिनाथ1, नागनाथ2, चर्पटनाथ1, रेवानाथ1, करणिपानाथ1, गोपीचन्द्रनाथ1

३.

सुधाकर चनिद्रका

सुधाकर

एकनाथ1, आदिनाथ2, मत्स्येन्द्रनाथ3, उदयनाथ1, दण्डनाथ1, सत्यनाथ1, सन्तोशनाथ1, कूर्मनाथ1, और जालन्धरनाथ3

नवनाथ चरित्र (तेलगू)

सोमन्न

मीननाथ4सारंगनाथ (चौरंगीनाथ)1, गोरक्षनाथ2, मेघनाथ1, विरूपक्ष1, नागार्जुन3, खणिक1, व्यालि1 और तोरक्कुनाथ1

नवनाथ चरित


आदिनाथ3, उदयनाथ2, सत्यनाथ2, सन्तोशनाथ2, अचम्भनाथ1गजकंथडनाथ1, चौरंगीनाथ2, मत्स्येन्द्रनाथ5, और गोरक्षनाथ3

भारत में नाथ सम्प्रदाय

कृष्णकुमार बाली

आदिनाथ4, उदयनाथ3, सत्यनाथ3, सन्तोषनाथ3, अचम्भनाथ2, गजकंथडनाथ2, चौरंगीनाथ3, मत्स्येन्द्रनाथ6, और गोरक्षनाथ4

हिन्दी साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास

डा0 कृष्णलाल हंस

आदिनाथ5, मत्स्येन्द्रनाथ7, गोरक्षनाथ5, गैनीनाथ2, चर्पटनाथ2, चौरंगीनाथ4, ज्वालेन्द्रनाथ4, भर्तृहरीनाथ2 और गोपीचन्द्रनाथ2

पदमावत

मल्लिक मौहम्मद जायसी

आदिनाथ6, मत्स्येन्द्रनाथ8, गोरक्षनाथ6, गहिनीनाथ3, चर्पटनाथ3, चौरंगीनाथ5, ज्वालेन्द्रनाथ5, भृतहरिनाथ3 और गोपीचन्द्रनाथ3

चिन्तामणि विजय

ढूंढीराज

मत्स्येन्द्रनाथ9, गोरक्षनाथ7, जालन्धरनाथ5, कानिफानाथ2, चर्पटनाथ4, नागनाथ4, भृत हरिनाथ4, रेवणनाथ2 और गहनीनाथ4

१०

गोरक्ष सिद्धान्त संगृह


आदिनाथ7, मत्स्येन्द्रनाथ10, उदयनाथ4, दण्डनाथ2 सत्यनाथ4, सन्तोषनाथ4, कूर्मनाथ2, भवनाथ1 और गोरक्षनाथ8

११

नवनाथ नाम कविता

आदिनाथ

आदिनाथ8, उदयनाथ5, सत्यनाथ5, सन्तोषनाथ5, अचलअचंभनाथ3, गजबेली कन्थडनाथ3, ज्ञानपारखी चौरंगीनाथ6, मत्स्येन्द्रनाथ11 और गोरक्षनाथ9

१२

नवनाथ स्मरण


आदिनाथ9, उदयनाथ6, सत्यनाथ6, सन्तोषनाथ6, कन्थडनाथ4, मत्स्येन्द्रनाथ12, चौरंगीनाथ7, अचंभनाथ4, गोरक्षनाथ

१३

नवनाथ कथा

आदिनाथ

,, उदयनाथ7, सत्यनाथ7, सन्तोषनाथ7, अचलनाथ5, कन्थडनाथ5, चौरंगीनाथ8, मत्स्येन्द्रनाथ13, गोरक्षनाथ11

१४

नवनाथ स्तुति


आदिनाथ10, उदयनाथ8, सत्यनाथ8, सन्तोषनाथ8, कन्थडीनाथ6, अन्चेतीअचंभनाथ6, चौरंगीनाथ9, मत्स्येन्द्रनाथ14, गोरक्षनाथ12

१५


जी.डब्ल्यू. बि्रग्स

आदिनाथ11, शैलनाथ1, सन्तोषनाथ9, अचल अचंभनाथ7, गजबली गजकन्थानाथ7, प्रजानाथ1 अथवा उदयनाथ9, मत्स्येन्द्रनाथ15, गोरक्षनाथ13, चौरंगीनाथ10

१६

गोरक्ष सिद्धान्त संग्रह


आदिनाथ12, मत्स्येन्द्रनाथ16, उदयनाथ10, दण्डानाथ, सत्यनाथ9, सन्तोषनाथ10, कूर्मनाथ3, भवनारनाथ, गोरक्षनाथ14

१७

स्कन्द पुराण


आदिनाथ13, भवनाथ1, सत्यनाथ10, सन्तोषनाथ11, मत्स्येन्द्रनाथ17, कूर्मनाथ4, गोपीनाथ, गोरक्षनाथ15, (अज्ञात)

१८

श्री नवनाथ भकितसार

कवि श्री मालू (महाराष्ट्र)

मत्स्येन्द्रनाथ18, गोरक्षनाथ16, जालन्धरनाथ6, कनिफानाथ3, चर्पटनाथ5, नागेषनाथ5, भरतनाथ, रेवणनाथ3, गहिनीनाथ5

१९

भारद्वाज संहिता


आदिनाथ14, कण्डलनाथ1, चौरंगीनाथ11, गोरक्षनाथ17, रावलनाथ, अनंगनाथ, जालन्धरनाथ7, भुजंगनाथ6, अरूणाचलनाथ1


ऊपरोक्त तालिका के अध्ययन से प्रकट होता है कि, नवनाथों के नाम पर ग्रन्थ और ग्रन्थकार एकमत नहीं हैं। विशेषतः छंटनी किये गये इन ग्रन्थों में यदि सभी नामों को नवनाथों में शामिल किया जावे, तो नवनाथों की संख्या 36 से भी अधिक हो जाती है। अपवाद को छोडकर केवल मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ का नाम लगभग सभी ग्रन्थों में समान रूप से नवनाथों में शामिल है, जिसमें मत्स्येन्द्र्रनाथ को कहीं पर मीननाथ और कहीं पर मछीन्द्रनाथ नाम से उलिलखित है। इसी प्रकार गोरक्षनाथ को भी कहीं कहीं एकनाथ नाम से सम्बोधित किया गया है। उपलब्ध 19 सूचियों में इन महापुरूषों के नाम की आवृति के आधार पर देखा जावे तो मत्स्येन्द्रनाथ व गोरक्षनाथ का नाम 18, चौरंगीनाथ का नाम (कूर्मनाथ को चौरंगीनाथ मान लेने पर) 15, आदिनाथ का नाम 14, सन्तोषनाथ का नाम 11, उदयनाथ व सत्यनाथ का नाम 10, अचंभनाथ, कन्थडनाथ व जालन्धरनाथ का नाम 7, नागारजुन (नाग, नागेष, भुजंगनाथ को एक माना जाकर) का नाम 6, चर्पटनाथ तथा गाहनीनाथ (गैनी, गहिनी को शामिल कर) का नाम 5, भर्तहरि व गोपीचन्द्रनाथ का नाम 4, रेवानाथ, कनिफानाथ और दण्डनाथ का नाम 3 सूचियों द्वारा समर्थित हैं। शेष नामों की आवृति केवल एक-एक सूचि में है।

यह अपेक्षा की जाती है कि, नाथ सम्प्रदाय के चार प्रमुख आचार्यों क्रमशः आदिनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ जालन्धरनाथ और गोरक्षनाथ का नाम तो नवनाथों की सभी सूचियों में अवश्य होगा किन्तु ‘योगी सम्प्रदाया विष्कृति और ‘सुधाकर चनिद्रका ग्रन्थों में गोरक्षनाथ को नवनाथों में समिमलित नहीं किया गया। ‘नवनाथ चरित्र, ‘भारत में नाथ सम्प्रदाय और ‘गोरक्ष सिद्धान्त संगृह में जालन्धरनाथ को नवनाथों में समिमलित नहीं किया गया। ‘योगीसम्प्रदाय विष्कृति, ‘नवनाथ चरित्र तथा ‘चिन्तामणि विजय में आदिनाथ को नवनाथों में समिमलित नहीं किया गया। केवल मत्स्येन्द्रनाथ का नाम सभी ग्रन्थों में समान रूप से नवनाथों में शामिल है, जो कहीं पर मीननाथ और कहीं पर मत्स्येन्द्रनाथ नाम से उलिलखित है। गहनीनाथ व गैनीनाथ और जालन्धर व ज्वालेन्द्रनाथ, नागार्जुन व नागनाथ, रेवानाथ व रेवणनाथ, करणिपानाथ व कानिपानाथ को हमने एक ही मान लिया है।

द्वितियत: नाथ सम्प्रदाय के अनुयायियों में प्रचलित मौखिक परम्पराओं पर दृषिटपात करें तो उनमें भी नवनाथों के नामों पर मतैक्य नहीं मिलता। मौखिक परम्परा के सन्दर्भ में ‘नवनाथ जाप नाम से एक स्तुति में आदिनाथ, उदयनाथ, सत्यनाथ, संतोषनाथ, कंथड़नाथ, अचम्भेनाथ, चौरंगीनाथ, मछन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ के नाम हैं, किन्तु इससे मिलती जुलती संज्ञा वाले नवनाथ रक्षा जाप मंत्र में बालगुन्दार्इ (सम्भवत: गुसार्इं), धूंधलीमल और एक अन्य मौखिक परम्परा में खरमचलनाथ ऐसे नाम हैं जो न तो किसी ग्रन्थ में बताये गये और न ही नाथ सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा अनुमोदित है। अलग-अलग स्थानों पर भाषा के उच्चारण और परम्परा के कारण इन नवनाथों के नामों की वर्तनी में किंचित भेद को स्वाभाविक और सामान्य बात मानकर छोड़़ दें तो इतना तो माना जा सकता है कि, उदयनाथ को उदेनाथ, सत्यनाथ को सतनाथ, अचल अचम्भनाथ को आंचोली अंचेपानाथ, मत्स्येन्द्र को मछन्दर और गजबेली गजकन्थड़नाथ को घोडाचोली कन्थड़ीनाथ उच्चरित किया गया है।

नाथ सम्प्रदाय से इतर विद्वदजनों और मौखिक परम्पराओं के अतिरिक्त नाथ सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा रचित ग्रन्थों मेंभी नवनाथों की सूची का अनुमान मिलता है। इस क्रम में विटठल योगीष्वर मठ कर्णाटक के महन्त राजा पीर योगी चन्द्रनाथ ने ”पीर द्वारकानाथ वाणी तथा ”जोगमाया जाप संगृह नामक ग्रन्थों में नवनाथ मंत्र जाप और नवनाथ भजन लिखा है। मृगस्थली काठमाण्डू के पीठाधीष्वर व नेपाल के राजगुरू विद्वान योगी प्रवर नरहरिनाथ ने ”नाथ नित्यकर्म, ”नवनाथ स्वरूप वर्णन तथा ”नवनाथ चरित्र में नवनाथों के नाम उलिलखित किये हैं जिनकी अवधूत योगी महासभा दलीचा भेक (भेष) बारह पंथ हरिद्वार द्वारा पुषिट की गयी है। इसी प्रकार नवनाथों के नामक्रम में सभी संषयों का विच्छेदन करते हुए नाथ सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ ‘गोरक्ष टिल्ला काषी वाराणसी से प्रकाषित ‘नवनाथ कथा नामक ग्रन्थ में भी नवनाथों के वे ही नाम हैं जो उक्त दोनों महानुभावों द्वारा अपने ग्रन्थों में बताये गये हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि, नाथ सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा नवनाथों की नामावली उनके द्वारा की जाने वाली नवनाथों की वन्दनास्तुति पर आधारित होने से अधिक विष्वसनीय होने का प्रबल आधार है। नाथ सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा रचित ग्रन्थों में नवनाथ नामावली को साररूप में प्रस्तुत किया जावे तो वन्दना क्रम से जो समान नाम प्रकट होते हैं वे इस प्रकार है। आदिनाथ, उदयनाथ, सत्यनाथ, सन्तोषनाथ, अचल अचम्भनाथ, कन्थड़नाथ, चौरंगीनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ।

नवनाथों की नामवली की चर्चा अधूरी होगी यदि हम श्रीलंका की नाथ परंपरा में नवनाथों की चर्चा नहीं करें।

श्रीलंका की परंपरा के अनुसार श्रीलंका में अवलोकितेष्वर से संबंद्ध नवनाथों की परंपरा का असितत्व है जो नाथ नाम से जानी जाती है। श्रीलंका में 9वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य लिखी गयी की संस्कृत कृति सरीपुत्र में नाथ को वर्णित किया गया है जिसके आधार पर श्रीलंका के चितेरों ने 15वीं शताब्दी में अवलोकितेष्वर को चित्रित किया है। (हम यहां स्पष्ट कर दें कि सरिपुत्र नामक एक ब्राहमण महात्त्मा बुद्ध का एक प्रमुख षिष्य भी था जिसका नालन्दा में स्तूप है। प्रस्तुत पंकितयां केलानिया युनिवर्सिटी के इन्स्टीटयूट आफ एस्थेटिक स्टडीज के निदेषक डा0 आर.एम. शरत चन्द्रजीवा और इनिदरागांधी नेषनल सेंटर फार दी आर्टस की शोधकर्ता डा0 राधा बनर्जी के शोध पत्रों पर आधारित है)। नवनाथों की अन्य समस्त सूचियों की भांति ही सरिपुत्र में भी नवनाथों की सूचि उनके स्वरूप वर्णन से युक्त है हम यहां केवल उनके नाम का उल्लेख कर रहे हैं। तदनुसार षिवनाथ, ब्रहमनाथ, विष्णुनाथ, गौरीनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, भद्रनाथ, बुद्धनाथ और गणनाथ हैं।

ज्ञातव्य है कि सरिपुत्र की इस सूचि में केवल आठ ही नाम हैं और गोरक्षनाथ का नाम नहीं है। सूचि में उक्त आठ नामों के तुरन्त बाद अवलोकितेष्वर के स्वरूप का वर्णन करते हुए श्रीलंका में उसकी प्रतिमाओं और चित्रों का विवेचन किया गया है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि अवलोकितेष्वर को नवनाथों में समिमलित करते हुए उसको बौद्ध और नाथ के मध्य सन्तुलित कर दिया है। अपने शोधपत्र में एक स्थान पर अवलोकितेष्वर के साथ नाथ पद का प्रयोग करते हुए स्पष्ट कहते हैं कि ”श्रीलंका में विभिन्न दूरस्थ स्थानों पर अवलोकितेष्वरनाथ की प्रतिमाएं प्राप्त हुर्इ हैं। अब अवलोकितेष्वर का 84 की संख्यां के साथ विलक्षण संगम देखिये कि अवलोकितेष्वर के भ्रुमध्य से 84 किरणें निकल रही है और प्रत्येक किरण बुद्ध और बोधिसत्वों की इस विषाल संख्या का प्रतिनिधित्व कर रही है। अवलोकितेष्वर की प्रत्येक अंगुली के पौरों में 84000 (चौरासी हजार) तस्वीरें हैं और तस्वीर से निकलने वाली किरण जगत के सभी तत्वों को प्रकाषित कर रही है।
यह सुनिषिचत है कि श्रीलंका में ‘नाथ परंपरा को दक्षिण भारत की ‘अगम नामक शैव परंपरा ने स्थापित किया है। श्रीलंका की परंपरा अनुसार नवनाथ सूचि की पहली और रूचिकर विषेषता यह है कि नवनाथों के संबंध में यह प्राचीनतम अभिलेख है जो समय के साथ आज हम तक पहुंची है। दूसरे, इस सूचि का परीक्षण किये जाने के बाद यह निषिचत रूप से कहा जाता है कि यह भारतीय नाथ परंपरा से संबद्ध है ना कि बौद्ध संप्रदाय के विख्यात एवं प्रतिषिठत समूह जिससे कि अवलोकितेष्वर के रूप में मत्स्येन्द्रनाथ को जोडा जाता है। विस्मय यहां समाप्त नहीं होता वरन श्रीलंका की नाथ परंपरा अनुसार अवलोकितेष्वर को महायोगी गोरक्षनाथ से संबद्ध होना बताया गया है जो कि नेपाल की नाथ परंपरा में मत्स्येन्द्रनाथ को अवलोकितेष्वर बताया जाता है। श्रीलंका की केलानिया यूनिवर्सिटी के इन्स्टीटयूट आफ ऐस्थेटिक स्टडीज के निदेषक डा0 आर.एम. सरथ चन्द्रजीवा के अनुसार अवलोकितेष्वर नाम प्रारंभिक बौद्ध ग्रन्थों यथा प्रथम शताब्दी के उत्तर भारत के प्रसिद्ध दार्षनिक अष्वघोष (80-150 र्इ0) जो बाद में बौद्ध भिक्षु बना के ग्रंथ ललितविस्तार, दिव्य वन्दना और जातक माला आदि में प्रकट नहीं होता। द्वितीय शताब्दी में संस्कृत से चीनी और जापानी तथा आधुनिक काल में विद्वान मेक्स मुलेर द्वारा अनुवादित सुखवतीव्यूह ग्रंथ में बोधिसत्व अवलोकितेष्वर को बुद्ध का पुत्र होना बताया गया है और चौथी से सातवीं शताब्दी के मध्य लिखित गुण-करन्दव्यूह सूत्र, अमितयुध्र्यन सूत्र तथा सधर्म पुण्डरीक सूत्र में अवलोकितेष्वर को अदभुत शकितयों का स्वामी बताया जाकर गुणगान किया गया है। श्रीलंका मेें अवलोकितेष्वर का प्राकटय 8वीं शताब्दी के षिलालेख में होता है जो अवलोकितेष्वर के संबंध में आरंभिक और प्राचीन है। षिलालेख में अवलोकितेष्वर, बुद्ध और मंजूश्री को त्रिमूर्ति कहा गया है।

विचारणीय प्रष्न यह है कि, नवनाथों की इतनी संक्षिप्त सूची के संबन्ध में इतने मत मतान्तर क्यों हैं?

उत्तर इतना सहज नहीं है किन्तु इस ग्रन्थ की प्रस्तावना मेंं उलिलखित प्रथत वाक्यांष (विष्व में मानव समाज अपनी इकाइयों के प्रत्येक स्तर पर अपने दर्षन, संस्कृति साहित्य और इतिहास को श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयास में लगा रहता है) के प्रकाष में विचार करें तो-

  1. सर्वप्रथम यह अवधारणा सत्य ही सिद्ध होती है कि, समय समय पर अलग-अलग स्थानों पर उत्साहित और समर्पित षिष्यों ने अपनी सुविधा अनुसार नवनाथों में से किसी एक के नाम के स्थान पर अपने गुरू का नाम प्रतिस्थापित कर दिया।
  2. द्वितीयत: यह एक सुस्थापित तथ्य है कि, इस सम्प्रदाय में यधपि सभी वर्ण एवं वगोर्ं के लोग अनुयायी हुए, किन्तु इनमें क्षत्रिय कही जाने वाली जातियों और राजा महाराजाओं का प्रतिषत सर्वाधिक है। यहां यह स्पष्ट करना समीचीन होगा कि अन्य सम्प्रदायों से इतर नाथ सम्प्रदाय ही एक ऐसा सम्प्रदाय है, जो राज्याश्रय के कारण पल्लवित और पोषित नहीं हुआ वरन राजा महाराजाओं ने इस सम्प्रदाय का आश्रय लिया। जहां कहीं राजा, महाराजा व सम्पन्न व्यकितयों ने नाथ सम्प्रदाय की दीक्षा ली उन्होंने अथवा उनके समीपस्थ सहायकों ने स्थान विषेष की परम्परानुसार नवनाथों के नामों का चित्रण, मुद्रण एवं ग्रन्थ रचनायें करवादी, जो आज नवनाथों के नामों के संबन्ध में मतभिन्नता का कारण बनी हुयी हैं।
  3. तीसरा अनुमान यह है कि, नाथ सम्प्रदाय की मान्यता अनुसार स्वयं योगी गोरक्षनाथ ने शास्त्रों के पठन-पाठन को महत्त्वहीन मानते हुए कहा है”मैं कहता हूं कि यदि वे मेरा उपदेष मानें तो सभी ग्रन्थों को कुएं में फेंक दे क्योंकि आधुनिक समय में जो स्वयं ही मु नहीं हैं, वे दूसरों को मोक्ष का उपदेष देने में किस तरह समर्थ हो सकते हैं? ये निपुणता प्रदर्षन, अभिमान, जीविकोपार्जन, व्यसन अथवा किसी भी अभिलाषा की पूर्ति के लिये षास्त्र रचना करते हैं, वह रचनायें पारमार्थिक पुरुषों के समक्ष क्या महत्त्व रखती है? ग्रन्थों की ग्रन्थी को काटने के लिये इस प्रकार का उधोग करने और उपदेष देने वाले योगेष्वर श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से निकले शब्दों को महायोगी गोरक्षनाथ के शब्दों के पासंग में रखकर देखें तो श्रीकृष्ण भी यही तो कह रहे हैं।

यामिमां पुषिपतां वाचं प्रवदन्त्यविपषिचत:। वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन:।।
कामात्मन: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम। कि्रयाविषेषबहुलां भोगैष्वर्यगतिं प्रति।।
भोगैष्वर्यप्रसक्तानां तयापहतचेतसाम। व्यवसायातिमका बुद्धि: समार्धा न विधीयते।।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवाजर्न। निन्द्र्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान।।
यावानर्थ उदपाने सर्वत: संप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राहमणस्य विजानत:।।

(अध्याय 2, श्लोक 42-46)

अर्थात अल्पबुद्धि मनुष्य वेदों के उन आलंकरिक वचनों में बहुत आसक्त रहते हैं जिनमें स्वर्ग, उच्चकुल, ऐष्वर्य और भोगों को देने वाले सकामकमोर्ं का विधान है। भोग और ऐष्वर्य की अभिलाषा के कारण ही वे ऐसा कहते है कि इनसे (वेद, ग्रन्थ आदि) श्रेष्ठ कुच्छ भी नहीं। जो मनुष्य विषयभोग और लोकिक ऐष्वर्य में प्रगाढ़ आसकित के कारण इस प्रकार सम्मोहित हो रहे हैं उनके चित्त में मन की एकाग्रता का दृढ़ निष्चय नहीं होता। वेद तो मुख्यत: (केवल) प्रकृति के तीन गुणों का विषय (वर्णन) करने वाले हैं। हे अजर्न, तू इन गुणों का उल्लंघन कर के इनसे अतीत हो जा और सम्पूर्ण द्वन्द्वों तथा प्रापित व सरंक्षण के विचार से मुक्त होकर अपने आप में सिथत हो जा।

इसी आधार पर अधिकांष गुरूओं ने भी शास्त्रों को महत्व नहीं दिया और केवल गुरू के सानिनध्य में रहकर मौखिक ज्ञान की षिष्य परम्परा से ही योग साधना पल्लवित होती रही है। स्मृतियों और श्रुतियों के सन्दर्भ में यह कोर्इ नयी बात भी नहीं है। देष, काल और परिसिथतियों के कारण जो परिणाम स्मृतियों और श्रुतियों का हुआ, वही परिणाम नवनाथ नामावली में भी अनपेक्षित नहीं है।

  1. एक अन्य अनुमान के अनुसार जैसा कि विदित है कि, नाथ सम्प्रदाय में बारह और अटठारह पंथों में से योगी गोरक्षनाथ द्वारा बारह पंथों का पुनर्गठन किया गया, किन्तु उनके पष्चात इन बारह पंथों के अनेक उपपंथ और उपपंथों की अनेक शाखा-उपषाखाएं विकसित होती रहीं। गुरू को सर्वोच्च सम्मान देने की मानसिकता के कारण अनुयायियों द्वारा अपने पंथ के प्रवर्तक का नाम नवनाथों की नामावली में रखकर उनकी वन्दना करने की प्रबल सम्भावना इस अनुमान को और भी पुष्ट कर देती है। समय व्यतीत होने के साथ-साथ यह एक परम्परा बन गयी और इस प्रकार विभिन्न नवनाथ नामावलियों का असितत्त्व कोर्इ आष्चर्य की बात नहीं है।

सारांष यह है कि, एक अन्तहीन बहस और सभी तर्क वितकोर्ं को विराम देने के लिये हमें एक सर्वमान्य मापदण्ड का आश्रय लेना होगा। नाथ सम्प्रदाय के बाहय और लिखित परम्पराओं तक सीमित रहने वाले इतिहासज्ञों और साहित्यकारों द्वारा किया गया शोध एवं समीक्षा यधपि बहुत महत्त्वपूर्ण है किन्तु उन्हें मान्यता नहीं दिये जाने के कारणों का उल्लेख हम प्रस्तावना में कर चुके हैं। इन महानुभावों के मत को नाथ सम्प्रदाय के बाहर तो कमोबेष मान्यता मिल सकती है किन्तु इतनी कुषलतापूर्वक किये गये प्रदर्षन को भी नाथ सम्प्रदाय के सन्त व अनुयायियों द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। अत: आवष्यक है कि, जिस सम्प्रदाय के प्रथम प्रवर्तकों का अनुमान लगाना चाह रहे हैं, उस सम्प्रदाय के मनीषियों से अनुमोदित सर्वत्र व सर्वाधिक प्रचलित मान्यताओं व प्रमाणों को महत्त्व देना होगा। केवल अपने गंरथ को पूरा करने की ललक में बाहरी और सतही सामग्री को आधार बनाया जायेगा, तो साहित्यकारों, दार्षनिकों व इतिहासकारों द्वारा शोध का प्रपंच चलता रहेगा और वे कभी भी एकमत नहीं हो पायेंगे।

हमने देखा कि ‘योगीसम्प्रदायाविष्कृति और आचार्य द्विवेदीजी द्वारा ‘नाथसम्प्रदाय पुस्तक में दी गयी नवनाथ सूचीयां, नवनाथ स्वरूप मंत्र में उल्लेख किये गये नवनाथों से भिन्न तो हैं ही, महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन नवनाथों में से केवल मत्स्येन्द्रनाथ का नाम ही तीनों सूचीयों में समान रूप से है। जहां विचारकों में किसी विषय को लेकर मतभेद हों वहां परम्परा के आधार पर संषय का निवारण तथा मत को स्थापित किया जाना चाहिये, क्योंकि परम्परा किसी कालखण्ड से चले आ रहे किसी व्यवहार की निरन्तरता को प्रमाणित करती है। इस प्रकार हैं ऐसी मान्यता है। इस प्रकार नाथ सम्प्रदाय में प्रचलित नवनाथ ध्यान, वन्दना व स्तुति मंत्रों में चहुंदिष जिन नामों का प्रचलन है और इस सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा जिन नामों का अपने योग ग्रन्थों में वर्णन किया है वे नवनाथ क्रमष: आदिनाथ, उदयनाथ, सत्यनाथ, सन्तोषनाथ, अचल अचम्भनाथ, कन्थड़नाथ, चौरंगीनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ ही हैं। नाथयोगियों द्वारा सन्ध्या उपासना में उच्चरित की जाने वाली नवनाथ स्तुति इस प्रकार है।

ओ•म गुरुजी। ओ•मकारो आदिनाथ ओ•मकार स्वरूप बोलिये। उदयनाथ माता पार्वती धरती स्वरूप बोलिये। सत्यनाथ ब्रहमाजी जल स्वरूप बोलिये। सन्तोषनाथ विष्णुजी खडगखाण्डा तेज स्वरूप बोलिये। अचल अचम्भनाथ आकाष स्वरूप बोलिये। गजबलि गजकंथडानाथ गणेषजी गज हसित स्वरूप बोलिये। ज्ञानपारखी सिद्ध चौरंगीनाथ अठारह हजार वनस्पति स्वरूप बोलिये। मायारूपी मत्स्येन्द्रनाथ मायारूपी बोलिये। घट पिण्ड नवनिरन्तरे रक्षा करन्ते शम्भुयति गोरक्षनाथ बाल स्वरूप बोलिये। इतना नवनाथ स्वरूप मंत्र सम्पूर्ण भया, अनन्त कोटि सिद्धों में नाथजी ने कथ पढ़ सुनाया। नाथजी गुरुजी को आदेश!आदेश!

हालांकि नवनारायणों को ही नवनाथ बनाये जाने के पश्चात नवनाथ नामावली पर किसी वाद विवाद की संभावना पर पूर्ण विराम लग जाना चाहिये तथापि नाथ सम्प्रदाय की मूलभूत आख्यायिकाओं और अनेक सन्तों से विचार के पष्चात आदिनाथ और जालन्धरनाथ सहित गोरक्षनाथ के नाम के बिना नवनाथ नामावली पूरी हो ही नहीं सकती किन्तु, नवनरायाणों के नाथ बनने के तथ्य की उपसिथति के उपरान्त भी ‘नवनाथ स्वरूप मंत्र में आये नवनाथों के नाम पर एकमत होना युकितयुक्त और विषय की गंभीरता के साथ न्याय नहीं होगा। अत: यह सर्वकालिक रूप से वादविवाद का विषय होकर एक अनुत्तरित प्रष्न रहेगा। हमारी विवषता यह है कि परंपरा द्वारा पोषित इन्हीं नवनाथ स्वरूप मन्त्र में उल्लेखित नवनाथ नामावली पर ही चर्चा करनी होगी।

प्रष्न रह जाता है कि, नवनाथों का स्वरूप वर्णन क्या किसी विषिष्ट रचना की ओर संकेत करता है?

इस प्रष्न पर तार्किक प्रकाष में इन स्वरूपों के योगात्मक रूप पर विचार किया जावे तो सृषिट तथा जीव के निर्माण और इनकी एकात्मता का एक अदभुत दृष्य उपसिथत हो जाता है। यह सुस्थापित है कि, सम्पूर्ण प्रकृति और जगत प्रपंच पंच महाभूत और चार अलंकरणों से मिलकर निर्मित नो तत्त्वों का परिणाम है। (आज केवल पंच महाभूतों को ही जीवधारियों के शरीर के घटक कहा जाता है, जबकि यह सत्य नहीं है, ऐसी लेखक की मान्यता है।) इन नौ तत्वों के युग्म घटक यानी शरीर में इन नवनाथों का क्या तादात्म्य है? यही परीक्षण हम अगली पंकितयों में कर रहे हैं। निसन्देह हम यह स्पष्ट कर दें कि योग का हमें कोर्इ व्यावहारिक अनुभव नहीं है केवल पुस्तकीय ज्ञान और सिद्ध योगियों से चर्चा ही इसका आधार है। अग्रांकित सामग्री केवल एक विचार है जो ना तो वाद-विवाद के लिये है और ना ही हम इस पर अडिग हैं। इस संबंध में यदि कोर्इ समर्थन या खण्डन प्राप्त होता है तो हम उसे गुण-दोष के गुरूत्व के आधार स्वीकार करेंगे।

5.आदिनाथ नवनाथ स्वरूप पर क्रमपूर्वक विचार किया जावे तो सर्व प्रथम आदिनाथ के ओ•मकार स्वरूप के संबन्ध में प्रकट होता है कि, सभी धर्मग्रन्थों में सृषिट के प्रारम्भ में एक स्पन्दन का होना माना गया है। वेद विज्ञान में शब्द से ही सृषिट का प्रादुर्भाव माना गया है। र्इसार्इयों के धार्मिक ग्रन्थ बाइबल में भी शब्द के बारे में कहा गया है कि, श्प्द जीम इमहपददपदह जीमतमू जीमूवतकए जीमूवतकू पजी जीम ळवक दक जीमूवतकू जीम ळवकश्ण् शब्द का गुण ध्वनि है और ध्वनि, इस अनन्त आकाष में प्रतिपल एक अनवरत स्पन्दन उत्पन्न करती रहती है। ओ•म ही वह शब्द है जिसकी प्रतिध्वनि अनवरत रूप से अखिल ब्रहमाण्ड में व्याप्त है। सृषिट का जनक, देवों का देव, समस्त शकितयों का स्वामी, समस्त सृषिट जिससे सृजित और समाहित है, समस्त महायोगियों उसी के रूप हैं, जो द्वैत और अद्वैत से परे होने के कारण आदिनाथ नाम दिया गया प्रतीत होता है। उल्लेखनीय है कि सदाषिव महेष को आदिनाथ समझने की भूल करने वाले लोगों के लिये यह महत्वपूर्ण है कि भगवान षिव आदिनाथ नहीं है वरन ब्रहमा, विष्णू और महेष भी इस ओंमकार रूप में एकात्म है। ब्रहमा, विष्णु, सदाषिव जानत अविवेका, प्रणव अक्षर के मध्य ये तीनों एका। अविवेकी लोग ब्रहमा, विष्णू और महेष को पृथक समझते हैं जबकि ये तीनों प्रणवाक्षर में एकात्म हैं।

योग में षट चक्रों के वर्णनानुसार जीवधारी के गले में विषुद्ध चक्र का स्थान है जो शुद्ध अन्तरिक्ष के आकाष रूप से संबद्ध है। विषुद्ध चक्र रूद्र ग्रंथी के निम्न केन्द्र के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह सहस्त्रारब्रहमरन्ध्रदषम द्वार के साथ मसितष्क में भ्रुमध्य में सिथत आज्ञा चक्र को स्थापित करता है। यह विषुद्ध चक्र मानव शरीर के आकाष तत्व का आधार है जो राग, द्वेष, भय, लज्जा और मोह को उत्पन्न करने का उत्तरदायी है। योगी (मानव) के लिये विषुद्ध चक्र को पार करना केवल आमकार में लय (सूर्य और चन्द्रमा (ह-सूर्च, ठ-चन्द्रमा अर्थात हठ योग) के योग) अर्थात नितान्त शुद्ध सिथति द्वारा ही संभव है। इसीलिये इसे विषुद्ध कहा जाता है। आदिनाथ को ज्योति स्वरूप भी कहा जाता है।

6.उदयनाथ (ऊमापार्वती) क्रम सोपान के अन्तर से उदयनाथ द्वितीय स्थान पर हैं और यह नाम षिव की भार्या पार्वती को दिया गया है और सम्पूर्ण पृथ्वी उनका स्वरूप है। यह समझना आवष्यक है कि, यहां पृथ्वी से तात्पर्य केवल हमारे सौरमण्डल के इस पृथ्वी ग्रह से नहीं है वरन अन्तरिक्ष में जितने भी ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं, उनका भू-मण्डल षिव भार्या पार्वती का स्वरूप है। पर्वत की पुत्री होने के कारण इन्हें पार्वती और जीव को सर्वप्रथम अपने अपनी निजा शकित से उत्पन्न, पल्लवित और पोषित करने के कारण इन्हें दिव्य शकित, महा शकित, धरती रूपा, माही रूपा, पृथ्वी रूपा, प्राण नाथ, प्रजा नाथ, उदयनाथ, भूमण्डल आदि कहा गया। पृथ्वी तत्व मूलाधार चक्र से संबंद्ध है जो गुदा के मध्य सिथत एक वलय है जो अन्य सभी का आधार है। भौतिक जगत के सृजन से पूर्व आदि शकित ने अदृष्य वलयों का निर्माण किया जो चक्र कहे जाते हैं। यह षिव की निजा शकित (व्यकितगत सामथ्र्य) जो उनसे भिन्न नहीं होकर समस्त सृषिट को प्रकार चलायमान रखती है कि ये महान दिव्य युगल समस्त दृष्टमान एवं बोधगम्य तत्वों का उत्पादन और भरण करता है। जहां षिव समस्त चराचर जगत में आत्मतत्व है तो यह शकित उस चराचर जगत का रूप है। षिव समस्त सृषिट में बीज है तो यह शकित उस बीज को अपने कलेवर में ढांपती और उसका सरंक्षण करती है। जिस प्रकार एक चेहरा दर्पण में प्रतिबिमिबत होकर दो अथवा अनेक बिम्बों में दिखार्इ देकर भी एक ही होता है, उसी प्रकार सृजन के समय माया रचित अनेक कारणों से बाहय अद्वैत बृहम षिव और उनकी निजा शकित द्वीआयामी और बहुआयामी हो जाती है।

सम्पूर्ण सृष्टी की उत्तरदायी होने के कारण यह निजा शकित देवताओं और असुरों की जननी है। शाबिदक अर्थ में मूलाधार (मूलचक्र) से आषय मुख्य आधार या षटचक्रों में प्रथम चक्र है और गणितीय व्याख्या अनुसार मूलाधार चक्र सृषिट का वो शून्य बिन्दू है जहां से सात उच्च लोक और सात पाताल लोक हैं। यहां षिव की निजा शकित के दो रूप है। पहली जव वह षिव से पृथक होकर सृषिट कर्म के लिये अधोगति करती है और दूसरी जब वह सृषिट कर्म से प्रत्याहरण होकर सर्वोच्च सातवें चक्र सहस्त्रार जो कि उसके स्वामी षिव का आसन है, तक ऊपर उठती है जहां, वह पुन: षिव के अद्वेत रूप ओंमकार में समाहित हो जाती है।

उदय का शाबिदक अर्थ उठना या प्रकट होना है अत: उदयनाथ को उदित होने वाले देवता की संज्ञा दी जा सकती है। महायोगी गोरक्षनाथ ने इस दिव्य शकित की सुप्त और जागृत दो सिथतियां बतायी है। सुप्त अवस्था में यह सर्पिणी की भांति मूलाधार चक्र में मेरूदण्ड के आधार में सिथत रहती है। योग की तकनीक से जब इसे जागृत किया जाता है तो यह सुषुम्णा नाडी में प्रवेष कर सहस्त्रार चक्र की ओर ऊपर उठती है जो इसका अनितम लक्ष्य है। मूलाधार चक्र से सहस्त्रार चक्र की यात्रा में प्रत्येक चक्र का भेदन करती हुर्इ यह अपने स्वामी षिव से संगम करती है। अपनी सुप्त अवस्था में सत, रज और तमस नामक त्रयगुणों की प्रकृति से आवृत और माया के शकित रूप में प्रकट होती है जिससे सभी भाव असितत्व में आते हैं। यही वह शकित है जो इस जगत के असाधारण, भौतिक व परा विज्ञान और असंख्य पदाथोर्ं के असितत्व व वास्तविक बाहरी रूप के लिये उत्तरदायी है। केवल इसी दिव्य कुण्डलिनी शकित को जागृत किया जाकर ही योगाभ्यास में सफलता प्राप्त की जा सकती है और योगी पूर्णतया व सदा सर्वदा के लिये योग में आरूढ हो सकता है। हठयोग प्रदीपिका के तृतीयोपदेष का पहला श्लोक इस कुण्डलिनी के महत्व को स्थापित करता है तदनुसार स: शैल वन धात्रीणां यथाधारोहि नायक:। सर्वेषां योग तन्त्राणां तथाधारो हि कुण्डली। कुण्डलिनी शकित को परा शकित (वस्तुत: यह शब्द पारा शकित है। आध्यातिमक शब्दावली में पारा वीर्य का पर्यायवाची है) भी कहा गया है और इसे जागृत करने के लिये सम्यक ब्रहमचर्य (पारा अर्थात वीर्य का सरंक्षण) का पालन आवष्यक है। मन, वचन और कर्म से मैथुन का सदा-सर्वदा, सर्वत्र व समस्त स्तरों पर त्याग ब्रहमचर्य है। नाथयोगियो के सन्दर्भ में ब्रहमचर्य की कि्रयानिवति केवल सम्यक ब्रहमचर्य की सख्ती और स्वाधिस्ठान चक्र के नियन्त्रण तक सीमित नहीं है, वरन देह के अन्य आठ द्वारो पर भी ब्रहमचर्य का पालन किया जाता है। पूर्ण ब्रहमचर्य के पालन से ही योगी सत्य लोक अर्थात परं ब्रहम के स्थान को प्राप्त करता है।

  1. सत्यनाथ (ब्रहमा) तृतीय स्थान पर सत्यनाथ नाम से ब्रहमा पदस्थापित है, जिनको जलस्वरूप कहा गया है। कहने की आवष्यकता नहीं है कि, सृषिट के समस्त जीवों, चल व अचल पदाथोर्ं के निर्माण में जल एक प्रमुख तत्त्व है। इन्हें प्रजा (सृष्टी पति) पति भी कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में ब्रहमा की उत्पति विष्णू के नाभी कमल से होना सर्वविदित है। जलतत्व स्वाधिष्ठान चक्र से संबंधित है जो जननेन्द्रीयों के तल में सिथत है और मानव शरीर के स्व का आसन है। ज्ञान गूदडी नामक गंरथ के अनुसार ब्रहमा भी सृषिट करने की इच्छा के कारण इस जगत प्रपंच में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं। आदि पुरूष इच्छा उपजार्इ, इच्छा साखत निरंजन मामही।। इच्छा ब्रहमा, विष्णु, महेषा। इच्छा शारदा, गौरी, गणेषा।। इच्छा से उपजा संसारा। पंच तत्व गुण तीन पसारा।। (ज्ञान गूदडी)
  2. सन्तोषनाथ (विष्णु) चतुर्थ स्थान पर सन्तोषनाथ नामान्तर्गत विष्णु विराजित है, जो तेजसिवता लिये हुए हैं। आज विज्ञान जगत सहित समस्त संसार यह मान चुका है कि, हमारे शरीर में एक ज्योतिपुंज है जिसे हम योगाभ्यास के माध्यम से अपने ही शरीर में देख सकते हैं। शरीर में इस ज्योतिपुंज की उपसिथति ही जीवन के असितत्त्व को सिद्ध करती है। सूर्य के साथ ज्योतीअगिन तत्व मणिपुर चक्र से संबंद्धित है जो नाभि क्षेत्र में सिथत है। मणिपूर चक्र मानव देह का विषुद्ध केन्द्र बिन्दु है और इस देह रूपी सौरमण्डल के सूर्य के समान है। विष्णु सन्तुषिट का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, इस सृषिट का संचालक, सन्तुलनकर्ता होते हुए भी निर्लिप्त व सन्तुषिट भाव से अपने कर्तव्य का पालन करता है।

शाबिदक अर्थ में देखा जावे तो सन्तोष भौतिक संसाधनों पर स्वामित्व, महत्वाकांक्षाओं पर विराम और हैसीयत आदि पर वर्तमान क्षण की सिथति पर एक तटस्थ भाव को इंगित करता है अर्थात जो है और जैसा है उसकी स्वीकारोक्ती सन्तोष है। इस अर्थ एक वास्तविक योगी महल और कुटिया में तटस्थ भाव से समान रहता है। श्रीमदभगवदगीता में समत्वं योगं उच्यते कहकर समता को ही योग कहा गया है। सन्तोष र्इष्वर का उपहार है जिसके प्राप्त होने पर स्थायी शान्ती प्राप्त हो जाती है। योगीजन इस आन्तरिक शान्ती को प्राप्त होने के कारण बाहरी शान्ती पर निर्भर नहीं रहते। महर्षी पातंजली, कबीर, रहीम आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने सन्तोष प्राप्त हो जाने के बाद किसी भी तृष्णा पूर्ती की आकांक्षा नहीं रहने संबंधी श्लोक, छन्द और कविताएं लिखी हैं जिन्हें पुन: उदधृत करना हमारा उददेष्य नहीं है। किन्तु सन्तोष का तात्पर्य अकर्मण्य हो जाना नहीं है वरन कर्मफल में आसक्ती नहीं रह जाना सन्तोष है। श्रीमदभगवतगीता के छठे अध्याय का पहला और अटठारहवें अध्याय का ग्यारहवां श्लोक इस संबंध में विषय को और अधिक स्पष्ट कर देते हैं। तदनुसार अनाश्रित: कर्मफलं कायर्ं कर्म करोति य:। स सन्यासी च योगी च न निगिर्नचकि्रय:।। और न ही देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यषेषत:, यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।।

  1. अचल अचम्भनाथ (विष्णु, शेषनाग अथवा अन्तरिक्ष) पांचवें स्थान पर अचम्भनाथ नाम से आकाष तत्त्व का उल्लेख है और इसकी प्रकृति अचल बतायी गयी है। गीता के दूसरे अध्याय के चौबीसवें श्लोक-अच्छेधो∙यमदा∙यमक्लेधो∙षोष्य एव च। नित्य: सर्वगत: स्थाणूर्चलो∙यं सनातन:।।

के सन्दर्भ में यह तत्त्व स्थायित्व लिये सर्वत्र व्याप्त आत्मा का धोतक है। स्थायी होने के कारण अमरत्व के समस्त गुण अर्थात अकाटय, अभेध, अषोष्य, अदाहय आदि इसमें समाहित हैं। इन दोनों तत्त्वों पर आगे विचार किया जावे तो ये सभी तत्त्वगुण एक ही परमसत्ता आत्मा की ओर संकेत करते हैं जो, सम्पूर्ण सृष्टी में व्याप्त है। पृथ्वी को अपने फन पर सिथर और अचल भाव से धारण करने के कारण शेषनाग को भी अचलनाथ कहा जाता है किन्तु यहां सूर्य और चन्द्र नाडी में लय के द्वारा वायु को सिथरअचमिभत अर्थात अचल कर देने की कि्रया भी संकेतित हो सकती है। जो भी हो, सम्पूर्ण सृष्टी नित्य गतिमान है केवल वायु से बना (बोलचाल में अन्तरिक्ष) आकाष ही सिथर और अचल है। यह एक विलक्षण तथ्य है कि वायु भी सिथर नहीं है और एक निषिचत परिधी के बाद आकाष वायु रहित हो जाता है, संभवत: योग की यही विलक्षणता योगियों का ध्येय है।

  1. गजबेली कन्थड नाथ (गणेष) छठे स्थान पर हाथी को कन्थड़नाथ नाम दिया है। इस सम्बन्ध में कोर्इ बहुत तार्किक तथा सटीक अनुमान उद्वेलित नहीं होता। हाथी को ही क्यों कन्थड़नाथ का स्वरूप अथवा प्रतीक बताया गया? इस विषय पर विचार करते हैं तो दो अनुमान प्रकट होते हैं। पहला यह कि आदिनाथ षिव ने हाथी की खाल को अपना कन्थाकन्थड़ी (अधोवस्त्र) बनाया। बेली का अर्थ साथी तथा गज का अर्थ मर्यादा भी होता है। संक्षेप में तात्पर्य यह कि नाथ सम्प्रदाय के मनीषियों द्वारा अपने प्रथम आराध्य षिव द्वारा हाथी के चर्म को यह सम्मान देने के कारण इसे नवनाथों में समिमलित किया गया होगा। इस अनुमान को स्वीकार करने का यह तर्क अत्यन्त कमजोर है। इस आधार पर तो षिव द्वारा अपने शरीर पर धारण की गयी समस्त विचित्रताओं को नाथान्त नाम से इस सूची में लेना होगा। दूसरा अधिक सटीक किन्तु फिर भी विवाद योग्य अनुमान यह है कि, हाथी सृषिट निर्माण में प्रयोग किये गये स्थूल तत्त्वों का प्रतीक है। यधपि स्थूलता के दृषिटकोण से देखा जावे तो किसी अन्य जीव को प्रतीक बताया जा सकता था। किन्तु इस क्रम में गज अथवा हाथी के सर्वाधिक सम्मानित व प्रचलित नाम गणेष पर विचार किया जावे तो बहुत विलक्षण तथ्य प्रकाष में आते हैं।

गणेष अर्थात समूह का नेतृत्व करने वाला जो रिद्धि और सिद्धियों का देने वाला है। गणेष के अन्य नामों में विघ्नेष अर्थात विघ्न उत्पन्न करने वाला और विघ्नेष्वर अर्थात विघ्न समाप्त करने वाला प्रस्तुत विषय के सन्दर्भ मे विषेष उल्लेखनीय है। इस प्रकार किसी कार्य के निर्विघ्न संचालन एवं सफल समापन गणेष की अनुकम्पा पर निर्भर करता है। स्पष्ट है कि भौतिक समृद्धि रिद्धि और आध्यातिमक शकित सिद्धि गणेष की कृपा से ही संभव है। योग मार्ग के पथिक को आरंभिक सिथति में ये रिद्धि और सिद्धि उसके मुख्य उददेष्य से भटकाती है। हिन्दू मतानुसार इनिद्रयों का देवता इन्द्र हमेंषा सन्यासियों को उनके पथ से विचलित करने का प्रयास करता रहता है जिससे कि जीवों पर हमेंषा उसका नियन्त्रण बना रहे। वह अपने इन्द्रजाल के माध्यम से योगियों और सन्यासियों को उनकी साधना को सफल नहीं होने देना चाहता। योगियों की साधना की आरंभिक सफलता में ही योगी को समृद्धि, शकित और यष प्राप्त हो जाता है। जो लोग स्वयं को माया (मा¾ नहीं है, या¾ जो अर्थात जो नहीं होकर भी है अथवा जो होकर भी नहीं है वह माया है) से दूर रखने का प्रयास करते हैं तातिवक रूप से उनकी साधना असफल होने का अन्देषा रहता है। यही कारण है कि भौतिक सुखों के त्याग और इनिद्रयों के सुखों पर विजय की अपेक्षा भौतिक सुखों से सन्यास और इनिद्रयों पर नियन्त्रण प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। माया से भागने की अपेक्षा उससे अप्रभावित रहने की षिक्षा पर जोर देते हैं। यह निर्विवादित है कि अवसर मिलने पर त्याग’ पुन: भौतिक सुखों की ओर लालायित होगा और जीती हुर्इ इनिद्रयां पुन: अपने व्यवहार की ओर उन्मुख होगी किन्तु भौतिक सुखों से सन्यास और माया से अप्रभावित व इनिद्रयों पर नियन्त्रण प्राप्त हो जाने की सिथति में यह आषंका नहीं रहती।

फिर भी इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि अपनी शकितयों पर अति विष्वास योगी को पथभ्रष्ट कर सकती है। जिस प्रकर अगिन के बिना भोजन नहीं पकाया जा सकता उसी प्रकार तप की अगिन के बिना योग को प्राप्त नहीं किया जा सकता। नाथयोगियों की इसी परंपरा से महायोगी गोरक्षनाथ को भी अनेक बार महामाया की अगिन परीक्षा का सामना करना पडा। जो लोग भौतिक सुखों से जुडे रहते हैं वे उनमें लिप्त होकर भोगी और जो त्याग की आड में जीवन की चुनौतियों और दुष्वारियों से भागते हैं वे मुकित का मार्ग प्राप्त नहीं कर सकते। जहां बन्धन है मुकित उसी स्थान से हो सकती है। शान्त और अनुकूल परिसिथतियां एक कच्ची कृपाण की तरह सुरक्षा का सामयिक भ्रम तो उत्पन्न कर सकती है किन्तु वास्तविक अवसर आने पर उसकी कोर्इ उपादेयता सिद्ध नहीं हो सकती। माया की परीक्षा से निकले अपने पथ और अनुषासन के पक्के माया से अप्रभावी रहने वाले योगियों और केवल शान्त व अनुकूल परिसिथतियों में चुनौतिया से बचकर रहने वाले त्यागी और जितेन्द्र उपमा वाले साधकों के मध्य यही अन्तर सिथति है। योगियों के लिये योगारूढ़ होना गणेष (विघ्नेष-विघ्नेष्वर) की कृपा के बिना संभव नहीं है किन्तु योगी को उस समय सावधान रहने की आवष्यकता है जब योग के मार्ग में रिद्धि एवं सिद्धियां अनायास ही प्राप्त होने लगती है जिससे कि वह माया के अधीन होकर पुन: माया क्रीडा में उलझ कर न रह जावे।

शास्त्रों के अनुसार महादेव द्वारा शीष विच्छेद के बाद गणेष को इन्द्र के ऐरावत हाथी का शीष काटकर लगाया गया जो सामूहिक रूप से इनिद्रयों की अविभक्त शकित व संपतियों का प्रतीक है। गणेष के दो हाथों में पाष (पशुओं के गले में डाला जाने वाला फन्दा) और अंकुष है जिनका सांकेतिक अर्थ है। पाष जीव के त्रिआयामी बन्धन अण्व, कर्म और माया का प्रतिनिधित्व करता है। पाष वह शकित है जिससे स्वामी अपने पशुओं (यहां तात्पर्य जीव से है) को गन्तव्य की ओर ले जाता है और आवष्यकता पडने पर अंकुष का प्रयोग करता है।

  1. चौरंगी नाथ (चन्द्रमा) सातवें स्थान पर वनस्पतियों के जीवनदाता चन्द्रमा को चौरंगीनाथ नाम दिया है। शाबिदक अर्थ के सन्दर्भ में चौरंगीनाथ एक अंगविहीन पुरूष किन्तु पूर्ण ज्ञान का प्रतीक है। नाथ सम्प्रदाय में चन्द्रमा भ्रूमध्य में सिथत आज्ञा चक्र से संबंधित है और तीसरे नेत्र के रूप में भी जाना जाता है। नाथ साहित्य और साधना के सन्दर्भ से देखें तो आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य) ही वह स्थान है जहां से निरन्तर अमृत निसृत होकर सूर्य (स्वाधिष्ठान चक्र) में गिर कर नष्ट हो रहा है। इसी अमृत को नष्ट होने से बचाना योगियों और हठयोग (सूर्य और चन्द्रमा की युति) का ध्येय है जो स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र को नियनित्रत किया जाकर संभव है। जब कुण्डलिनी शकित जागृत होकर सुषुम्णा मार्ग में प्रवृत होती है तो शरीर विदेह अवस्था (वह अवस्था जिसमें शरीर के अंग व इनिद्रयां इस प्रकार अन्तर्मुखी होकर निष्चेष्ट हो जाती है जैसे कि उनका असितत्व ही न हो) को प्राप्त होकर विषुद्ध रूप से केवल मसितष्क चेतन रहता है। नवनाथों की सूचियों में कहीं-कहीं चौरंगीनाथ को कूर्मनाथ भी अंकित किया गया है जो श्रीमदभगवदगीता के दूसरे अध्याय के 58वें श्लोक में चर्चित व उपदेषित कूर्म युकित को प्रतिबिमिबत करता है। तदनुसार यदा संहरते चायं कूर्मो∙गानीव सर्वष:, इनिद्रयाणीन्द्रयार्थे प्रज्ञा प्रतिषिठता।। अर्थात जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है उसी भांति जो पुरूष अपनी इनिद्रयों को इनिद्रयविषयों से हटा लेता है, उसकी बुद्धि सिथर है।

आज्ञा चक्र (चन्द्र स्थान) से निसृत होने वाले अमृत (सोमरस) के प्रसंग में हठयोग प्रदीपिका के तीसरे अध्याय का 45वां और 46वां श्लोक उल्लेखनीय है। तदनुसार नित्यं सोम-कला-पूर्णं शरीरं यस्य योगिन:, तक्ष्हकेणापि दष्टस्य विषं तस्य न सर्पति।। और इन्धनानि यथा वहनिस्तैल-वर्ती छ दीपक: तथा सोम-कला-पूर्णं देही देहं ना मुनछति। अर्थात जिस योगी का शरीर सोमरस (आज्ञाचक्र से निसृत होने वाला अमृत) से पूर्ण है उसका शरीर तक्षक नाग के विष से भी अप्रभावित रहता है। इसी प्रकार जैसे तेल और बाती से पूर्ण दीपक में ज्योती बनी रहती है वैसे ही सोमरस से पूर्ण देह (शरीर) को देही (शरीरी) नहीं त्यागता। ज्ञातव्य है कि आध्यातिमक साहित्य एवं योगियों द्वारा बताये अनुसार जीव के मसितष्क में सहस्त्रदल वाले अधोमुखी कमल सहस्त्रार चक्र में सोम (चन्द्रमा) का स्थान है जिसको पीने वाला नित्य-प्रति की आवष्यकताओं से मुक्त हो जाता है।

  1. मत्स्येन्द्रनाथ (मायारूप) नवनाथों में सबसे अधिक चर्चित नाम मत्स्येन्द्रनाथ तथा गोरक्षनाथ है। मत्स्येन्द्रनाथ को माया स्वरूप कहा गया है। संस्कृत में मा का अर्थ नहीं है तथा या का अर्थ है जो। अर्थात जो नहीं है किन्तु फिर भी है और इसके उलटक्रम से जो है किन्तु फिर भी नहीं है, वह माया है। मत्स्येन्द्रनाथ को दादागुरू कहा जाता है और जिस प्रकार परिवार में पितामह को अपने प्रपौत्रों से स्नेह व अनुराग होता है मत्स्येन्द्रनाथ को भी अपने पुत्र (शिष्य) महायोगी गोरक्षनाथ के पुत्रों (शिष्यों) से अनुराग है और परिवार में पितामह का अपने प्रपौत्रों की त्रुटियों को क्षमा करने की स्वाभाविक प्रवृति वाला होने से मत्स्येन्द्रनाथ को कृपालु भी कहा जाता है। निसन्देह सीखने की किसी भी पद्धति और प्रकि्रया में षिक्षार्थी से त्रुटी होना संभव है, नाथ सम्प्रदाय के दादा गुरू मत्स्येन्द्रनाथ कृपापूर्वक उन त्रुटियों को क्षमा कर देते हैं। नाथयोगियों की मान्यता अनुसार जीवन षिव और उसकी निजाषकित का खेल है और सम्पूर्ण चराचर जगत का प्रपंच षिव द्वारा स्थापित विधि के अनुरूप ही होता है। यदि जीव इस सत्य को पहचानने में असफल होता है तो यह उसके स्वयं के विवेक और दृषिट की असमर्थता है और गुरू हमारे ज्ञान चक्षुओं को इस सत्य को पहचानने में समर्थ बनाता है। जीव जब दूसरों पर दोषारोपण की प्रवृति को छोडकर स्वयं के कर्मों के उत्तरदायित्व को स्वीकार करना प्रारंभ करता है तो जीवन का प्रत्येक क्षण स्वयं षिक्षक बन जाता है। स्वयं षिक्षा की यह प्रकि्रया अनुषासित (अनुभव द्वारा शासित) जीव को जीवन भर त्रुटि रहित षिक्षा देती है जिससे योगी में विष्वास, विनम्रता एवं विषुद्ध व्यवहार के गुणों का स्थायी वास हो जाता है और तब कुण्डलिनी शकित जागृत होकर निरन्तर, निर्बाध व नि:षेष रूप से सुषुम्णा नाडी में गमन करती है।

शरीर में जीव (आत्मा (विष्णु) का पुत्र) मत्स्येन्द्रनाथ का प्रतीक है, जो मछली के समान चंचल इनिद्रयों वाला है। यह जीव शरीर के सम्पूर्ण भागों में विचरण करता है। वासना से संबद्ध होने के कारण अपनी रुचि के विषय से साक्षातकार होने पर वह अपने मूल स्वरूप को भूल जाता है और आनन्दरत रहते हुए संयम को अस्वीकार करने लगता है। वासनाओं के इस जाल में उलझे हुए मत्स्येन्द्रनाथ अर्थात जीव को गोरक्षनाथ अर्थात इनिद्रयनिग्रही विचार से ही मुकित मिलती है। घट अर्थात शरीर और पिण्ड अर्थात शरीरस्थ समस्त तत्त्वों की नित्य और निरन्तर रक्षा करने के कारण गोरक्षनाथ अर्थात इनिद्रयनिग्रही विचार का नाम शम्भुयति कहा जाकर उन्हें बाल स्वरूप कहा गया है।

  1. गोरक्षनाथ (बाल रूप) महायोगी गोरक्षनाथ को षिव का अवतार मानते हैं और षिवस्वरूप मानने के कारण ही षिवगोरक्ष की संज्ञा से उच्चारित करते हैं। यधपि आदिनाथ सृष्टी के प्रथम देव हैं किन्तु गोरक्षनाथ ने योगाभ्यास द्वारा स्वयं को उससे एकात्म कर लिया और इस प्रकार गोरक्षनाथ व आदिनाथ भिन्न नहीं है। गोरक्षनाथ नवनाथों में सर्वोपरि है और पवित्रता में आदिनाथ से अभिन्न होते हुए सृष्टी संचालन के लिये विभिन्न काल एवं भूखण्डों में प्रकट होते हैं। महायोगी गोरक्षनाथ का विषद वर्णन (हमारे ज्ञान की सीमा के अनुसार) तो पृथक से अगले अध्याय में करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत प्रसंग में नवनाथों के स्वरूप को समझने के प्रयत्न में उनके बालरूप से मिलने वाला संकेत हमारा लक्ष्य है। गोरक्षनाथ को एक बालक की भांति निष्कपट, निष्पाप और निर्मल होने से पार्वती का ऐसा पुत्र भी कहा जाता है जो सृष्टी के नियमों से परे अद्वैत है और सभी देव, दानव, नर, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, नाग, वानर, जलन्द, परन्द, चर, अचर, उभयचर आदि जीवों के नैसर्गिक गुण मैथुन से नितान्त नि:षेष होने के कारण जती (यती अर्थात जगत प्रपंच से अनासक्त) है। यती एक बालक की वो अवस्था है जहां उसे अपनी नग्नता का कोर्इ आभास भी नहीं है। महायोगी गोरक्षनाथ अयोनिज (जिसकी उत्पति मैथुन जनित परिणाम न हो) है किन्तु सूर्य और चन्द्रमा की युति का माध्यम होकर भी वह उससे अप्रभावित ही रहता है। षिव ही कि तरह महायोगी गोरक्षनाथ के भी तीन नेत्र हैं। बायां नेत्र चन्द्रमा, दाहीना नेत्र सूर्य और भ्रूमध्य में ज्ञानचक्षु है जिसे षिव नेत्र भी कहा जाता है। प्रथम देव आदिनाथ के सदृष्य होने से महायोगी गोरक्षनाथ को स्वयं ज्योतिस्वरूप (जो स्वयं की ज्योती से प्रकाषित है) भी कहा जाता है। षिव से एकात्म हो चुका योगी जब स्वयं में, सर्वत्र और समस्त तत्वों में षिव का ही प्रतिबिम्ब देखता है तो अद्वैत हो चुके योगी के लिये कुछ भी धृणित और भयकारक नहीं रह जाता क्योंकि उसे सब में स्वयं का ही आभास होने लगता है। श्रीमदभगदगीता में श्रीकृष्ण ने छठे अध्याय के 30वें श्लोक में यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति, तस्याहं न प्रणष्यामि स च मे न प्रणष्यति।। कह कर इस अद्वैत दर्षन को समझाया है तो नाथयोगियों द्वारा घट-घट वासी, गोरक्ष अविनाषी, टले काल मिटे चौरासी।। कह कर गोरक्ष (षिव) के सर्वत्र व सभी में व्याप्त होने की अवधारणा की जाती है।

नवनाथों के स्वरूप चिन्तन में आदिनाथ के ओंमकार स्वरूप से लेकर गोरक्षनाथ के बाल स्वरूप तक जीव की उत्पती से उसके पूर्ण विकास पर्यन्त जिन नौ सिथतियों का प्राकटय होता है वह विलक्षण है। सभी जीवों व तत्वों की उत्पती ओंमकार स्वरूप (आदिनाथ) से, प्राकटय धरती स्वरूप (उदयनाथ) से, पोषण जल स्वरूप (ब्रहमा) से, स्थायित्व तेजस्वरूप (सन्तोषनाथ विष्णु) से, जीवन की सार्वभौम एवं सर्वकालिक सत्ता आकाष स्वरूप (अचलनाथ) से, जीवन यापन के समस्त साधन व सामथ्र्य गणेष स्वरूप (गजबेली गज कन्थडनाथ) से, ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ती चौरंगीनाथ से, विभिन्न विषयों में प्रयोग मायारूपी (मत्स्येन्द्रनाथ) से और उक्त सभी कि्रयाकलापों सहित सत्य तत्व का मार्ग प्रषस्त करने वाला इन्द्रीयनिग्रही विवेक बालस्वरूप (षम्भूयती गोरक्षनाथ) से प्राप्त होता है।
पूर्ववर्ती पंकितयों में हमने जीव की देह के बाहरी विकास एवं जगत प्रपंच के दृषिटकोण से विचार करने का प्रयास किया। यदि देह के भीतर ही इन नवनाथों की सिथति का दर्षन करें तो भी इसी प्रकार की विलक्षणता का अनुभव होता है। योगवेत्ताओं के अनुसार जब कुण्डलिनी जागृत हो जाती है तो शरीस्थ मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विषुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, को भेदती हुर्इ सहस्त्रार चक्र में पहुंचती है। जीव के शरीर में ये सात चक्र कहीं दादा गुरू मत्स्येन्द्रनाथ और महायोगी गोरक्षनाथ से इतर शेष सात नाथों के स्थान तो नहीं? यदि यत पिण्डे तत ब्रहमाण्डे की अवधारणा के दृषिटकोण से देखा जावेे तो मानव शरीर में मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विषुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्त्रार चक्र क्रमष: उदयनाथ, सत्यनाथ, सन्तोषनाथ, अचलनाथ, गजबेली कन्थडनाथ, चौरंगीनाथ और आदिनाथ के स्थान हैं और वृहद रूप में जिस प्रकार सृषिट को संचालित करते हैं उसी प्रकार सूक्ष्म रूप में जीव के नियन्ता हैं। मत्स्येन्द्रनाथ शरीस्थ सिथतियों, सिथतियों के प्रति हमारी पृवृति और व्यवहार तथा गोरक्षनाथ उक्त सभी द्वारा संचालित की जाने वाली इनिद्रयों को नियन्त्रक होकर भी उन इनिद्रयों के कि्रयाकलापों से निर्लिप्त विवेक शक्ती है। श्रीमदभगवतगीता के पांचवें अध्याय के सातवें श्लोक अनुसार योग की शाष्वत सिथति को प्राप्त योगी जिसका अन्त:करण पूर्णतया शुद्ध हो गया है, जिसकी दृषिट समस्त तत्वों में अपनी छवि देखती है वह प्रकटत: कि्रया करते हुए भी अपने कमोर्ं से नहीं बन्धता। योगयुक्तो विषुद्धात्मा विजितात्मा जितेनिद्रय:, सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।

नवनाथों के स्वरूप के संबंध में विचार और चिन्तन करते हुए अनेक अनुमान उद्वेलित हुए हैं। शरीर में किसी भौतिक अंग की भांति नहीं होने पर भी चक्रों के सिथतिक्रम और उनकी ऊर्जा से नवनाथों को संबद्ध करते हुए एक ऐसा वैज्ञानिक सत्य प्रकट होता है जिसके लिये शोध किया जाकर एक पृथक ग्रन्थ लिखा जा सकता है। फिलहाल महायोगी गोरक्षनाथ के संबंध में गोरक्षनाथ नामक अगले अध्याय में विस्तृत चर्चा करेंगें।

नवनाथों के साथ चौरासी की संख्या ही अज्ञात समय से न केवल नाथ और बौद्ध पंरपरा वरन सभी धार्मिक समूहों में बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। विभिन्न स्त्रोतों में चौरासी सिद्ध, चौरासी लाख योनियां, चौरासी लाख आसन जिनमें से वे चौरासी आसन प्रमुख हैं जो प्रत्येक एक लाख आसन का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इस प्रकार चौरासी की संख्या का असितत्व अकस्मात अथवा संयोग से नहीं होकर अवष्य ही किसी अदृष्य तर्क किसी अज्ञात सिद्धान्त अथवा विधि से संबद्ध होना चाहिये। कल्पना किसी अनुमान को उद्वेलित नहीं करती।

नाथयोगियों की षिक्षाओं को गहनता से समझने का प्रयास करने वाले को शीघ्र ही नाथयोगियों द्वारा पूजित नवनाथ चौरासी सिद्धों से परिचित होना आवष्यक हो जाता है। सभी ग्रन्थों में इन नाथयोगियों की संख्या अनुषासनिक रूप से नौ एवं चौरासी है किन्तु जब यह जानने का प्रयास किया जाता है कि यह संख्या नौ और चौरासी ही क्यों है, ये नवनाथ और चौरासी सिद्ध कौन हैं और उनका जीवन परिचय क्या है? तो कोर्इ सन्तोषप्रद उत्तर प्राप्त नहीं होता वरन अनेक विरोधाभाषी विचार और कहानियां प्रकट होती है जिनसे इस बारे में कोर्इ सटीक अनुमान लगाया जा सकना या निष्कर्ष निकाल पाना संभव नहीं होता। यह पहेली आज तक अनसुलझी होकर शोधकर्ताओं के लिये इस सम्प्रदाय को समझ पाना एक मुषिकल कार्य बना हुआ है। फिर भी हमें याद रखना होगा कि विष्व में अनेक ऐसे रहस्य हैं जिनका कोर्इ तार्किक, सहज और बोधगम्य स्पष्टीकरण नहीं है किन्तु वे निरर्थक नहीं है। कहीं कोर्इ कडी टूट गयी है और हो सकता है इन रहस्यों के वे अदृष्य और आन्तरिक तार्किक सिद्धान्त हम आधुनिक मानवों की समझ में नहीं आये हों जो सतही रूप से दृष्यमान नहीं है। षिव द्वारा पार्वती को अमरकथा बताये जाने के सन्दर्भ में नाथयोगियों की षिक्षा व कि्रयाकलापों की प्रकृति गहन एवं अत्यधिक गोपनीय है और केवल पूर्णरूपेण दीक्षित योगी द्वारा अपनी अन्तदर्ष्टी एवं अनुभव से ही इन्हें जाना जा सकता है। भौतिक जगत के सदृष्य ही आध्यातिमक जगत के भी सर्वकालिक नियम हैं जो किसी पंथ या धर्म पर आश्रित नहीं है। चूंकि धर्म की अवधारणा मानव द्वारा सृजित है जो सामयिक तौर पर सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित है जबकि आध्यातिमक नियम सनातन है। नौ और चौरासी की संख्या के गणितीय स्पष्टीकरण पर विचार करें तो 12 राषियों और 7 ग्रहों का गुणनफल 84 आता है। (हालांकि हिन्दू मान्यता अनुसार राहू और केतु (छाया ग्रहों) को भी मुख्य ग्रहों में शामिल किया गया है तदनुसार 9 ग्रहों और 12 राषियों की अवधारणा से यह संख्या 108 होती है)। भारतीय सन्दर्भ के अतिरिक्त 9 और 84 की संख्याओं को विष्व की प्राचीनतम सभ्यता मिश्र, बार्इबल की कथाओं और नाथ संप्रदाय के सहमार्गी बौद्ध मत के साथ अध्ययन करें तो बहुत अधिक विस्मयकारी तथ्य प्रकट होते हैं। श्

यह आष्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि ये 9 एवं 84 की दो रहस्यमयी संख्याएं मिश्र की धरती से आयी हैं जहां ये दोनों संख्याएं मिश्र के पिरामिडों के रूप में एक साथ प्रयोग की गयी हैं। मिश्र के पिरामिडों को उन बीजभूत टीलों का प्रतिनिधी माना जाता है जिनसे पृथ्वी की उत्पतित हुर्इ है। पिरामिडों के निर्माण की संख्या के योग का परीक्षण करते हैं तो 84 की सख्यां वास्तव में चमत्कृत करती है। इसी प्रकार सृष्टी रचना संबंधी विभिन्न ग्रन्थों में भी मिश्र के पिरामिडों की त्रिआयामी संख्या 1-3-5-7 प्रकट होती है। सृष्टी रचना संबंधी मिश्र की प्राचीनतम किंवदन्ती अनुसार जब प्रथम देवता (आदिनाथ) प्रकट हुआ तो उसे सिथत होने के लिये कोर्इ स्थान नहीं था। उसके अवस्थान के लिये ये टीला (ठमद.इमद) प्रकट हुआ जो कि प्राय: सूर्य उपासना के निमित्त होने का भ्रम उत्पन्न करता है। सृष्टी निर्माण संबंधी मिश्र के ग्रंथों के अनुसार सृषिट का आविर्भाव सृषिट के देवता नवनाथों के रूप में हुआ जिनका एक अघिष्ठाता देव आदिनाथ है। अब स्थान के अनुसार उन नौ देवताओं और उस अधिष्ठार्इ देव के नाम में अन्तर हो सकता है। यह विवाद का विषय भी नहीं है। नाथयोगियों द्वारा उन नौ देवों को ही नवनाथ कहा जाता है जो प्रथम देव (आदिनाथ) को मध्य में स्थापित करने के लिये आठ दिषाओं में प्रकट हुए। इससे पूर्व कुच्छ भी नहीं था किन्तु इन नौ देवों (क्योंकि मिश्र के सन्दर्भ में चर्चा की जा रही है अत: यहां नवनाथ पद के स्थान पर नौ देव पद का प्रयोग कर रहे हैं) के प्रकट होते ही समस्त सृषिट अपनी पूर्ण पेचीदगियों सहित प्रकट हो गया। यह धारणा नाथयोगियों की षिक्षाओं व मान्यताओं के इतने निकट है कि दोनों के मध्य कोर्इ अन्तर ही नहीं रह जाता। यदि सूर्य और चन्द्र गतिमान हैं तो सृषिट अवष्यंभावी है और यदि निर्माण को विराम देना है तो इन दोनों को आराम दिये जाने की आवष्यकता है।

इस स्थान पर तीन चित्र दिये गये हैं किन्तु वे वेब पर प्रकट नहीं हो रहे।

पिरामिडों के सर्वोच्च षिखर (ठमद.इमद) की अवधारणा और शीवलिंग में समानता दृष्टव्य और विचारणीय है। भारत में ऐसे अनेक षिवलिंग हैं जिनमें मुख्य लिंगाकृति अष्टकोणीय आकृति से धिरी हुर्इ है उदाहरणार्थ वाराणसी (बनारस) का भैरों मनिदर। पाष्चात्य विद्वान जी.डब्ल्यू. बि्रग्स ने अपनी पुस्तक गोरक्षनाथ एण्ड कनफटा योगीज में इस षिवलिंग का सटीक वर्णन किया है और मुझ लेखक द्वारा अपनी माता की इच्छानुसार अपने पिता षिवलीन योगी श्रीमानसिंह तंवर के पिण्डदान हेतु की गयी गयातीर्थ की यात्रा से लौटते समय इस षिवलिंग के दर्षन करने का अवसर मिला। जी.डब्ल्यू. बि्रग्स के शब्दों मेंरू ष्प्ज बवदेपेजे व नहमए बवचचमत.बवअमतमकेजवदम सपदहंए चंपदजमक तमकण् प्ज पे इवनज मपहीज मिमज पही दक इवनज जूवदक वदम स मिमज पद कपंउमजमतए पेपजनंजमक वद संतहमए पहीऐजवदम चसंजवितउ दक पेनततवनदकमक इल ससण् म्पहीजेउंसस चसंजवितउेनततवनदक जीम सपदहंण्ष् ठीक यही अवधारणा विभिन्न आध्यातिमक एवं धार्मिक यन्त्रों में प्रतिबिमिबत होती है। नाथयोगियों की एक वाणी में भी कहा गया है कि अष्ट कमल में तेरे खेल अवधू वरना सब झूठा रे।

इसी प्रकार र्इसार्इयों के पवित्र ग्रंथ में चौरासी की संख्या का सन्दर्भ देखें तो बार्इबल के मैथ्यू 10:5-15 मार्क 6:7-13 में उल्लेख है कि जीसस ने अपने 12 षिष्यों का बुलाया और उन्हें दुष्ट आत्माओं को निकाल बाहर करने व बीमारियों को ठीक करने की शकित दी और र्इष्वर की राजधानी में धर्मोपदेष के लिये भेजा। उसके बाद 72 अन्य षिष्यों को दो-दो के जोडे में उन स्थानों पर भेजा जहां उसे स्वयं को जाना था। सभी षिष्यों ने लौटकर खुषीपूर्वक कहा कि हे पिता, दुष्ट आत्माओं ने भी आपके नाम का आश्रय लिया है। तब जीसस ने कहा कि उसने शैतान को स्वर्ग से बिजली की तरह गिरते हुए देखा है। उसने आगे कहा कि मैने तुम्हे सांप और बिच्छुओं को कुचल डालने और दुष्मन की समस्त ताकत पर अधिकार करने का अधिकार दिया है, तुम्हें कोर्इ हानि नहीं होगी। इस बात से प्रसन्न मत हो कि बुरी आत्माओं ने समर्पण किया है किन्तु इस बात से प्रसन्न होना कि तुम्हारा नाम स्वर्ग में लिखा गया है। उल्लेखनीय यह है कि जीसस द्वारा भेजे गये षिष्यों की संख्या 12+72 ¾ 84 होती हैं।

यह संयोग भी हो सकता है और वास्तविकता भी कि मिश्र की उक्त मान्यताएं नाथयोगियों की मान्यता की छाया प्रतिलिपि के सदृष्य है और यही कारण है कि महायोगी गोरक्षनाथ को किसी स्थान विषेष और किसी कालखण्ड तक सीमित नहीं मानते हुए उनके प्रभाव और व्यकितगत उपसिथति को पारंपरिक भारतीय सीमा और समय रेखा से दूर तक विस्तारित किया जा सकता है। षिवलिंग का सर्वोपरी हिस्सा पारा बिन्दू का स्थान है जो सृषिट प्रारंभ से पूर्व है और जब पारा नीचे की ओर निसृत होता है तो सृषिट प्रारंभ हो जाती है। इसी प्रकार जब सूर्य और चन्द्र (ह-सूर्य व ठ-चन्द्र और हठयोग) एकाकार हो जाते हैं तो कुण्डलिनी जागृत होकर पारे (वीर्य) के मेरू पर्वत षिखर (मेरूदण्ड का सर्वोच्च भाग) पर पहुंचती है। इस अवधारणा का ही प्रतिरूप पिरामिड के षिखर (ठमद.इमद) पर तीन रेखाओं के रूप में देखा जा सकता है जो आदिनाथ षिव के त्रिषूल के समान है। यहा यह उल्लेखनीय है कि जहां 84 सिद्ध बौद्धमत और भगवान दत्तात्रेय के जूना अखाडा की विभिन्न परंपराओं में प्रतिषिठत और पूजित हैं वहीं इन 84 सिद्धों के साथ नवनाथ केवल परंपराओं में ही प्रकट होते हैं। नवनाथों की विभिन्न सूचियों की चर्चा हम नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति और उसके प्रारमिभक आचार्य नामक अध्याय में कर चुके हैं। हम चौरासी सिद्धों के नाम और अलग-अलग सूचियों में विसंगतियों की चर्चा नहीं कर रहे क्योंकि इस संबंध में बहुत अधिक लिखा जा चुका है। उस समस्त सामग्री का पुन: उल्लेख करना अनावष्यक विषय सामग्री और पुस्तकीय पृष्ठों का विस्तार तो होगा किन्तु उससे कोर्इ प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। किन्तु, इतना उल्लेख अवष्य करेंगें कि सिद्ध पद केवल बौद्ध और नाथ परंपरा में ही प्रयुक्त नहीं हुआ है वरन जैन, अचरंग सूत्र, हिन्दू धर्म की अन्य विभिन्न शाखाओं और पौराणिक ग्रंथों यथा स्कन्द पुराण वायु पुराण आदि में अपनी-अपनी परंपरा अनुसार परिभाषित हुआ है।







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