श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-अनुवाद

1. मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघ्यते गिरिम |

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानंद माधवं ||

जिन परम आनंद धाम श्री भगवान् जी की कृपा से एक गूंगा व्यक्ति भी बोल पाता है, एक लंगड़ा व्यक्ति भी पर्वतारोहण करने योग्य हो जाता है; अर्थात समस्त असंभव प्रतीत होने वाले कार्य संभव हो जाते हैं, उन परम करुणानिधान भगवान को मैं (भक्त) प्रणाम करता हूँ | वह भगवान मुझे माया के वशीभूत होने से बचाये |

2. नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः || (2 ,23 )

मानव की आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, न ही अग्नि इसे जला सकती है; जल इसे गला नहीं सकता, न ही वायु इसे सुखा सकती है | अर्थात मानव मात्र देह नहीं है, जो वास्तविक मानव है, वह उस परम सत्ता का एक सात्विक अंश है व दैहिक कष्टों से परे है और अनश्वर भी |

3. धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः |

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संडाय ||

जब कुरुक्षेत्र के कौरव-पांडव सेनाओं सहित युद्ध हेतु पहुंचे तब राजमहल में महाराजा धृतराष्ट्र उत्सुकतावश दिव्यदृष्टि प्राप्त संजय से कहते हैं,"हे संजय ! मुझे युद्धभूमि का हाल कह सुनाओ कि मेरे व पाण्डु पुत्र वहां क्या कर रहे हैं |"

4. कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः |

धर्मे नष्टे कुलं कुत्स्नमधर्मोभिभवत्युत || (1, 40)

अर्जुन; कौरवों से युद्ध से कुल की हानि होगी, यह सोच कर कहते हैं,"यद्यपि कौरवों ने लोभ करके बुरा किया परन्तु मैं यदि अपने अधिकार की रक्षा के लिए युद्ध करूँगा तो कुल नष्ट हो जायेगा, साथ ही कुल-धर्म भी | इस प्रकार सम्पूर्ण कुल में पाप फ़ैल जाने की संभावना है | " अर्थात अर्जुन युद्ध करना नहीं चाहते |

5. न कांक्षें विजयं कृष्ण न च राज्यम सुखाानि च |

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||

"हे कृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राजसुखों की मुझे लालसा ही है | (जो राज्य अपने ही बंधु-बांधवों को मार कर प्राप्त हो ) हे गोविन्द ! ऐसे राज्य और सुख से लाभ ही क्या है ?"

6. एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत |

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ||

संजय ने कहा,"हे धृतराष्ट्र ! अर्जुन के रथ को कौरव पांडव सेनाओं के मध्य खड़ा कर श्रीकृष्ण भगवान ने कहा कि भीष्म व द्रोणाचार्य जी सहित इस सम्पूर्ण कौरव सेना को ध्यान से देख |"

7. क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते |

क्षुद्रम हृदय दौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || (2 , 3)

पार्थ सारथि,"हे परन्तप ! तू मोह के वशीभूत हो अकर्मण्यता को अपना रहा है, जो तेरे लिए सर्वथा अनुचित है | अतः संकीर्ण ह्रदय की दुर्बलता को त्याग कर उठ व कर्तव्योन्मुख हो जा |"

8. वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि गृहाणि नरोपराणि |

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि सम्पाति नवानिदेहि || (2, 22)

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्रों को धारण करता है, ठीक उसी प्रकार जीवात्मा पुरानी देह त्याग कर नयी देह को धारण करता है |

9. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |

मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोस्त्वकर्मणि || (2, 47)

भगवान अर्जुन से कहते हैं,"मनुष्य को कर्म करने का अधिकार प्राप्त है, परिणाम पर उसका अधिकार नहीं है | अतः तू कर्म के परिणाम के विषय में चिंता न करते हुए केवल (करणीय) कर्म की राह को अपना ले |"

नोट: यहाँ परिणाम के विचार को त्याग देना कठिन प्रतीत होता है | अतः यह स्पष्ट होना आवशयक है कि परिणाम की चिंता करते रहने से मानव के कर्म की गुणवत्ता नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकती है | एक बार निर्णय लेते समय जानना होता ही है कि कर्म करना उचित है या नहीं या इसका परिणाम घातक तो नहीं होगा |

10. स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव |

स्थित धीः किं प्रभाषेत किमासीतब्रजेत किं ||

अर्जुन भगवान से पूछते हैं,"हे प्रभु ! आप मुझे बताएं कि जो व्यक्ति परमात्मा की राह पर हैं, स्थित प्रज्ञ अर्थात स्थिर बुद्धि युक्त हैं, उनके क्या लक्षण हैं ? वे मनुष्य कैसा व्यवहार करते हैं ?"

11. यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |

अभ्युथानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम || (4, 7)

भगवान माधव कहते हैं,"हे भारत ! जब जब पृथ्वी पर अधर्म का साम्राज्य बढ़ जाता है तथा धर्म पर संकट आता है (अर्थात मानवता की हानि होती है); तब तब मैं धर्म के उत्थान के लिए पृथ्वी पर साकार रूप में प्रकट होता हूँ |

नोट: एक सामान्य प्रश्न है कि आज कहाँ है भगवान? जो अवतार नहीं ले रहे | आज दुनिया में इतने पाप हो रहे हैं, अब भगवान धरती पर कब आएंगे ? क्या बहुत देर नहीं हो जायेगी?

उत्तर: प्रत्येक मनुष्य ही प्रभु का अवतार है | जन्म से प्रभु की कक्षा में निर्मित व्यक्ति का अन्तः करण पवित्र होता है | यदि उस पर उम्र बढ़ने के साथ कलुष न जमे व कर्तव्यबोध रहे तब प्रत्येक व्यक्ति अंशावतार होगा ही और पूर्णावतार भी | यह ऐसे ही है जैसे घर में माँ अकेली सारे घर के काम निपटाएं, तो माँ को हमेशा 'सावधान' की मुद्रा में रहना पड़ता है | यदि घर के सभी सदस्य उत्तरदायित्वों का बुद्धिमत्ता पूर्ण विभाजन करते हैं तो माँ को भी कुछ आराम मिल जाता है |

12. परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम |

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

"हे अर्जुन ! साधुओं (नेकनीयत वाले मनुष्यों ) की रक्षा के लिए, दुष्टों (या दुष्टता) के संहार के लिए तथा धर्म की पुनर्स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ |"

13. युक्ताहारविहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु |

युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःख़हा || (6, 17)

जो व्यक्ति अष्टांग योग के सभी नियमों का पालन करता है; जैसे संतुलित आहार विहार, नियमित दिनचर्या अपनाता है; निजधर्म के अनुसार आचरण करने का प्रयास करता है तथा समुचित समयानुसार ही जागता व सोता है, वह दुःख व क्लेश से मुक्त रहता है |

14. जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये |

ते ब्रह्मा तद्विदुः कृतस्नमध्यातमं कर्म चाखिलाम || (7, 29)

जो मानव मेरी शरण होकर जरा(रोग) व मरण(मृत्यु) से छूटने का प्रयत्न करते है, वे उस ब्रह्मा को, समस्त अध्यात्म को व सम्पूर्ण कर्म को जान पाते हैं |

15. अन्तकाले व मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम |

यः प्रयाति समद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ||

जो मनुष्य अंत समय में केवल मेरा(प्रभु का) ही स्मरण करता है, वह केवल मेरे ही स्वरुप को प्राप्त करता है | इसमें कोई संशय नहीं है |

16. ओमित्येकाक्षरं ब्रह्मा व्याहरनमामनुस्मरन |

यः प्रयाति व्यजनदेहं स याति परमां गतिम् ||

सभी इन्द्रियों को वश में कर के, प्राण (श्वास) को मस्तक में स्थापित करके प्रभु सम्बन्धी योगधारणा में स्थित होकर जो व्यक्ति ॐ का उच्चारण करता हुआ निर्गुण स्वरुप का चिंतन करता हुआ शरीर त्यागता है, वह परम गति को प्राप्त है |

17. वेदेषु यज्ञेषु तपः सु चैव, दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टं |

अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा, योगी परं स्थानमुपैतिचाद्यं || (8, 28)

योगी मनुष्य इस रहस्य तत्व को जान कर वेदों के अध्ययन में, तप, यज्ञ, दानादि जैसे पुण्यकर्मों में अपना समय व्यतीत करता है वह परमपद को प्राप्त करता है |

18. सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम |

कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यम ||

हे अर्जुन ! कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और नए कल्पों में पुनः मैं उनकी रचना करता हूँ | [भूत का अर्थ समस्त जगत के जीव व निर्जीव पदार्थ]

19. समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानपमानयोः |

शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संग विवर्जित || (12, 18)

जो शत्रु-मित्र में और मान अपमान में समभाव रखता है तथा सर्दी गर्मी , सुख-दुःख आदि में भी वैसा ही रहता है, जो आसक्ति से रहित है |

20. यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काक्षीत |

शुभाशुभ परित्यागी भक्तिमान्यः सः मे प्रियः || (12, 17)

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है न कामना करता है तथा शुभ-अशुभ समस्त कर्मों के फल को त्याग देता है, वह व्यक्ति मेरा भक्त ही है, अर्थात मुझे प्रिय है |

21. य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह |

सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोभिजायते ||

इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है, वह सब प्रकार से कर्त्तव्य कर्म करता हुआ भी पुनः इस पृथ्वी पर जन्म नहीं लेता | अर्थात मोक्ष को प्राप्त करता है|

22. ये तू धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते |

श्रद्धानां मत्परमा भत्तास्तेतीव मे प्रियाः ||

जो व्यक्ति श्रद्धायुक्त मेरे परायण हो कर उपरोक्त कथित धर्ममय अमृत का निष्काम प्रेममय भाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यंत ही प्रिय हैं |

23. सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम् ब्रज |

अहं त्वा सर्व पापेभ्य मोक्षयित्यामि मा शुचः || (18, 66)

समस्त धर्मो अर्थात कर्तव्यकर्मों को त्याग कर, हे पार्थ ! तू केवल एक मुझ (परमात्मा) को ही भज | तू शोक न कर | तू सम्प्पूर्ण पापों से मुक्त हो जायेगा |

24. यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः |

तत्र श्रीर्विजयो भूतिरधुवा नीतिर्मतिर्मम ||

हे राजन ! जहां योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हैं तथा धनुर्धारी अर्जुन भी हैं | वही विजय, विभूति व अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है |

नोट : [मानव अर्जुन सरीखा दिग्भ्रमित सा इस मिथ्या जगत में बार बार, किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर भगवान की शरण में जा कर पूछता है- हे भगवान ! मैं क्या करूँ ? यह गीता-ज्ञान उस प्रश्न का उत्तर है | बोलो भक्त और भगवान् की जय ! ]


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