थामी आंच खोए से इश्क़ मद्धम ने
दी दस्तक जो भीनी सी रिमझिम ने

पकड़कर राह दूर तलक चलते साथ थे
था मौसम ऐसा ही जब हाथों में हाथ थे
है पुकारा मुझे फिर उसी मौसम ने
दी दस्तक जो भीनी सी रिमझिम ने

नज़ारे हसीं कितने गुलशन में जगते थे
छूकर तुम्हे गुल और भी खूब लगते थे
माँगा फिर तुझे फूलों की शबनम ने
दी दस्तक जो भीनी सी रिमझिम ने

बलाएँ जैसे सभी मुझपे बेअसर थी
इन हवाओं में जो तेरी हँसी तर थी
पर घेरा आज मुझे मीठे मीठे गम ने
दी दस्तक जो भीनी सी रिमझिम ने

न बात वस्ल की न कोई दूरी कह पाई
कहानी ये न ही पूरी न अधूरी रह पाई
किया महसूस कुछ टूटा सा हम ने
दी दस्तक जो भीनी सी रिमझिम ने

गुलशन- बगीचा, उद्यान
गुल- फूल ,पुष्प
वस्ल- मिलन
बलाएँ - बुरी ताकतें
शबनम - ओस

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