धोधाबाई की कथा

"इस बार श्राद्धपक्ष में पिण्डदान करने काफी लोग गयातीर्थ जा रहे है। सोचता हूँ मैं भी अपने पितरों को तृप्त कर ही दूं। " चतुरसिहं ने मालती को अपनी मशां बताई।

"वाह ! पन्द्रह दिन तक इनके पीछे से खूब स्वादिष्ट भोजन बनेगा सहेलियों का जमावड़ा रहेगा।"

ऐसी कल्पनामात्र से खिलकर मालती ने मिश्री से स्वर में कहा "भला पितरों की तृप्ति जैसे पुण्यकार्य के लिए मैँ क्यों मना करुंगी। कहो, क्या तैयारी कर दूँ।"

तू छकडे पर मेरे कपड़े और राशन-पानी लदवा मेै श्राद्ध निकालने के लिए अनाज, शक्कर, दालें और घी घर में रखवाता हूँ। "सारी तैयारियों के बाद रवाना होने से पहले चतुरसिहं ने मालती से कहा '' देख ! पितरों की आत्मा घर की बहन-बेटी को खिलाकर, मान-सम्मान देने से ही तृप्त रहती है। मात्र 5-7 कोस दूर ही तो मेरी बहन धोधाबाई रहती है। तू सोलहों श्राद्ध में बाई-जवाई व उसे बालकों-टाबरों को बुलाकर श्रद्धा से भोजन कराना।''

"लो कर लो बात, मेरे लिए धोधाबाई से बढ़कर भी कोई पूज्य हो सकता है भला । वो नहीं तो क्या मेरी सहेलियाँ और मायकेवाले आयेंगे? आप निश्चिन्त होकर जाइये।"

पूर्णिमा की सुबह ही मालती ने अपने इकलौते बेटे मगन को भुआ के घर बुलावा देने भेजा। धोधाबाई आनन-फानन में घर का काम निपटाकर मायके आई। आते ही भौजाई ने चौका संभला दिया।

"बाईसा पन्द्रह आदमियो जितनो हलवा-पूड़ी बना लीजो। " धोधा ने श्रद्धा से रसोई तैयार की साथ ही ये आस लगाने लगी कि पांच पंडितों के अलावा मेरे पांचों बेटे व दो बेटियों का भी भोजन यही होगा फिर इनके जमाई का कासा बांध दे। पांच पंडित आये न आये मालती की सखियाँ समय पर पहुँच गई। सबने खूब सराहते हुए भोजन किया। धोधा को किसी ने नहीं परोसा। शाम को धोधा ने कहा "भौजाई ! मैँ घर जाऊ ? "

मालती ने बेझिझक कहा "हाँ बाईसा पर काल स रोज बेगा ही आइज्यो। रास्ते भर भूखी-प्यासी धोधा मन को दिलासा देती रही कि इतने मेहमानों के बीच भौजाई को मेरा व मेरे बच्चों का भोजन धयान में नही आया। कोई बात नहीं अभी तो श्राद्ध पक्ष के पन्द्रह दिन बचे है। इतने सम्पन्न ननिहाल में मेरे गरीब बच्चों को भी भरपेट मिठाई तो मिलेगी। गरीबी क्या न करवा दे। रोज धोधा की आस टूटती। रसोई में कमरतोड मेहनत करती पर मनुहार इतनी-सी भी नहीं। एकादशी को धोधा के माता-पिता का श्राद्ध था। उसने सोचा मेरे बच्चे आज उनके निमित्त का मांड भी पी लेगें तो नाना-नानी तृप्त हो जायेंगे। सो मिट्टी के सिकोरे देकर उन्हें रसोई की नाली के बाहर छिपाकर, समझाकर बैठा दिया। जैसे ही दाल-चावल का माडं धोधा ने बहाया, बच्चों ने करवे लगा दिए। बच्चों के कोलाहल में मालती की प्रिय सहेली को भनक लग गई। उसने आकर नाली पर गोबर लीप दिया और बडबडाई

"ऐ धोधाबाई का छोरा-छोरी रसोई तैयार होने से पहले ही झूठी कर दी। "

बच्चों ने मिल बाटकर मांड पिया और घर चल गये। घर लौटते समय धोधा ने चूड़ियों पर आटा लपेट लिया। सोचा यही घोलकर पिला दूगीं। फिर उसी पडोसन ने पकड़ लिया "ल़्यो कर ल्यो बात। पीहर म पाणी की कमी है जो आटो भी कोनी धोयो। मैं धुला दयूं।" रोती-कलपती धोधा घर आई। इधर पति का पारा सातवें आसमान पर था। ग्यारह दिनो से पत्नी बेगार पर जाती और दाना-पानी भी घर का खाती। गुस्से में भरकर उसकी खूब पिटाई की। उधर जब तर्पण के लिए चतुरसिहं ने अजंलि में जल लिया तो खून नजर आया। दो-तीन बार पानी बदला फिर भी...| पूजा करवाने वाले पंडित ने कहा कि "आपके घर की कोई बहिन-बेटी आंसू बहा रही है इसलिए आपके पितरों ने आपकी पूजा स्वीकार नहीं की। चतुरसिहं को मालती की नीयत पर सन्देह तो था ही अब विश्वास हो गया कि उसका व्यवहार धोधा के प्रति ठीक नहीं है। रात को धोधा के घर नौ प्राणी भूख के कारण करवटें बदल रहे थे तभी दरवाजे पर खट-खट हुई। मरी आवाज में धोधा बोली "कुण है ? "जवाब आया "म्हे हा, थारा मां-बाप।"को्धित धोधा ब़ोल पडी "अठे कई लेबा आया। थाक बेटा-बहु क जाओ, पाचं पकवान तो बठ बण्या है। "माता-पिता के इसरार पर उसने दरवाजा खोला तो उन्होंनें पूछा कि घर में क्या है ? धोधा ने दो फूटी हांडी दिखादी कि, इनके सिवाय कुछ नहीँ है। पितरों की कृपा से स्वतः ही चूल्हा जल गया और हंडियो में दाल-चावल बनने लगे। कवँर साहब इधर जब धोधा बाई मायके नही पहुची तो मालती की जान सांसत में आ गयी। बड़बड़ाने लगी कि रोटी की नी पूछी जो बाई सा क कसर पड गी, दिन चढ़ ग्यो हल ही कोणी आया रत का बासी बर्तन पड्या है जा रे मग्न्या बुलार् ल्या थारी भुआ न। मगन पंहुचा तो भुआ की झोपडी नदारद थी। इधर उधर देखने पर धोधा बाई के बच्चे नजर आये। ऐसी कायापलट देखकर उनके साथ खेलने में मस्त हो गया। अब तो मालती से रहा नही गया। खुद ही निकल पड़ी भुआ भतीजे की खबर लेने। वहाँ पहुची तो मुंह खुला रह गया। बाई सा ओ कई हुयो, धोधा ने रात की सारी बात बता दी। मालती वही से पितरो को रास्ते भर गालियां देते हुई घर आई। अपनी प्रिय पड़ोसन के पास फुट फ़ूट कर रोने लगी। देख आली, पितरेश्वर कितरा दोगला है सोलह दिन पांच पकवान म्हरै घर बण्या पंडित अठे जीम्या अर टूट कर गया बी धोधा न। इतने में चतुर सिंह वहाँ आ गया। उसे समय से पुर्व आया देख मालती चोँक गयी। जब उसने बताया की पितर संतुष्ट नही हुऐ तो मालती कहने लगी रोज धोधा बाई कँवर सा अर टाबर अठे ही जीमता फेर भी पितर राजी कोणी हुया। अगले साल जोड़े से जाने की बात कहकर चतुर सिंह अपनी बहन से मिलने चला गया। बहन की समृद्धि देख श्रद्धा से पितरों को प्रणाम किया। पर मालती को सबक सिखाने की योजना मन में बून चूका था। धोधा से कहा महीने भर बाद में तेरे लिए कुछ सामन लाऊंगा। उसे सारी योजना समझा दी। महीने भर बाद मुंह लटकाकर मालती से कहने लगा बहुत दुखद समाचार है। मालती घबरा कर पूछने लगी। डूबी सी आवाज में बोला थारे पीहर म तो लाय लाग गी काई भी नी बाच्यो। थारी माँ फाटी गुदड़ी ओढ़ पेड़ क नीचे बेठी ह। थार सातों भाई भाभी क तो पेहनबा का कपडा बी नी बच्या।

बच्या। मालती सुनते ही छाती-माथा कूटने लगी। चतुर ने सांत्वना दी कि ऎसे करने से क्या होगा। बेहतर होगा कि वो उनकी कुछ मदद कर दे। मालती सहमत हुई। आंसू पोंछकर छकड़े में सामान भरने लगी। झाड़ू और छलनी तक भी रखना नहीँ भूली। फिर एक हांड़ी में स्वर्ण मोहरे भरकर कपड़े से मुँह बांधने लगी। तभी चतुर ने कहा "रास्ता म धोधा को भी घर पड़सी। कई भजनो है की?" मालती तुरन्त तहखाने में गई। एक हांड़ी में सांप, बिच्छु, मकड़ी सरीखे काटने वाले जन्तु भरकर उसे कपड़े से ढक लाई। मगनसिंह को समझा दिया कि मोहरों वाली हांड़ी नानी को और कीड़ो वाली भुआ को देनी है। मालती मानो चतुर की उदारता से निहाल थी। उधर जब छकड़ा धोधा के गाँव की ओर चला तो चतुरसिंह ने मगन को मोहरों की हांड़ी दे दी। योजनानुसार एक पेड़ के नीचे धोधा फ़टी गुदड़ी ओढ़े बैठी थी। चतुरसिंह ने मगन को आदेश दिया "छोरे ! वा देख थारी नानी बैठी है। जा दिया जो थारी माँ दियो।" हैरान-सा मगन बोल पड़ा"पर बापू ओ तो भुआ को घर है, रास्तो भी भुआ क घर को हो।" चतुर ने आँखे तरेरी। मगन पास जाकर बोला "नानी! सबकुछ बलग्यो की; कई भी नी बच्यो। माँ छकड़ो भर सामान और हांड़ी भेजी है।" धोधा ने गुदड़ी फेंकी और हांड़ी ले ली। उसके बच्चों ने सारा सामान घर में रख लिया।

अब नानी के घर की ओर यात्रा प्रारम्भ हुई। सालों ने सत्कार किया, सास ने मनुहार की। चतुरसिंह ने मगन को हांड़ी देने का इशारा किया। ख़ौफ़ खाये मगन ने नानी को हांड़ी देकर कहा, "नानी! माँ कियो कि जब मामा-मामी सब सो जाव तब किवाड़ बन्द कर इन खोलजे|" रास्ते में चतुर ने बेटे को धमकाया "अगर थारी माँ न कई भी बतायो तो थारा हाड़ घड़ दयूला।" रात में नानी ने हांड़ी खोली और चीखें मारने लगी। बेटे दौड़कर आये। दरवाजा तोड़कर माँ को बचाया। शरीर पर घाव देखकर बहुएं मुँह दबाकर हँसती कि बेटी ने अच्छा धन भेजा। इधर चतुरसिंह मगन को ज्यादातर समय खुद के साथ रखता। मालती के पास फटकने तक नहीँ देता। मालती को कुछ अखरा। एक दिन अकेले में मगन से सारा राज खुलवा7 लिया। अब छाती-माथा कूटने का कार्यक्रम शुरू हुआ। प्रिय पड़ोसन ने आग को हवा दी। मालती ने झूठ-मूठ बिस्तर पकड़ लिया। चतुर हाल पूछने आया तो पड़ोसन ने चादर के नीचे पापड़ सेक कर रख दिए। मालती ज्योही करवट ले ;चर्र की आवाज हो। चतुर ने घबराते हुए इस विचित्र बीमारी का इलाज पूछा । पड़ोसन ने हाल सुनाया "भायाजी ! रो-रोकर लाण की नसां ही आम गी। डॉक्टर वैद को तो इलाज ही कोनी। शाणा-भोपा स पूछकर आई। बो कियो कि जो भी ईको धन खायो है बे सारा घरवाला काला मुँह कर गधा पर बैठकर आव। आदमी एक तरफ का ढाढी-मूँछ मुंडाव। जद आ ठीक होव।

चतुर ने सहजता से कहा " अब इन कई हो ज्यावे तो म्हारों तो घर बह ज्यावे धोधा इतनो धन खायो है तो भौजाई की जिंदगी क लिय इतनो तो कर ही सक है। मैं काल ही ओ उपाय करवाऊँ। थे पूरी तैयारी रखो।" चतुर के जाते ही दोनों ख़ुशी से उछल पड़ी। सखी बोली, "देख मालती! थारो मूसल तो छोटो है। मैं म्हारो मोटो वालो ले आऊं। आग ही आग धोधा आवली। इत्तो जोर को सटाको रखजे कि दुबारा ऊठ ही न सक।" चतुरसिंह सीधे ससुराल पहुँचा और मुँह लटकाकर बैठ गया। सास- सालो ने आवभगत की। मालती के हाल-चाल पूछे तो चतुर ने बताया कि कुछ दिनों की मेहमान है बस! उनके जोर देकर इलाज पूछने पर उसने बता दिया कि अगर उसके मायके का प्रत्येक सदस्य काला मुँह करके , एक ओर के ढाढी-मूँछ मुंडाकर गधे पर बैठकर ये नारेबाजी करते आये "खेम खुसल घर ज्यावा बाई न नीका पावा।" सालोँ ने आश्वासन दिया कि "जीजाजी! आप जाकर आगे की तैयारी करो। म्हे सब शाम न तैयार होकर आवाँ। दाढ़ी मूछ तो सावन की खेती है। फेर उग ज्याई। इकलोती बहन क लिए कई भी कर सका।"

मालती सावधान की मुद्रा में दरवाजे के पीछे खड़ी कल्पना कर रही थी कि कैसे वो धोधा और उसके परिवार को मजा चखायेगी। इसलिए माँ व भाईयों की आवाज तक न पहचान सकी। आगे -आगे माँ थी। मालती ने पूरे जोर से मूसल का वार किया। माँ चीखते हुए गिर पड़ी। उन्माद में मालती अब तक नहीँ समझी और सब पर ताबड़तोड़ वार करने लगी। आवेग हटने पर सबको पहचाना तो रो-रोकर बुरा हाल कर लिया। "देख बन्दे की फेरी; माँ तेरी या बहन मेरी। ये मूसल के सटाके खाने को मेरी बहन दिखी?" ऐसा कहकर चतुरसिंह चल दिया। मायकेवालो को विदा करके मालती पड़ोसन के गई। उसने समझाया कि वो चतुर से नहीँ जीत सकती, बेहतर होगा राजीनामा कर ले। पर मालती तो प्रतिशोध की अग्नि में झुलस रही थी।

एक दिन सुबह मगन से बोली "छोरा! थारा बापू न कह दे कि आज भोजन नही बणेलो। म्हार साँझा ऊली को व्रत है। " इस विचित्र नाम वाले व्रत पर चतुर मुस्करा दिया। शाम को छिपकर मालती की पूजा देखने लगा। मालती ने जतन से मिठाईयां बनाई और पूजा करके कहने लगी " मैं तन पूजू ये साँझा ऊली ; मरज्यो धोधाबाई और बीको बींद। मैं तन पूजु ये साँझा ऊली; मरज्यो धोधा का पांचों बेटा, तीनों बहुआ और दोनों बेटिया।" दस -पन्द्रह दिन का भुलावा देकर चतुरसिंह ने घोषणा की कि उसका भोजन न बनाये। उसके ऊंट कटेला का व्रत है। मालती चौकी कि आजतक तो कोई व्रत किया नहीँ; ये क्या नया प्रपंच है? शाम को चतुर बाजार से मिठाइयां लाया चौक के बीच में एक पेड़ की डाली रोपकर , मिठाइयाँ सजाकर खुलेआम कहने लगा, " मैं तन पूजू रे ऊँट कटेला मरज्यो म्हारी सासू और सातों साला। मैं तन पूजू रे ऊँट कटेला मरज्यो सातो साला की बहुआ और सारा बच्चा।" मालती चीखने लगी कि ये कौनसा व्रत हो रहा है जिसमे उसके मायकेवालोँ को मारा जा रहा है। चतुर ने कहा ," वो कोनसा व्रत था जिसमे मेरी बहन के सुहाग और परिवार को मारा जा रहा था।"

इस तरह लड़ते झगड़ते फिर श्राद्धपक्ष का समय आ गया। चतुर ने घी तेल के कनस्तर , आटा,दाल, चावल की बोरियाँ धोधाबाई के घर रखवा दी कि सोलहो दिन सब तृप्त होकर भोजन करना। इस बार मालती को साथ लेकर गया तीर्थ गया। सोलहों दिन तर्पण किये। वापस आने पर निश्चित हुआ कि सफल तीर्थयात्रा के निमित्त ब्राह्मणभोजन किया जावे। मालती न्यौते लिखने लगी। अपना मायका, सखी-सहेली सबका नाम लिखा । चतुर ने धोधा की स्मृति करवाई तो मालती ने सफाई दी "अजी बाईसा तो सबसे पहले है, मैं तो भूल ही गई। " भोज वाले दिन चतुरसिंह ने पर्याप्त भोजन पहले ही धोधा के घर भेज दिया। पूरा परिवार खा- पीकर आया। जब मालती परोसने लगी तो धोधा और उसकी बहू-बेटियां अपने गहनों से कहने लगी " जीमो रे म्हारी नथ ,बंगड़ी; जीमो रे म्हारी पायल और हार; जीमो रे म्हारी कणकती और कर्णफूल।" मालती ने कहा " थे लोग खुद तो जीमो कोनी और गहना न क्यूँ जिमाओ?" बहू- बेटियों ने जवाब दिया " मामीजी ! भोजन तो म्हें घर ही जीमकर आया हां। अठै तो गहणा न जिमाबा ल्याया क्योंकि ऐ गहणा हुया जद थे म्हान न्योतो दियो ;नहीँ तो गरीबी ही जद चावल को मांड और आटो तक नहीँ दियो।" मालती ने सिर पकड़ लिया।

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