काँच की लम्बी चौड़ी खिड़की पर पड़े परदे की झिर्री से दृश्य चलने लगे तो श्वेता को अहसास हुआ कि गाड़ी ने सरकना शुरू कर दिया है । अब वातानुकूलित डिब्बों में सफर करना श्वेता को इसीलिये नहीं भाता कि ना तो उसमें इंजन की सीटी सुनाई देती है ना ही छोड़ने आए परिजनों को हाथ हिलाकर अलविदा ही कह पाते हैं । श्वेता अक्सर देवेश को कहती है कि उसका आरक्षण स्लीपर क्लास में ही कराना और देवेश हँस कर कह्ते-“ ...तुम भी ना श्वेता....!”
श्वेता ने गाड़ी की बढती रफ्तार के साथ ही अपना सामान चेक करने की गर्ज से सीट के नीचे झाँका...दो बड़े अटैची...एक बड़ा-सा बैग...एक कार्टून...दो ट्रोली बैग....और एक गिटार सीट के कोने पर टिका खड़ा था मानो अभी गौरव तार छेड़ेगा और बज उठेगा ।
पर गौरव तो खिड़की के काँच पर सिर टिकाए श्वेता की फिक्र से बेफिक्र चिप्स कुतर रहा था ।
शादी के बाद यह चौथा ट्रांस्फर था । हर बार तो देवेश साथ रहते थे पर इस बार गौरव की छ्ठी कक्षा की पढाई का सत्र पूरा करवाने के लिए श्वेता को ज़रूरी सामान के साथ रुकना पड़ा और देवेश एक महीना पहले ही सारे सामान के साथ अपने नियुक्ति स्थान पर चले गये । कम से कम सामान भी इतना था कि कुली करना पड़ेगा । जोधपुर में तो वीरेन दा और भाभी स्टेशन तक छोड़ने आये थे । अच्छे पड़ौसी पाए है । यही गाड़ी सीधी बिलासपुर जाती तो क्या चिंता थी पर उसे तो मेड़ता पर गाड़ी बदलनी थी । वहाँ कैसे उतारेगी सामान....फिर कैसे बदलेगी गाड़ी....पता नहीं कुली मिलेगा या नहीं...यह सोच सोच कर ही मन ही मन परेशान थी । देवेश मोबाइल पर उसे कईं बार हिदायत दे चुके थे “....कुली कर लेना.....” देवेश को मालूम है न कि श्वेता कुली करने में विश्वास नहीं करती । चार नग तो उसके लिए मामूली बात है । यूँ देवेश और श्वेता जब भी पर्यटन के लिए निकले हैं उन्होंने हमेशा अपना सामान खुद उठाया है । स्टेशन पर लाल कमीज़ वाले कुलियों को बस दूर भर से ही देखा है पर इस बार कुली बिना सामान नहीं उठ पाएगा ।
श्वेता की विचार शृंखला अभी और चलती पर उसके मोबाइल एप मेड़ता स्टेशन आने का संकेत दिख गया था । उसने सामान खींचना शुरु किया और गौरव को भी चेतावनी दी कि वो उठ जाए । पतले गलियारे और पुल-पुश के इन दरवाज़ों से सामान के साथ निकलना कौनसा आसान है । इस स्टेशन पर गाड़ी भी मात्र दस मिनट ही रुकती है । सात नगों को दरवाजे तक पहुँचाना कौनसा आसान था । पीछे मुड़कर देखा तो गौरव अपना गिटार पीठ पर लादे आ रहा था । गाड़ी धीमी होते होते प्लेटफॉर्म पर लग चुकी थी । श्वेता ने दरवाजे से बाहर झाँक कर देखा तो ठीक सामने एक नौजवान लाल कमीज और जीन्स पहने खड़ा था । श्वेता को देख कर बोला-“ मैम ! कुली लेंगी आप ? ” श्वेता ने गौर किया कि उसकी बाँह पर पीतल की प्लेट सफेद रस्सी से बन्धी थी । श्वेता को अहसास हुआ- “ हाँ यही कुली है । ”...छोटा स्टेशन....कम समय...पहले से ही कुली के मामले में चिंतित श्वेता के पास कोई विकल्प नहीं था और उसकी सौदेबाजी की लाख आदत के बावजूद सौदेबाजी की कोई गुंजाइश नहीं थी ।
“कितने पैसे ?”
“सौ रुपये ! गाड़ी भी बदलवा दूँगा ” मानो उसे मालूम था श्वेता का टूर-प्लान । इस स्टेशन पर अधिकतर यात्री गाड़ी बदलने के लिए ही उतरते हैं । श्वेता ने अपना सामान उसके हवाले कर दिया । उसने अपने माथे पर आये बालों को पीछे किया । लाल गमछे को गोल बना कर सिर पर रखा और दो बड़े अटैची उस पर मुस्तैदी से रख लिये । दो छोटे बैग एक कन्धे पर...दूसरे बड़े बैग को दूसरे कन्धे पर टांगा फिर गौरव की तरफ इशारा किया...गिटार के लिए...उसने अटैची को हाथों से ऊपर किया और अपना सिर आगे कर दिया...वह इस स्थिति में खड़ा था कि गौरव ने ना चाहते हुई भी अपने गिटार की बेल्ट उसके सिर में डालकर कन्धे पर टिका दी । अब वो श्वेता के हाथ में रखे कार्टून पर फुर्ती से लपका बांये हाथ पर बन्धी पीतल की प्लेट को श्वेता के सामने किया जिस पर 204 खुदा था और बोला “ मेरा नाम चेतन है ” और चल दिया । श्वेता हैरान थी उसकी मुस्तैदी पर । जीवन में कभी कुली ना करने वाली श्वेता के ना दिल को अच्छा लग रहा था ना दिमाग को ।
कुली का पीछा करना ज़रुरी था । श्वेता ने लम्बे-लम्बे डग भरना शुरु किया । पुल की सीढियाँ चढते हुए थोड़ी चाल धीमी हुई तो श्वेता ने मुड़कर गौरव को देखा और खींच कर हाथ पकड़ लिया । पुल के रास्ते मुख्य प्लेटफॉर्म पर आ गये जहाँ प्रतीक्षालय था । पुल पर चढते हुए कुली नम्बर 204 की नीली जींस के नीचे रंग-बिरंगे धागों वाली जोधपुरी जूतियाँ नज़र आ रही थी । कार्टून पकड़े उसके हाथ गिटार पर ऐसे पड़ रहे थे मानो अभी कोई राग छेड़ बैठेंगे ।
कुली का पीछा करते हुए उसे मालूम ही नहीं चला कि वो प्रथम श्रेणी के प्रतीक्षालय में आ चुकी थी। कुली ने सामान उतारना शुरु किया...कार्टून...बैग...फिर दूसरा बैग....फिर तीसरा बैग....फिर सिर पर पड़ी अटैची...श्वेता ने देखा उसकी पेशानी पर पसीने की बूँदें उभर आई थी। उसके गौरवर्ण चेहरे पर हल्की भूरी मूँछें उसके होंठों की मुस्कान से फैल गई थी । लाल कमीज़ की फोल्ड की हुई बाँहों से उसकी हाथों पर नीली नसों का जाल साफ दिखाई दे रहा था । अब उसके कन्धों पर पड़ा गिटार उसे बहुत बड़ा संगीतज्ञ घोषित कर रहा था । उसने गिटार की बेल्ट को कन्धे से उठा कर सिर से मुक्त कर दिया और गौरव को सौंपते हुए कहा-“ लो बाबू ! तुम्हारा गिटार खूब बजाना ”
श्वेता ने अपना पर्स खोला तो वह बोला “ मैम अभी नहीं ...पहले गाड़ी बदलवा दूँ । ”
अभी आप आराम करो...आपकी गाड़ी अभी दो घण्टे बाद आएगी..मुझे अभी और गाड़ियाँ देखनी है । यह कहकर वो चल दिया । श्वेता धम्म से बेंच पर बैठी तो उसे जाता देख मुस्कुरा उठी । श्वेता को यह कुली किसी मल्टीनेशनल कम्पनी क एग्ज़ीक्यूटिव नज़र आ रहा था । आधे घण्टे बाद वह फिर आया । बोला-“ मैम ! चाय ला दूँ । आप कहाँ जाएंगी सामान छोड़कर ” चाय की शौकीन श्वेता ने पर्स खोलते हुए अपनी सहमति दिखाई । तो उसने हाथ से इशारा कर पैसा देने से रोका
। अगले ही क्षण उसके हाथ में डिप-डिप वाली चाय के दो कप थे । उसने एक कप गौरव की तरफ बढा दिया । उसने अपना मोबाइल नम्बर बोलते हुए कहा-“ आप इसे सेव कर लें । कोई ज़रुरत हो बुला लेना । वैसे मैं गाड़ी आने से पहले आ जाउंगा । ” श्वेता की हैरानी और बढ गई थी । कुली नम्बर 204 के व्यक्तित्व में इज़ाफा होता जा रहा था । वो गाड़ी आने से 15 मिनट पहले आ गया था । बाहर बूँदा-बाँदी शुरु हो गई थी । इस बार उसके पास ट्रोली थी । उसने सामान पर प्लास्टिक की चादर डाल दी । ट्रोली को ठेलते हुए वो आगे बढ रहा था । प्लेटफॉर्म की टिन शेड पर टपा-टप की आवाज़ यह बता रही थी कि बारिश तेज हो चुकी है । श्वेता और गौरव शेड के किनारे तक आए तो बारिश देख कर ठिठक गए । उसने झट से उनके हाथ में छाता दे दिया-“ मैम ! ए.सी का डिब्बा आगे आएगा ।”
वो प्लास्टिक कवर की ओट में चल रहा था और श्वेता और गौरव छाते की शरण में थे । धड़धड़ाती रेलगाड़ी प्लेट्फोर्म पर आई तो चेतन ने ट्रोली से सामान उतारना शुरु किया । गाड़ी रुकी तो ए.सी. डिब्बे का दरवाज़ा चार कदम पर ही था । चेतन का अन्दाज़ सही था । अब तक श्वेता ने भी उसे चेतन नाम से सोचना शुरु कर दिया था । मल्टीनेशनल कम्पनी जैसी सर्विस देने वाले को कुली कैसे कहा जा सकता है । चेतन ने पहले श्वेता औए गौरव को चढाया और सीट तक चलने का इशारा किया । फिर उसने एक झटके में सारा सामान गाड़ी में लाद दिया और सीटों के नीचे जमा दिया । श्वेता ने पर्स खोलकर सौ का नोट उसके हाथ में रखा तो उसने हाथ जोड़ कर अभिवादन किया और गौरव की तरफ हाथ मिलाने की गरज से अपना हाथ बढा दिया । “ कोई दिक्कत तो नहीं हुई मैम
”श्वेता समझ ही नहीं पा रही थी कि उसे क्या कहे । जिस फुर्ती से वो आया था उसी फुर्ती से गाड़ी से नीचे उतर गया ।
गाड़ी सीटी दे चुकी होगी तभी गाड़ी की खिड़की से दृश्य सरकना शुरु हो गये थे । श्वेता ने अपना सिर काँच की खिड़की से टिका दिया कि वो चेतन की एक झलक देख कर उसे अलविदा कह सके ।



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