दो बीघा ज़मीन, हाँ, वही जिसे आज भी देखते हुये लगता है कि वर्तमान समय में भी कितनी प्रासंगिक है यह फ़िल्म. पर जब मैं इसकी कथावस्तु और कहानी के दृश्य-परिदृश्य पर दृष्टिपात करता हूँ तो मन में जैसे हूक सी उठती है जो अनायास ही बोल पड़ती कि क्यों इस प्रकार की कथा आज भी प्रासंगिक है. मन में टीस सी चुभती. क्यों सत्तर बरस बाद भी किसान, कृषि, गाँव और खेत-खलिहान के सरोकार आज भी जस के तस बने हुये हैं? सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा आज जैसे शाश्वत बन चुके हैं. सुख मानों क्षण भंगुर है पर दुःख और कष्ट जैसे अमर हो कर हमारे साथ ही आलथी-पालथी मार कर बैठ गये हैं. जिस आधुनिकीकरण और कल-कारखानों तथा विकास के नाम का रोना हम आज रो रहे हैं वह सब तो तब भी ऐसे ही मुँह बाये खड़ा था जैसे आज टकटकी बाँधे हमें देख रहा है.

रविन्द्र नाथ टैगोर की कविता ‘दुई बीघा जोमी’ का हिन्दी शीर्षक ‘दो बीघा ज़मीन’ नाम ले कर उस पर संगीतकार सलिल चौधरी द्वारा रची कहानी पर आधारित यह फ़िल्म निर्माता-निर्देशक बिमल रॉय की एक कालजयी फ़िल्म है. मुख्य भूमिका में शम्भू महतो के चरित्र में बलराज साहनी अपने गाँव में रह कर कृषक के रूप में अपनी एकमात्र पूँजी दो बीघा भूमि पर खेती-बारी का काम करते हुये अपनी पत्नी पार्वती पारो (निरूपा रॉय), पुत्र कन्हैया (रतन कुमार) और वृद्ध पिता (नाना पलसीकर) के साथ जीवन यापन कर रहे होते हैं. गाँव में सूखा पड़ने के कारण खेत बंजर पड़े हैं और ऊपर से इस भूमि पर लिये रुपयों पर सूद की बढ़त से रही-सही कोर-कसर भी पूरी हो जाती है. गाँव का ज़मींदार ठाकुर हरनाम सिंह (मुराद) नगर के धनाढ्य सेठों के संग मिल कर गाँव की अपनी भूमि पर कल-कारखाना खोलने के विचार से काम प्रारम्भ करने की योजना बनाता है. पर अड़चन तब आती है जब उसकी स्वयं की भूमि के मध्य स्थित अपनी दो बीघा भूमि को शम्भू इस प्रयोजन हेतु देने से मना कर देता है. क्रोध में आ कर ठाकुर शम्भू की उस भूमि पर सूद सहित रुपयों को उसे तत्काल लौटाने को कहता है. बात बढ़ कर न्यायालय तक पहुँच जाती है जहाँ शम्भू को निर्णय सुनाया जाता है कि यदि तीन माह के अन्दर वह रुपये नहीं लौटाता है तो उसकी यह भूमि ले ली जायेगी.

इस बीच गाँव के ही एक व्यक्ति द्वारा शम्भू को सुझाया जाता है कि रुपये-पैसे अर्जित करने के वास्ते वह कलकत्ता जा कर कोई काम क्यों नहीं कर लेता. घर-परिवार में सलाह कर शम्भू रेल गाड़ी पकड़ कर कलकत्ते को निकल पड़ता है और चुपके से साथ में उसका पुत्र कन्हैया भी उसके संग हो लेता है. कलकत्ता जैसे महानगर में पहुँच कर उसे पूछते-पाछते रहने का आश्रय मिलता है और फिर जैसे-तैसे हाथ से खींचने वाले रिक्शे से वह कमाई करने लगता है. इस बीच शम्भू रिक्शा चलाते हुये जब दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है तब उसका पुत्र भी बूट पॉलिश का काम करने लग जाता है. शम्भू दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद भी जब काम पर जाने के लिये उद्धृत होता है तब कन्हैया गाँव में पत्र भेज का अपनी माँ को इसकी सूचना दे देता है. कलकत्ते पहुँच कर पारो जब अपने पति शम्भू का ठिकाना पूछ रही होती है तब बरगला कर एक व्यक्ति उसे कमरे में बन्द कर देता है पर वह किसी प्रकार वहाँ से छूट कर जब भागती है तो राह में एक गाड़ी की चपेट में आ कर वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है. वहीं थोड़ी दूर खड़ा शम्भू जब अपने रिक्शे पर उसे चिकित्सालय ले जाने को आता है तो वह अपनी पत्नी पारो को इस स्थिति में देख फूट-फूट कर रोने लगता है. अब तक जो कमाई उसने यहाँ कलकत्ते में की थी वह सब गँवा कर जब परिवार के तीनों लोग अपने गाँव वापस पहुँचते हैं तब उसकी वह दो बीघा भूमि भी अब उसकी नहीं होती है. उस भूमि पर ठाकुर की मिल का निर्माण प्रारम्भ हो चुका होता है. सब कुछ लुटा कर जब शम्भू अपनी उस धरती से एक मुठ्ठी माटी ले कर अपने माथे से लगाने का जतन कर रहा होता है तभी वहाँ खड़ा पहरेदार उसे झिड़क देता है और शम्भू के मुठ्ठी से अन्ततः उसकी अपनी वह माटी भी फिसल जाती है.

यह फ़िल्म मन को अवसाद से भर देती है. एक किसान की स्थिति में तब और अब की तुलना में कितना परिवर्तन आया है? हाँ, आज देश में सरकार इस ओर कुछ सकारात्मक करने को उद्धृत हुयी है परन्तु प्राकृतिक आपदाओं का हल फिर भी हमें सामूहिक रूप से ही उठाना पड़ेगा तभी निर्धन कृषकों का कल्याण सम्भव है. यह फ़िल्म शैलेन्द्र के गीत ‘धरती कहे पुकार के’, ‘हरियाला सावन’ में पगा सलिल चौधरी के संगीत के लिये भी सदा स्मरण की जाती रहेगी साथ ही गायक मन्ना डे की स्वर लहरी को भी जीवन्त करती रहेगी. इस फ़िल्म में बाल कलाकार के रूप में हास्य अभिनेता जगदीप को देखना सुखद अचरज में डालता है और अतिथि भूमिका में मीना कुमारी को ‘आजा री आ निन्दिया’ गाते हुये देखना और भी अच्छा लगता है. बलराज साहनी का अभिनय सहजता का पर्याय इसलिये भी बन पड़ा है कि रिक्शा चालाक की भूमिका को और भी जीवन्त बनाने हेतु उन्होंने कलकत्ते के पथ पर रिक्शा खींचने के काम को मूल रिक्शा चालकों के संग सीखा था. वृद्ध पिता की भूमिका में नाना पलसीकर तथा पारो के चरित्र में निरूपा रॉय अत्यन्त प्रभावी हैं.

मेरा मानना है कि आगे चल कर भारतीय सिनेमा में कला और समान्तर फिल्मों का जो क्रम प्रारम्भ हुआ उसके मूल में राज कपूर की ‘जागते रहो’ और बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’ जैसी फ़िल्में थीं. सामाजिक सरोकार की आधारभूत विषयों का रेखांकन सिनेमा में कला, संगीत एवं व्यावसायिकता के संतुलित ताल-मेल से किस प्रकार संयोजित किया जा सकता है उसका एक श्रेष्ठ उदाहरण हैं ये दोनों फ़िल्में. भविष्य में समान्तर सिनेमा ने अपनी सार्थकता इसलिये भी गँवा दी क्योंकि कला के नाम पर सिनेमा के आवश्यक तत्वों की उपेक्षा की जाती रही. गीत-संगीत तथा मनोरंजन के आवश्यक अनिवार्य तत्वों को परे रख कर उसे ओढ़ी गयी कलात्मकता का चोला पहना दिया गया जिसका बहुसंख्य दर्शकों ने स्वतः ही परित्याग कर दिया. सिनेमा का यह एक ऐसा पक्ष है जिस पर अभी भी वृहद् शोध, सम्वाद एवं परिचर्चा किया जाना शेष है.

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