उस दिन गुरूनानक पार्क गुड्डू बाबू कुछ ज़्यादा ही सुबह पहुँच गए थे । क्या करते । जाते तो कहाँ जाते । बहू बेटे का हुक्म था । सुवह उठते ही फरमान जारी कर दिया था । “ बाबूजी ,आज दफ्तर के कुछ लोग आ रहे हैं होली मिलने । आपके घर पर रहने पर इन लोगों की स्वतंत्रता में खलल पड़ेगा । जो आएगा आपका पैर स्पर्श करना उसकी मज़बूरी होगी ।”

“--हाँ बाबूजी । आप पार्क में बैठे रहिएगा । सब मेहमान चले जायेंगें तो हम छोटू को भेजकर आपको बुलवा लेगें “

पल भर को लगा गुड्डू बाबू अपने ही घर से निकाले जा रहे है । उस घर से जिसे बनवाने और सजाने में उन्होंने अपना पीएफ और सारा पैसा लगा दिया था । यह सोचकर क़ि उन्हें जीने का मौका तो नहीं मिला लेकिन अब अपने मकान में मर शान से मारेंगें । न जाने कौन सी घडी थी क़ि भावुकता में पत्नी के मरने के बाद उन्होंने मकान बेटे बहु के नाम कर दिया था । अब मकान पर भी गुड्डू बाबू का कोई अधिकार नहीं रह गया था । बैंक की जमा पूंजी खर्च हो गयी थी । अपनी ज़रूरतों को पूरी करने को एक एक पैसे के लिए तरस रहे थे गुड्डू बाबू ।

वही अस्सी नव्बे लाख के मकान के मालिक गुड्डू बाबू अपने घर से निकाले जाने के बाद पार्क में बैठे थे । मैंने उनकी उदासी को भांप लिया था । कुरेदा तो बच्चों की तरह फफककर रोने लगे गुड्डू बाबू । हिलक हिलक कर रो रहे थे गुड्डू बाबू । उनके भीतर कितना दुःख भरा हुआ था । सब आंसू बनकर बह रहा था उनकी आखों से । उन्होंने अपने को संभाला । फिर बोले ,” अब जीने का मन नहीं करता । ज़हर खा लूंगा मैं । मर जाऊँगा । मेरी ज़रूरत अब किसी को नहीं । मैं बूढ़ा हो गया हूँ । बूढ़े को मर जाना चाहिए । जिन बच्चों के लिए मैंने कभी अपनी ख़ुशी नहीं देखी , वे मुझे मेरे ही घर से निकाल देते हैं । मेरे घर पर रहने पर दोस्तों के सामने उनका अपमान होता है ।

उन्होंने कहा ,” मुझे पता होता तो…

क्या वह बच्चों को जन्म ही न देते ?

क्या वह बच्चों को अपनी संपत्ति न देते ?

क्या ये दिन देखने से पहले वह ज़हर खा लेते?

उन्होंने पार्क की एक क्यारी की ऒर देखा जहां उम्मीद का एक फूल बस चहकने चटकने वाला था । तभी छोटू ने आकर गुड्डू बाबू का हाथ पकड़ लिया और बोला ,” दादाजी घर चलिए । मेहमान चले गए ,,,,

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