ईश्वर, तू महान है

गाँव की कच्ची सड़क। तेज धूप। दोपहर का समय। तन को झुलसाती गर्म लू। दूर दूर तक किसी छायादार पेड़ का नामोनिशान नही। सड़क के दोनो तरफ कुछ हरी कुछ सूखी झाड़िया थी, जो मार्ग में हरे पीलेपन का आभास दे रही थी। कभी कभी हवा एकदम बन्द हो जाती। सूर्य की प्रखर किरणे पत्थरो पर पड़कर जल के समान चमक रही थी। दूर दूर तक कोई मनुष्य तो दूर पशु-पक्षी तक नजर नही आ रहे थे। एकान्त नीरवता किसी भी मनुष्य को भयभीत कर सकती थी। ऐसा वातावरण किसी भी मनुष्य को प्रसन्न नही कर सकता था।
परन्तु इस वातावरण में सांवले रंग का एक युवक सिर पर लाल रंग की साफी डाले बड़ी प्रसन्नता से चल रहा था। वह शीघ्र से शीघ्र अपने घर पर पहुँचना चाहता था। लू की गर्म लपटें उसके तन को झुलसा सकती थी। मन को नही।
मानव का स्वभाव ऐसा ही तो होता है। यदि मन प्रसन्न है तो खराब से खराब मौसम भी सुहावना लगता है। और यदि मन दुःख या चिन्ता से पीड़ित है तो अच्छे से अच्छे मौसम भी खराब लगता है।
राधेश्याम पसीने से तरबतर हो रहा था। परन्तु कुछ ही दूर अपना गाँव देखकर उसका मन प्रसन्न हो रहा था। राधेश्याम अपनी फसल की शहर से अच्छी कीमत लेकर आ रहा था। एक किसान को अपने खेतो से अच्छी फसल और फसल से उचित लाभ मिल जाये तो उसे और किसी वस्तु की आवश्यकता नही होती है।
राधेश्याम विचारो में खो रहा था। अनेक कल्पनाये उसके हृदय में उठ रही थी। बाबूजी के लिए एक जोड़ी कुर्ता पायजामा खरीदूंगा और अम्मा के लिए एक साड़ी खरीदूंगा। छोटू और गोलू के लिए खिलौने और घरवाली के लिए जो उसे अच्छा लगे। वैसे भी वो कभी कुछ कहा मांगती है। और सारे रूपये उसे ही तो देने है।
पर काश मेरी कोई पक्की नौकरी होती। समय पर बारिश और अनुकूल मौसम की वजह से फसल की पैदावार इस साल अच्छी हो गई। किसानो की किस्मत में हर साल अच्छी पैदावार होना सम्भव नही है। मैं अपने कर्म के साथ ही कितना ईश्वर की आराधना करता हूँ, पर ईश्वर है कि मेरी सुनता ही नही है। हे ईश्वर कृपा कर के मेरी कोई अच्छी सी नौकरी लगा देना तभी मैं मानूंगा कि तू महान है।
राधेश्याम विचारो में खोया हुआ चला जा रहा था। अचानक उसे पीछे से कार की एक जोरदार टक्कर लगी। कार की टक्कर से राधेश्याम मुँह के बल गिर गया। सारी कल्पना विचार मिट्टी में मिल गये। उसका मुँह धूल से सन गया। पैरो में भी चोट लग गई। राधेश्याम एक पल को तो होश ही खो बैठा था। अगर कार चलाने वाला सही समय पर ब्रेक नही लगाता तो राधेश्याम गाड़ी से कुचला भी जा सकता था। कार चलाने वाला, 20-21 साल का एक गौरा नौजवान था। अपनी गलती के लिए क्षमा माँगने के स्थान पर वह गुस्से में आकर बोला- अरे अन्धे हो क्या ? सड़क के एक तरफ नही चल सकते।
इसे कहते है उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। राधेश्याम साफी से मुँह और कपड़ो को झाड़ते हुए सोचने लगा।
नौजवान बोले जा रहा था - वास्तव में ये गाँव के लोग भी बेवकूफ होते है पर . . .
राधेश्याम को क्रोध आ गया। माफी माँगने की जगह वह तो उसका ही दोष बता रहा था। राधेश्याम ने उसके और कुछ बोलने से पहले ही कहा - ओ, साहब हम गूंगे नही है, इतनी देर से बोले जा रहे हो। खुद गाड़ी देखकर नही चला सकते। हम तो एक तरफ ही चल रहे थे और कुछ नही तो हार्न ही बजा देते। समझते क्या हो अपने आप को ?
हे, तुम कुछ ज्यादा ही बोल रहे हो।
और तुम ज्यादा नही बोल रहे हो। एक तो गाड़ी की टक्कर मारते हो। ऊपर से माफी माँगने की जगह हमारी गलती बता रहे हो।
माफी और तुमसे बेहूदा अनपढ़ गँवार
ऐ बहुत सुन ली हमने एक तो हमारे टाँग में जोर की लग गयी है। ऊपर से हम से ही लड़ रहे हो।
ओ गॉड। ये गाँव के लोग कितने लालची होते है ? पैसे ऐंठने के लिए कितने बहाने करते है।
नौजवान जल्दी में था। वह कार का दरवाजा खोल कर बाहर निकला और बोला - हे मेन मैं लेट हो रहा हूँ। ये पकड़ो सौ का नोट और मेरा रास्ता छोड़ो।
उसने राधेश्याम की जेब में सौ रूपये का नोट रखा। और पर्स पेंट की पीछे की जेब में रखा। कार का दरवाजा खोला और जल्दी से उसमें बैठ गया। लेकिन जल्दबाजी में उसका पर्स कार दरवाजा बन्द करने से पहले ही जमीन पर गिर गया। बिना एक पल गंवाये उसने कार स्टार्ट की और वहाँ से चला गया।
राधेश्याम नौजवान की इतनी जल्दी से कुछ समझ नही पाया। राधेश्याम अपनी टांग की चोट देखने लगा। तभी उसे नौजवान का पर्स नजर आया। उसने शीघ्रता से पर्स उठाया। पीछे मुड़कर देखा। कार ज्यादा दूर नही गयी थी। वह चिल्लाया - ओ साहब, आपका पर्स।
पर नौजवान ने नही सुना। वह जल्दी से जल्दी अपनी मंजिल तक पहुँचना चाहता था। राधेश्याम ने सोचा अगर ये पर्स इस लड़के को नही मिलेगा तो ये लड़का यही सोचेगा कि गाँव के लोग बुरे होते है। नही, नही। हम ये पर्स उसे लौटा कर ही दम लेंगे।
राधेश्याम ’’ साहब, आपका पर्स। रूको। ’’ कहता हुआ दौड़ने लगा। जितना तेज वह दौड़ सकता था। उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह टांगो में चोट लगने के बावजूद ऐसे दौड़ रहा था जैसे उस नौजवान का नही उसका ही कुछ नौजवान के पास छूट गया हो। अपनी तेज गति के कारण वह कार के कुछ नजदीक पहुँच गया।
’’आ,े साहब आपका पर्स, रूको।’’ शब्द जब उस नौजवान के कानों में पड़े तो उसने पीछे मुड़कर देखा। राधेश्याम उसका पर्स लेकर उसकी तरफ ही दौडा चला आ रहा था।
नौजवान ने शीघ्रता से ब्रेक लगाया। राधेश्याम कुछ ही देर में कार के पास आ गया। पर पास आते ही कुछ बोलने की जगह अचानक गिर गया। दोपहर का समय तेज धूप और तेज गर्मी में इतनी तेजी से दौड़ने के कारण उसे चक्कर आ गये। वह बेहोश हो गया। उसका मुख पसीने से तरबतर हो गया। कपड़े गीले हो गये। नौजवान कुछ समझ नही पाया। उसने राधेश्याम को उठाकर सीट पर लिटा दिया और कार का पंखा चला दिया। मुँह पर पानी के छींटे मारते हुए कहा - हे मेन उठो।
थोड़ी देर में उसे होश आ गया। नौजवान ने पानी की बोतल देते हुए कहा - पसीना पोंछकर थोड़ा पानी पी लो।
नौजवान ने अपना पर्स उठाया। नोट गिने। दस हजार रूपये पूरे रखे थे। उनका क्रम भी नही बदला था। नौजवान सोचने लगा। ऐसा अगर सिटी में होता तो मैं तो लुट ही जाता, पर गाँव के लोग कितने ईमानदार होते है।
क्या सोच रहे है साहब - नौजवान को विचारो में मग्न देख राधेश्याम ने कहा।
नौजवान ने कहा - तुम्हे पता है इस पर्स में कितने रूपये रखे है ?
मुझे क्या पता साहब मैने तो पर्स खोलकर भी नही देखा। किसी का पर्स खोलकर रूपये गिनने की मुझे क्या जरूरत है ?
बहुत ईमानदार लगते हो। लेकिन अगर तुम पर्स खोलकर देखते की इसमें दस हजार रूपये हैं तो शायद ही तुम पर्स लौटाते - नौजवान ने राधेश्याम की ईमानदारी पर शक करते हुए कहा।
नही, साहब हम चाहे पूरा गाँव ढूढ़ते पर आपको पर्स जरूर लौटाते। गरीबो का ईमान ही सबसे बड़ी दौलत है। और परायी लक्ष्मी वैसे भी किसी का भला नही करती है। साहब हम उन आदमियों में से है जो अपने हम के रूपयो के लिए लड़ाई भी कर सकते है। लेकिन परायी लक्ष्मी को हम जबरदस्ती भी नही लेंगे।
बहुत अच्छे विचार है तुम्हारे। मैं तुमसे प्रभावित हुआ हूँ। वैसे नाम क्या है तुम्हारा।
राधेश्याम
नौजवान ने पर्स में से 500 रूपये का नोट निकाला और कहा - लो राधेश्याम तुमने मेरा पर्स लौटाया। इसलिए रख लो।
साहब अभी हमने आप से कहा हम परायी लक्ष्मी को नही लेते है।
पर मैं तुम्हे कुछ देना चाहता हूँ
अगर आपको कुछ देना ही है तो आप मुझे वचन दे कि आगे से कार धीरे से और सावधानी से चलायेंगे। ताकि मेरी तरह और किसी को चोट नही लगे। और ये लीजिए आपके 100 रूपये। मेरे बाबूजी वैद्य है। वो मेरा इलाज कर देंगे।
राधेश्याम ने नौजवान की कमीज की जेब में 100 का नोट रखा। और आगे बढ़ गया। नौजवान लज्जित हो गया। सोचने लगा कि ये आदमी नही महापुरूष है, इतनी गालियाँ देने के और झगड़ने के बाद भी इस गर्मी में पर्स लौटाने के लिए दौड़ लगायी। चोट लगने के बावजूद 100 रूपये वापस लौटा दिये। मुझे ऐसे आदमी की सख्त जरूरत है।
नौजवान ने राधेश्याम को रोका और कहा- राधेश्याम, रूको। मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।
राधेश्याम रूक गया। -हाँ, कहिये।
क्या तुम मेरे यहाँ नौकरी करोगे।
क्यों साहब, ये अनपढ़ गँवार आपको आपके यहाँ नौकरी करने लायक लगता है क्या ?
मुझे माफ कर दो राधेश्याम मैं अपनी सारी गलतियो के लिए तुमसे माफी माँगता हूँ। बस तुम मेरे यहाँ नौकरी कर लो। मुझे बहुत दिनो से तुम्हारे जैसे ईमानदार आदमी की सख्त जरूरत थी। कहाँ तक पढ़े हो तुम ?
मैने 12 वीं पास कर रखी है।
बस ठीक और किसी डिग्री की जरूरत नही है। तुम मेरे साथ चलो। मैं अभी तुम्हे सब काम दिखला देता हूँ। तुम मेरे साथ रहना। और अच्छी तनख्वाह और खाना पीना भी मेरी तरफ से ही होगा। मैं तुम्हारी ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुआ हूँ।
राधेश्याम कह नही सकता था। उसे कितनी खुशी थी। कुछ पल पहले तो वो इस घटना से दुःखी था पर ईश्वर पर उसके भरोसे ने उसके मन की इच्छा पूरी कर दी। ऊपर आकाश की और देखता हुआ मन ही मन में कहने लगा - वाकयी मैं मान गया। ’’ईश्वर, तू महान है।’’

समाप्त

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