राजू ट्रेवल्स की २/२ बस - लक्जरी कोच सन्नाटे को चीरते हुए, हिचकोले खाते हुए, आगे बढ़ती चली जा रही थी. एक झटके से बस रुक गयी. बस के रुकते ही शंकित की नींद खुल गयी और उसके शरीर के सारे रोयें खड़े हो गए. एक अनजाने भय से उसका शरीर थरथरा रहा था उसने खुद को सहज किया और चारो और देखा - कहीं कोई अनहोनी की आशंका तो नहीं है. उसने देखा कि बस न तो खराब हुई, न जंगल में रुकी है,एक लाइन होटल पर रुकी है . यात्रियों का झुण्ड खाना खाने के लिए नीचे उतर रहा है और बस कंडक्टर चिल्ला रहा है - "यहाँ बस सिर्फ ३० मिनट ही रुकेगी, खाना खा लीजिये, फ्रेश हो लीजिये, फिर, रास्ते में बस नहीं रुकेगी."

शंकित बस से नहीं उतरा था उसके मन में एक अनजाना-सा भय जो था. वो बस एक द्रष्टा की तरह अपने चारो ओर होने वाले गतिविधियों को देख रहा था.

लाइन होटल जैसे सोती नहीं है रात को उसकी नींद भाग जाती है. कुछ लोग खटिया पर पसरकर अपने हाथ- पाँव को सीधा कर रहे थे. कुछ लोग चाय की चुस्कियां ले रहे थे. कुछ लोग गुंगटी से गुटखा खरीद रहे थे और कुछ लोग फ्रूटी. एक ने गुटखा थूकते हुए चिल्लाया - ,"छोटू, २ रोटियाँ बटर मारके,एक ऑमलेट,एक बटर चिकन जल्दी ले आओ. साथ में गिलास भी ले आना." जैसे ही स्टील का ग्लास आया, वो अपने कुरता से देसी की बोतल निकला और गिलास में डाल कर, चिल्ड कोक मिलाकर, अपने सूखे गले को तर करने लगा.

ऐसे लाइन होटलों पर चालकों का विशेष ख्याल रखा जाता है. होटल के २-४ छोटू, ड्राईवर की विशेष आवभगत में लगे रहते हैं. ड्राईवर ने जैसे ही खाना ख़त्म किया, वो एक आदिवासी युवती के साथ अँधेरे में खो गया. ये आदिवासी युवतियां जाने-अनजाने में, देह व्यापार के जंगल में धकेल दी जाती हैं, जिससे वो शायद ही निकल पाती है . न जाने कितने लोगों की यौन-पिपासा शांत करती हैं और असमय बूढी हो जाती हैं और कई बार असाध्य रोगों से ग्रसित हो जाती हैं और ये असाध्य रोगों को आगे भी फैलाती रहती हैं, असमय काल-कलवित भी हो जाती हैं. जब ऐसे रोगों का इन पर आवरण चढ़ जाता है, तो इनका देख -भाल कोई नहीं करता है, लोग घरों से निकाल देते हैं और ये अति नारकीय मौत को वरण करती हैं.


बस ४५ मिनट से रुकी हुई थी. सारे यात्री बस में लौट आये थे. ड्राईवर का कोई अता-पता नहीं था. लोग परेशान हो रहे थे . इतने में ड्राईवर आता हुआ दिखा, वो अपनी फुल पेंट की जीप को लगाते हुए बस की और दौड़ा चला आ रहा था.


एक बार फिर बस चल पड़ी गंतव्य की और ! शंकित के बगल वाली सीट पर जो यात्री था, चुप्पी तोड़ते हुए कहा -," ये साले लाइन होटल वाले हरामी होते हैं". इतना कहकर चुप हो गया.

शंकित की जिज्ञासा बढ़ गयी और उसने कहा ," ऐसा क्या हुआ, सर!".

"मैं आलू -गोभी की सब्जी आर्डर किया था रसोइया जिस कड़ाही में चिकन फ्राई कर रहा था, उसी से तेल निकाल कर आलू-गोभी में डाल दिया. भला हो कि मैंने देख लिया, मेरा धरम भ्रष्ट होते होते रह गया."

"घर छूटा तो धरम भी छूटा." शंकित ने कहा.

"आप अपने जूते पहन लें, नहीं, तो मेरा दम छूट जाएगा. सहयात्री ने कहा.

शंकित ने अपनी जुराबें नहीं धोये थे, उस से बदबू आ रही थी.

शंकित को नींद आ रही थी वो सोना चाहता था और सहयात्री बातचीत का सिलसिला चलते रहने देना चाहता था.

पड़ोस की सीट वाला चिल्लाया," सारी बातें बस में ही कर लोगे. कुछ घर के लिए भी छोड़ दो."

बस में शांति पसर गयी थी. ज्यादातर लोग सो रहे थे.

अपने देश की ज्यादातर सड़कें और बसें रोमांचकारी अनुभव कराती हैं. विशद वर्णन की आवश्यकता नहीं है, हमारे सुधि पाठक समझदार हैं.

ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगाया और इस अचानक ब्रेक के कारण कई लोगों का सर आगे वाली सीट से जा टकराया. एक-बार फिर शंकित डर गया और पुरानी यादों में खो गया, सब कुछ चलचित्र की तरह उसकी आँखों के सामने घूमने लगा..

आज से करीब १ साल पहले - २६ जनवरी की रात थी.

शंकित पटना में गाँधी मैदान के पास बस स्टैंड में खड़ा था. उसे पटना से रांची जाना था. बस कंडक्टर, दलाल अपनी-अपनी बसों में बिठाना चाह रहे थे, कोई आगे की सीट का लालच दे रहा था, कोई कम किराया का तो, कोई आरामदायक सीट का, कोई कह रहा था - हमारे बस में लेटेस्ट मूवी चलती है.

२ लोग आये और उसका बैग लेकर जबदस्ती बस में बिठाने लगे. शंकित ने खुद को छुड़ाया और बोला कहीं नहीं जाना है मुझे. बस स्टैंड में एक ओर जहाँ गन्दगी का साम्राज्य फैला था वहीं दूसरी और शोर-शराबा, धक्कम- धुक्की . बस ड्राइवर खुद को ड्राइविंग के लिये तैयार कर रह थे.

खैर, शंकित ने राजू ट्रेवल्स में टिकट बुक कर लिया और बैठ गया. उसका सीट नम्बर था -८ . वो बहुत खुश था इस तरह की सीट पाकर . अच्छी नींद आएगी . ये सीट न बहुत आगे है न बहुत पीछे और नहीं टायर के उपर है, जर्क नहीं लगेगा, घुमावदार रास्ते में भी


शंकित आराम से अपनी सीट पर बैठ गया, बस में मर्द सिनेमा दिखाई जा रही थी, वो भी खुद को अमिताभ बच्चन ही समझने लगा. इतने में बस का खलासी चिल्लाने लगा - आज बस नहीं जाएगी, नवादा वाला रास्ता में जाम है और बोध-गया वाला रास्ता सुरक्षित नहीं है, उस में खतरा है .

पाठकों की जानकारी के लिए

पटना से रांची जानेवाली ज्यादातर बस नवादा वाला रूट फॉलो करती है, बोध- गया वाला नहीं, क्योंकि नवादा वाला रूट छोटा है. आप मैप जरूर देखें.


यात्री परेशान हो रहे थे. बस ड्राइवर ने यात्रियों को शांत करने के लिए कहा ,"हम ओनर से बात कर रहे हैं, उनसे परमिशन ले रहे हैं, एक बार उनका परमिशन मिल जाए, फिर, चल पड़ेंगें. दौड़ा देंगे और आप लोगों को टाइम से हीं रांची पहुंचा देंगे.

गड्डी चल पड़ी, बस में बैठे यात्री सुकून महसूस कर रहे थे.

शंकित के मानस- पटल पर अज्ञात भय रेंग रह था,आज कुछ तो गड़बड़ होकर ही रहेगा वो ऐसा सोच रहा था. ईश्वर से प्रार्थना कर रह था कि आज की ट्रिप अच्छे से पार लग जाए.

बस, एक-एक कर, छोटे शहरों को, गाँव को पार करती हुई आगे बढ़ने लगी. शंकित का मन उद्धिग्न था वो सोने की कोशिश कर रहा था. अचानक उसकी नजर सामने बोर्ड पर पड़ी, उसे पढ़कर वो बहुत खुश हो गया. उसने सोचा - संकट टल गया.

बोर्ड पर लिखा था जहानाबाद.

पाठकों की जानकारी के लिए

जहानाबाद एक नक्सल प्रभावित क्षेत्र था, जहां अक्सर रक्त- रंजीत घटनाएं हो जाती थी.

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शंकित खुश था एक खतरनाक इलाका निकल गया अब कोई समस्या नहीं होगी.

बस चलती रही और गया पहुँच गयी और गया से आगे बोध- गया. बोध- गया से जैसे ही बस आगे बढी. पुलिस ने गाड़ी रोक दी.

थानेदार -," अभी बस आगे नहीं जाएगी. आगे खतरा है. १५- २० बसों को हम साथ लेकर जाएंगे, जिस से आप सुरक्षित रह सको "

"पैसा खाने का तरीक़ा है. ये पुलिस वालों का कोई माई -बाप नहीं होता है. पैसा ही इनका ईमान- धर्म होता है. साले, अब हमे लटका कर रखेंगे". एक यात्री ने कहा.

काफी देर तक ड्राइवर, कंडक्टर और थानेदार आपस में जिरह करते रहे. अंततः बस चल पडी.

"पैसा लिया होगा साला दारोगा" एक यात्री ने कहा.

बस चल पड़ी, भगवान् बुद्ध के निर्वाण भूमि को नमस्कार करती हुई.

अचानक कानों में तीव्र स्वर सुनायी दी.

"गाड़ी, गाडी रोको."

बस रुक गयी थी, लोग भय से काँप रहे थे. कुछ लोग अपना सर छुपा रहे थे. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था. इतना तो तय था कि सभी लोग लुटे जाएंगे . किसकी जान जाएगी ,किसकी बचेगी,किसी को नहीं पता था! सब डाकूओं और ईश्वर के भरोसे था. शंकित भयभीत नहीं था वो चोरों को, डाकूओं को देखना चाहता था. अँधेरे में वो इतना ही देख पाया - कुछ दुबले -पतले कद- काठी के लोग बस के चारो और दौड़ रहे हैं.

शंकित ने सोचा - आज जीवन का अंतिम दिन है. जैसे ही ये डाकू बस के अंदर आएंगे और मेरे पहचान पत्र पर मेरे पिता का नाम पढ़ेंगे तो मुझे मार डालेंगे. यह सोचते हुए वो अपना पहचान पत्र छुपाने लगा. उसके मानस पटल पर बारा हत्या कांड घूम रही थी जिसमें एमसीसी ने उसकी जाति-विरादरी के अनेक लोगों की गला काट कर हत्या कर दी थी.

पाठकों की जानकारी के लिए (विकी)

The Maoist Communist Centre (MCC) was one of the largest two armed Maoist groups in India, and fused with the other, the People's War Group in September 2004, to form the Communist Party of India (Maoist)

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अचानक गोली चली ढेर सारी पुलिस आ गयी और बस गया लौट गयी.

अगले दिन, बस दिन में रांची के लिए प्रस्थान की और दोपहर में रांची पहुँच गयी.

शंकित अपने दोस्तों को अपनी आपबीती बता रहा था. उसी क्षण किसी ने रेडियो ट्यून किया. समाचार आ रहा था. अभी आप लवनीत निगम से प्रादेशिक समाचार सुनेंगे.

पुलिस ने अपनी बहादूरी से बस डकैती को होने से रोका. कांस्टेबल रमन सिंह ने डाकुओं से जमकर सामना किया और अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए वीर गति को प्राप्त कर लिए. जब राजू ट्रेवल्स की बस रात्रि में बोध- गया से आगे जा रही थी तो बस को सुरक्षित करने के लिए वो यात्रियों के साथ हो लिए थे. जब बस को डाकूओं ने घेर लिया था, उन्होंने अप्रतिम बहादुरी का परिचय दिया और यात्रियों की सुरक्षा करते हुए अपने प्राण की आहूति दे दी.

शंकित सोच रहा था जिस पुलिस को हम लोग गाली दे रहे थे, वही हमारा रक्षक साबित हुआ.

शंकित ने थोड़ी और जानकारी एकत्रित की इस घटना के बारे में तो ज्ञात हुआ कि कांस्टेबल रमन सिंह पुलिस में अपनी बहादूरी और देश-भक्ति के लिए जाने जाते थे. उस रात २६ जनवरी को वो चुपचाप राजू ट्रेवल्स की बस में बैठ गए थे. जैसे ही डाकूओं ने बस को घेरा,रमन सिंह अपनी रायफल लेकर ड्राईवर की सीट से कूद पड़े और डाकूओं पर टूट पड़े और गोलियां चलाकर उनको हतप्रभ कर दिया, डाकू अंधाधुंध गोली चलाने लगे. एक गोली रमन सिंह के सीने में लगी, वो जमीन पर धडाम गिर गए. उनके सीने से खून के फब्बारे निकलने लगे पर वो रुके नहीं, हार नहीं माने, गोलियां चलाते रहे. थोड़ी देर में पास के पुलिस स्टेशन से पुलिस भी आ गयी तब तक उनके प्राण पखेरू उड़ गए पर हांथो से रायफल गिरी नहीं थी, रमन सिंह का पार्थिव शरीर रायफल वैसे ही थामे था.

कुछ दिनों बाद अखबार में खबर छपी थी - मुख्यमंत्री ने २ लाख की अनुग्रह राशि की घोषणा की है कांस्टेबल रमन सिंह के परिवार के लिए और २५ लाख की अनुग्रह राशि की घोषणा - साम्प्रदायिक हिंसा में शिकार हुए एक परिवार के लिए. शंकित समझ नहीं पाया कि अनुग्रह राशि में इतना फ़र्क क्यों हैं? कांस्टेबल रमन सिंह ने तो नागरिकों की रक्षा करते हुए अपने प्राण गवाएं.

शंकित ने थोड़ी सी और जानकारी अर्जित की तो पता चला कि बोध-गया पे पास एक गांव है - चोरडिहा, जहां के लोगों का पेशा है - बस लूटना. रात को

ज्यादातर बस ग्रुप में चलती हैं और वो सड़क पर पेड़ काट कर, गिरा कर, रास्ता अवरुद्ध कर देते हैं , उसके उपरान्त सारे बसों को लूट लेते हैं.

शंकित ये सोचने लगा - क्या हो गया है बुद्ध के निर्वाण स्थली को? यहाँ के लोग लूट-पाट क्यों करते हैं? उसने मन में सोचा - बुद्ध एक बार फिर आ जाओ इस जंगल के डकैतों को सद्बुद्धि दो, जैसे आप ने अंगुलिमाल को दिया था.


इस घटना के उपरांत जब भी शंकित रात में यात्रा करता और बस किसी भी कारण से रुक जाती तो उसके मन में वही अनजाना भय समा जाता है.


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