कौतुक-कथा

सुबह-सुबह बच्चे अपने घरों से स्कूल जाने के लिए निकले ही थे, कि यह कौतुक हो गया।

सड़क किनारे खड़ा वह अजीब-सा आदमी बच्चों के लिए पहले तो अजनबीयत... वैचित्र्य और अंततः औत्सुक्य का कारण बना। बच्चों के पांव अनायास ठिठक गए, हांलाकि वे सभी के सभी सख्त अनुशासन से बंधे थे और उनका अपने स्कूलों में ‘राइट टाइम’ पहुंचना अनिवार्य था...लेकिन उनके पांव ठिठक गए। बच्चों के माताओं-पिताओं की कड़ी हिदायत थी, कि वे घर से सीधे स्कूल जाएं, लेकिन वे रुक गए, गोकि बच्चे रुकना नहीें चाहते थे... लेकिन पांव थम गए।

बच्चे उस अजनबी आदमी के इर्द-गिर्द इकट्ठा होते जा रहे थे। उनकी कम्प्यूटर संचालित आॅटोमेटिक स्कूल बसें, उनके स्टाप पर आईं...अपनी निर्धरित अवधि तक रुकीं...फिर बढ़ गईं...बसें खाली थीं...उनमें बच्चे नहीं थे।

बच्चे उस आदमी के इर्द-गिर्द उत्सुकता का घेरा डाले उसे गौर से देखने लगे थे। वह आदमी उनके लिए अजनबी था, क्योंकि उन्होंने उसे पहले कभी नहीं देखा था...उसके चेहरे पर न तो तनाव था...न ही थकान थी। इसके ठीक विपरीत, उसका चेहरा दप-दप दमक रहा था मानो उसके चेहरे से कोई आभा फूट रही हो। उसकी आंखों में न तो गहरी लाली थी...न ही पसरा पड़ा अंधेरा था। ...इतनी साफ सुंदर आंखें बच्चों ने पहली बार देखी थीं...। उसके शरीर पर वैसे सुंदर-साफ, चमकीले कपड़े नहीं थे, जैसे कि उनके पिता या कि नगर के दूसरे लोग पहनते थे, पर उसने जो वस्त्र पहन रखा था विचित्र होते हुए भी आकर्षक था...हालांकि बच्चे आकर्षण के इस कारण को ठीक-ठीक समझ पाने या समझा पाने की स्थिति में नहीं थे।

वह अजनबी सिर झुकाए कुछ बुदबुदा रहा था...उसकी आवाज इतनी मद्धिम थी कि बच्चे कुछ भी साफ-साफ न सुन पा रहे थे, न समझ पा रहे थे। उनकी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। वे उसकी आवाज सुनने के लिए उसके और करीब चले आए। उस अजनबी ने अपने इर्द-गिर्द एकत्र हो आए बच्चों को सिर उठाकर देखा...फिर उसके होंठों पर एक गहरी और निहायत कोमल-सी मुस्कुराहट खिल आई। बच्चे चकित...! उनके भीतर गुदगुदी सी महसूस हुई। ऐसी तलस्पर्शी मुस्कुराहट बच्चों ने पहली बार देखी थी...वे अपने अगल-बगल खड़े दूसरे बच्चों को देखने लगे...सभी मंत्रामुग्ध-से दिखे मानो जागी आंखों से सपना देख रहे हों। कुछ बच्चों ने अपनी कलाइयों से बंधी इलेक्ट्राॅनिक घड़ियों के नाॅब-दबाए...घड़ी से फीडेड आवाज आई, ‘‘इस वक्त सुबह के सात बज रहे हैं।...’’ उन्हें यकीन हुआ कि यह सुबह है और वे कोई सपना नहीं देख रहे हैं।

अजनबी ने अपने करीब खड़े एक गदबदे बच्चे के सिर पर हाथ फेरा...सबने देखा कि उसका चेहरा रौशन हो रहा है...उसकी आंखों में चमक आ गई है...और...और गजब तो यह कि उसके होठों पर निहायत मीठी-मासूम मुस्कुराहट उभर आई है। वह बच्चा जो अभी-अभी घबराया-सा दिख रहा था, अब बेहद इत्मीनान से भरा लग रहा था। दूसरे बच्चे भी इस घटना से आश्वस्त हो गए थे, कि वह विचित्र-सा दिखता अजनबी चाहे कुछ भी हो उनके लिए नुकसानदेह नहीं है।

वह अजनबी, जो थोड़ी देर पहले बहुत मद्धिम स्वर में बुदबुदा रहा था, अब कुछ ज्यादा जोर से बोलने लगा था। असकी आवाज अब कहीं ज्यादा साफ और समझ में आने लायक थी। हालांकि उसकी आवाज इतनी शांत थी मानो कोई प्रार्थना में लीन हो...इतनी गहरी जैसे अतल गहराइयों से फूट रहे हों स्वर...इतनी मुलायम गोया आवाज नहीं शबनम की बूंदें हों। बच्चों के लिए यह आवाज हैरतअंगेज थी...न खीझ...न ऊब...न चिड़चिड़ाहट...न हड़बड़ाहट। उनके कानों को राहत के फाहे से सहला रहा हो जैसे।

वह अजनबी अपनी उसी मुस्कुराहट और शांत स्वर में बोले जा रहा था, ‘‘बच्चो...मेरे प्यारे बच्चो...! तुम्हें अपने पास पाकर मुझे बेहद खुशी हो रही है...। मुझे मालूम है कि तुम देश और समय की सीमाओं से परे हो...। तुम सही और गलत की हर चालाकी से दूर हो। तुम जहां भी हो...अपनी सम्पूर्णता में एक जिज्ञासु... निर्मल...और ऊर्वर मन-मस्तिष्क के साथ मौजूद हो..। तुम्हारे होने से ही यह दुनिया खूबसूरत है और तुम जब तक हो यह दुनिया खूबसूरत रहेगी।’

वह अजनबी उन बच्चों को स्नेह से निहारते हुए पल-भर को ठिठका कि बच्चों के दिमाग कम्प्यूटर की तेजी से सक्रिय हो गए-उनकी शिराओं में ‘तुम्हारे होने से ही यह दुनिया खूबसूरत है’ वाक्य अटक गया। वे न तो इस वाक्य का अर्थ समझ पाए, न ही उन्होंने ऐसा वाक्य पहले कभी सुना था। वे विचित्र उलझन में पड़ गए। एक-दूसरे को देखते हुए उनकी आंखों में अनसुलझा-सा प्रश्न तैर रहा था।

अजनबी शायद बच्चों की मनःस्थिति भांप गया था। उसने अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ अपनी बात जारी रखी, ‘‘बच्चों...! मेरे प्यारे बच्चो!! मैं जो कह रहा हूं उसपर विश्वास करो, क्योंकि ‘विश्वास’ दुनिया को बेहतर बनाने की पहली शर्त है...! तुम्हारे अंदर विश्वास है तो तुम हर मुश्किल को आसान बना सकते हो...। लेकिन तुम्हारी मुश्किल यह है कि तुम आसान रास्तों के अभ्यस्त हो गए हो। तुम अपने लक्ष्य को येन-केन प्रकारेण पाने के लिए तत्पर हो। तुम्हारे लिए ‘आदर्श’ का कोई अर्थ नहीं है , क्योंकि तुम्हारे पास कोई ‘आदर्श’ नहीं है। तुम्हारा कोई आदर्श नहीं है...। तुम्हारे अंदर कोई ‘नैतिक मूल्य’ नहीं है, क्योंकि तुम्हारे लिए अपनी कामयाबी ही मूल्यवान है और उसके लिए तुम कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार हो, चाहे वह नैतिक हो चाहे अनैतिक...।’’

बच्चे उस अजनबी को फटी-फटी आंखों से देख रहे थे। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उस अजनबी की शब्दावली इतनी कठिन और अपरिचित थी, कि वे एकदम से परेशानी महसूस करने लगे। न समझ में आने के बावजूद उस अजनबी की आवाज में अजीब-सा सम्मोहन था और वे उसे लगातार सुनते जाने के मोह में बंध से गए थे। उनके भीतर अजीब-सी हलचल पैदा होने लगी थी मानो उनके भीतर कुछ बेहद सख्त-सी चीज टूट-फूट रही हो और वे न चाहकर भी उसे रोक पाने में सक्षम न हों।

वह अजनबी, जिसकी आवाज किसी अजनबी प्रदेश-सी आती मालूम पड़ रही थी पूर्ववत बोले जा रहा था, ‘‘बच्चों...! मेरे प्यारे बच्चो!! लेकिन यह ठीक नहीं है...क्योंकि तुम एक भयावह भविष्य की ओर धकेले जा रहे हो...एक बदसूरत दुनिया के नागरिक बनाये जाने के लिए तैयार किए जा रहे हो...। तुम नहीं जानते कि तुम क्या कर रहे हो...कहां जा रहे हो...? क्योंकि तुम बच्चे हो और सही और गलत का चालाकी-भरा फर्क नहीं जानते, इसलिए तुम जो कर रहे हो, उसके लिए तुम दोषी नहीं हो...लेकिन जो दोषी हैं, उन्हें पहचानने की जरूरत है।’’

बच्चे अपनी सांसें रोक उस अजनबी की बात सुन रहे थे। उस अजनबी ने अपने उलझे बालों में उंगलियां फिराई और माथे पर चमकती पसीने की बूंदों को दाहिने हाथ की हथेली से पोछा। बच्चों ने उसकी इस क्रिया को कैतूहल से देखा । उस अजनबी के माथे पर चमकी बूंदें उन्हें अच्छी लगीं और उन्हें आश्चर्य हुआ कि उन्होंने ऐसी बूंदें कभी अपने माता-पिता के माथे पर क्यों नहीं देखीं?

इस बार वह अजनबी बच्चों की मनःस्थिति भांप नहीं पाया था शायद, क्योंकि वह अपनी ही धुन में अपनी बात जारी रखे हुए था, ‘‘बच्चों...! मेरे प्यारे बच्चो!! जो बच्चों को एक बदसूरत और अमानवीय दुनिया में धकेल रहे हैं, वे हत्यारे हैं। हां...उनकी पहचान आसान नहीं है, क्योंकि उनके चेहरे पर तुम्हारा हितैषी होने का मुखौटा चढ़ा है...लेकिन इस मुखौटे के पीछे एक हिंस्र चेहरा है...इससे पहले कि वह हिंस्र चेहरा तुम्हें विरासत में मिले...तुम उनसे पूछो कि यह धरती इतनी बेरौनक क्यों है? नदियां जहरीली क्यों हैं? पर्वत वीरान क्यों हैं? फूलोंवाले पौधे कहां गए? फलोंवाले पेड़ क्यों नहीं होते? ’’

बच्चों की उलझन बढ़ती जा रही थी। लाख कोशिशों के बावजूद उनके ऊर्वर मस्तिष्क में कोई ऐसी आकृति नहीं उभर रही थी, जिसे वे फल...फूल...पेड़....पौधे...पर्वत...नदी के रूप में पहचान पाते। चूंकि वे जिज्ञासु थे, इसलिए उस अजनबी के प्रति उनका आकर्षण स्वाभाविक था और उन्हें उम्मीद थी कि यह दिलचस्प आदमी उनकी जिज्ञासा का शमन अवश्य करेगा। लेकिन यह क्या?

वह अजनबी तो सिर्फ अपनी ही धुन में खोया, अपनी ही बात कहने पर आमादा था, ‘‘बच्चों...! मेरे प्यारे बच्चों!! तुम्हारे बड़ों की दुनिया में भाग-दौड़.... आपाधपी... मार-काट... भय... असुरक्षा क्यों है? तुम्हारे पिताओं की दुनिया मे बम...बारूद...गोली...बंदूक...राकेट... मिसाइल का खौफ क्यों है? सुनो! वे तुम्हें यही सब कुछ विरासत में देना चाहते हैं। लेकिन नहीं! तुम उनसे कहो, पिता आप अगर हमें कुछ देना ही चाहते हैं, तो प्यार के जजबात दीजिए... सत्य का सम्बल दीजिए... ईमानदारी की ताकत दीजिए...नैतिकता के तकाजे दीजिए, ताकि...!’’

इससे पहले कि अजनबी की बात पूरी होती, सड़क पर सायरन बजाती गाड़ियों का शोर उभरा और बच्चे सकते में आ गए। ये पुलिस गाड़ियां थीं। गाड़ियों में से चुस्त-दुरुस्त रोबोट उतरे और पलक झपकते ही बच्चों को अपने घेरे में ले लिया। एक सीनियर रोबोट जिसकी आवाज में जबर्दस्त रौब था, बच्चों का मुआयना करने के बाद एक यंत्र

को आॅन करके किसी को संदेश देने लगा, ‘‘हैलो...! हैलो!! मैं डी.सी.पी. बोल रहा हूं...सी.पी. साब से बात कराओ!’’

पल-पल की प्रतीक्षा के बाद डी.सी.पी. रोबोट ने फिर संदेश यंत्र पर बोलना शुरू किया, ‘‘सर! बच्चे मिल गए हैं...। ये, यहां... सड़क किनारे एक अजनबी के इर्द-गिर्द खड़े हैं...। यस सर! इन बच्चों को उनके स्कूल भेज दें? ओ.के. सर! और सर, यह अजनबी? ओ.के. सर! इसे लेकर में स्वयं आपके पास आता हूं। दैट्स आॅल, सर।’’

डी.सी.पी. रोबोट की बातें सुनकर बच्चों के चेहरे पीले पड़ गए।...वे जो अभी-अभी अजनबी की बातें सुनते हुए तमाम चिंताओं से मुक्त थे । वे एकबारगी अपनी दुनिया के यथार्थ में लौट आये थे।

। यह बेहद रोमांचक अनुभव था...! उन्हें पहली बार महसूस हुआ था कि कोई आदमी इतनी दिलचस्प बातें कर सकता है कि वे उसमें खोए हुए अपना वर्तमान भुला सकते हैं...। लेकिन वर्तमान सामने था। डी.सी.पी. रोबोट के इशारे पर बच्चों को घेरे रोबोटों ने उन्हें अपनी गाड़ियों में बैठाया और उनके स्कूलों की ओर उड़ चले।

वह अजनबी जाते बच्चों को निश्च्छल मुस्कुराहट के साथ देखता हुआ अपनी जगह पर निश्चल खड़ा था। डी.सी.पी. रोबोट ने उसे निर्विकार भाव से देखा और अपना हाथ बढ़ाकर उसे अपनी गाड़ी की ओर खींचने लगा। वह अजनबी पूर्ववत मुस्कुराता हुआ स्वयं आगे बढ़ा। गाड़ी की सीट पर ड्राइवर नहीं था, फिर भी उस अजनबी और रोबोट के बैठने के साथ ही गाड़ी चल पड़ी।

बच्चे जो स्कूलों में पहुंचा दिए गए थे, अभी भी सामान्य नहीं हो पाए थे। एक तरफ अनुशासन तोड़ने का भय उन पर तारी था, तो दूसरी तरफ उस अजनबी की बातों का असर बरकरार था। वे न तो सजा भुगतने को राजी थे, न ही उस अजनबी की बातों को हवा में उड़ा देने को तैयार थे। ऐसे में, जब उनके टीचर्स ने उन्हें सजा सुनाई, वे विद्रोह की मुद्रा में आ गए। टीचर्स आवाक्! ऐसा पहली बार हुआ था कि बच्चों ने उनका आदेश मानने से इनकार किया था। बच्चों के तेवर खतरनाक थे, इसलिए टीचर्स ने अपनी तरफ से कोई कार्रवाई करने के बजाय इस घटना की सूचना प्रिंसिपल को देना वाजिब समझा।

प्रिंसिपल को स्थिति की गंभीरता समझते देर नहीं लगी। इससे पहले कि हालात बिगड़ें, उसने स्वयं बच्चों से वस्तुस्थिति जानने की कोशिश की। बच्चों ने प्रिंसिपल के सामने प्रश्नों की झड़ी लगा दी-फूल, फल, पौधे... पेड़, पर्वत,सनदी...प्यार...सत्य...ईमानदारी...नैतिकता...। ऐसी-ऐसी अज्ञात-अपरिचित शब्दावलियां बच्चों के मुंह से सुनकर प्रिंसिपल का सिर चकरा गया। वह हक्का-बक्का-सा अन्य टीचर्स का मुंह ताकने लगा। काफी देर तक ऊहापोह की स्थिति रही। अंततः प्रिंसिपल ने सभी टीचर्स को आदेश दिया, ‘‘इन शब्दों के अर्थ खोजें और बच्चों की जिज्ञासा का समाधन करें।’’

सारे टीचर्स कंप्यूटरों पर टूट पड़े। सर्च इंजनों के मार्फत तरह-तरह की सूचनाएं उभरने लगीं...मेमोरी चिप्स ,पुराने फ्लाॅपी, डिस्क एक पर एक बदले गए...डाटा बैंक खंगाला गया...तमाम कोशिशें की गईं, लेकिन वे शब्दावलियां नहीं मिलीं...न सूचना...न संकेत...कहीं कोई आसार नहीं। टीसर्च परेशान। प्रिंसिपल परेशान। कंप्यूटर्स के सारे नेटवर्क नाकाम...इंटरनेट फेल...स्क्रीन ब्लैंक...कभी-कभार कुछ धब्बे उभरते फिर पीं...पीं...की आवाजों के साथ ‘‘साॅरी, नाॅट एवेलेबुल।’’ लिखा मिलता।

एक जबर्दस्त चुनौती थी। सारे विद्वत समाज के सामने एक विकट चुनौती। पूरे नगर में खलबली मच गई। आला दिमागों ने सिर जोड़कर बैठकें की और अपने ज्ञान-विज्ञान के तमाम संचित संग्रहालयों से संपर्क साधे, लेकिन हर जगह से उत्तर नदारद मिला। सारे सूचना केन्द्रों ने एक ही जवाब दिया-‘‘साॅरी, नाॅट एवेलेबुल।’’

समस्या गंभीर थी। सूचना नगराधीश तक पहुंची। नगराधीश स्वयं विद्वान थे। विद्वानों के बीच उनका आदर-सम्मान था। वह भी उन अनोखे, अनजाने शब्दों को सुनकर हत्प्रभ रह गए। उन्होंने अपनी निजी व भव्य कंप्यूटर लाइब्रेरी में स्वयं बड़ी देर तक मगजमारी की । लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा। वे शब्द वाकई दिलचस्प थे, इसलिए उनकी इच्छा हुई कि वह विद्वानों की एक कमेटी बना दें, ताकि इसपर उनकी रिपोर्ट आए और फिर उस रिपोर्ट के आधार पर वह किसी निष्कर्ष पर पहुंचें। लेकिन जबतक वह कोई फैसला लें, उन्होंने नगर के महासुरक्षा प्रहरी को आदेश दिया, ‘‘उस आदमी को फौरन मेरे सामने हाजिर किया जाए।’’

महासुरक्षा प्रहरी जिस वक्त उस आदमी को लेकर हाजिर हुआ, नगराधीश वातानुकूलित विशाल कांफ्रेंस हाॅल में मौजूद थे। उनके सामने पत्राकारों की भीड़ थी। उनके अगल-बगल विद्वानों का हुजूम था। पत्रकारों ने अपने कैमरे संभाल लिए थे। माइक्रोफोन चेक कर लिए थे। कुछ कैमरे ऐसे थे, जो इस घटना को लाइव टेलीकास्ट कर रहे थे। चारों ओर गहमा-गहमी थी। पूरे हाॅल में सनसनी थी।

उस अजनबी को देखते ही कांफ्रेंस हाॅल में चुप्पी छा गई। वहां मौजूद लोगों की आंखों में कौतूहल उभर आया।

वह अजनबी अपनी जगह पर खड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था...इतनी शीतल...स्निग्ध् मुस्कान कि पूरे कांफ्रेंस हाॅल में एक गर्म अहसास की लहर दौड़ गई। नगराधीश ने उस अजनबी का पुरजोर स्वागत करते हुए कहा-‘‘अजनबी, तुम चाहे जो भी हो, हमारे लिए महत्वपूर्ण हो, क्योंकि तुमने हम ज्ञान-विज्ञान के चरमोत्कर्ष पर खड़े लोगों के सामने चुनौती पेश की है...हम हर चुनौती स्वीकार करते हैं...क्योंकि हम जानते हैं कि हमने आज जो कुछ हासिल किया है, वह चुनौतियों का ही परिणाम है...।’’

वह अजनबी बगैर किसी प्रतिक्रिया के स्वभावतः मुस्कुराता रहा। कैमरे उसकी भाव-भंगिमाओं को कैद करने में मशगूल थे। पत्रकारों ने माइक्रोपफोन आॅन कर दिए थे। पूरे नगर में इस घटना का सीध प्रसारण शुरू हो गया था।

नगराधीश के चेहरे का क्लोजअप टी.वी. के पर्दे पर उभरते ही, अपने ड्राइंग रूमों में बैठे बच्चे घबरा गए। उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं। कानों में उंगलियां डाल लीें। थोड़ी देर को उनके भीतर गहरा अंधकार छा गया। इस अंधेरे से आतंकित बच्चों ने झट से आंखें खोल दीं। आश्चर्य! घोर आश्चर्य!! टी.वी. के पर्दे पर नगराधीश नहीं थे, बल्कि उनकी जगह उस अजनबी का चेहरा था, जो सुबह उन्हें स्कूल जाते हुए रास्ते में मिल गया था। बच्चों की आंखों में चमक-सी आ गई। चेहरा दमक उठा।

टी.वी. के पर्दे पर भी वह अतनबी ठीक वैसे ही मुस्कुरा रहा था जैसे सुबह उनसे बातें करते वक्त मुस्कुरा रहा था-स्नेहिल...निष्कलुष...मंद...मंद...मधुर ...मधुर !

पत्राकार उससे प्रश्न पूछ रहे थे...विद्वान उससे मुखातिब थे...विशेषज्ञ उसे घेर रहे थे...वह सबकी बात सुन रहा था...लेकिन चुप था...बिल्कुल चुप। बच्चे हैरान थे कि जो आदमी सुबह उनसे इतनी लंबी-लंबी बातें कर रहा था, वह इस कदर चुप क्यों है?

टी.वी. पर समवेत स्वर शोर में बदलने लगा था। इससे पहले कि इस शोर को कम करने के लिए बच्चे अपने टी.वी. सेटों के ‘रिमोट कंट्रोल’ के बटन दबाएं, उस अजनबी के होंठ हिले। फिर धीरे--धीरे उसका धीर-गंभीर स्वर उभरने लगा, ‘‘आप मेरे शब्दों को अनोखा, अनजान और अपरिचित समझ रहे हैं, क्योेंकि आपके पास अपनी स्मृतियां नहीं हैं...आपके पास अपना कुछ भी मौलिक नहीं है...। जिन कौमों के पास स्मृतियां नहीं होतीं...उनके पास अपना इतिहास नहीं होता...जिनके पास मौलिकता नहीं होतीं...उनके पास अपनी पहचान नहीं होती...। आपके पास मेरे शब्दों के अर्थ नहीं हैं...। वे इसलिए नहीं हैं कि मेरे शब्द आचरण की मांग करते हैं और ये आचरण के बगैर अर्थहीन हैं।’’

अपनी बात पूरी करके उस अजनबी ने एकदम से चुप्पी साध ली। टी.वी. स्क्रीन पर पल-भर के लिए सन्नाटा छा गया। फिर धीरे-धीरे माइक्रोपफोन पर बोलता हुआ एंकर सामने आया और उसने उद्घोषणा की, ‘‘आइए, अब हम जानते हैं। अपने विद्वान नगराधीश की राय।’’

बच्चों ने तत्काल टी.वी. सेटों को आॅफ कर दिया। सामने एक तेज चमक लपकी और फिर स्क्रीन काला पड़ गया।

नगराधीश ने कोई कमेंट करने से इनकार करते हुए सिर्फ इतना कहा, ‘‘हम पूरी स्थिति पर गौर कर रहे हैं और जल्दबाजी में किसी निर्णय पर पहुंचना ठीक नहीं होगा। फिलहाल, विद्वानों की एक कमेटी बना दी गई है, जिसमें रिटायर चीफ जस्टिस के अलावा एक सांसद, एक वाइस चांसलर, एक ब्यूरेक्रेट, एक टेक्नोक्रेट और एक ट्रेड यूनियन प्रतिनिधि शामिल हैं। इन्हें चैबीस घंटे के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है।’’

रिपोर्ट पर पूरे नगर की निगाह टिकी थी । समय तेजी से गुजर रहा था। नगराधीश नगर की उत्सुकता और बेचैनी को लेकर चितिंत थे, इसलिए वह स्वयं कमेटी से लगातार सम्पर्क साधे हुए थे। लेकिन कमेटी किसी ठोस नतीजे पर पहुंचती नहीं दिख रही थी। नगराधीश भीतर-ही-भीतर उद्विगन हो आए थे । ।

देर रात गए जबकि वह तमाम कोशिशें करके हार गए, नींद उनकी आंखों तक आने का नाम नहीं ले रही थी, उन्हें अचानक कुछ ख्याल आया। उन्हें बिजली का झटका-सा लगा। वह बिस्तर से उठकर लगभग दौड़ते हुए अपने गुप्त कंप्यूटर रूम की ओर दौड़े। उन्होंने चिप्स,फ्लाॅपियों के ढेर में जल्दी-जल्दी कुछ ढूंढना शुरू कर दिया। ढेरों चिप्स के बीच अंततः उन्हें एक ऐसी चिप हाथ लगी, जो उनके काम की थी। उन्होंने उस चिप को कंप्यूटर से जोड़ा...बटन दबाए...धीरे--धीरे कुछ संकेत उभरे...फिर संदेश-‘‘हर कंप्यूटर की एक सीमा है...यह सिर्फ उतना ही बताता है...जितना इसमें फीड किया जाता है। लेकिन ज्ञान की सीमा नहीं है...क्योंकि मानव मस्तिष्क जिज्ञासु है...। यह जिज्ञासा सिर्फ तब तक ठीक है, जब तक कि वह राज-काज, सत्ता और सिंहासन के प्रति जिज्ञासु न हो...इसलिए इस ज्ञान को बांधो...कैद कर लो..स्मृतियों से बाहर कर दो इसे , , ताकि मनुष्य सिर्फ वह सोचे जो कि कंप्यूटर सोचता है, कंप्यूटर का कंट्रोल हमेशा अपने हाथ में रखो।’’

संदेश की अंतिम पंक्तियां पढ़ते हुए नगराधीश के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी।

उन्होंने हड़बड़ाकर चिप को कंप्यूटर से बाहर निकाला और उसे गुप्त तहखाने में डालकर अपने निजी कार्यालय में आए और विद्वानों की कमेटी से सम्पर्क साधने लगे।

अगली सुबह बच्चे जब स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे, टी.वी. पर सुबह का समाचार प्रसारित हो रहा था। बच्चों को समाचारों में कोई रुचि नहीं थी, लेकिन ब्रेक फास्ट खाते उनके मुंह अचानक खुले-के-खुले रह गए, जब उन्होंने समाचार में उस अजनबी के बारे में सुना। न्यूजरीडर निहायत निर्विकार भाव से खबर पढ़ रहा था-‘‘वह अजनबी आदमी, जो कल नगर में बच्चों को बरगलाता हुआ पकड़ा गया था, बेहद खतरनाक प्राणी है। उसके बारे में विद्वानों की कमेटी ने जों रिपोर्ट दी है, वह चैंकानेवाली है। सरकार ने उस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है, क्योंकि उससे नगर की सुरक्षा खतरे में पड़ जाने की आशंका है। ताजा सूचना के मुताबिक सरकार ने उस अजनबी की उच्चस्तरीय जांच कर मुकदमा चलाने का फैसला किया है। ’’

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