क्यों कातिल ही दिलदार हुआ करते हैं,

अपने ही कत्ल ए हथियार हुआ करते हैं |

जिनको चाहो और समझो सरपरस्त अपना ,

वही कदमों के नीचे की जमीन छीन लिया करते हैं|

वो गैर ही रहते तो अच्छा था ,

अपने बनकर जो सकून छीन लिया करते हैं |

चोट गैर की दी हुइ काबिले बर्दाश्त होती है ,

आजकल अपने ही खंजर लिए तैयार खड़े होते हैं|

वक्त क्या भरेगा उन जख्मो को,

दिलवर के दिए जख्म ला इलाज होते हैं|

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