याद आ रही है बहुत....

किसकी श्रद्धा, और वो भी तुमको.

हाँ आ रही है.....

तो बताओ न किसकी आ रही है.

नहीं बता सकती न.

बताना पडेगा......

बताते ही तुम भाव जो खाने लग जाते हो.

ओ अच्छा मेरी याद आ रही है.......

हाँ,आ भी जाये तो तुम्हें क्या फर्क पढ़ जाता है न अक्षित.

तुम तो मुझे प्यार भी नहीं करते हो.


अच्छा तुम ये बताओ मेरी स्माइली का जवाब तुम मुँह बनाकर देती हो फिर भी मैं स्माइल ही करता हूँ. अब इससे सुलझा हुआ प्यार तुम्हें और क्या दूँ मैं श्रद्धा......


तुम इसे सुलझा हुआ प्यार कहते हो अक्षित. जहाँ हमें पता ही नहीं है कि हमारे प्यार का होगा क्या. सारी गलती तुम्हारी है, न तुम मुझे प्यार करते न मैं तुम्हें सारा झंझट ही खत्म.....


अरे तुम बिना मतलब बात को इतना सीरियस लेने की कोशिश कर रही हो. इससे हमारे प्यार पर कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हे पता है न.


पर कब तक अक्षित कभी न कभी तो बगावत करनी ही होगी और ये बगावत कितनी मंहगी पड़ती है तुमको पता है न. मैंने अभी कल ही सुना कि दो इश्कबाजों ने खुद को खत्म कर दिया.


श्रद्धा तुम बात को समझती काहे नहीं हो. इश्क कभी नहीं मरता. प्यार करने वाले मरते है पर उनका प्यार जिन्दा रहता है. अब उन्हें ही देख लो वो नहीं रहे लेकिन उनका प्यार तो है न.


अक्षित तुम अपना हिन्दी सिनेमा बन्द करोगे क्या प्लीज.


इसमें हिनदी सिनेमा जैसा क्या है....?


यही कि प्यार करने वाले मरते है लेकिन प्यार जिन्दा रहता है. अच्छा मुझे ये बताओ न कि ये प्यार करने वाले कब तक अपनी कुर्बानी देकर अपना प्यार जिन्दा रखेंगे.........

बोलो न अक्षित कुछ तो कहो...

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