सफ़र : एक सूटकेश का

सफ़र : एक सूटकेस का

हर व्यक्ति के जीवन में कुछ घटनाएँ ऐसी होती है जो अपने खट्टे-मीठे अनुभवों के कारण अविस्मरनीय बन जाती है | हिमांचल प्रदेश प्रवास के दौरान मेरे साथ एक ऐसी ही घटना घटी, जो आज भी मेरे मन मष्तिष्क में अमिट छाप के रूप में अंकित है |

मेरी प्रथम नियुक्ति केंद्रीय विद्यालय, सरहन में प्रवक्ता (जीव विज्ञानं) के रूप में हुई जो शिमला से लगभग २०० किमी दूर हिमालय की उच्च पर्वत शालाओ में ९००० फीट से भी अधिक ऊँचाई पर अवस्थित है | शिमला से सराहन जाने का मुख्य एवम एकमात्र साधन है बस | शीत कालीन अवकाश के बाद कालका से ज्योरी का इस बार का मेरा सफ़र कुछ विशेष होने वाला है इसका आभास मुझे कालका रेलवे स्टेशन के पास ही हो गया जब नियत स्थान पर बस मुझे नहीं मिली | परिणाम स्वरूप मुझे बस पकड़ने के लिए लगभग १ किमी पैदल आगे जाना पड़ा | बस तो मिली लेकिन सीट नहीं क्योकि बस में पहले से ही यात्री मालगाड़ी में भरे बोरे की तरह ठूँसे थे | शिमला में बस चेंज कर लूँगा , यह सोंच कर मैंने अपनी यात्रा का आगाज किया | पहाड़ों को काटकर बनाई गयी सड़के, जिसके एक तरफ सैकड़ो फीट ऊँची पर्वत शृंखलाये थी तो दूसरी तरफ हजारों फीट गहरी खाईया |एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई , मुहाविरा सुना तो था आज देख भी लिया | सड़क पर बस जब सर्प की भांति लहरा कर चली तो मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गयी | पर्वत की ऊँची चोटियो पर बर्फ की सफ़ेद चादर तो धरती पर चीर और देवदार के हरे भरे पेड़ किसी को भी सम्मोहित करने की क्षमता रखते है ! प्राकृतिक सौंदर्य के आकर्षण में बधा कब मै शिमला के करीब पंहुच गया , पता ही नहीं चला | मेरी तन्द्रा तब टूटी , जब बस के परिचालक ने यह घोषणा की कि लक्कर बाज़ार जाने वाले यात्री विक्ट्री टनल के पास उतर जाये , बस लक्कर बाज़ार न जाकर मुख्य बस स्टैंड जायेगी | एक नयी मुसीबत , विक्टरी टनल से लक्कर बाज़ार बस स्टैंड तक का एक किलोमीटर का पैदल सफ़र | पिघलते बर्फ को चूम कर आ रही ठंडी हवा शरीर में सिहरन उत्पन्न कर रही थी | भरी भरकम सामान के साथ लक्कर बाज़ार बस स्टैंड तक पहुचते पहुचते मेरी स्थिति ठीक वैसे थी जैसे १०० मी रेस भागने वाले की स्थिति रेस ख़त्म होने के बाद होती है |

टिकट लेकर मै बस में बैठ गया | अब मुझे लगा कि मेरी मुसीबते ख़त्म हुई , तभी एक व्यक्ति उस सीट से उठने के लिए मुझे विवश कर दिया क्योकि वह सीट परिचालक ने उसे दे रखी थी | एक लम्बे सफ़र पर बिना सुनिश्चित सीट के यात्रा करना का तात्पर्य पीछे की सीट पर यात्रा करना था, जो मुझे गवारा नहीं था | मैंने इधर उधर देखा मगर चालक और परिचालक कही नजर नहीं आ रहे थे ताकि उन्हें सूचित कर मै अपनी सीट सुनिश्चित कर लू | मजबूरन मै सीट नम्बर लेने काउंटर पर चला गया | टिकट खिड़की से सीट नम्बर लेकर जैसे ही मै पीछे की ओर मुडा, मेरे होश उड़ गये | बस स्टार्ट होकर धीरे-धीरे बर्फीले रास्ते पर रेंग रही थी, साथ ही मुझसे दूर जा रहा था मेरा सूटकेस | हालांकि मेरे और बस के बीच दूरी मात्र १० मी थी , लेकिन पिघलते बर्फ पर रेंगती बस को भी पकड़ना उस समय एवरेस्ट पर चढने से भी मुश्किल साबित हुआ | मेरे चीखने चिल्लाने का कोई असर नहीं हुआ और बस अगले मोड़ पर मुड़कर मेरी आँखों से ओंझल हो गयी | हैरान परेशान मै तुरंत बुकिंग विंडो पर पहुंचा जहा मुझे पता चला की अगली बस आधे घंटे बाद मिलेगी | बुकिंग क्लर्क के सुझाव पर मैंने अपना टिकेट उस बस के लिए वैध कराया और बस की प्रतीक्षा करने लगा| इस बीच मैंने रामपुर बुशैर बस स्टैंड पर भी संपर्क स्थापित कर सूटकेस उतरवाने की कोशिश की लेकिन वहा से भी कोई उम्मीद की कोई किरण फूटती नहीं दिखाई दी | कुछ लोंगो ने मुझे आश्वस्त करने की कोशिश की लेकिन वो मुझे कोरी सांत्वना ही लगी |

दूसरी बस जब वहा से खुली तो मुझे यह जानकर निराशा हुई कि बस रामपुर पूर्व बस की तुलना में एक घंटा ज्यादा समय लेगी क्योकि इस बस का आकर बड़ा है और यह लम्बे रूट से होकर जायेगी | मेरा दिल बैठ गया | मै मन मसोस कर अपनी सीट पर बैठ गया | सांप से मणि निकालने से उसकी क्या दशा होती है यह तो मैंने सुना था, उसके कुछ भाग का अनुभव मै आज कर रहा था | मै बार बार अपने दिल को दिलाशा दे रहा था कि सूटकेस के गायब होने से कुछ ज्यादा नुकसान नहीं होंगा मगर कुछ महत्वपूर्ण प्रमाणपत्रो के खो जाने की कल्पना कर व्याकुल हो जाता था | मेरे एक एक पल घंटो की तरह बीत रहे थे| मेरे समीप बैठे सेलानियो का प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेना मुझे मुह चिड़ाने जैसे लग रहा था | बार-बार बस के रूकने या धीमे चलने पर मुझे चालक और परिचालक पर गुस्सा आ रहा था लेकिन मेरी स्थिति से बेखबर सभी अपनी अपनी दुनिया में मस्त थे | आखिरकार मेरी मंजिल आ गयी , बस से उतरकर , सूटकेस की उम्मीद में मै टिकटघर की तरफ झपटा लेकिन बुकिंग क्लर्क के बेरुखे जबाब ने मुझे सन्न कर दिया | बस अपनी मंजिल काफनू के लिए निकल गयी थी | साथ ही उस लम्बे सफ़र पर निकल पड़ा था मेरा सूटकेस | हताश परेशान एक हारे जुआरी की भांति मै बस में आ गया | मेरी परेशानी जानकर एक सज्जन ने मुझे शिकायत दर्ज करने की सलाह दी, जिसे न चाहते हुए भी मैंने शिकायत दर्ज करा दी | शिकायत दर्ज करने वाले अधिकारी ने मुझे आश्वश्त किया की अगले दिन बस के लौटने पर वह सुरक्षित सूटकेस उतार लेगा |उस कर्मचारी की आशावादिता भी मेरे बेचैनी को दूर न कर सका | मै नाउम्मीद हो ज्योरी अपने एक मित्र पीरी सर के रूम पर ठहर गया |

रात्रि में बर्फ़बारी के कारण सुबह चारो तरफ बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी | छात्रों की नगण्य संख्या के कारण विद्यालय में पठन- पाठन नहीं हो सका | ठण्ड से बचने के लिए हम लोंगो ने बुखारी का सहारा ले रखा था | कुछ देर बाद मेरे एक मित्र मेरे पास आये और मुझसे मिठाई खिलाने की जिद करने लगे | मिठाई मंगाई गयी| मिठाई मागने का कारण जानकार सभी के चेहरों पर ख़ुशी की एक लहर दौड़ गयी | दरअसल पीरी सर ने रामपुर बस स्टैंड सूटकेस की बाबत फोन किया तो पता चला की बस के ड्राईवर और परिचालक ने एक लावारिस सूटकेस जमा कराया है जिसका हुलिया मेरे गायब सूटकेस से मिलता है और उस पर मेरा नाम लिखा है | अब पूर्ण रूप से यह स्पष्ट हो गया की वह सूटकेस मेरा ही है | फिर क्या था ,सूटकेस के सुरक्षित मिलने की ख़ुशी में मिठाई खाकर हम सबने रोमांचक यात्रा का सुखद अंत किया |

मैंने अपने लगभग ६ वर्षो के हिमाचल प्रदेश प्रवास में वहा के निवासियो के परिश्रमी और ईमानदार होने के बहुत सारे उदाहरण सुने और देखे है, उनमे से यह एक है | यही कारण है की हिमांचल प्रदेश भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम होते हुए भी एक समृद्ध प्रदेशो में गिना जाता है | मै इनके जब्बे को ह्रदय से सलाम करता हूँ | काश हमारा संपूर्ण भारत ऐसा होता |

लेखक : बी के दीक्षित

पी जी टी (जीवविज्ञान)

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