2014 लोकसभा चुनाव बतौर पीठासीन अधिकारी मेरा प्रथम चुनाव था, काफी तैयारी की थी मैंने ड्यूटी पर जाने से पहले क्योँकि सभी जानते हैं चुनाव एक लोकतांत्रिक देश में कितना महत्वपूर्ण है और चूंकि मैं 18 वर्ष का 2012 में ही हुआ था इसलिये मुझे कभी वोट डालने का भी मौका नही मिला था, यानी कि चुनाव की प्रक्रिया का मुझे बुनियादी ज्ञान भी नहीं था, इसलिये मेरा कुछ ज्यादा ही सजग होना जायज ही था, आयोग द्वारा दिये गये निर्देशों, पाठ्य सामग्री और प्रशिक्षण से मैंने खुद को तैयार किया ।

चुनाव शांतिपूर्वक सम्पन्न हो चुका था, ई.वी.एम. मशीन और अन्य चुनाव सामग्री जमा करने के लिये रमा बाई रैली स्थली पर पीठासीन और मतदान अधिकारियों का मेला लगा हुआ था । जो चुनाव सामग्री चुनाव सम्पन्न कराने के लिये उपलब्ध करायी जाती है, उसमे एक मिलान पर्ची होती है जिसके अनुसार आपको सामग्री वापस जमा करनी होती है, लेकिन रमा बाई रैली स्थली पर जो अधिकारीगण सामग्री वापस ले रहे थे उनके पास दूसरी चेक लिस्ट थी, इसके कारण सभी मतदान कर्मियों को असुविधा हो रही थी, अब सरकारी मुलाजिमों को कौन समझाये कि सूरज और भास्कर में कोई अंतर नहीं होता लेकिन अगर उनकी लिस्ट में सूरज है तो वे भास्कर को कैसे स्वीकार कर सकते हैं । पूरे परिसर मे चारों ओर मतदान कर्मी चादरे बिछाये वांछित प्रपत्र तैयार करने मे जुटे थे । ऐसा लग रहा था कि सभी कर्मचारियों ने नौकरी छोड़कर व्यापार करना शुरू कर दिया था, और चद्दर पर अपनी दुकान सजाकर जल्दी से जल्दी माल बेचकर मुक्त होना चाहते हैं।

रात को 12:00 बजे तक मैंने सभी सूरज को भास्कर लिख कर अपनी चुनाव सामग्री जमा कर दी और उस भीड़ रूपी समुद्र से ड्यूटी प्रमाण पत्र रूपी रत्न अपने सेक्टर मजिस्ट्रेट से लेकर आया। अपने अधीनस्थ मतदान अधिकारियों को भी मैंने उनके संबंधित ड्यूटी प्रमाण पत्र, जो मैंने पहले ही हस्ताक्षरित कर रखे थे, दे दिये। अब मैं और मेरे मतदान अधिकारी रैली स्थली के गेट की तरफ अग्रसित थे । सभी के चेहरे पर संतुष्टी के भाव थे, हो भी क्यूं ना, जिन कठिन परिस्थितियों में संवेदनशील बूथ पर हमने शांति पूर्वक चुनाव सम्पन्न कराये, वह हमारी पोलिंग टीम के लिये उपलब्धि तो थी ही, भले ही कोई कहने वाला ना हो। हां सामान जमा करने में थोड़ी समस्या जरूर हुई, फिर भी बहुत सारे अनुभवी महारथी जिस चक्रव्यूह में फंसे हुए थे उससे निकल कर हम लोग बाहर आ रहे थे, तो एक सुकून वाली भावना का होना स्वाभाविक ही है।

पार्क की आंतरिक 30 मी० चौड़ी सड़क की दोनों पटरियों पर विभिन्न पार्टियों के अधिकारी कर्मचारी अपने काम मे लगे हुए थे, कोई सील लगा रहा था, कोई मोमबती के उजाले में अपने प्रपत्रों को जांच कर यह देख रहा था आखिर गलती कहा हो गयी गुरू, कोई भीड़ से आवाज लगा रहा है, फलाना फार्म लेकर जल्दी आ जाओ। जिन्हें लगता है सरकारी कर्मचारी काम नही करते, वो ये द़ृश्य देखकर अवश्य ही चुल्लू भर पानी खोजेंगे। पोलिंग पार्टियों की दुकानों को पार करते हम सभी मुक्ति रूपी गेट पर आ गये।

पार्टी के अन्य सदस्यों को शहर के दूसरी तरफ जाना था, तो औपचारिक विदाई लेकर चलते बने। मुझे मुंशी पुलियाँ जाना था, वहा से 500 मीटर की दूरी पर मेरा घर था जो की पैदल ही चली जा सकती थी। यह रूट ऑटो के लिये दिन मे भी सामान्य नहीं था फिर अब तो रात के 1:00 बजने वाले थे। मुझे आभास हो गया था यह इतना आसान नही होने वाला पर इंतज़ार करने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता भी तो नहीं था। करीब आधे घण्टे तक गुजरने वाले हर ऑटो को हाथ देने के बाद एक तीन सीट वाला ऑटो रूका-

“कहां जाओगे साहब”,

“मुंशीपुलिया”,

“मुंशीपुलिया नहीं, मैं पालिटेक्निक चौराहे तक चलुंगा”,

“ अरे दादा 1 किलोमीटर ही तो है, मैं अलग से पैसे दे दुंगा उसके” दादा सम्बोधन मुझे उसके लिये ठीक लगा, क्यूकि उसकी उम्र करीब 60-62 वर्ष रही होगी... थोडा सांवला सा चेहरा, अंधेरे मे चमकती आंखें, कुल मिलाकर ठीक ठाक ही लग रहा था वह.....

“ठीक है बैठिये”

एन.ओ.सी. मिलते ही मैं तपाक से ऑटो में बैठ गया, क्यूकी वहा ग्राहक बहुतेरे घूम रहे थे। धीरे धीरे ऑटो ने अपनी स्पीड पकड़ ली और दिमाग मे घूम रहे विचारो ने अपनी... चांदनी रात मे शहीद पथ के किनारे बने मल्टीस्टोरी भवन पहरेदारो की तरह खड़े थे, सड़क के बीच और किनारे लगी स्ट्रीट लाइटों की श्रिंखला से पूरी सड़क एक रोशनी की नदी की तरह दिखायी दे रहा था, एक ऐसी नदी जिसके केवल किनारे ही वक्राकार नहीं बल्कि उसकी सतह भी क्षैतिज ना होकर उर्ध्वाधर में बलखा रही हो । सहसा एक मंद हवा बदन को छू गयी, जैसे दो दिनों की सारी थकान उतारने का काम इसी ने ले रखा हो। मैंने भी प्रकृति के इस उपहार को पूरे सम्मान के साथ स्वीकर किया, आंखें बंद की और ब स्खुद को समर्पित कर दिया। अचानक ध्यान एक कार्यालय भवन पर पड़ा, इलेक्शन ड्यूटी पर जाते समय इसी भवन की भीड़ को देखकर मैंने कहा था कितना व्यस्त होता है शहर का जीवन, लेकिन ये क्या इस समय तो ये भी बिल्कुल अकेले मे आराम कर रहा था, यानी मेरी सोच को झुठला रहा था। प्रकृति को निहारते निहारते कब साथ के दोनों यात्री उतर चुके थे मुझे आभास ही नहीं हुआ। पता नहीं क्या दिमाग में सूझा, बरबस ही ड्राइवर से पूछ उठा-

“कितना कमा लेते हो दादा दिन भर में”

“ कहां साहब, यही कोई 150 – 200 रूपये”

“घर चल जाता है इतने में”

“चल तो नहीं पाता लेकिन चला लेते हैं साहब किसी तरह”

मैं और कुछ पूछता वह स्वतः ही आगे बोल पडा-

“उसमे भी हज़ार रूपये वर्दी वालो को देने पड़ते हैं, अब आप ही बताओ इस मंहगायी के जमाने में कैसे गुजारा हो”

इसी बीच दादा का फोन बजा, दादा किसी से फोन पे कह रहे थे “मैं सुबह 7 बजे बिटिया को आर.एल.बी. छोड़ दूंगा,”

चूंकि मैंने किराया अभी तक पूछा नहीं था इसलिये मैं अब सतर्क हो रहा था, कहीं दादा दुखडा रोकर किराये पर मंहगायी भत्त्ता ना लगा दे । मैरी मंजिल भी आने वाली थी तो मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा और फिर से स्ट्रीट लाइटों और ऊंचि इमारतों में ही आनंद ढूंढने लगा।

“आ गया भैया मुंशीपुलिया”

ऑटो वाले की आवाज से मैं जगा और अपना बैग और पानी की बोतल लेकर पीछे की सीट से आगे ड्राइवर के पास ही आकर खड़े होकर पैसे देने के लिये पर्स निकाले, पर ये क्या! पर्स मे तो बस एक हज़ार की ही नोट थी। पूरे दिन के बवाल में मैं ये तो भूल ही गया था। हांलाकि एक हज़ार की नोट इतनी बड़ी समस्या नही थी पर इस टाइम अगर ऑटो वाले के पास फुटकर नहीं हुआ फिर तो भारी समस्या हो जाती, मैं सोच में डूबा ही था कि आवाज आयी,

“बाबू जी 60 रूपये दे दीजिये”,

मैंने आशा भरी नजरों से दादा की ओर देखते हुए कहा “ दादा मेरे पास एक हज़ार की ही नोट है”

“आप को पहले बताना चाहिये था साहब”

गलती मेरी तो थी ही लेकिन अब गलती हो चुकी थी मैं चाहता था किसी तरह ऑटो वाले को पैसे दे दिये जाये। मैंने अगल बगल निगाह दौडायी दूर दूर तक कोई आदमी नही दिख रहा था जिससे मैं छुट्टे की उम्मीद करूं, सभी दुकानें बंद थी। मैंने ऑटो वाले की ओर देखा, उसका चेहरा बता रहा था इन रूपयों की उसे कितनी जरूरत है। इस उमर में अगर कोई इतनी रात को दो पैसे कमाने के लिये इतनी मेहनत कर रहा है तो उसके लिये पैसे की जरूरत के बारे में सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है, मैं उधेणबुन में लगा था कि तभी सुना-

“फिर घर जाइये साहब, जब कभी मिलियेगा तब दे दीजियेगा”,

मतलब वो अपने रूपये डूब जाने दे रहा था क्यूंकि इतने बड़े शहर मे इस तरह से फिर से मिलने की प्रायिकता तो शून्य ही थी, मैं ऑटो भी कभी कदार ही प्रयोग करता था। यानी कि वो अपने दिन की कमाये का एक बडा हिस्सा दान देनए जां रहा था वो भी किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं एक आदमी के लिये, एक सामर्थ्यवान आदमी के लिये। मैंने इसी शहर में लाखों रूपये महीने कमाने वालों को 2-4 रूपये के लिये मार पीट करते देखा है उसी शहर में ये दादा। मैं कुछ कड़े शब्दों का हकदार था। मैं स्तब्ध था, हैरान था, शर्मिंदा था।

दादा ने ऑटो स्टार्ट की और चलते बने, मुझे अपने एहसानों के बोझ से लाद्कर्। मैं घर गया, हाथ पैर धुले और बिस्तर पे आ गया, जरा सी भी भूंख नहीं थी। मन मे बस पश्चाताप था, मुझे खुले पैसे रखने चाहिये थे।

मैं दादा के बारे में ही सोच रहा था, उसके सहृदयता के बारे में सोचता रहा। एक छटपटाहट थी कैसे दादा का कर्ज उतारा जाये..... ऐसे इंसान ज़िंदगी मे कम मिलते हैं, इन्हें हौसला अफजाई की खास जरूरत होती है ताकि ये भविष्य में किसी मुसीबत में पड़े आदमी की सहायता करने में हिचके ना, अचानक दिमाग में एक खयाल आया.. हां यह ठीक था....मेरी सारी परेशानियों का जैसे हल मिल गया हो.... हां मुझे विश्वास था अपनी सोच पर, अब मैं सुकून से सो सकता था.....


अगले दिन आराम करने के लिये आफिस से छुट्टी मिली थी पर आराम किसे था, सुबह दूध की दुकान से टूटे पैस और जनरल स्टोर की दुकान से चाकलेट लेकर मैं मुंशीपुलिया पर खडा था। 5 मिनट बाद वही दादा मुझे साइकिल पर आगे एक छोटी सी बिटिया बैठाये मुझे आते दिखे। मैंने अवाज दी तो किनारे रूके, कुछ देर तक मुझे देखा और जैसे ही पहचान पाये

“अरे भैया आप”,

“हां दादा मैं”

“ आपको कैसे पता मैं यहा आ रहा हू”

“दादा इंजीनियर हूं, आपको याद है रास्ते मे आपके मोबाइल पर फोन आया था और आपने कहा था कि बिटिया को सुबह आप आर.एल.बी. पहुचा देंगे, बस उसी के सहारे मैं यहां आ गया”

दादा मुस्कुराये,

“ दादा ये लो आपके 60 रूपये, आपके दरियादिली को मैं शब्दों में बखान नहीं कर सकता”

दादा ने कुछ कहा नहीं, पर बिना कहे ही उनका चेहरा बता रहा था कि इंसानियत का ये इनाम वो तहे दिल से स्वीकार करते हैं।

मैंने बिटिया को चाकलेट का पैकेट दिया, बिटिया ने मासूमियत से पूछा “आज किसी का बर्थडे है क्या”

मैंने कहा “ हां बेटा आज इंसानियत का बर्थडे है”

दादा की आंखें सजल थी, मैं मौन था......

दादा को जाना था उन्होंने इशारा किया, मैंने दोनो हथ जोड्कर उन्हे और उनकी सह्र्दयता को सादर प्रणाम किया।

इस घटना को बीते हुए आज 3 साल बीत गये, फिर भी जब भी मैं ऑटो में बैठता हूं दादा मुझको बरबस ही याद आ जाते हैं।


hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.