बचपन बहुत अनमोल होता है, हमारा बचपन भी बहुत अनमोल था, क्योकी हमारे बचपन का एक हिस्सा या कहे की सबसे रंगीन हिस्सा गावं मे बीता था। आज के बचपन से बहुत अलग था गांव का बचपन जिसमे ना तो मोबाईल फोन थे ना कम्पयूटर गेम ना ही 24 घंटे चलने वाला टीवी, वो समय एक दम शांत था, हम भी ठाली और समय भी ठाली, एकदम फुर्सत से भरा हुआ। गाँव मे ना तो हमे कोई चिंता थी और ना ही हमारे माँ-बाप को की कहा घूम रहे हैं, क्योकी शहरो से दूर छोटी वस्ती मे पूरा गांव ही अपना परिवार था। शहरी शोर-शरावे और स्कूल कि चिंता से दूर वहा थे तो नये नये किस्से कहानी और रोज होने वाले नये नये अनुभव। ऐसी ही किस्से काहनियो का एक अनुभव है जो मुझे आज भी याद है, वो अनुभव है छलावा।

इस बात को काफी अर्सा हो गये लेकिन आज भी यह घटना मेरे जेहन मे एकदम नयी है, जैसे यह कल की ही बात हो...। मेरे दादाजी का गाँव गंगानागर, गंगा मैया के किनारे बसा हुआ था शायद इस लिये ही इसका नाम गंगानगर था, हम लोग गर्मी की छुट्टी मे गाँव आते थे, हर साल बहा आने के कारण मुझे सब जानते थे। गाँव मे मेरे बहुत सारे दोस्त थे और बडा कुनवा था भाई बहन थे, वहा पर हम पूरा दिन कहा कहा खेलते किसके यहा खाते क्या क्या किस्से कहानी सुनते इसका कोई हिसाब ही नही था वहां।

गावं मे मेरा एक चचेरा भाई था राजू और दोस्त था चेतन, चेतन का छोटा भाई भी था गुड्डू, जो हमेशा हामारे साथ रहता था वो था तो हमारी ही उम्र का लेकिन

चेतन का छोटा भाई होने के कारण हम सबके लिये वो छोटा था और हम तीनो उस पर अपना बडप्पन झाड़ते थे,। हम चारो की पक्की वाली दोस्ती थी, गांव की भाषा मे कहे तो हमारी टोली थी।

वहां गंगा जी के बीच मे एक टापू था गर्मीयो मे पानी कम हो जाता तो वह टापू हमारे गांव से मिल जाता था, कुछ लोग वहा खेती भी करते थे, उस टापू पर बेर के बहुत पेड़ थे, जंगली बेर छोटे-छोटे और थोड़े खट्टे, गांव के बच्चे बेर खाने टापू पर जाते थे, पता नही क्या रस था उन खट्टे बेरो में, मै भी वहा जाना चाहता था, उन जंगली बेरो का स्वाद लेना चाहता था लेकिन अभी तक चाहकर भी जा नही पाया था क्योकी गांव मे अघोषित रूप से बच्चो के उस टापू पर जाने पर रोक लगी हुई थी। राजू कई बार चुपचाप आपने दोस्तो के साथ उस टापू पर जा चुका था और वह जानता था की मै वहा जाना चाहता हूं तो इस बार उसने वादा किया था की हम सब वहा जायेंगे। उस दिन हम चारो ने वँहा जाने का प्रोग्राम बनाया, जून की गर्मी पड़ रही थी आसमान आग उगल रहा था, लेकिन हम तो बच्चे थे और बचपन के जोश के आगे सर्दी गर्मी का एहसास नही होता, इसलिये सूर्यदेवता के के प्रकोप को भूलकर थोडा दिन चढते ही हम चुपचाप घर से निकल गये। टहलते टहलते गाव से बहार निकल कर हम चारो गंगा जी के किनारे पहुंचे, वहाँ हमने हरतरफ का मुआयना किया की कोई हमे देख तो नही रहा है क्योकी अगर कोई हमे वहा जाते हुए देखलेता तो वो हमे रोक देता और आगर वो हमे ना रोक पाता तो घर पर कहकर हमरी धुलाई का इंतजाम करा ही देता। हर तरफ निरिक्षण के बाद जव यकीन हो गया की हम पर किसी की नजर नही है तो हमने तेजी से से टापू की ओर कूच कर दिया। रास्ता थोड़ा लम्वा था इसलिये धीरे धीरे बातो कहानीयो का सिलसिला चलने लगा। बाते दूसरे मोहल्ले के लड़को से लडाई, दशहरे मेले की मौज, नन्हे पर आये भूत से होते हुये जा पहुची छलावे पर, छलावा जो गांव का सबसे लोकप्रिय भूत था क्योकी बच्चो के साथ साथ बड़े बूढे भी उसके बारे मे बात करते थे उसे देखने मिलने का दावा करते थे, कुछ बूढे तो बकायदा छलावा से कुश्ती लडने या दोस्ती होने का दम भरते थे।

राजू ने उसके बारे मे बात शुरू की थी वो बताने लगा की छलावा नाक मे बात करता है, उसके पैर पीछे की तरफ मुड़े हुए होते हैं, उसकी परछाई नही दिखती वो बहुत तेजी से पीछे भागता है और किसी का भी रूप बदल लेता है, और अगर नाराज हो जाये तो पल भर मे ही किसी को भी मार देता है.. राजू की बात सुनकर हम सभी के अंदर का डर हमारे चेहरे पर आ रहा था, राजू बोला की मेरे बाबा बता रहे थे की ज्यादतर वो रात को ही मिलता है। इस बात से सबने राहत की सांस ली लेकिन तभी चेतन बोला, अबे उस दिन की बात भूल गया मोहन चाचा क्या बता रहे थे की हा छलावा ज्यादातर रात मे ही मिलता है, लेकिन वो दिन मे भी घूमता रहता है, और इस टापू मे तो अक्सर दोपहर मे भी मिल जाता है। उसकी बात सुनकर हम सब के डर का स्तर और बढ गया, डर के मारे बेचारे गुड्डू के पेट मे मरोड होने लगी वो बार बार वापस चलने को कहने लगा। गुड्डू छोटा था वो तो अपने डर को कह सकता था लेकिन ये हमारी तो शान के खिलाफ था इसलिये हम उस पर हसकर आगे बढते रहे। हम उपर से तो वीर बहादूर बन रहे थे लेकिन नीचे से हमारी टांगे कांप रही थी, मै भी अब बेरो को भूलकर वापस घर जाना चाहता था लेकिन ये झूठमूठ की बहादूरी ने मेरे पैरो को वापस लौटने से रोक रखा था और ये सिर्फ मेरा ही नही हम सबका हाल था, लेकिन हम अपनी जुवान से अपने डर को बयां नही कर पा रहे थे वरना बाकी की नजर मे हमेशा डरपोक कहलायेंगे बस अकेला गुड्डू ही ईमानदारी से अपना डर बयां कर रहा था और बार बार वापस चलने का गाना गा रहा था...जब हमारा डर हमारी बहादुरी पर भारी पड़ने लगा तो हमने गुड्डू के कंधो पर अपने डर की पोटली रख दी,,और राजू कहने लगा चलो यार इस बेचारे के पेट मे दर्द है..चलो वापस चलते हैं,,फिर कभी आयेंगे..और हा इस डरपोक को साथ नही लाना है जरा से छलावे का नाम सुनकर ही पेट मे मरोड उठने लगे इसके, हां सही कहा तूने इस डरपोक को साथ नही लायेंगे, आधे रास्ते से वापस लोटने की झूठी निराशा दिखाते हुए चेतन और मैने भी उसकी हां मे हां मिलायी।

गुडडू को डरपोक ठहराकर हम चारो वापसे आने लगे, हम मुडकर थोडां ही चले थे, की हमे एक आदमी आता हुआ दिखायी दिया, एक दम सफेद लिवास से वो दुर से ही चिल्लाया रुको कौन हो तुम, उस आदमी का आवाज सामान्य नही थी, हम चारो ने एक दूसरे को देखा, और फिर उस आदमी को देखा जो सामान्य ना चलकर अपने टेडे पंजो पर चल रहा था, हमने एकदूसरे से नजरे मिलायी और हमारी आंखो ने ही बिना वोले हमे अवगत करा दिया की ये हो ना हो छलावा ही है, मरे गले से आवाज निकली भागो, और अपनी झूठी बाहादुरी को वही पटक कर हम चारो वहा से सिर पर पांव रखकर दौड लिये, पैरो मे जितना जोर था वो सब उडेल दिया उस दौड़ मे.. हम भागते रहे भागते रहे, जब हमे लगा की हम उस छलावे से बहुत दूर आ गये है तब हम रूक गये। हम चारो का सांस फूल रहा था, मुह लाल हो चुका था, और गला प्यास के मारे सूख गया था, मेरी तो कोख मे भी दर्द हो रहा था। हमे थोडी दूर पर ही अपना गांव दिख रहा था, जिसे देखकर हमने राहत की सांस ली। हम थोडा सुसताने के लिये पेड़ के नीचे खड़े हो गये, अभी हम दम भर ही रहे थे की हमे छलावा फिर से दिखा गया, हमारे हाथ पाव फूल गये अब हममे इतनी हिम्मत नही थी की और तेज भाग सके। तभी चेतन का दिमाग चेतन हुआ और वो चिल्लाया किसी पर माचिस हे क्या ? ये माचिस जलाने पर भाग जायेगा, या फिर प्याज हो तभी हमारी जान बच सकती है। गाव मे किसी बालक के माचिस रखने का मतलब होता ही की हो ना हो ये भी बीडी मे दम मारता है..इसलिये हम जैसा बालक तो माचिस रख ही नही सकते थे और प्याज जेव मे रखकर चलता कौन है, इसलिये ना हम पर माचिस थी और ना ही प्याज अब करे तो क्या करें..? राजू जोर जोर से हनुमान चालिसा गाने लगा लेकिन उसे भी बस चार लाइन ही आती थी। तभी चेतन बोला अरे यार नगे हो जाओ नगे होकर ही जान बच सकती है मैने सुना है की जब कुछ ना हो तो नंगे हो जाना चाहिये, नंगे आदमी से डरता है छलावा । लेकिन नंगा होगा कौन सब एक दूसरे को ताक रहे थे की तू हो जा तू हो जा...लेकिन जब किसी ने भी अपनी इज्जत से समझोता नही किया तो सबने मिलकर छोटे गुड्डू को दबा दिया और उसे धीरे धीरे हमारे पास आते छलावे का डर दिखाकर कहा जल्दी कपडे उतार साले वरना सब मर जायेंगे, गुड्डू वेसे कभी भी आसानी से हमारी बात नही मानता था, लेकिन उस दिन उसने हम सबका छोटा भाई होने का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया और बिना देर किये अपने कपडे उतार दिये, राजू वोला कच्छा भी उतार, अब गुड्डू विलकुल नंगा था, और नंगमलंग होकर वो खडा हो गया हम सवके आगे सुपरमैन बनकर छलावे से टक्कर लेने, लेकिन उसे नंगा देखकर भी वो छलावा रूक नही रहा था वो लगातार पास आता जा रहा था। अब छलावे से बचने का हमारा ब्रह्मअस्त्र भी विफल हो गया तो हमने फिर अपने पैरो पर भरोसा किया और दौड पड़े गांव की ओर, हमारा एक ही लक्ष्य था की कैसे भी गांव पहुचो वहां ये हमारा कुछ नही कर सकता। हम चारो भाग कर गांव के रास्ते पर पहुच गये, लेकिन वहां जाकर रूक गये की अब गांव कैसे जाये क्योकी गुड्डू तो बिलकुल नंगा था, वैसे तो वो कई बार गंगा मे नंगा नहाता था लेकिन इस समय इस तरह वो गांव मे नंगा नही जाना चाहता था, भले ही कोई उसकी इज्जत ना करे लेकिन उसे खुद अपनी इज्जत का ख्याल था, और अपनी खाल का भी, क्योकी इस तरह नंगमलंग होकर घर जाता तो जूता बजना तय था । हमारी जान तो बच गयी लेकिन अब एक विकट समस्या सामने आ गयी, करे तो क्या करे..?

हम इसका हल सोच ही रहे थे की तभी हमने देखा की वो छलावा फिर से हमारे पास आ गया, हमे काटो तो खून नही, हमारी आंखे फटी रह गयी, उसे फिर से देखकर हमारी टांगे कांपने लगी और घबराहट के मारे पेट मे भी दर्द होने लगा।

वह हमारे इतने नजदीक आ चुका था की अब हम भाग भी नही सकते थे। वो अपनी अजीब सी चाल चलते हुए हमारे पास आया, उसके हाथ मे गुड्डू के कपडे थे, वह हमारे नजदीक आकर उसने सबसे आगे खड़े राजू और मेरे गाल पर एक एक तमाचा रसीद कर दिया, तमाचा लगते ही अपनी इज्जत छिपाये बैठा गुड्डू ओर ज्यादा खुद मे ही छिप गया और चेतन ने भी दवे पाव पीछे होकर संभावित मार से बचाव कर लिया। वो छलावा बोला सालो, किस किस के हो तुम आज तुम्हारे बाप से ही पूछू की भरी दोपहरी मे बालको को जंगल मे क्यो जाने दिया पता है ना वहा भेडिया आया हुआ है ले जाता तो ढूंढते रहते फिर। उसके इस तरह से बोलने पर हम चांटे को भूलकर आंखे फाड़कर उसे देखे जा रहे थे और सोच रहे थे की ये छलावा तो बहुत अच्छा है, हमारे दिल पर कब्जा जामाये बैठे डर मे तो कुछ कमी आयी लेकिन छलावा थोडा गुस्से मे था उसने कहा और ये छोटा लडका अपने कपडे उतार कर क्यो भाग आया, ऐसी गर्मी मे मरेगा क्या नंगा घूमकर। छलावे का ऐसा अच्छा रूप देखकर चेतन ने मोर्चा संभाला और कहा कि सब कहते है छलावा मिल जाये तो माचिस या प्याज से उसे भगाया जा सकता है और अगर ये ना हो तो नंगे हो जाओ तब वो तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ पायेगा। उस शख्श ने हमे देखा और कहा हाँ कहते तो सब ये ही हैं लेकिन तुम्हे छलावा कहां मिला..? हम चारो ने एक दूसरे को देखा और एकसाथ कहा की तुम छलावा हो। उस छलावे ने आश्चर्य से हमे देखा और पूछा कैसे, तुम्हे पैर टेडे है, तुम्हारी परछाई भी नही दिख रही और तुम्हारी आवाज भी थोडी अजीव है। हमारी बात सुनकर वो छलावा हमे देखता रहा और फिर जोर से हँसा, क्या मे छलावा हुं,... सच मै. हा..हा....तुम चारो इस लियो भाग रहे थे, हा..हा..हा..हा.....और वो हँसता ही रहा। हम समझ ही नही पा रहे थे की हुआ क्या है..? काफी देर हंसने के बाद वो चुप हुआ और वोला भाई मे छलावा नही हूँ मै तो पास के गांव का चंद्रपाल किसान हू। मेरी गाय रात को खुल गयी थी और मिल नही रही है उसे ढूंढने इस गांव आया हूँ, गाँव के सब लोग मुझे जानते हैं।

और रही बात मेरी चाल, मेरी परछाई और मेरे बोलने की, तो बचपन मे मै बीमार हो गया था जिसमे मेरे पैर टेढे हो गये थे, इस लिये मेरी चाल ऐसी है, मेरी आवाज इसलिये अजीव लग रही है तुम्हे की रात भर मे अपनी गाय तो ढूंढता रहा और इस बजह से मेरा गला बैठ गया है। और तीसरी बात मेरी परछाई की तो तुम लोग अपनी परछाई देखो, सूरज सिर पर है किसी की भी परछाई नही दिखेगी।

वो छलावा सही कह रहा था, हमारी भी परछाई हमारे पैरो के नीचे दवी हुई थी। उस छलावे ने गुड्डू के कपडे दिये और हमारी अक्लमंदी पर हसता हुआ चला गया। हमे अपनी हद से ज्यादा होशियारी का एहसास हो गया था, लेकिन हम नही चाहते थे की गांव मे किसी को हमारी इस बेवकूफी का पता चले और हम हमेशा के लिये गांव मे हसी का पात्र बने, इस लिये हम चारो ने वही गंगा मैया को साक्षी मानकर कसमधर्म खायी की गांव मे जाकर कोई किसी को कुछ नही बतायेगा। बिना बेर खाये हम हम चारो बुद्धू लौट कर घर को चल दिये, हमे बेर भले ही ना मिले हो लेकिन हमारे मन मे एक दबी हुई सी खुशी थी और वो खुशी थी की आज हम एक जंग जीत कर आये थे, छलावे से, भले ही वो हमारे मन का छलावा था।


( अरूण गौड़)



(दोस्तो आपको मेरी कहानी ‘छलावा’ कैसी लगी...कृपया अपनी अमूल्य राय अवशय दे, मुझे आपके विचारो का इंतजार रहेगा।) अरूण गौड़ 9897457533.

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