दिल में जो कहीं चुभा है इक बेनाम-सा काँटा

उसे एक नाम दे दूँ ,या बाईपास करा दूँ ।


दिल में गड़ा अब बड़ी ,तकलीफ़ देता है

जब जी चाहे ,तब ये दर्द ,सर उठा लेता है।


ज्यों पाँव में धसाँ काँटा ,लेकर चल नहीं सकते

हाथों से अपनी मय्यत ,भी यों उठा नहीं सकते ।


जमाना हँसेगा ,ये मालूम है पक्का,केवल इस

वजह से मगर ,कारवां रुक नहीं सकतेे।

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