मन का मीत

दोनों की आँखें बहुत ही भाव प्रवण थी. बड़ी बड़ी मोतियों जैसी आँखें फर्क सिर्फ इतना था की अदिति अपनी आँखों से दुनिया देख सकती थी. आदित्य अपनी बड़ी बड़ी आँखों से दुनिया नहीं देख सकता था . अदिति अद्वैत्य इंटरनेशनल में पढ़ती थी और आदित्य गवर्नमेंट ब्लाइंड स्कूल में.

जैसे ही स्कूल से छुट्टी होती थी, अदिति आदित्य के घर चली आती थी. दोनों दिन भर स्कूल में क्या हुआ इसकी बातें करते थे फिर अदिति अपने घर आ जाती थी. यही थी दोनों की दिनचर्या.

बिन कुछ कहे ही एक दूसरे को समझ जाते थे. उन दोनों के बीच एक ऐसा ताना बाना था जिसे वो भी शायद नहीं समझ पाते थे. कई बार वो दोनो घंटो बैठे रह जाते थे बस एक दुसरे की उपस्थिति का अहसास, सन्नाटे से करते थे. ये ख़ामोशी भी बहुत कह जाती थी. वो दोनो इस ख़ामोशी की भाषा को समझ भी लेते थे और मन के के कैनवास पर चित्रित कर लेते थे.

कई बार आदित्य ब्रेल लिपि की किताबें अदिति को पढने कहता और वो पढ़ नहीं पाती फिर दोनो हंसने लगते. उनकी निश्छल हंसी का गवाह उनका बैठकखाना बन जाता .

एक बार आदित्य ने कहा, “ देख सकता हूँ बिन नैन”. अदिति ने बीच में टोकते हुए कहा

“ये जो है मेरी आँखें, वो हैं तेरी आँखें.

तुम देखोगे दुनिया, साथ निभाएगी ये तेरी आँखें, मेरी आँखें.”

ये बातें यहीं ख़तम हो गयी. अदिति अपने घर चली गयी. आदित्य कीबोर्ड बजाना और गाना गाना सिखने लगा. जो कुछ भी सीखता हो अदिति को बताता. एक दिन उसने कहा मैंने एक गाना कंपोज़ किया है, सुनो तुम.

भगवान् कृष्ण और गोपियों को ध्यान में रख कर बनाया है.

जब से गए हो कान्हा, मथुरा रे नगरिया

लोक लाज सब तज दीनी, नाचूं तेरी रे बजरिया

बाट बाट जोहत, हो गयी रे बाबरिया

कब आओगे कान्हा, मोरी रे डगरिया.

इस गीत को आँखे मूंद, और जब सधे स्वर में, आदित्य ने गया तो अदिति मंत्र मुग्ध हो गयी और बोली अंतर्मन को छू गया, आज के कान्हा. तुम तो मन के मीत लगते हो.

मुझे संगीत की समझ नहीं है पर तुम कान्हा को उच्चारण करते वक़्त अपने स्वर को उंचा करो. यह एक लोक गीत है और लोक गीत में स्वर में बदलाव की आश्यकता होती है.

आदित्य ने जब पुनः गाया अदिति की सलाह को मनन करते हुए, तो अदिति ने कहा , लौ गयी, लगन लग गयी. रुक जाओ तुम. इस अलौकिक सुर लहरी को आत्मसात करने दो.

कुछ पलों के बाद उसने अपनी चुप्पी तोडी और कहा.

एक बार फिर से गाओ. आदित्य जमीन पर बैठ गया और सुर साध दिया.

अदिति ने कहा,” बस, आज इतना ही, अब मैं घर चलती हूँ और वो घर चली गयी.

एक दिन अदिति और आदित्य स्कूल लौट कर आपस में गप शप कर रहे थे. अदिति बता रही थी आज हमारे स्कूल में एक बहुत ही प्यारी कविता पढाई गयी है. तुम्हे पता है जब हम दोनों चुपचाप बैठे होते हैं तो हमारी ख़ामोशी, हमारी बातों से ज्यादा खुबसूरत होती है. तुम मानता है कि नहीं, इस बात को.

उसी भाव से ओत प्रोत एक कविता है – राम धारी सिंह दिनकर की

दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब बड़े साँझ आल्‍हा गाता है, पहला स्‍वर उसकी राधा को घर से यहाँ खींच लाता है। चोरी-चोरी खड़ी नीम की छाया में छिपकर सुनती है, 'हुई न क्‍यों मैं कड़ी गीत की बिधना', यों मन में गुनती है।

वह गाता, पर किसी वेग से, फूल रहा इसका अंतर है। गीत, अगीत, कौन सुन्‍दर है?

--------

देख तू गा कर अपने भाव को वयक्त कर देता है मैं सोंचती, काश मैं भी गा पाती, और अपने अंतर्मन के भाव को प्रगट कर पाती. सब कुछ अनकहा, अनछुआ और टटका टटका रहता है.

इतने में शोर गुल सुनायी दी. पता चला कि कल टीवी से लोग आदित्य से मिलने आये है. आदित्य आश्चर्य चकित था , उस ने ऐसा क्या किया कि कल टीवी के लोग उस से मिलने आ गए हैं.

कल टीवी :- आदित्य, हमने आप का विडियो देखा है यूट्यूब पर. आप अद्भुत गाते हैं. वायरल हो चुका है आप का गाना “जब से गए हो कान्हा, मथुरा रे नगरिया”. १० लाख हिट्स हो चुके हैं, इसके. कौन है प्रेरणा श्रोत आपकी.

आदित्य :- सर्वप्रथम आप को बहुत बहुत धन्यबाद, मेरी इज्जत अफजाई के लिए. मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा, बस ये अंतर्मन का संगीत है.

कल टीवी :- कल टीवी चाहता है कि आप एक युगल गीत गाये, अपनी फ्रेंड के साथ. ये है हमारा आमंत्रण पत्र. इसका लाइव टेलीकास्ट होगा. आप न नहीं करना . अब मैं विदा लूँगा आप से.

आदित्य :- अदिति, हम दोनों मिलकर एक सोंग कंपोज़ करते है.

अदिति :- मेरे बुद्धुराम दोस्त, तुम्हे पता नहीं मेरी आवाज कैसी है, मैं तेरा साथ नहीं दे पाउंगी.

आदित्य :- तुम मेरे साथ नहीं गायेगी, तो मैं इस इवेंट में भाग नहीं लूँगा

अदिति :- अश्क, तेरी आँखों में देख नहीं पाउंगी, ओ मीत, तेरे साथ गीत गाऊँगी.

इवेंट की तैयारी

आदित्य और अदिति इवेंट की तैयारी में जुट गए. गाने के बोल कुछ इस तरह तैयार किये.

तू है दिवानी, मैं हूँ दिवाना

मैं हूँ दिवानी, तू है दिवाना

साथ निभाना, ओ जाने जाना

सब कुछ भूल गए है, पढ़ कर, प्रेम का ढाई आखर

इन आँखों में मस्ती में है सपनो का नगर

मैं भी बेखबर, तू भी बेखर

तू भी बेखबर, मैं भी बेखबर

ओ जाने जाना , साथ निभाना

मैं हूँ दिवानी, तू है दिवाना

तेरी आँखों में, आँखे डाल, इस दुनिया से है जाना

ओ जाने जाना , साथ निभाना

मैं हूँ दिवानी, तू है दिवाना

कई सप्ताह की अथक मेहनत के बाद , अदिति और आदित्य को लगा कि उनकी परिश्रम रंग लायेगी..

सबकी आँखे नम थी, अदिति और आदित्य बहुत बड़े स्टार बन गए थे इवेंट के दिन. जिस ने भी सुना “तेरी आँखों में, आँखे डाल, इस दुनिया से है जाना”, उन सब के लबों पर अदिति और आदित्य के नाम थे.

अदिति और आदित्य अपनी नयी इस स्टारडम से दूर रहते थे. उन्हें ज्यादा लोगों से मिलना पसंद नहीं था. वो उनकी चुप्पी में खलल डालता था. वो दोनों स्कूल के बाद वैसे ही चुपचाप घंटो साथ बैठना पसंद करते थे.

आदित्य कुछ दिनों से परेशान था. अदिति उसके घर नहीं आ रही थी. उसने अपनी माँ से पूछा,” माँ, आज कल अदिति क्यों नहीं आ रही है?

मुझे नहीं पता बेटा, उसकी माँ ने कहा.

पता करो न माँ, आदित्य ने मनुहार भरे शब्दों में कहा.

ठीक है बेटा.

अब मेरी मौन साधना नहीं होती है. और मैं मौन साधना नहीं करूंगा, तो अंतर्मन से संगीत नहीं उपजेगा. पता करो न माँ, क्या हुआ, क्यों नहीं आ रही है अदिति.

अदिति रुग्ण पडी थी. डॉक्टर थक गए थे, उन्हें पता नहीं चल पा रहा था कि अदिति को कौन सी बीमारी है. अदिति दिन ब दिन कमजोर पड़ती जा रही थी. एक दिन उसने डॉक्टर को बुलाया और कहा डॉक्टर,” अब, मैं इस धरती की ज्यादा दिन की मेहमान नहीं हूँ. क्या आप मेरी आँखे दान कर देंगे?

ऐसा मत बोलो बेटा, तुम जल्द ही ठीक हो जाओगी. डॉक्टर ने ढाढस बंधाते हुए कहा और उसके सर पर हाथ रख दिया.

नहीं, डॉक्टर, मेरी मौन साधना कहती है, मैं अब ज्यादा दिन नहीं जीऊँगी. आप को मेरी माँ और मेरे पिता को मनाना होगा, चक्षूदान के लिए. और हाँ, सारी दुनिया मरने के बाद अपनी आँखे दान करती है और मैं मरने से पहेले दान करना चाहती हूँ.

ऐसा नहीं हो सकता, बेटी. डॉक्टर ने कहा.

नहीं डॉक्टर, आप को करना होगा. अदिति ने दृढ स्वर में कहा.

आदित्य को नयी आँखे लग गयी थी, अब वो देख सकता था और उसने जिद कर दिया कि मैं अदिति से मिलूंगा.

आदित्य की माँ उसको लेकर हॉस्पिटल गयी है. वहां अदिति का शव पड़ा था और उसके हांथो में एक कागज का टुकड़ा था जिसे लोग निकलने की कोशिश कर रहे थे पर वो नहीं निकल रहा था. आदित्य ने जैसे उस कागज को पकड़ा, वो पुर्जा उसके हाथ में आ गया . उस पर अदिति की हैण्ड राइटिंग में लिखा था

तेरी आँखों में, आँखे डाल, इस दुनिया से है जाना

ओ जाने जाना , साथ निभाना

मैं हूँ दिवानी, तू है दिवाना

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.