मोती

भैया इसे ले चलो न घर पर - रमेश ने अपने भाई के हाथ को पकड़ कर बड़ी ही कातरता से कहा।

धत् पगले! क्या करेगा इसे ले जाकर? अरे ये तो साधारण नस्ल का है। पालना है तो कोई विदेशी नस्ल का पालो। देखो न कितना गंदा भी है। - उसके भाई ने उसे समझाने की कोशिश की।

नही, नही, चलो न इसे लेकर- रमेश ने फिर आग्रह किया।

अरे तो इसे लेकर कैसे जाएंगे? सुसु पोट्टी करेगा रास्ते भर - रमेश के बड़े भाई सोमेश ने खीजते हुए कहा।

इसे एक थैले में डाल लेते हैं, तुम धीरे-धीरे सायकिल चलाना और मैं कैरियर पर आराम से इसे गोद में लेकर बैठ जाऊंगा, जब घर पहुंच जाएंगे तो थैले से निकाल देंगें। - रमेश ने तर्क दिया।

अरे मर जायेगा ये, दम घुट जाएगा इसका- सोमेश ने झिड़कते हुए कहा।

नहीं मरेगा, मैं इसका मुंह थोड़ा बाहर निकाले रहूंगा न? मर कैसे जाएगा?- रमेश जिद पे अड़ा रहा।

ठीक है तुम ही छूना उसे मैं तो नही छुऊँगा-सोमेश को अपने छोटे भाई की जिद माननी पड़ी।

रमेश की तो जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई थी। झट से कपड़े के एक थैले में बड़े ही कुशलतापूर्वक उसने उस पिल्ले को इस तरह से रखा जिससे उसका मुंह थोड़ा बाहर की ओर निकला रहे और साइकिल के पीछे कैरियर पर सवार होता हुआ अपने बड़े भाई को चलने के लिए इस तरह से हुक्म दिया जैसे कोई राजा कोई लड़ाई जीत कर अपने साम्राज्य को वापस लौट रहा हो।

दरअसल रमेश को पालतू जानवरों से बहुत लगाव था। जब से उसका एक प्रिय कुत्ता शेरू बूढ़ा होकर मरा था तब से उसके सर पर दूसरा कुत्ता पालने का भूत सवार था जो शेरू की कमी को पूरा कर सके। और आज उसने भाई के साथ बाजार से लौटने वक्त एक धूल धूसरित मटमैला बीमार सा पिल्ला देख लिया। उसे अकेला देख, वो अपने घर ले जाने के लिए आतुर हो उठा.

आधे रास्ते मे उस पिल्ले का नामकरण और घर आते आते उसके रहने का स्थान, उसके खाने का बर्तन, उसके सोने के लिए बिस्तर इत्यादि सब निर्धारित हो गए।

मम्मी, मम्मी, देखो न, कौन आया है- रमेश ने अपने माँ को जोर जोर से आवाज दिया।

कौन आया है? - माँ ने पूछा।

रमेश ने थैले को पिल्ले के मुंह से धीरे धीरे इस तरह से हटाया जैसे सास अपनी नई नवेली बहु का चेहरा मुहल्ले वालों को दिखाती है।

अरे ये क्या ले आया है?
कहाँ से उठा लाया?
इसकी माँ तुम्हे काट लेती तो?
लाना था तो कोई सुंदर सा देख कर लाता,
बीमारू को क्यों उठा लाया?
मुझे कहता में मंगवा देती सोनपुर मेले से- रमेश की माँ ने नाराज होते हुए कहा।

बताता हूं सब बताता हूँ - रमेश ने मोती को आहिस्ते से जमीन पर रखते हुए कहा।

उसने बाजार से घर आने तक की एक एक घटनाओं को एक गौरव गाथा की तरह अपनी माँ को सुनाया और मोती उतनी देर रमेश के पैरों के पास बैठा रहा।

मानवों को भगवान ने अगर उत्कृष्ठ सोचने की शक्ति प्रदान की है तो उन्होंने जानवरों के ज्ञानेन्द्रियों को बेमिसाल बनाया है। शायद इसीलिए जानवर स्पर्श को ज्यादा अच्छे से समझ पाते हैं और जो प्यार देता है उनके भक्ति में सारी जिंदगी निःस्वार्थ भाव से तल्लीन रहते है। मोती भी आधे घंटे के स्नेह स्पर्श को समझ चुका था और रमेश को अपना मालिक मान चुका था।

मोती के लिए एक छोटी सी चारपाई, बिस्तर और जगह का इंतजाम फौरी तौर पर किया गया और खाने के लिए दूध- रोटी दिया गया। रमेश ने ये सारा इंतजाम अपने सिरहाने से केवल पांच फीट की दूरी पर किया। उसका वश चलता तो वो मोती को अपने साथ लेकर सोता पर विवश था क्योंकि रमेश को अपने पिता जी के पास सोना था। उसके पापा ने भी कोई आपत्ति दर्ज नही की बल्कि वे खुश थे कि चलो घर की रखवाली करने को कोई आ गया।

7 बजे सुबह उठने वाले रमेश की नींद आज 5 बजे ही खुल गई थी, ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे रात भर वो सोया ही न हो। मोती भी जैसे रमेश के आने का इंतजार ही कर रहा था। रमेश के पास आते ही वो भी अपनी पूंछ हिलाकर और कुँ-कुँ की आवाज करते हुए प्यार दिखाने लगा। रमेश ने उसे गोद मे बिठा कर सहलाया और उसके बाल से सारे खर-पतवार और मिट्टी को साफ किया फिर उसे साबुन से रगड़ रगड़ कर नहलाया। तौलिये से उसके शरीर को पोछ कर उसे धूप में रखा। फिर खाना पानी दिया।

यह दिनचर्या लगभग हर दिन की थी बस 15-20 दिनों बाद मोती की ट्रेनिंग खेल कूद के माध्यम से शुरू हो चुकी थी। मोती धीरे धीरे घर के सदस्य में शामिल हो चुका था।
दो तीन महीनों में मोती जब जरा बड़ा हुआ, उसका शरीर और मुंह उसकी प्रजाति के मुकाबले थोड़ा लंबा और बाल छोटे छोटे रेशमी व मुलायम हुए। सबसे ज्यादा आकर्षक तो उसके कजरारे नैन थे। उसे तो अब घर के अंदर आने जाने की अनुमति मिल चुकी थी, पर कभी भी उसने रसोई में प्रवेश नही किया और न ही कभी उसने घर को गंदा किया। उसे अगर मल मूत्र त्यागना होता तो बगीचे में जाया करता था। रमेश की माँ का भी लाडला था वो क्योंकि जब भी जमीन पे वो किसी काम से बैठती थी मोती उनके आँचल में चुपके से अपने को लपेट लेता, कभी कभी हड़बड़ी जब भी माँ काम निपटा कर खड़ी होती वो धम्म से जमीन पे गिर जाता। ऐसा दो चार बार हुआ, पर अब तो माँ को भी याद रहने लगा था इसलिए जब भी खड़ी होने को होती पहले उसे अपने आँचल से निकालती थी। पर प्यार से झिड़की देना न भूलती थी कि बहुत बदमाश हो गया है, बहुत मार लगेगी , चल भाग बदमाश इत्यादि। और बदले में मोती पूँछ इतनी जोर से हिलाता जिससे उसका आधा शरीर भी हिलने लगता, ये देख कर माँ की हंसी छूट जाया करती। मोती को दिन का खाना रमेश के माँ के हाथों और रात का पापा के हाथो होता। पापा जब भी खाने बैठते एक निवाला खुद खाते और दूसरा मोती को मिलता। मोती भी बड़े इत्मीनान से अगले निवाले का इंतज़ार करता।

घर के सदस्य अगर संस्कारी हों तो उनके जानवर भी संस्कारी हो जाते हैं। हमारे आस पास के परिवेश हमारी जिंदगी को बहुत प्रभावित करते हैं। अगर एक राजा के बेटे की परवरिश किसी चोर के यहां हो तो वो भी चोर ही बनेगा राजा थोड़े न बनेगा? ठीक उसी प्रकार मोती जानवर होकर भी मानवों का गुण सिख रहा था।

मोती की समझने की शक्ति बहुत विकसित हुई जिससे वो परिवार के कुटुम्बों का भी पहचान लेता और घुल मिल जाता। जब कोई अतिथि घर आते, उनके आने की सूचना भौंक कर नही, घर आकर किसी के कपड़े को खींच कर देता था। हाँ, किसी अजनबी जिससे रमेश का खून का रिश्ता नही होता उनके आने पर जरूर शोर मचाता था। इतना ही नही कुटुम्ब को विदा करने भी जाता था, केवल इसी समय वह घर से बाहर जाता था, एकदम निर्भीक, निडर होकर। क्या मजाल जो गली के कुत्ते उस पर भौंक भी दें। शायद वे भी इसके व्यक्तित्व के कायल हो चुके थे।

जोरों की ठंड पड़ रही थी। मोती के लिए रजाई का इंतज़ाम किया गया। एक सुबह जब रमेश उसके पास गया मोती ने कोई प्रतिक्रिया नही दी। रमेश के तो मानो सांस ही थम चुकी थी, उसने अपने भाई, माँ पिता सबको बुलाया। पापा ने कहा इसे ठंड लग गई है अब तो इसे नहलाना बंद करो? इसे आराम करने दो कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा। सब अपने कामों में लग गए पर रमेश मोती के बालों को सहलाता उसके पास ही बैठा रहा।

बार बार माँ के पास जाकर पूछता -माँ बताओ न कैसे ठीक होगा मोती? क्या करें? न तो कुछ खा रहा रहा न ही पानी ही पी रहा है।

माँ ने कहा इसके पास अलाव जला दो गर्मी रहेगी तो जल्दी ठीक होगा। अलाव लगा पर मोती के तबियत में सुधार नही हुआ। रमेश भी माँ के बहुत आग्रह करने पर दो रोटी खाया था। उसकी तो भूख प्यास तो जैसे खत्म ही हो गई थी। मोती की सेवा में कोई कसर बाकी न रहे बस यही धुन उसके सर पे सवार थी। उसे याद आया जब मेरी तबियत खराब हुई थी तो माँ ने तेल गरम करके मालिश की थी। बस यही प्रक्रिया उसने मोती के साथ भी शुरू कर दी। दो दिनों तक सेवा प्राप्त कर मोती का स्वास्थ्य बेहतर होने लगा था और तीसरे दिन से रमेश को अपना मोती फिर से मिल चुका था। एक कुत्ते की इतनी सेवा? पापा ने तंज कसा- बुढ़ापे में हमारी इतनी सेवा बेटे के हाथों पता नही हमारे नसीब में होगी या नही? रमेश का बाल-मन इस मजाक को समझ न पाया।

समय का पहिया गतिशील था। पांचवीं में पढ़ने वाला रमेश अब दसवीं में जा चुका था। पढ़ाई के बढ़ते बोझ, और मोती के साथ मस्ती, के साथ वो सामंजस्य बनाये हुए था।

छठ पर्व में रमेश को कुछ दिनों के लिए उसकी दीदी के यहां जाना था। इस बात को मोती पता नही कैसे भांप चुका था, इसलिए सुबह से वो रमेश के इर्द गिर्द मंडरा रहा था। इंसान तो था नही, बोल तो सकता नही था? अगर बोल पाता तो जरूर जिद करता कि मैं भी जाऊंगा, मुझे भी ले चलो, में इतने दिन किसके साथ खेलूंगा? कौन मुझे नाहलायेगा? वो बस कूँ सूं, कूँ सूं कर कातर निगाहों से रमेश को तैयार होते देख रहा था। आज मोती ने कुछ नहीं खाया। रमेश ने माँ से पूछा -माँ आज इसे क्या हो गया है ये खा पी क्यों नही रहा है? गैंडे जैसा हो गया है नहीं तो मैं इसे साथ लिए जाता। जबाब में मोती ने अपनी कुँ सूं जारी रखी।

पंद्रह दिनों बाद आज रमेश घर वापस आया, आकर पहले मोती के पास गया उसे वहां न पाकर काफी चिंतित हुआ माँ पापा का आशीर्वाद लेकर पूछने लगा- मोती?

माँ ने जबाब दिया - भैया उसे लेकर डॉक्टर के पास गया है। तुम जब से गये हो उसकी तबियत खराब रहने लगी थी, आता ही होगा।

रमेश और विस्तृत से मोती के स्वास्थ्य के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो उठा। भरे गले से पूछा- क्यों तबियत ज्यादा खराब हो गई है क्या?

माँ ने सांत्वना देते हुए कहा- डॉक्टर ने बताया है कि उसके पेट मे फीता कृमि हो गया है, दवा चल रही है, ठीक हो जाएगा। तुम हाथ मुंह धो लो मैं खाना लगाती हूं। पर उसे भूख कहाँ थी?

डॉक्टर के यहां से सोमेश मोती को लेकर जैसे ही लौटा रमेश ने मोती को गोद मे ले लिया। मोती अपने स्वामी का सानिध्य पा कर हर्षित हो उठा, लगा जैसे किसी ने उसमें जान फूंक दी हो। सब विस्मय दृष्टि से उसे देख कर आश्चयचकित हो रहे थे। रमेश एकटक मोती को देखे जा रहा था और मोती कभी उसके हाथ कभी उसके चेहरे को चाटे जा रहा था। कुछ देर के लिए तो ऐसा लगा जैसे सब कुछ सामान्य हो गया, लेकिन मोती का स्वास्थ्य बहुत ही गिर गया था फलतः थोड़ी देर बाद मोती धीरे -धीरे सुस्त हो गया, उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी।

माँ बताने लगी- तुम्हारे जाने के बाद ये तो न कुछ ढंग से खा रहा था न ही पी रहा था। इसका बस एक ही काम था, गेट के पास घंटो बैठ कर तुम्हारा इंतजार करना। एक दिन एक परकटा तोता कहीं से आंगन में आ गिरा, मैं उसे उठाने गई तो वह अपने बचाव में मुझे जोरों से काट लिया और मेरी चीख निकल गई। मोती वहीं बैठा सब देख रहा था, पर मेरी चीख और हाथों से बहता खून देख उसे पता नही क्या हो गया, उस तोते पे झपटा और उसे लेकर बाहर भागा। मैं उसके पीछे गई पर मुझे उस तोते का कहीं नामोनिशान नहीं मिला। मुझे यकीन है इसने उसे खा लिया था इसीलिए इसके पेट मे कृमि हो गया है।

पर रमेश सुन कहाँ पा रहा था अपनी माँ की आवाज को? वो तो जड़ हो चुका था, वह अपलक मोती को निहार रहा था। उसके साथ गुजारे तमाम लम्हे चलचित्र की भांति उसके नजरों के सामने थे।

अकस्मात वह उठा और उसने मोती के शरीर को झिंझोड़ते हुए -से पूछा क्या जरूरत थी तुम्हें अपना जौहर दिखाने की? न चैन से रहते हो न रहने देते हो।

पर यह क्या!

मोती का ठंढा निढाल शरीर उसकी गोद से जमीन पर गिर गया।

धम्म की आवाज की साथ रमेश की तंद्रा टूटी, मोती के प्राण पखेरू जा चुके थे परन्तु उसकी आंखें अब भी खुली थीं और अपलक, एकटक रमेश को निहार रही थी;

शायद यह उसके इंतजार की इन्तेहाँ थी।

बड़े ही भारी मन से मोती को उसी बागीचे में दफनाया गया जहां वह अक्सर वह अपनी क्रीड़ाएं किया करता था। सच है कभी कभी कोई बेजुबान भी मानवीय संवेदनाओं की सभी सीमाएं पार कर जाता है।

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.