पहली कविता

लहुलुहान हूँ मैं

घायल आत्मा है

चीत्कार तड़प रही है

धरती से आसमां तक

किन्तु मैं हारा नहीं हूँ ।

फूटती हैं बिजलियाँ

कंपकंपाते हैं बाजू

टूट गए है बाण

धूल धूसरित हो गयी है उम्मीदें

किन्तु धड़क रहा हूँ

और धड़कूँगा इसी तरह ।

ऐ वक्त के बादशाहो

नहीं ले रहा हूँ दम

जीत रहा हूँ थकन

सी रहा हूँ जख्म

लौटूंगा !

लौटूंगा !!

जुझुंगा, इसी समर में

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