वर्तमान में सोशल मीडिया के प्रचलन ने मानव जीवन शैली के अर्थ ही बदल कर रख दिए हैं| जिनके जरिये कुछ भूली बिसरी यादें मन में लहराई, तो कुछ खट्टे-मीठे किस्से भी याद आए | कितने ही साथी बनें हमारे और कितने ही छूटे भी | ऐसा ही एक वाटस एप किस्सा आपको सुनाती हूँ| यह मेरे जीवन की एक विशेष घटना है जिसमें एक रचनाकार बहन मेरी गहन, अजीज सखी बन गई | ठीक वैसे ही जैसे श्री कृष्ण की सखी द्रौपदी बनी थी |

हमारे छेत्र गुरुग्राम में पिछले वर्ष 2016 में “कलमवीर” नामक एक साहित्यिक ग्रुप का गठन हुआ | जिस पर ग्रुप के एडमिन के अनुरूप प्रतिदिन हर एक रचनाकार अपनी एक-एक रचना कविता के रूप में रखेंगे | और पहले दिन की रचना का शीर्षक मिला “रिश्ते”- तो मैंने यह छोटी सी रचना पटल पर डाली |


रिश्ते

तोड़े ना रिश्ते

ये हमारी शान होते हैं

सुखद अहसास इनका

आत्मा का ज्ञान होते हैं

मीठा बोलो सबसे

ये रब की आवाज होते हैं

निभाओ दिलो जान से

ये परमपिता भगवान होते हैं

सभी प्रतिभागियों ने भी अपनी रचनाएँ डाली | उनमें से एक हमारी साथी की रचना सबसे अलग सबसे प्यारी, न्यारी और दमदार थी| जिसे एडमिन समेत हम सभी रचनाकारों ने बहुत ही सराहा और सबसे अव्वल पाया, जिसकी रचियता डा० विद्या शर्मा थी | अभी रचनाएँ डालने का क्रम जारी ही था की साथ-साथ समीक्षाएँ भी आनी शुरू हो गई| जब हमने समीक्षक का नाम पढ़ा तो भी डा० विद्या शर्मा ही मिली | उन्होंने मेरी कविता की समीक्षा इस तरह की, बानगी स्वरूप|

आदरणीय सबकी लाडली लाडो जी

सुप्रभात

शुभ संदेश की रिश्तेदारी पहली पोस्ट से ही मिल गईं

ठंड में गरमा गरम प्रेम प्याली

किसकी मज़ाल है जो तोड़े

इतनी शानदार रिश्तेदारी

रब की आवाज़ में मिला दे

जो अपनेपन की मिठास

मिल जाएगा सारे जहाँ का ज्ञान

जब तारीफ करतीं है तो

जर्रा-जर्रा आफताब हो

जाता है साधारण सी

नामधारी विद्या साक्षात

ब्रह्मापुत्री हो जाती है

आपके सलाम पर

कुर्बान हो जाती हैं

हम सब आपकी कर्मठता

कर्मठता पे कुर्बान है

आप में बसते हमारे प्राण है

सुप्रभात तो हमारी लाडो रानी

के शुभ संदेश से होता है

नहीं तो हमारा ज्ञान सचमुच

रजाई ओढ़े सोता है

रिश्ते की अहमियत आप ही

जानती है हम सबको प्रीत

की डोर से आपही है बाँधती

हार्दिक अभिनन्दन वन्दन

बधाई

शुभेच्छु

डा० विद्या शर्मा

हम सभी साथी अपनी-अपनी समीक्षाएँ पढकर फूल जैसे खिल उठे और सभी ने पटल पर ही डा० विद्या शर्मा जी को अधिकाधिक धन्यवाद दिया और जागरूकता जाहिर की ऐसी महान हस्ती को जानने की| तो उन्होंने बताया कि वे इलाहाबाद की रहने वाली हैं फिलहाल उनके पति का व्यवसाय चेन्नई में होने के कारण वहाँ रहती हैं| उन्होंने अनेक विषयों में डिग्री हासिल के साथ-साथ हिंदी-संस्कृत में पी.एच.डी किया है और वे डिग्री कॉलेज से प्राध्यापक सेवा निवृत हैं| वे कई भाषाओं की ज्ञाता हैं, देश प्रेमी व समाज सेविका है| उनके बारे में इतना जानकर सहसा मेरे मुह से निकल ही पड़ा| ओह ! यह तो साक्षात वीणापाणी की सुपुत्री हैं| फिर उनके प्रतिउत्तर में मेरी प्रतिक्रिया यूँ रही|

आदरणीय विद्या शर्मा जी

आप तो हैं बे मिसाल

पारखी नही कोई आपसा आज

साक्षात ब्रम्हापुत्री हैं आप

इसीलिए तो करती हैं समीक्षाएँ खास

आपके शब्दों का चुनाव

आपकी चाहत और लगाव

सब में जगा देता है भाव

आपका साथ बेमिसाल

करते हैं हम सब आपको सलाम

लाडो कटारिया

अब आप ही देखिए कि प्रतिदिन एक ग्रुप पर 30, 40 प्रतिभागीयों की रचनाओं की स्पष्ट, सटीक और पारंगत प्रतिक्रियायें वे भी फूल-पत्तियों द्वारा सुसज्जित देना कोई आसान काम नहीं| और मेरी तो दो-दो रचनाओं की प्रतिक्रिया वे प्रतिदिन देती हैं| एक तो ब्रह्म बेला के सुप्रभात संदेश की और दूसरी कविता की मैं तो कायल हो गई उनकी इस शालीन कार्य शैली और मिलनसार व्यक्तित्व की| तभी मैंने उनसे फोन पर बात की और उन्हें अपनी पक्की सखी बना लिया| और उनकी शान में यह शब्द लिख डाले |

आदरणीय डा० विद्या शर्मा

जी आपके मुखवृन्द पर सदा

सूर्य सा तेज चमकता रहे

आप सदा दीर्घायु व स्वस्थ रहें

आप द्वारा की जाने वाली

प्रतिदिन की सुंदर,सटीक

समीक्षाएँ हमारे मनों में खिली

खिली उमंग,तरंग भर कर हमें

उत्साहित कर देती हैं और भी

अधिक अच्छा लिखने को

सच पूछिये तो हमारी लेखनी

का संबल हैं आप। आपकी

सख्त मेहनत और नेक विचार

हमारे कठिन पथ को सुपथ

सुगम बनाते हैं। आप हमारी

प्रेरणा और मार्ग दर्शक हैं। ऐ

साक्षात ब्रम्हपुत्री आपने मुझे

लाडो से सबकी लाडली

बनाया।आप सम्मानीय हैं।

हम आपका बहुत बहुत

सम्मान करते हैं।

शुक्रिया

लाडो कटारिया

मेरे इस रिश्ते ने उन्हें बहुत खुशी प्रदान की और मुझे भी| और ऐसी महान विदूषी की एक रचना इस लेख में शामिल ना करूँगी तो यह मेरे लिए नाइंसाफी होगी| तो लीजिये पढ़िए “मेला” पर लिखी उनकी एक रचना:

मेला

ये दुनिया का मेला

मैं बिल्कुल अकेला

न संगी न साथी

अम्मा न बापू

न भैया न बहना

वो बचपन में देखा

बाबा संग मेला

वो भीड़ का रेला

उँगली थी छुटी

घबराया चीखा

बाबा ने उठाकर

कंधे पर बैठाया

रंग बिरंगे गुब्बारे दिलाया

झूला भी झूलवाया

जलेबियाँ खाकर

बहुत मज़ा आया

आज न मेला हैं न रेला

पोते पोतियांआते है

गाड़ी में बैठा कर

मेला ले जाता हूँ

मरीना के समुद्री

तट के किनारे

खूब बतियाते है आइसक्रीम

खाकर मुझे भी खिलाते है

बेबात खिलखिलाते है

झूलते कभी भजिया खाते

घोड़े की सवारी कर

मस्त हो जाते हैं

शंख सीपी बीन

खुश हो रेत के घरौंदों को

सीपी से सजाते हैं

समुद्र की लहरों से

खेलना हम सबको

बहुत भाता है

जो लिपटती है पैरों से

रेत गुदगुदी कर

तलवे सहलाती है

दूर तक दौड़ती है

मन मस्त कर जाती हैं

अचानक लहरें

बन गई नागिन

लोग बेतहाशा

चिल्लाने लगे

बचाओ -बचाओ

की गुहार लगाने लगे

विकराल लहरें

जल प्रलय में बदल गई

खिलौने झूले गुब्बारे लिए

बच्चे बूढ़े जवान सब लापता...

बह गयी लोरिया, लाल हरी चुनरिया, सजन -सजनी ,

प्रेमी -प्रेमिकाएं;

किनारे खड़ी नावें,

कारें खिलौने की तरह

सुनामी के जल में पल भर में समा गई

बहा ले गयी उस पार के मेले में ...

मेरी आँखे खुली आँसू बह रहे थे

मेरे पोता पोती खुशियों

से वार्ड में ऐलान कर रहे थे

दादू बच गए दादू बच गए

हम बहुत सारे लोगों को

मछेरों ने बचा लिया

भगवान बनकर

मेले का दृश्य आज भी

रोगटें खड़ा कर देता है

और कृष्ण कन्हैया से

मछवारे

सच के भगवान् ...

न जाने कितने लोगों को

दिया जीवन दान .....

बेचकर मछलियाँ पेट भरते.....

सफेदपोश, उन लंगोटीधारी

स्वाभिमानियों को हिकारत से देखते,

खुद ने किए प्राण कुर्बान

उस मेले से भी बिकते है शंख

जो गोताखोरी कर लाते है

हम उन्हें न चाहे ,पर वे हमें

बचाते हुए मानवता का पाठ

पढाते हुए दुनिया का मेला छोड़

उस पार चले जाते हैं ....

पार उस चले जाते हैं ....

शुभेच्छु

डा० विद्या शर्मा

तो कैसा लगा मेरी वाटसएप सखी- डा० विद्या शर्मा से मिलकर?

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