लोगों के स्वास्थ्य को अच्छा करने के लिए दवा बनाने वाली कम्पनी खुद बीमार रहती है। यानि न तो स्टाफ का वेतन ही समय पर देती है, न छुट्टी की ज़रूरत पड़ने पर छुट्टी ही देती है। बस काम...काम...और काम ! तभी तो यह नौबत आ गई कि एक कर्मचारी ने बगावत वाले तेवर दिखाए।
"क्यूलेक्स फार्मेसी" मॆं उसकी स्थापना से लेकर आज तक, बीस वर्षों मॆं ऐसा कभी नहीं हुआ था। कभी भी ऐसा नहीं हुआ था ! कार्यालय मॆं आकर कोई कर्मचारी कम्पनी मैनेजर के सामने खड़ा होकर ऐसा दुस्साहस नहीं कर सका था... और वह भी तब जबकि सामने दूसरी टेबल पर कम्पनी का मालिक भी बैठा हुआ हो।

कार्यालय मॆं मैनेजर की मेज के सामने, अशोक सिर झुकाए चुपचाप खड़ा था। ठिगने कद का अशोक चेहरे पर कई दिन की बढ़ी हुई हजामत और ठोड़ी पर झांकता हुआ कोई-कोई सफेद बाल ! जवानी मॆं ही सूखकर पिचका हुआ पीला चेहरा और कानों के पास उठती हुई कनपटी की हड्डियाँ, जो भीतर दबे हुए आक्रोश के कारण अब और अधिक भयानक-सी लग रही थीं।

"बड़े लोग हो न तुम ? पैसा फैंकते हो और राजनीतिक दलों के नेता, मंत्री, अफसर और पुलिस का पूरा महकमा तुम्हारी मुट्ठी मॆं रहते हैं न ? चढ़वा दो मुझे सूली पर...टेलीफोन करके बुलवा लो पुलिस को। कह देना कि मैं कोई बलवाई (दंगाई) हूँ और तुम्हारे आफिस मॆं तोड़-फोड़ करने घुस आया हूँ।" अशोक ने दाँत किटकिटाते हुए कहा।

कार्यालय के भीतर और बाहर खलबली मच गई थी। बराबर के लेबोरेट्री हॉल मॆं काम कर रहे सारे कर्मचारी, दूसरी ओर एकाउंट्स सेक्सन के लोग अपना-अपना काम छोड़ कर आ गए थे और अब कार्यालय को बाहर द्वार से घेरकर खड़े हो गए थे। वे सभी हतप्रभ थे...और क्या हो गया है, यह सारा माज़रा समझने की कोशिश कर रहे थे।

कुछ लोगों के चेहरे डरे हुए और कुछ चमचा टाइप के लोगों के चेहरे तो जैसे उसी पर (अशोक पर) लानत भेजते हुए। चोरी और सीनाजोरी...? यह सरासर बदतमीजी थी अशोक की..कि उसने पूरे लैब डिपार्टमेंट पर आज आफत बुला भेजी थी...जैसे उसने सभी की नाक कटवा दी थी। क्या ऐसा कहना चाहिए था अशोक को ? क्या मालिक और मैनेजर के सामने खड़े होकर ऐसी बदसलूकी करनी चाहिए थी ?

ऐसा दुस्साहस ! मालिक तो मालिक ही है। वही तो सबका आश्रयदाता है। उसकी कम्पनी मॆं काम कर रहे हैं सभी। उसी से रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। कोई कंप्यूटर ऑपरेटर हैं, कोई मार्केटिंग मॆं है...वे लोग कोई इंजिनियर या डॉक्टर तो हैं नहीं कि बहुत बढ़िया नौकरी मिल जाएगी। दवा बनाने की फैक्टरी के लैब मॆं या उनके दफ्तर मॆं काम करने वाले कम पढ़े-लिखे लोग, सीधे-सादे गोली-कैप्सूल बनाने वाले लोग ही तो यहाँ नौकरी पा रहे हैं।

लोग "क्यूलेक्स फार्मेसी" के मालिक से डरते हैं। वह उन्हें रोजगार दे रहा है, इस अहसान मॆं भी ये दबे जा रहे हैं। ये लोग अशोक को ही बुरा समझ रहे हैं। मालिक के पक्ष मॆं सोच रहे हैं। मालिक का नमक खाना और उसी को आँखे दिखाने का दोषी समझ रहे हैं अशोक को।

"क्यूलेक्स फार्मेसी" का मालिक सिर्फ किसी कम्पनी का मालिक ही नही है, उसकी वैसे भी अपनी एक धाक है, बहुत ऊपर तक पहुँच है। शहर भर की नाक है वह। उसके सामने यह हिमाकत ? कार्यालय मॆं बैठने वाले अधिकारी व क्लर्क सभी अशोक की इस हरकत पर तिलमिलाए हुए थे।

उधर मैनेजर सक्सेना बोल पड़ा, "देख लिया तुम लोगों ने? इस हरामखोर की इतनी हिम्मत ? इस साले को चार-पाँच साल के लिए धरवा दूँगा । मेरे ज़रा से इशारे की देर है। फिर तुम सभी लोग कह दोगे कि गरीब पर जुल्म हुआ है।" सहसा वह गुस्से से चीखने लगा, "बाल-बच्चे भूखे मर जाएँगे। जेल मॆं पड़े-पड़े एडियां रगड़ता रहेगा। शहर मॆं रहना हराम कर दूँगा। इसने मुझे समझ क्या रखा है ?"

अशोक ने आज सचमुच 20 वर्षों से चली आ रही क्यूलेक्स की धाक को ललकारा था। उस परम्परा को ललकारा था, जो इस शहर के धन्नासेठों और इस शहर के क्या, इस जैसे कई शहरों के फैक्टरी-मालिकों ने बना रखी है, और इन लोगों की सामंतशाही वाली परम्परा जाने कब से चली आ रही है, जिसे कोई अदना कर्मचारी तो क्या जिले का डी.एम. भी बदलने की हिम्मत नहीं कर सकता। इस देश मॆं पूँजीपतियों की एक समानांतर सत्ता चलती है। पहले से ही चलती आ रही है।

इसीलिए सब कर्मचारी सन्न रह गए थे। यह अशोक ने क्या किया आज?

मैनेजर की मेज पर रखे दवाई के बीकर को पेपरवेट मारकर तोड़ देना...और मैनेजर के कहे काम को मना करके आज ओवरटाइम करने से इंकार करना...और समय से पहले छुट्टी करके घर जाने की जिद करना...यह तो कभी इस फैक्ट्री मॆं हुआ ही नहीं है फिर अशोक ने आज कैसे इस तरह करने की हिम्मत दिखाई ?

यहाँ की रीत के हिसाब से यह बहुत बड़ा अपराध होता है कि जब कोई कर्मचारी काम पूरा होने से पहले, घर जाने पर अड़ जाए। आप ऐसे घर नहीं जा सकते भई, भले ही आधी रात हो जाए और चाहे दूसरे दिन की भोर भी हो जाए...ना...ना कोई चूं नहीं करेगा। आज जहाँ कहीं की दवाई का ऑर्डर पूरा करके भेजना है, उस ऑर्डर की दवाई बना कर तैयार करनी है। यह काम पहले है भाई, आपकी निजी जिंदगी बाद मॆं है।

आज के ऑर्डर की पूर्ति करने से मना करके फैक्ट्री छोड़ना! ये तो मालिक की सत्ता को सीधे ही चुनौती देना है। भले ही किसी को अपने घर मॆं कितना भी ज़रूरी काम हो। किसी अन्य फैक्ट्री मॆं यह नियम हो या न हो, पर यहाँ तो यही नियम है कि यहाँ काम करने वाला वर्कर सिर्फ कम्पनी का वर्कर है। इसके बदले उसे सिर्फ सिंगल ओवरटाइम मिल सकता है और फैक्ट्री के फोरमॆन और मेनेजर की गालियाँ मिल सकती हैं...पर ज़रा भी सहानुभूति नहीं मिल सकती। आज अशोक ने उस पूरे साम्राज्य को ललकार दिया था। इसीलिए तो सब सकते मॆं आ गए थे। हाय ! अब क्या होगा ?

मालिक गुर्रा रहा था, "बीस साल हो गए हैं "क्यूलेक्स" को चलते हुए। पंद्रह साल तक तो इसके बाप धर्म सिंह ने काम किया। वह हमारे तलुए चाटते-चाटते मरा...और वही इसे इस फैक्ट्री मॆं लाया था...और आज यही हरामखोर...? मैनेजर साहब, शहर कोतवाली दरोगा रविराज को फोन लगाओ।"

मैनेजर ने फौरन रिसीवर उठाकर कोई नम्बर डायल किया। वहाँ पर उपस्थित सभी वर्करों के चेहरों पर आतंक पुत गया। अशोक कितनी हिम्मत से तनकर खड़ा था। एक ठंडी फुरहरी उसके शरीर मॆं भी ऊपर से नीचे तक दौड़ गई।

अब तो जो भी होगा, भुगतना ही पड़ेगा। सिवाय इसके और चारा भी क्या ? क्या किस्मत लिखवाई थी जो इस लाइन मॆं नौकरी करने आ गए। आज यह दिन देखना पड़ रहा है। उसका मन गुस्से और कड़वाहट से भरता चला गया। उसने ग्यारह साल पहले इंटर पास किया था। पढ़ने का बड़ा शौक था उसे। पर घर की हालत शोचनीय थी। कमाने वाले एक पिता धर्म सिंह---"क्यूलेक्स" मॆं लैब असिस्टेंट थे।

वेतन तब मिलता था चार हजार रुपये। पर इसका वितरण माह मॆं दो बार करने की शुरू से परम्परा चली आ रही है इस फैक्ट्री मॆं। पर जिस तरह इस वेतन का वितरण होता था, वही रोने-झीकने के लिए काफी था। वेतन जो सात तारीख मॆं मिलना चाहिए, वह मिलता था जाकर सत्रह-अट्ठारह तारीखों मॆं और एडवांस जो बाईस तारीख मॆं मिलता आया था, वह मिलने लगा आकर उनतीस-तीस तारीखों मॆं। उस तरह कभी भुगतान समय पर नहीं होता था तो स्थिति यह हो गई थी कि महीने के महीने दूसरे लोगों से ले-देकर खाते।

ऐसी तंगदस्ती मॆं खाने वाले पाँच पेट...उसमें दो बहनें, एक वह और माता-पिता। ऐसे मॆं आगे कैसे पढ़ाया जाता उसे। फिर इंटर के बाद तलाश शुरू हुई उसके लिए नौकरी की, कोई काम-धँधा लगाने की। पर काम मिलना इतना आसान कहाँ ? न चाहकर बाप को उसे भी इस फैक्ट्री की लैब मॆं लगा देना पड़ा। पैसा कमाने के लिए इस घर को एक दूसरे हाथ की बड़ी सख्त ज़रूरत थी। पिता धर्म सिंह भी बीमार रहने लगे थे और घर मॆं दो-दो सयानी हो आई बहनें थीं।

तब इस लाइन मॆं पड़ा था तो आज तक गधे की तरह काम करता चला आ रहा है। मशीनी जिंदगी हो गई है। जैसे-तैसे जान पेल-पेलकर इसी फैक्ट्री से उसने पैसा कमाया था। दोनों बहनों के हाथ पीले हुए और फिर उसकी शादी करने के दो साल बाद ही बापू मर गया था। चार सालों मॆं उसके (अशोक के) भी दो बच्चे हो गए हैं।

इनमें एक 4 साल की लड़की तो लीवर मॆं सिस्ट होने की बीमारी से ग्रस्त है। वह तो रोज़ बीमार ही रहती है। डाक्टर ने उसका आपरेशन बता रखा है, मगर पैसा हीनहीं है आपरेशन कराने के लिए उसके पास। बस किसी तरह उसकी दवाई कराता रहता है। यह भी एक परमानेण्ट खर्च है।

इस खर्च के अलावा माँ है, वह खुद है, उसकी बीवी और दो बच्चे, दुख-सुख, तीज-त्योहार; सभी कुछ बोझ-भार अब उस पर उतना ही लद गया था जितना अकेले ढोते-ढोते बापू मर गया था। बल्कि बापू ने इस प्रेस से उस ज़माने मॆं जो चार हजार रुपये एडवांस लिए थे, वह विरासत मॆं मिला कर्ज भी किसी तरह रो-रोकर और थोड़ा-थोड़ा करके चुकाया गया।

अब जाकर उसका वेतन दस हजार रुपये हुआ है। इतनी महँगाई मॆं क्या होता है इतने रुपये मॆं ? कुछ ओवरटाइम लगा लेता है। पर उसका भी सिंगल ही मिलता है। रोज़ पाँच-छः घंटे लगाओ तो माह मॆं तीन-चार हजार और बन जाते हैं। अब कोई आदमी इस ज़माने मॆं तेरह-चौदह हजार कमाए तो शहर मॆं रहकर, इस पैसे में क्या-क्या कर ले ?

पर यही सब सहने की आदत सी हो गई है उसे और उस जैसे अन्य वर्करों को। किंतु यही बर्दाश्त नहीं होता कि पैसे का भुगतान निर्धारित तारीख से 8-8, 10-10 दिन बढ़ाकर किया जाए। पैसे का अभाव-दर-अभाव भोगते-भोगते भी आदमी पेट की आग को कब तक नज़रंदाज़ करेगा ? एक वक्त न खाए, दूसरे वक्त तो वह खाएगा ही। और साहूकारों और दुकानदारों से उधार लेकर खाने की भी एक सीमा होती है। रोज़-रोज़ फैक्ट्री वाले भुगतान कल पर टाल दिया करते हैं, यही सहन नहीँ होता।

रोज़ सुबह-शाम घर से आते और जाते हुए बीवी से जो चिख-चिख होती है वह तो होती ही है लेकिन अन्य कितने लोगों की भी खरी-खोटी सुननी पड़ती है। फिर कब तक कोई आए उसके घिस्से मॆं ? और वह खुद इन लोगों से घिस्सा खाता आ रहा है।

* * *

"मैनेजर साहब, मुझे मेरा इस महीने का पेमेंट दिला दीजिए। मेरी बेटी की तबियत अचानक बिगड़ गई है। घर से फोन आया है। देखना है कि उसे अस्पताल ले जाना पड़ेगा या..." बेटी की तबियत को लेकर वह आज बड़ी भारी टेंशन मॆं आ गया था।

"हूँ !" मैनेजर ने सिर्फ "हूँ" की और सिट्रजिन साल्ट का एक डिब्बा उठाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "लो यह आज के ऑर्डर को पूरा करके सिट्रजिन भेजनी है। इसलिए ये टेबलेट्स बनाकर ही जाना। कुछ देर के लिए जाना चाहो तो चले जाओ। घंटे-दो घंटे मॆं पैसे का बंदोबस्त करके लौट आओ।"

"घंटे-दो घंटे मॆं ?" वह चौंक पड़ा, "नहीं मैनेजर साहब, नहीं। कैसे आ सकूँगा।"

थोड़ी दूर एक टेबल पर बैठे मालिक साहब बोले, "मैनेजर साहब, इस वक्त इसे पाँच सौ रुपये दे दो। बाकी पेमेंट हम कल करेंगे सभी वर्करों का।"

तनबदन मॆं आग लग गई थी अशोक के उस क्षण, "पाँच सौ रुपये ? पाँच सौ रुपये मॆं क्या होगा साहब ?"

"तो अब कहाँ से तुम्हारे लिए हुन्डी लाकर दें। लो पकडो यह सिट्र्जिन का डिब्बा और काम करो।" मैनेजर ने वितृष्णा से मुँह बनाकर कहा और उस दवा का डिब्बा उसके हाथों मॆं ठूंस दिया।

यह सुनना था कि अशोक की नसों मॆं खून खौल उठा। सहने की और जुल्म करने की भी एक हद होती है। पलक झपकते ही उसने निर्णय कर लिया। बगावत ? जो होगा, आज उसे ही भुगत कर जाएगा। उसने हाथ मॆं पकड़ा हुआ दवा का डिब्बा पटक दिया और पेपरवेट उठाकर मैनेजर की मेज पर रखे एक बीकर पर जोर से मारा। काँच के बीकर के टुकड़े-टुकड़े हो गए।

टूटे हुए काँच के टुकडों को उठाकर मैनेजर की मेज पर रखते हुए वह पूरी ताकत से चीखा, "नहीं करूँगा, नहीं करूँगा अब मैं काम। जो कुछ करना चाहो, कर लो। मैं खड़ा हूँ यहीं, तुम्हारे सामने। तुम लोग वर्कर को वर्कर नहीं, गुलाम समझते हो, कीड़ा-मकौड़ा समझते हो। मेरी ज़रूरत है और तुम्हारे पास पैसा नहीं है। पाँच सौ रुपये ? मैं कोई भीख माँग रहा हूँ।" वह गुस्से से कांप उठा था।

सारा का सारा स्टाफ और कार्यालय मॆं आकर बैठे बाहर के लोग, स्तब्ध रह गए थे। आश्चर्य ? इतनी हिम्मत "क्यूलेक्स" के मालिक के सामने,उसकी फैक्ट्री मॆं काम करने वाले किसी वर्कर ने कभी नहीं की थी। और यदि किसी ने पहले यह हिम्मत की होती तो ये दिन देखने ही न पड़ते जो आज वर्करों को देखने पड़ रहे थे।

"बहुत बड़े आदमी हो न तुम ? पुलिस और सरकार मॆं सब जगह तुम्हारी चलती है। अब कर लो जो करना है मेरा ?"

काफी समय बीत चुका है। मैनेजर दो बार फोन लगा चुका था कोतवाली के दरोगा को। पर किसको फोन लगाना था ? सब नाटकबाजी थी। झूठमूठ फोन का डायल घुमाया गया था, रौब मारने के लिए। माऊथपीस मॆं चाहे जो अपनी ओर से बक दो। ज़रूरी थोड़े ही है कि वह सब कोतवाली मॆं ही जाकर गिरे। यह मात्र गीदड़भभकी थी -- आज अशोक को यह भी समझ मॆं आ गया। और इसी के साथ उसके भीतर का डर भी दूर होता जा रहा था।

कार्यालय के द्वार पर बाहर और भीतर फैक्ट्री के सारे वर्कर जमा हो चुके थे। उनमें अब परस्पर कानाफूसी भी होने लगी थी। इनमें से अधिकाँश ऐसे लोग थे जो किसी न किसी रूप मॆं यहाँ कार्यालय मॆं या फैक्ट्री मॆं, मैनेजर और बाबुओं के द्वारा अपमानित हो चुके थे। लेकिन वे आज भी बेबस बने खड़े थे। भाग्य और ईश्वर का खेल मानकर वे इस कुचक्र को वर्षों से नहीं भेद पा रहे थे। किंतु आज तो हद ही हो गई थी।

अब क्या होना है ? क्या किया जाए इस अशोक का ? यही प्रश्न कार्यालय के एडमिन स्टाफ यानी न्यायपंचों के सामने भी था। इस फैक्ट्री मॆं जहाँ कि वर्कर इस फैक्ट्री के अफसर तथा छोटे से छोटे क्लर्क का आदेश तक नहीं ठुकरा पाते थे, आज अदना से एक लैब-ब्वाय ने इतना बड़ा धमाका कर दिया था। उन पलों मॆं सबके सब अवसन्न रह गए थे। किंतु मालिक सोच रहा था कि वर्षों पुरानी अपनी हस्ती के पाए इतनी आसानी से हिलने नहीँ दूँगा।

"हरामी...बदतमीज...नमकहराम ! मारो इसे, मारो।" तभी चिल्लाता हुआ मालिक का एक मुँहलगा और घर पर नियुक्त पहलवान टाइप गार्ड वहाँ आ निकला। मालिक का घर भी तो एकदम पास ही था। किसी ने उसे बताया होगा कि कार्यालय मॆं क्या हंगामा हो गया है। यह सुन वह भागा भागा आया... अपने कार्यालय मॆं, द्वार पर जुट आई भीड़ को चीरता हुआ वह आगे आया और अशोक की ओर इशारा करके गुर्राया, "साले की खोपड़ी मॆं पिस्तौल की गोलियाँ उतार दूँगा।" यह कहकर वह पलटकर फिर भीड़ को चीरता हुआ वापिस चला गया। वह तीर की तरह मालिक के घर की ओर चला गया, जैसे वहाँ से कोई पिस्तौल लाने गया हो। मगर बहुत देर तक ना वह लौटा और न ही पुलिस के दर्शन हुए।

अब धीरे-धीरे फैक्ट्री के वर्करों का रुझान बदलने लगा था। सभी डरपोक किस्म के और बोदे वर्कर भी अशोक की ओर प्रशंसा की दृष्टि से देखने लगे थे। लेकिन अब भी किसी मॆं इतनी हिम्मत न थी कि दिल की बात को होठों पर ला सके।

अशोक ने गरदन घुमाकर एक ताड़ती हुई नज़र चारों ओर डाली। कार्यालय के लोगों मॆं घिरा इस समय वह स्वयं को बेहद निरुपाय और अकेला पा रहा था। उस पर मालिक के गुंडे के किसी भी पल पिस्तौल लेकर आ धमकने की आशंका थी ! पल-पल बुझते जा रहे उसके चेहरे से साफ परिलक्षित हो रहा था कि उसका मनोबल क्षीण होता जा रहा था।

कार्यालय मॆं कार्य करने वाले सारे क्लेरीकल के कर्मचारी भी इस समय एक तरफ़ थे। अशोक अकेला था। कमजोर वर्कर, मारपीट हुई भी तो अपनी देह के बूते पर अकेले सारी स्थिति को झेलने के अलावा दूसरा कोई चारा न था। उसके पूरे शरीर मॆं भय की एक ठंडी लहर दौड़ गई। अगले ही पल शरीर के सारे रोमछिद्रों ने ढेर सारा पसीना उगल दिया था।

उधर मालिक और मैनेजर की आँख का इशारा पाकर दो युवा क्लर्क और कार्यालय का एक चपरासी अशोक पर टूट पड़ने के लिए उठ खड़े हुए। तभी एक लैब असिस्टेंट तरुण जो पहले कभी एक अखबार का रिपोर्टर भी रह चुका था,(केवल दो-एक माह से लैब मॆं ही कार्य कर रहा था, वह अभी यहाँ की सामंतशाही से पूरी तरह वाकिफ नहीं था) उसी ने यह दृश्य देखा कि वे तीन लोग अभी अशोक पर टूट पड़ना चाहते हैं और अशोक को अभी कुछ भनक भी नहीं है, तो वह तुरंत कूद कर अपनी सीट से उठा,

"ख़बरदार ! अगर किसी ने एक क़दम भी आगे निकाला।" तरुण तुरंत कूदकर कार्यालय के द्वार पर पहुँच गया और वहीं खड़े तमाशा देख रहे वर्करों को ललकार कर बोला, "रास्ते से हट जाओ।"

उसकी चीते जैसी फुर्ती और शेर जैसी दहाड़ देखकर, सभी खड़े हुए वर्कर हकबकाकर पीछे हट गए।

"तुम सब डूब मरो चुल्लू भर पानी मॆं, बुझदिल-गुलामों ! तुम सबको तलूए चाटने की आदत हो गई है। तुम्हारे एक साथी को अकेला करके उस पर जुल्म ढाने की तैयारी हो रही है और तुम सब तमाशबीन बने तमाशा देख रहे हो।"

कोई नहीं बोला। सबको जैसे साँप सूंघ गया था।

सभी लोगों पर हिकारत की एक दृष्टि डालकर तरुण अशोक की ओर मुड़ते हुए बोला, "बाहर निकल आओ अशोक ! यहाँ मालिक और मजदूर के रिश्ते की पवित्र मर्यादा दफन कर दी गई है। तुम चिंता मत करो, मैं कई अखबारों से जुड़ा रहा हूँ। अब मैं इस फैक्ट्री मॆं वर्करों के उत्पीड़न और शोषण की पूरी कहानी लिखकर इस सच्चाई को उजागर करूँगा। राजधानी के सारे अखबारों को रिपोर्ट लिखकर भेजूंगा। अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री व श्रममंत्री को लिखूंगा। तुम बेफिक्र निकल आओ बाहर। मै सबको भुगत लूँगा। देखता हूँ, अब कौन रोक कर रखता है तुम्हें यहाँ ?"

उपस्थित सारा जन समुदाय और कर्मचारी स्तब्ध ! यह छोटी सी घटना थी और बढ़ते-बढ़ते इतना गम्भीर रूप लेगी, किसी को भी तो ऐसी आशा न थी। मैनेजर और मालिक को भी नहीं। और अब स्थिति इस तरह उलटी पड़ गई थी कि उस सिंहनाद करते इस भूतपूर्व रिपोर्टर तरुण को रोका भी नहीं जा सकता था। कार्यालय मॆं उपस्थित किसी भी स्टाफ कर्मचारी की जुबान तक न हिल सकी थी।

उस रिपोर्टर की खुली ललकार सुनकर फैक्ट्री वर्करों और कार्यालय के स्टाफ के लोगों के बीच घिरे अशोक का दिल भी एक क्षण के लिए काँप उठा था। वह क्या करे अब ? पहले ही उसने काँच का बीकर तोड़कर, और उलटा-सीधा बककर वह सारा माहौल अपने खिलाफ कर लिया है। अब दूसरी यह गलती भी वह कर डाले कि तरुण के कहने पर बाहर निकल कर मुकाबले पर भी आ जाए ?

इस ऊहापोह से उबरने मॆं उसने अधिक समय नहीं लिया। अगले ही पल वह कार्यालय के मुख्य द्वार को पार करके बेखौफ बाहर कूद आया।

अशोक ने एक नज़र उस तरुण की आँखों मॆं देखा...अगले ही पल वह गहरी साँस छोड़कर अपनी बाँहें हवा मॆं उठाता हुआ अपने स्थान पर डटकर खड़ा हो गया। उस क्षण जाने कैसे उसे यह अनुभव हो रहा था कि अपने स्तर पर वह एक क्रांति की शरूआत कर चुका है, जिसमें दूसरा क्रांतिकारी युवक वह तरुण भी है। उसने पूरे आक्रोश के साथ अपना दायाँ बाजू जोर से हवा मॆं उछाला और जोर-जोर से बोलने लगा, "इंकलाब जिन्दाबाद ....इंकलाब जिन्दाबाद।"

(समाप्त)

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