वह खास खुशबू

जिस स्कूल में पढ़ता था वहां ईसाइयत की चर्चा कुछ ज्यादा होती थी और शायद यह बात मेरे पिता कम पसंद आती थी.... हलाकि पिता के सबसे नजदीकी दोस्त मोहम्मद कमर खान और डेविड अंकल थे ... लेकिन पिताजी अपने बच्चों में हिंदू धर्म के वैदिक संस्कारों के साथ सभी धर्मों के प्रति सम्मान और सद्भाव को बढ़ते हुए देखना चाहते थे।

मैंने तो घर में यह चर्चा तक सुनी कि पिताजी मां से कह रहे थे-

" मुझे लगता है कि अशोक को भी मैसमोर प्राइमरी स्कूल से हटाकर कहीं और एडमिशन करा दिया जाए"

"ऐसा क्यों?" जब माँ ने यह पूछा तो उनका उत्तर क्या रहा होगा इसकी बस कल्पना के सकता हूँ ..बहरहाल मनोज का दाखिला दयानंद एंग्लो विद्यालय यानी डी0ऐ0वी0 कालेज के समीप स्थित सरकारी विद्यालय में करा दिया गया... इसके पीछे शायद पिता का विचार था कि वह मुझे भी पांचवी पास करने के बाद डीएवी कालेज ही भेजना चाहते थे।
इस बीच एक ऐसी घटना घटी कि मुझे कक्षा 5 पास करने से पहले ही मेसमोर प्राइमरी स्कूल छोड़ना पड़ा।

मैं कुछ बीमार पड़ा था शायद....कई दिनों तक बुखार रहा स्कूल नहीं जा सका...माँ बताती हैं कि खसरा हुआ था मुझे...दिन में अक्सर तेज बुखार रहता...और तेज बुखार में मैं बडबडाता-

"मेरा येसु मसीह आया है..वो अपने बेटो से मिलने जरूर आता है...वो अपने बच्चों को तकलीफ में नहीं देख सकता...आदि आदि"

मेरा इस तरह बुखार में येसु मसीह को याद करना पिता को नागवार गुजरा..उन्हें शायद यह भान हुआ होगा कि मैं जिस विद्यालय में पढ़ रहा हूँ वहां मेरे अचेतन मन में ईसाई धर्म की जड़ें मजबूत घर बनाने लगी हैं...यदि मुझे इस माहौल से बाहर नहीं निकाला गया तो शायद हिन्दू धर्म के मूल्यों से हमेशा हमेशा के लिए दूर हो जाऊंगा।


यीशु मसीह के प्रति मेरे बाल मन में बढ़ती आस्था आखिरकार मुझे प्राइमरी शिक्षा के अंतिम वर्ष में मेसमोर प्राइमरी स्कूल से निकालकर एक सरकारी स्कूल में ले गई जो दयानद एंग्लो विद्यालय के पास था। पिता के मन में मेरी भविष्य की शिक्षा के लिए यह विचार था कि मुझे अपनी आगे की कक्षाओं की पढ़ाई इसी dav कॉलेज से पूरी करनी थी। जिस नए स्कूल में अब मैं आया था वह स्कूल तो कम था प्रशिक्षण संस्थान ज्यादा था।आए दिन प्रशिक्षु शिक्षक स्कूल में आते और बच्चों को अपने अपने तरीके से पढ़ाते। मुझे याद है यही वह स्कूल था जहां मेरे कई दोस्त आगे आने वाली कक्षाओं में भी मेरे जिगरी दोस्त बने रहे , से जुड़े कई किस्से हैं जिनकी स्मृति आज भी ज्यों की त्यों है ।


ख़ास तौर पर आज याद आ रही है वह खास खुशबू जो शालिनी मैडम के कक्षा में आने पर भर से आ जाया करती थी। शालिनी मैडम अक्सर नीली साड़ी पहनकर स्कूल आती वह हमारी क्लास टीचर भी थी इसलिए प्रेयर के बाद पहली क्लास भी उन्हीं की होती थी। जब वह कक्षा में बच्चों की उपस्थिति अंकित कर रही होती तो बड़े प्यार से बच्चों का नाम पुकारती। ऐसा लगता था जैसे भगवान् ने उनके कंठ में मिश्री घोल कर भेजा हो...। उस मिसरी घुले कंठ से अपना नाम सुनने के लिए हम सब धैर्यपूर्वक अपनी बारी का इंतजार करते की मैडम हमारा नाम पुकारे और हम "प्रेजेंट मैम" कहकर अपना हाथ ऊंचा करें और वह हमारी ओर देखें। शालिनी मैम हमें विज्ञान पढ़ाती थी ब्लैक बोर्ड पर उनकी सधी उंगलियो से छोटे छोटे चित्र उभर जाया करते थे और हम गंभीरतापूर्वक उन्हें आत्मसात करते।


इस स्कूल की विशेषता यह भी थी कि वहां अक्सर निरीक्षण हुआ करते थे। उस दिन भी शायद कुछ खास निरीक्षण ही था जिसमें विद्यालय में कार्यरत अध्यापकों के पठन-पाठन की जांच करने कोई आला अधिकारी आने वाला था। बच्चों को विशेष क्रम से बैठाया गया था। अगली दो पंक्तियों में वह बच्चे जिनकी कापी किताबों पर जिल्द चढ़ी थी और होमवर्क पूरा था। मुझे अच्छी तरह याद है कि उस दिन दिन मैडम अमीबा के बारे में बता रही थी।अमीबा का छोटा सा चित्र उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर बनाया था और उसे रंग बिरंगी चौक से सजाया था। वह अमीबा के केंद्रक के बारे में बता ही रही थी क्योंकि कक्षा में किसी बड़ी मैंने प्रवेश किया उनके कक्षा में प्रवेश करते ही शालिनी मैम शांत हो गई सभी बच्चे अपने स्थान पर खड़े हो गए निरीक्षण को आई बड़ी मैडम ने इशारे से बच्चों को बैठने का निर्देश दिया और ब्लैक बोर्ड की ओर देखकर बोलीं-


"इससे छोटा अमीबा नहीं बनाया जा सकता था क्या ....?"


शालिनी मैम कुछ सहम सी गई उनकी मिश्री घोली आवाज बैठ सी गई थी। उन दोनों के बीच कुछ वार्तालाप हुआ। और उसके बाद बड़ी मैडम ने अगली पंक्ति में बैठे होने के कारण मेरी कॉपी उठाई। कॉपी के पन्ने पलटने के बाद उसमे कुछ लिखा और शालिनी मैडम को कुछ निर्देश भी दिए जिन्हें मैं सुन न सका क्योंकि जिस तूफान की तरह वह कक्षा में दाखिल हुई थी और जैसा व्यवहार उन्होंने शालिनी मैडम के साथ किया था उससे सहम कर कुछ अनमना सा गया हो था मैं। वह तो जैसे पहले से ही गुस्से में भरी थी और सोचकर आयी थी कि डांटना ही है। थोड़ी देर में उन्होंने खुद चाक उठाकर ब्लैकबोर्ड पर एक बड़ा सा अमीबा बनाया और मैडम से कहा -


"देखो ! इस तरह बनाया जाता है अमीबा जिससे पीछे बैठे हुए बच्चों को भी दिखाई दे..."


अब कक्षा में पीछे बैठे किसी बच्चे पुकार कर कहना चाहा-


"ये तो टेढ़ा है मैम...." तो शालिनी मैडम ने उसे इशारे से चुप किया और विद्यालय का निरीक्षण करने जो बड़ी मैडम आई थी उनके निर्देशों को शान्ति पूर्वक ग्रहण करती रही। जिस तूफान की तरह वह आई थी उसी आंधी की तरह वह लौटकर चली गई तो हम बच्चों की जान में जान आयी। सरे बच्चों की चहेती शालिनी मैम को उन बच्चों के सामने इस तरह भला बुरा कहना और जलील करना हम बच्चों को बहुत बुरा लगा था। मैं तो रुआंसा हो गया था मैडम मेरे नजदीक आई वह कॉपी उठाई जो बड़ी मैम देखकर गई थी उसमें उनका लिखा पढ़ा फिर मेरी और देखा मैं अभी वैसा ही सहमा और अनमना सा था। मुझे रुआंसा देखकर मेरे गालों पर हाथ लगाया बोली-


"क्या हुआ तुझे...? वह बड़ी मैम थी ना...! वह हम सब को डांट सकती हैं..!


मैं फिर भी सामान्य ना हो सका। अपने होंठ काटने पर भी मन से निकल रही रुलाई जैसे रोक नहीं पा रहा था। अब उन्होंने मुझे अपने अंक से लगा लिया मेरा चेहरा उनकी साड़ी की परतों में छिप गया। नथुने उस खास खुशबू से भर गए जिसके लिए हम शालिनी मैम को जानते थे... उनका वह स्पर्श अद्वितीय था ...कभी ना भूलने वाला ....! कभी ना विसरने वाला...!! तृप्त कर देने वाला...!!! अमृतमयी स्पर्श...!!!


ऐसा लगा जैसे साडी की उन सिलवटों के बीच हजारों दिव्य कस्तूरी बंद हों .. ।


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