सुना है मेरे वतन के लोग खुन्नस खाए बैठे है

खून की प्यासी तलवारों को धार लगाए बैठे है


चौराहों पर ख़ौफ़ खड़ा है, हाथ हवा के खंजर है

बाहर इतनी गर्मी है, अंदर आग लगाए बैठे है


ज़िंदा लोगों की लाशों को किन कब्रों में दफनाएं

मरने की इतनी जल्दी है, चिता जलाए बैठे है


साड़ी लहंगा चुनर दुपट्टा नज़रों में है गिद्धों की

घर घर की मुंडेरों पर काले साये बैठे है


जिनको अपना कहकर वो घर से निडर निकली थी

वे ही उसकी देह पर नख दंतों के घाव गड़ाए बैठे है


अमन के रक्षक ही खा बैठे श्वेत कबूतर नोच-नोच कर

आज वे ही अखबारों में इक और उड़ाए बैठे है


जिन बच्चों की आँखों में कोई रंग बिरंगी तितली थी

इतने चंचल बच्चे जाने क्यों पथराए बैठे है


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