यादों की किताब के पन्ने फडफडा कर खुलने लगे
पलक झपकते अतीत के झरोखों में झाँकने लगी
मानस पटल पर यादों का जलूस निकलने लगा
दुःख सुख की यादों के मोती लड़ियों मे पिरोने लगी
खोई ऐसी उन घड़ियों में कब दिन निकला कब रात हुई
फिर अतीत की खुली डायरी और तुम्हारी बात हुई"

वो एक नजर के लिए घंटो खिड़की पर इंतजार करना
एक बार मिलने के लिए फ़ोन पर ढेरों मनुहार करना
मिलने से घबराना, मिलने पर दिल का तेज धड़कना
फिर तेरा झुक कर चुपके चुपके कान में कुछ कहना
जाने कितनी बार हुई शह ,जाने कब कब मात हुई
फिर अतीत की खुली डायरी और तुम्हारी बात हुई"

वो पहली छुवन के पल, उन स्पर्शों से मेरा सिहर जाना
धीमे धीमे बोल तुम्हारे फिर धीरे से दिल में उतर जाना
साथ साथ के अहसासों का इन्द्रधनुष के रंग भर जाना
उन यादो की खुशबू से फिर तनमन का उपवन महकाना
भूले बिसरे पल की झांकी, अब जीवन की सौगात हुई
फिर अतीत की खुली डायरी और तुम्हारी बात हुई


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