पिया तू अब तो आजा

ऐसा देखा गया है कि ये जो पिया नामक एक प्राणी होता है बडा बेदर्दी होता है । अक्सर बरसात का मौसम आने के कुछ दिनोँ या महिनोँ पूर्व ही यह अपने घर से किसी दूसरे शहर मेँ या परदेस चला जाता है और बाद मेँ गृहणियाँ कहतीँ रहतीँ हैँ कि ‘अजहुँ न आए बालमवा सावन बीतो जाए । वे कई गवैयोँ के पास भी जाती हैँ और् उनसे आग्रह् करतीँ हैँ कि तुम भी अपने गाने के माध्यम से पिया को सावन के महिनेँ मेँ घर वापस आने के लिये प्रेरित करोँ । गवैये भी अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीँ छोडते है तथा याद पिया की आये, आये न बालम, मोहे भूल गये साँवरियाँ, या पिया बिन पिया बिना बसियाँ बाजे ना बाजे ना आदि गाकर पिया को बरगलाने की कोशिश करते रहते हैँ जैसे पिया कोई तबला वादक हो जिसके बिना बसिया नहीँ बज पायेगी । कुछ तो सावन के महिने को ही दोष देने लग जातीँ हैँ कि ‘बरसत गरजत सावन आओ है पर लायो न सँग मेँ हमरे बिछुडे बलमवा’ जैसे सावन का काम पानी बरसाने के साथ ही साथ यह भी रह गया हो कि वह अपने सँग मेँ परदेस मेँ बसे या बिछुडे पियाओँ को भी घर वापस लाए । सावन है या पुलिस विभाग ? अक्सर मेरे मन मेँ एक शँका जन्म लेती है कि गृहणियोँ को सावन के महीने मेँ या बरसात का मौसम आते ही पिया की याद क्योँ सताती है जाडे या गर्मी मेँ क्योँ नहीँ । शायद इसका कारण यह हो सकता है कि पिया एक सरकारी नौकरी मेँ होगा और कहीँ तबादला होकर दूसरे शहर मेँ सेवारत हो गया होगा तथा उसके परिवार को उस शहर मेँ जहाँ से वह गया है सरकारी मकान मिला हुआ होगा जहाँ उसके बीबी बच्चे रहते होँगेँ । अब तबादला हुआ है तो मकान भी खाली करना चाहिये लेकिन नहीँ कर रहे है जब बडे बडे अफसर नहीँ कर रहे है ,नेता नहीँ कर रहे, मँत्री नहीँ कर रहे तो वो क्योँ करे, हो सकता है वह सोच रहा हो कि ऊपर कुछ ले दे कर उसका तबादला वापस उसी शहर मेँ हो जाए तब क्या जो मकान मिला हुआ है वह फिर से आसानी से मिल पायेगा, नहीँ ! इसलिये खाली मत करो । अब सरकारी मकान है तो लाजमी है कि बरसात मेँ पूरा टपकता भी होगा शिकायत करने पर यह जवाब भी मिल सकता है कि परेशानी है तो खाली कर दो बस यहीँ सब मात खा जाते है अत: कहा भी न जाये और रहा भी न जाये । शायद इसीलिये पिया की याद आ रही है कि कम से कम बरसात मेँ सावन के महीने मेँ जब घरोँ मेँ पानी टपक रहा हो तब् तो पिया तू आजा और सीमेंट मेँ शक्कर का घोल बना कर छ्त पर चढ जा और टपकने का इलाज कर या घर मेँ कमरोँ मेँ पानी टपकने की जगहोँ पर बाल्टियाँ, भगोने, परात आदि रख जिससे सामान खराब न हो । अब गृहणी बच्चोँ को स्कूल भेजे, खाना बनाए, घर का सारा काम करे या छत पर चढ कर सीमेंट लगाए । क्या ऐसे कार्य गृहणियोँ को शोभा देते हैँ । माना कि महिलाओँ ने आज सभी क्षैत्रोँ मेँ अपना वर्चस्व कायम किया है लेकिन उन के द्वारा छत पर चढ कर सीमेंट लगाने के कार्य के उदाहरण अभी भी कम ही मिलते हैँ । यह अधिकार् तो पुरुषोँ ने अपने पास ही सुरक्षित रखा हुआ है ।

यह मन भी बडा चँचल होता है। पिया सावन के महीने मेँ घर क्योँ नहीँ आना चाहते इसका कारण जानने के लिये पता नहीँ कहाँ कहाँ भटकता रहता है ।

यह भी हो सकता है कि पिया जी बाढ राहत कार्य विभाग मेँ ही कार्यरत होँ तथा वे घर इसलिए भी नहीँ आ रहे हो कि बाढ की सँभावनाएँ सामने हैँ और राहत कार्य शुरू होने वाला है । अब जब राहत कार्य शुरू हो जायेगा तो ऐसा न हो कि वो तो अपने घर मेँ भगोने और बाल्टियाँ ही रखते रह जायेँ और राहत किसी और को मिल जाए । जब बाढ आयेगी तो राहत की आवश्यकता तो सभी को होती है चाहे राहत पाने वाला हो या देने वाला । मारने वाले से बचाने वाला ही बडा होता है । इसलिये राहत भी बडे को बडी ही मिलती है ।

ऐसा भी हो सकता है कि वह किसी विद्यालय मेँ अध्यापक हो तथा जो अध्यापक होगा उसे अध्यापन के अतिरिक्त और भी बहुत सारे काम है कभी जन-गणना तो कभी मत गणना, कभी पोलिओ ड्रोप्स तो कभी मतदाता परिचय पत्र,कभी यूनिक आई डी तो कभी नगर निगम, एम.एल.ए. या साँसद के चुनाव उसके पास तो इतना समय कहाँ कि सावन मेँ वह अपने घर जाए।

य़ह भी सँभव है कि इस मौसम् मेँ भारी बरसात होने के कारण जगह जगह बाढ आ रही हो तथा बाढ का दृश्य देखने के लिये मँत्री जी उन क्षैत्रोँ मेँ हेलीकोप्टर से हवाई सर्वे करने के लिये आ रहे हो क्योँकि सरकार को बाढ का आँकलन जगह जगह नष्ट हुई फसल, बेघर हुए लोग तथा उजडे हुए मकानोँ भूखे प्यासे बच्चोँ को देखकर नहीँ होता है उसे तो हेलीकोप्टर मेँ बैठ कर ही होता है और यदि पिया की किस्मत अच्छे हो तो उनके साथ वह भी मुफ्त मेँ हवाई यात्रा का आनँद उठा सकता है ।

ऐसे मौसम् मेँ घर से दूर रहने का एक लाभ यह भी है कि पिया जी के जब ‘सावन के महीने मेँ इक आग सी सीने मेँ लगती है तो वे पी लेते है और दो चार घडी जी लेते है’ यदि घर मेँ होते तो सीने की आग को बुझाने के लिये पत्नी ज्यादा से ज्यादा डाइजीन की गोली, या अजबाइन और मैथी के दाने पानी के साथ दे देती, भला उससे कोई आग बुझती है क्या ? इससे तो परदेस ही अच्छा है ।

मुझे तो लग रहा है कि पिया इस मौसम मेँ जान बूझ कर घर आना नहीँ चाहता उसे लग रहा है कि इस महिने मेँ बरसात, बाढ के साथ साथ कई त्योहार और बहुत सी मौसमी बीमारियाँ भी आने वालीँ है अर्थात घर का बजट गडबडाने वाला है और इस मँहगाई के दौर मेँ इन सब का खर्चा उठाना एक सरकारी कर्मचारी के बस की बात नहीँ है इसलिये परदेस मेँ ही बैठे रहो । ज्यादा से ज्यादा क्या होगा उसकी पत्नी उसे बेदर्दी, बैरी, हरजाई, जुल्मी आदि उपाधियोँ से विभूसित कर देगी एक और गीत गाना शुरू कर देगी जिसका भावार्थ भी पचासोँ गीतोँ की तरह वही होगा कि ‘ पिया तू अब तो आजा.. ।

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