दिल का खाली कोना

२ दिन पहले ब्याह कर आई छोटी बहु का घर में दूसरा ही दिन था।आँख खुली तो देखा 9 बज रहे थे देर से जागने की वजह से उसे शर्मिंदगी महसूस हुई।

खैर, तैयार होकर 1 घंटे में नीचे पहुंची जब तक निशा यानि गीतिका की जेठानी ने नाश्ता लगभग तैयार कर लिया था।

“सॉरी दीदी, मैं फ़िर लेट हो गई कल से अलार्म लगा लूंगी” गीतिका ने पीछे से आकर कहा।

“अरे कोई बात नहीं २-४ दिन हैं सो लो फ़िर तो ये सब ज़िन्दगी भर करना ही है” निशा ने मुस्कुराते हुए कहा और दोनों नाश्ता परोसने के लिए बढ़ गईं जहां दोनों के पति और सास-ससुर नाश्ते का इंतज़ार कर रहे थे।

गीतिका ने सभी को गुड मोर्निंग कहते हुए सास-ससुर के पाँव छुए और सभी नाश्ता करने बैठ गए।रोज़-मर्रा की बातचीत के बीच नाश्ता करके दोनों भाई ऑफिस के लिए निकल गए।

यूँ ही चलते २ महीने गुज़र गए थे। घर के सभी सदस्यों से और कुछ करीबी रिश्तेदारों से गीतिका ने अच्छे संबंधबना लिए थे लेकिन दीपक यानि उसके पति से उसके सबंध उतने अच्छे नहीं थे जितने की होने चाहिए थे।

ये बात उतनी ही अजीब थी जितनी की होनी चाहिएथी। लेकिन इस बारे में न तो उन दोनों के सिवा कोई कुछ जनता था और न ही दोनों ने आपस में इसे सुधारने की कोई कोशिश की।

और कुछ गुज़रे वक़्त के साथ गीतिका को ये एहसास हो गया कि उसके दांपत्य जीवन के हालात सामान्य नहीं हैं। अकसर ही अब वो दीपक के ऑफिस चले जाने के बाद इस बारे में सोचा करती।

आहिस्ता इस तनाव का असर उसके घरेलू काम-काज पर पड़ने लगा, जैसे दूध उबल जाना, सब्ज़ी में नमक ज़्यादा होना या फ़िर कभी बिल्कुल ही न होना।

निशा को एहसास होने लगा कि गीतिका को कोई बात परेशान कर रही है लेकिन पूछ्ने पर उसने मुस्कुरा कर बात को टाल दिया और बात आई-गई हो गई।

रातभर की बेचैनी ने गीतिका को और ज़्यादा गंभीर कर दिया। अब उसे एहसास होने लगा जैसे दीपक उसके साथ होकर भी कहीं दूर खड़ा है। उसे हमसफ़र के होते हुए भी भीड़ में तन्हाई का एहसास हुआ।

ज़रूर घर में सभी लोग उसे बहुत प्यार और सम्मान देते थे लेकिन जिस प्यार की भूखीनज़रों से वो दीपक की ओर देखा करती थी वो उसे नहीं मिल रहा था।

हारकर उसने दीपक से इस बारे बाते करने की कोशिश की तो उसने बात पलट दी और फ़िर कोई बहाना बनाकर बात को वहीं ख़त्म कर दिया।

लेकिन गीतिका के लिए ये बात ख़त्म कर देने जितनी छोटी नहीं थी। बल्कि दीपक के इस अजीब बर्ताव के बाद अब उसे इन सबके पीछे की बात जाननी थी।

एक दिन घर पर अकेली होने पर वह अपने कमरे की सफाई कर रही थी। तभी उसे दीपक की अलमारी से एक डायरी मिली। वो डायरी जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी।

यूँ तो किसी की भी पर्सनल डायरी बिना इजाज़त के पढना ग़लत लगा लेकिन फ़िर भी गीतिका से रहा नहीं गया तो उसने कुछ पन्ने पलटे।

तारीख़-दर-तारीख़ उसमें दीपक ने अपने नीजी जीवन को लफ़्ज़ों में पिरोया हुआ था।

गीतिका को यूँ लगा जैसे इस असंतुलित दांपत्य जीवन को लेकर उसके मन में उठ रहे सभी सवालों का जवाब उसी डायरी में छिपा हो। इसी ललक के साथ उसने सभी काम छोड़कर अगले 1 घंटे उस डायरी को बहुत गौर से पढ़ा।

“डिअर रश्मि, मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ जो बात मैं पिछले २ साल में तुमसे नहीं कह पाया अब कहे बिना रहा नहीं जाता।मैंने ये बात ठान ली है कि कल मैं किसी भी सूरत में अपने दिल की बात तुमसे कहकर रहूँगा तुम मेरे प्यार को अपनाती हो या नहीं आगे तुम्हारी मर्ज़ी।”

“हाँ, आख़िर आज मैंने अपने दिल की बात कह दी रश्मि से। एक बोझ हल्का हो गया। यूँ लगता है मानो बरसों से क़ैद इक परिंदा आज आज़ाद हो गया है। इससे भी ज़्यादा ख़ुशी की बात तो ये है कि मेरा प्रेम-प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया है।”

“एक महीना हो गया हमें आज रिलेशनशिप में। हम बहुत करीब आ गये हैं। एक-दूसरे को बेहतर समझने लगे हैं साथ खुश हैं और मैं तो ये कहूँगा कि मैं उसमे ही जीने लगा हूँ अब। सच में प्यार का एहसास दुनिया बदल देता है”

“आज मेरा जन्मदिन है। आज मैं बहुत खुश हूँ।हम कॉलेजबंक कर के आज डेट पर जो गये थे।भई जाना ही था... आज नहीं तो और किस दिन जाते... रश्मि, तुम्हारे साथ बिताया ज़िन्दगी का हर लम्हा मेरे लिए पारस मणि के समान है।”

“आज रश्मि का जन्मदिन है और आज मैंने उसे शायद एक ख़ास तोहफ़ा दिया है। हाँ वो रिंग ज़रूर नकली थी ४३० रूपए की लेकिन मेरा हर लफ्ज़ तो बेशकीमती था, कम-से-कम हम दोनों के लिए। आज मैंने रश्मि को शादी के लिए पूछा है और अगला कदम है घर पर बातचीत उम्मीद है सब अच्छा ही होगा।”

तीन महीने बाद लौट रहा हूँ ख़बर नहीं बुरी ख़बर लेकर। जाति के भेद पर बलिदान दिया गया है एक और प्रेम-कहानी का। इस बार गाज मेरे और रश्मि के रिश्ते पर गिरी है। अगले महीने रश्मि की शादी है और दूल्हा मैं नहीं कोई और है। लड़की तो मेरे लिए भी देख ली गई है पर वो रश्मि नहीं कोई और है। अपने मां-बाप को दुखी न करने के लिए ही हमने अपने प्यार की आहुति दी है और अब उन्ही की ख़ुशी के लिए उनकी मर्ज़ी से शादी भी करनी ही पड़ेगी। मैं नहीं जानता की मैं उस लड़की को रश्मि जितना प्यार दे सकूंगा या नहीं लेकिन इतना तो तय है इस दिल के एक कोने में रश्मि का घर ज़रूर रहेगा।”

डायरी बंद करके गीतिका सिहर गई। कुछ हरकत थी अगर तो सिर्फ़ उसकी आँखों से बहते आंसूओं की। कुछ देर में उसने डायरी वहीँ छिपा दी जहाँ से उसे मिली थी।

अलमारी बंद करके रसोई की तरह बढ़ ही रही थी की डोरबेल बजी। सास-ससुर लौट आए थे। उन्हें पानी दिया कुछ बात हुई ताउजी यानि ससुर के बड़े भाई के घर-परिवार को लेकर और फ़िर दोनों आराम करने चल दिए।

शाम को निशा और ऑफिस से दोनों भाई भी लौट आए। यूँ ही शाम और एक और रात गुज़ार दी गीतिका ने बिना किसी से कुछ सवाल किए। शायद उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो किससे औए क्या सवाल करे।

अगले दिन ऑफिस से लौटे दीपक को बेडरूम के मेज पर एक पानी का गिलास और गुलदान के नीचे दबा एक ख़त मिला पर गीतिकानहीं।ख़त गीतिका ने लिखा था दीपक के नाम –

सुनिए,

हमारी शादी को आज ही तीन महीने पूरे हुए हैं। इन तीन महीनों में मुझे घर की ज़्यादा याद शायद इसलिए नहीं आई क्यूंकि मम्मी-पापा, दीदी-जेठजी सब बहुत अच्छे हैं। अच्छे तो आप भी बहुत हैं पर पता नहीं क्यों पिछले एक-डेढ़ महीने से यूँ लगा रहा है जैसे आप मुझसे मीलों दूर हैं। कहीं न कहीं मुझे उस प्यार की कमी महसूस हुई जिसकी हर नव-विवाहिता उम्मीद रखती है अपने पति से।

मैंने कई बार आपसे पूछना चाहा पर आपने ध्यान नहीं दिया। परसों अलमारी ठीक करते वक़्त एक डायरी हाथ लगी जिसने मेरे हर सवाल का जवाब दे दिया।

मैं जानती हूँ मुझे वो डायरी नहीं पढनी चाहिए थी लेकिन पढने के बाद ये भी जान गई हूँ कि मेरा वो डायरी पढना कितना ज़रूरी था।

मुझे ये आपसी दूरी घटानी है। अगर आप मुझ तक नहीं आ सकते तो मैं आउंगी आप के पास। मुझे एक मौका दीजिए मैं आपके हर ज़ख्म पर मरहम लगाने की पूरी कोशिश करूंगी।

प्लीज़...

आपकी अर्धांगिनी

वो ख़त पढ़कर दीपक जड़ हो गया। जो बात वो गीतिका से कभी न कहने वाला था वो सब कुछ वह जान चुकी थी। दीपक के अन्दर झांककर उसने वो खालीपन ढूंढ लिया था जिसे वो ख़ुद से, अपने प्यार से भरना चाहती थी।

एकाएक दीपक की आँखें भर आईं काग़ज़ का वो टुकड़ा जो पति-पत्नी के बीच पुल बनकर खड़ा हो गया था वो भीग गया।

इतने में गीतिका ने पीछे से दीपक के कंधे पर हाथ रख दिया। पलट कर दीपक ने कुछ कहना चाहा, होंठ तो काँपे लेकिन एक भी लफ्ज़ न गिर सका। उसकी जुबां से दीपक के दिल का वो खालीपन कुछ देर को हवा में भर गया।

बिन कुछ कहे बिन कुछ सुने दोनों ने एक दूसरे को बाहों में भर लिया गीतिका को उसका दीपक मिल गया था और दीपक के दिल के उस ख़ाली कोने में अब गीतिका ने जगह बना ली थी। काग़ज़ का वो टुकड़ा इस खूबसूरत लम्हे का गवाह बने हवा में लहरा रहा था।

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