मलाल

वह किरण थी. . .प्रातः उगते सूरज की मनभावन किरण की तरह...। शांत, सौम्य चेहरे की स्निग्धता और उसके घने लंबे केश किसी देव कन्या का अहसास कराते थे। किरण को इस घर में ब्याह के आए अभी दो वर्ष ही हुए थे किंतु उसके रूप-लावण्य व शालीनता से ज्यादा चर्चे उसके माँ न बन पाने के थे।घर वालों के ताने-उलहाने उसे दिन-रात वेदने लगे।घरौंदे के प्यार के तंतु मानो उसे छलने लगे।हृदय में तूफ़ान उठ खड़ा हुआ जब डॉक्टर ने बताया कि वह किसी को इस दुनिया में लाने के लिए असक्षम है।सास- ननद ठूँठ पेड़ बुलाने लगीं।कैसे कहे कि हर वृक्ष पर फल नहीं लगते मगर शीतल छाया तो वह भी रखता है।श्वास तो वह भी धरता है, फिर वह निरुपयोगी कैसे रहा?पर उसकी एक न सुनी गई।पति का प्यार निश्छल था मगर माता- पिता के आगे मुँह न खोलने की रूढ़ भारतीय परंपरा की मज़बूरी थी।उसे कहा गया कि इस घर में रहना है तो अपनी रिश्तेदारी में से ही कोई ले आ।दिल पर पत्थर रख वह अपने गरीब मामा की दो में से एक बेटी अपनी ही सौतन बनाकर ले आई, इस आस में कि घर का चिराग भी आ जाएगा और वह पति सामीप्य से वंचित भी न रह सकेगी।मामा-मामी भी निश्चिंत से लग रहे थे कि चलो बिना दहेज़ एक तो निकली...।पति भी सरकारी नौकरी फ़ौज़ में है।बाद में पेंशन मिलेगी तो बुढ़ापा चैन से कटेगा।खाता-पीता घर है।

साल पूरा होते-होते घर में एक कन्या का जन्म हुआ।कुछ न से कुछ पाने की खुशी कुछ के चेहरे पर झलक आई थी। कुसुम और उसकी बिटिया को हाथों-हाथ सब सुविधाओं से लबालब कर दिया गया।गाँव का कोई व्यक्ति टोक भी देता तो सास चौड़े होके कहती,"अरे दम होना चाहिए दो-दो रखने का।हममें दम है तो रखते हैं।किसी को इससे क्या?"
ये वो ही जगत बुआ थीं जो मोहल्ले-पड़ोस में ज्ञान बाँटती रहतीं थीं।खुद पर आई तो रंग दिखा दिया।बेटे किशन की दो-दो ब्याहता ले आईं।
किरण मेरी पूर्व परिचित थी।एक विवाह समारोह में मिली तो उसकी पीड़ा आँसुओं संग बह निकली।उसने जो बताया उसे सुनकर मैं अवाक रह गई।आज के ज़माने में भी ऐसा हो रहा है, समझ नहीं पा रही थी।
कुछ ग्रामीण महिलाओं ने भोली-भाली कुसुम को उकसाया," देख पहली पे नज़र राखियो।कहीं तुझे और तेरी बच्ची को कुछ कर न देवे और ख़सम...उसके पास तो उसे तनिक न फटकने देना, हाँ...।सच कहूँ हूँ, फेर तोय कौन पूछे है?कुसुम को उन महिलाओं की उक्ति में अपना भविष्य सुदृढ़ नज़र आया।फलतः उसने किरण पर नज़र रखनी शुरू कर दी।जैसे ही वह अपने कमरे में जाती तुरंत ऊपर वाले उसके कमरे की ओर चल देती।"ऐ जीज्जी!तुम इकली यहाँ के करो हो।आओ न तनिक पानी भरवा दो।मेरी तो कमर दूखे है।बाल्टी उठे ही ना है।"
"देखो न तुम्हें परदेशिया(पति को उसका संबोधन) की महतारी बुलावत हैं।नीचे आ जाओ तनिक।" किरण उसे समझ न पाती।
जो किरण कुसुम खिलाती हो, वह कुहासे के छलावों को क्या जाने पर धीरे-धीरे विपरीत होते कुसुम के स्वभाव ने घरौंदे में चिक-चिक की कटुता भर दी।पति किशन भी सोचता कि दो महीने की छुट्टी घर जाकर क्या करूँगा पर किरण अपने किशन की बाट जोहती रहती।उसे मन में मलाल हो रहा था कि जिसे उसने स्वयं अपने पति के संग कुबूल कर लिया हो,खुद ब्याह कर अपना घरौंदा बसाने लाई हो वह उसका अहित कैसे कर सकती थी।उसके बोल अब भी मानो मेरा पीछा कर रहे हैं -"भाभी जी मुझे एक बात का मलाल है कि जिसे मैं लाई, वही मुझपे शक कर रही है कि मैं उसे कुछ कर दूँगी।घरवालों की नज़र में मैं आँख की किरकिरी बन गई हूँ।" मैंने उसे धैर्य रखने की सलाह दी और इस सबसे बाहर निकलने की गुजारिश की पर कहना जितना आसान होता है करना क्या उतना ही कठिन नहीं होता?
मैं उसकी 'मलालत में हलालत' पर चिंतित होती हुई घर की ओर लौट पड़ी।न जाने कितने मलाल और कब तक रूढ़ भारतीय परिवार की नारी के हिस्से में आते रहेंगे..??? कब अज्ञानता के अंधेरे में घिरी नारी ही नारी को अंधेरे में धकेलती रहेगी और वंश चलाने के लिए मासूम ललनाओं के अस्तित्व को नकारती रहेगी????
(एक सत्य घटना पर आधारित)
डॉ.बीना राघव

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