संजना और सिद्धार्थ दोनो एक दूसरे को प्यार करते थे पर दोनो ही अपने प्यार का अंजाम जानते थे गैर जात के होने के कारण उनकी शादी मुश्किल थी " कब तक यूँ ही हम छुप - छुप के मिलते रहेगें " ठंडी साँस भरते हुए सिद्धार्थ उर्फ सिड ने कहा , " पता नही ? " , " तुम ! मुझसे प्यार करती हो न " , " ये कैसा सवाल है तुम्हे शक है " , " यूँ ही तसल्ली के लिए पूछ रहा हूँ " , " मेरे घरवाले तो तैयार है " , " एक लड़की के लिए बाप से बात करना मुश्किल होता है और गैर जात तो और ज्यादा " , " इतने मॉर्डन होने पर भी जात पात " , " तुम नही समझोगे वो ब्राह्मण वो भी पांडे और तुम ठहरे बनिया " , " इसमे मेरी क्या गलती है " , " गलती किसी की नही है बस सारा खेल किस्मत का है " , " वैसे भी हम प्यार तो कर सकते है ना " , " हुँह!!" . " कभी कभी मन करता है काश! तुम बिरादर की होती तो हम शादी कर लेते " , "और शादी के बाद ..." वो बात करते - करते करीब आ गयी . " आज मेरा मूड ऑफ है ! " , " अच्छा मेरा बाबू ! मुझसे नाराज है क्यूँ " . " जिस रिश्ते को कोई नाम न दे सके और नही स्वीकार करके निभा सके उसे बनाये रखना जायज तो नही है " . " इसमे गलत क्या है मै तुम्हे चाहती और तुम मुझे , यही सच है ". " पर हम पति पत्नी नही है और न ही हो सकते है फिर भी " . " तुम ये मर्यादा की बात करते अच्छे नही लगते हो " उसने अपनी अगुँली उसको होंठो पर रख दी , वो उसकी जिद के सामने हार गया . " अब हमे मिलना नही चाहिए ,लोग तरह - तरह की बाते बनाने लगते है " , " जैसी तुम्हारी मर्जी " . समय परिवर्तनशील होता है उसके पापा खूब ठाट- बाट से उसकी शादी और ढेर सारा दहेज दिया और इधर सिड की भी शादी हो गयी , शायद दौलत से खुशियाँ नही खरीदी जा सकती . सिड ने दहेजरहित शादी की फिर भा जरा सी खटपट पर उसकी वकील पत्नी दहेज उत्पीड़न से लेकर महिला उत्पाड़न के मामले दर्ज करा दिये और वो कोर्ट के चक्कर लगा रहा था , एक दिन भरी दोपहर थकान से चूर होकर सुस्ताने लगा , " आखिर हमने दहेजरहित शादी करके क्या पाया ? कौन सी दपंत्ति मे अनबन नही होती पर इसका मतलब ये तो नही वो उत्पीड़न होता है " " अगर सरकार को महिला उत्पीड़न कानून बनाना था तो पुरुष उत्पीड़न का ख्याल करना चाहिए " इसी उधेड़बुन मे वो व्यस्त था उसके सामने बार-बार संजना का चेहरा आ रहा था पर अब वो किसी और की थी उसके चेहरे पर फिकी मुस्कराहट आ गयी वो बुदबुदाया " हर किसी को यह जहाँ मुकम्मल नही मिलता , किसी को आसमाँ किसी को जमीं नही मिलता " कोर्ट के चक्कर काट- काटकर वो परेशाँ हो गया आखिरकार वो समझौते पर राजी हो गया " मुझे तुमसे तलाक चाहिए " , " पर हमारे यहाँ विवाह तो सात जन्मो का रिश्ता होता है " , " सात जन्म तो छोड़ो , मै तुम्हारे साथ सात मिनट नही रहना चाहती " . " मेरी आर्थिक स्थिति को तो देखो , मै तुम्हे गुजारा भत्ता कैसे दे पाउँगा " उसकी पत्नी मुस्कराते हुए " जब हैसियत नही थी तो शादी नही करनी चाहिए , वैसे भी सरकार ने महिला सशक्तिकरण की है " वो बुदबुदाते हुए बोला " सशक्तिकरण " थक हारकर उसने उसकी बात मान ली पर उसकी आर्थिक हालत तंग हो गयी , किसी प्रकार वो अपने जीवन को पटरी पर ला रहा था " अरे यार ! तुम तो तलाकशुदा , हेल्थ भी अच्छा है , इस सेहत पे तुम अच्छे पैसे कमा सकते हो " , " मतलब " , " तुम कहो तो डॉक्टर साहब से बात करे " . " ठिक है " वो अपनी जिदगीं से बेजार होकर क्लीनिक चला गया , " देखो ! ये काम बड़ा आसान है बस तुम्हे स्पर्म डोनेट करना है व तुम नि:संतान दंपत्ति को संतान सुख देने मे सहायक बनोगे एवं मोटी कमाई भी होगी " . उसने हामी भर दी , एक दो बार तो उसे अपराध बोध लगा जो वह चाहता था उसके बजाय वो एक डॉक्टर की कठपुतली बन गया . क्लीनिक मे उसकी मुलाकात संजना और उसके पति से होती है " हैलो! इनसे मिलिए मि. और मिसेज चौबे " ,संजना ने अजनबीपन के साथ व्यवहार किया . " चिंता करने की कोई बात नही है" , " आजकल की दुनिया मे तो ये आम बात है " . " हमारे पास बेस्ट स्पर्म डोनर है , आपकी कोख सूनी नही रहेगी " संजना कातर नजरो से सिद्धार्थ की ओर देखने लगी पर वो नजरे चुरा रहा था उन लोगो के जाने के बाद " हम इन लोगो के लिए स्पर्म डोनेट नही करना चाहते " , क्यो ?" . " ऐसे ही " " देखो ये भी एक धंधा है इसमे इमोशनल होने से काम नही चलेगा . वो सोचने लगा " प्यार गैर जात के साथ , शादी सजातीय के साथ अब बच्चा नही हो रहा है पति से तो फिर गैर जात " उसके चेहरे के रंग बदल रहे थे उसने स्पर्म डोनेट कर दिया , संजना को संतान की प्राप्ति साथ ही अकस्मात घटना से उसके पति की मृत्यु हो गयी , उसके पति तेरहवीं मे उसने कहा की " क्या तुम मुझसे शादी करोगे " , " नही ..." , " क्यो ? " , " मै तुम्हारे जात का नही हूँ " , " बरसो पहले तो मुझसे विवाह के लिए ललायित थे और अब मना कर रहे हो " , " उस समय की बात अलग थी और अब की बात अलग है " .
" सीधे - सीधे क्यो नही कहते कि अब तुम बदल गये हो ...? " उसने धीरे से बुदबुदाया " हाँ ! तुम भी तो बदल गयी हो " . उसके दिल मे दफन सारे गिले शिकवे दूर हो गये, " वाह ! पहली शादी घरवालो की मरजी और दूसरी अपनी " . " ये भी तो अरेंज मैरिज है " , " वो तो है पर इतने बरस बाद , क्या तुम तैयार हूँ " . " कहते है कि मर्द को दर्द नही होता पर तुम्हे पता कि हम लोग सिखाया जाता है कि कैसे अपने दर्द को छिपाया जाता है , बचपन से आज तक मैने अपने गम को चेहरे पर आने नही दिया " , " तुम अपने औरत होने का वास्ता दे सकती हो , पर हम पुरुष मानव होने के बाद भी कठोर होने की कोशिश करते है " . " क्या तुम्हारे घरवाले तैयार है " , " मेरे घरवालो ने मुझे निकाल दिया है " , " ओह ! " . " तुम लोग न पति के रुप मे जीवन बीमा चाहती हो " , " भविष्य के लिए सोचना कोई अपराध नही है" . " वैसे हमारी शादी कैसी होगी ? " . " सादगी से लव कम अरेंज " दोनो ही खिलखिला के हँस पड़े और उनके फैसले स्वंयभू समाज के ठेकेदार डर गये , " ऐसे कैसे हो जायेगा , जाति एक सर्वमान्य सत्य है"," जाने दो कौन सा पहली शादी है " . " वैसे भी मियाँ बीवी राजी तो क्या करेगा काजी "

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