मुंशी प्रेमचंद को याद करते हुए

मुंशी प्रेमचंद को याद करते हुए

ठण्ड अपने पूरी जवानी पर थी और आज हुई बारिश ने तो गज़ब ही ढा दिया था | जग्गू अपने फटे हुए कथरी में किसी तरह दुबक कर ठण्ड को भुलाने का असफल प्रयास कर रहा था लेकिन रह रह के ठंडी हवाएँ घुस जा रही थीं | दूसरे खटिया पर उसकी मेहरारू बच्चे के साथ गुड़मुड़िया कर लेटी हुई थी और उसकी हलचल भी बता रही थी कि ठण्ड उसे भी तकलीफ दे रही है |
आखिरकार जब रहा नहीं गया तो जग्गू उठा और उसने बीड़ी के बण्डल से एक बीड़ी निकाल कर सुलगा ली | बीड़ी का धुआँ जब अंदर गया तो उसे थोड़ी गर्मी महसूस हुई | उसने मेहरारू को आवाज़ दी " अरे आजा रुक्मनियाँ , दो चार कश तू भी लगा ले बीड़ी के , कुछ राहत मिल जाएगी ठंडी से "| रुक्मनियाँ ने कोई जवाब नहीं दिया तो वो अपनी बीड़ी पीता रहा | जैसे ही बीड़ी ख़त्म हुई , ठंडा फिर लगने लगा और उसने दूसरी बीड़ी भी सुलगा ली |
बाहर दूर से झबरा के भूँकने की आवाज़ आ रही थी , शायद कोई मवेशी घुस गया था बाड़े में | हिम्मत तो नहीं पड़ रही थी लेकिन गमछी को सर पर कस के लपेट कर वो बाहर निकला और देखने लगा | झबरा दौड़ कर उसके पास आ गया और उसका पैर सूंघने लगा | एक खरखराहट हुई और झबरा भौंकते हुए भागा , शायद कोई पंड़वा आ गया था बाड़े में जो झबरा के दौड़ाते ही भाग गया |
अचानक उसे याद आया , आजकल घंड़रोज़ बहुत आ गए हैं सीवान में , कही गेहूं के खेत में आ गए तो फसल तो गयी ही जानो | अब उसने अपना चद्दर उठाया अंदर से और उसे कस कर लपेटते हुए खेत की ओर चल पड़ा | चारो तरफ धुंध छायी हुई थी , भिनसहरा की आहट सुनाई दे रही थी , वो और झबरा धीरे धीरे खेत की ओर बढ़ रहे थे | खेत के किनारे पहुँच कर देखा तो जान में जान आई जग्गू के , घंड़रोज़ नहीं दिख रहे थे | एक बार उसने झुक कर गेहूँ की फसल को हाँथ से छुआ और पलट कर घर की ओर चल पड़ा |

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