आज काम से घर वापस आते वक़्त उससे मुलाकात हुई जिससे बरसों से बस ख़्वाबों में ही मिल रही थी। इतने सालों के बाद वो मेरे सामने ऐसे आ खड़ा हुआ जैसे जून की गर्मी में बिन मौसम की बरसात। बताने के लिए तो बहुत कुछ था हमारे पास, पर ऐसा लगा कि आज हमारी खामोशियाँ ही बातें करें तो बेहतर है।

मिनटों तक तो हम खामोश रहकर एक दूसरे को एक टक ऐसे देखते रहे, जैसे एक दूसरे को कैद करने की साज़िश कर रहे हों।

हमने एक दूसरे से कुछ बोला तो नहीं, पर हमारे चेहरे की झुर्रियां बहुत कुछ बयाँ कर रही थीं। मुझे देखते ही उसके माथे की शिकन ऐसे गायब हो गई थी जैसे उसके मन में सुकून की एक लहर दौड़ गई हो।

झुर्रियों की वजह से अब उसकी बड़ी आँखें छोटी लगने लगी हैं, पर उन गहरी नीली आँखों में मुझे आज भी अपनी तस्वीर दफ़्न दिख रही थी। मन तो किया कि एक दफ़ा उसके गालों पर अपना हाथ फेर दूँ, पर फिर लगा कि कहीं ये सालों से सिमटी हुई झुर्रियां खुल ना जायें। अगर खुल जातीं तो उन्हें चाह कर भी समेट ना पाती।

उसके होंठ अब गुलाबी नहीं रहे, काफी काले हो गये हैं। शायद मेरी कमी सिगेरेट से पूरी कर रहा है। लेकिन आज भी अपना निचला होंठ दबा कर ही हँसता है। उसके हाथों की उँगलियों में आज भी किसी के नाम की अंगूठी नहीं है और हाथ देख कर साफ़ समझ आ रहा था कि यही झुर्रियां अब उसकी हमसफर बन चुकी हैं।

उसके साथ थोड़ी देर और रहती तो शायद अपने चेहरे की झुर्रियों के राज़ खोलने पड़ जाते। इसलिए मैं एक बार फिर उसे बीच रास्ते में अकेला छोड़ आगे बढ़ गई, वो भी ऐसे शख्स के लिए जो मेरे चेहरे पर उम्र से पहले आई इन झुर्रियों का ज़िम्मेदार है।

घर वापस आकर खुद को आईने में देखा तो आज मैं इन झुरियों में भी पहले की तरह खूबसूरत लग रही थी। शायद उसकी नीली आँखों ने मेरे चेहरे को एक बार फिर से रोशन कर दिया था।

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