अभिनव

अभिनव 40 वर्ष का एक साधारण इन्सान था । आज की आधुनिक दुनिया में उसे थोड़ा पिछड़ा कह सकते हैं । उसकी दुनिया उसकी माँ और उन बच्चों तक ही सीमित थी जिन्हें वो ट्यूशन पढ़ाता था । अभिनव ने दोनों छोटे भाइयों की शादी करा दी पर अपनी शादी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी । एक बार उसके ट्यूशन के बच्चों ने जबरदस्ती उसका फेसबुक आईडी बना दिया। अभिनव की इन चीज़ों में बहुत दिलचस्पी थी नहीं सो कभी खोल कर देखा ही नहीं। एक दिन उसका छोटा भाई पवन कहने लगा, 'भइया आप ने अपनी दुनिया को बहुत सीमित कर रखा है अपने दायरे से बाहर आ कर देखिये दुनिया कितनी आगे निकल गयी है। मैं आपका एक फेसबुक अकाउंट बना देता हूँ, कुछ लोगों से दोस्ती होगी बातचीत होगी तो आपको अच्छा लगेगा।' अभिनव ने हँसते हुए कहा , ' तुम्हें क्या लगता है तुम बहुत आधुनिक हो मैं पिछड़ा हुआ। ऐसा नहीं है, मैं भी तुम लोगों से पीछे नहीं हूँ। मैंने अपना फेसबुक अकाउंट बना रखा है। ' छोटा भाई आश्चर्य से देखते हुए बोला , ' क्या बात कर रहे हो भइया आपका फेसबुक अकाउंट है ? आपने कभी बताया नहीं। मैं आपको सर्च करके आपको रिक्वेस्ट भेजता हूँ आप अपना अकाउंट लॉगिन कीजिये और एक्सेप्ट कीजिये।' अभिनव थोड़ा घबरा गया क्योंकि उसने कभी अकाउंट लॉगिन ही नहीं किया था इसलिए उसे पता नहीं था के कैसे करते हैं और वो छोटे भाई के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहता था । उसने बहाना किया की उसे कहीं जाना है और वो बाद में देख कर एक्सेप्ट कर लेगा। बाद में उसने अपने ट्यूशन के बच्चों से सारा कुछ सीखा और अकाउंट लॉगिन किया वहां उसे अपने छोटे भाई की फ्रेंड रिक्वेस्ट मिल गयी और उसने एक्सेप्ट कर लिया। अब वो कभी कभी फेसबुक देख लिया करता था। एक दिन उसने देखा की छोटे भाई ने अपनी एक फोटो डाली और बहुत सारे लोगों ने फोटो को लाइक किया था। यूँ ही उत्सुकता वश वो देखने लगा की किन किन लोगों ने फोटो को लाइक किया है। वो एक एक करके सभी नाम पढ़ने लगा अचानक एक नाम देख कर रुक गया 'सुहानी', कुछ पुरानी बातें याद करते हुए वो मुस्कुरा दिया और उसने सुहानी को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। 2 - 3 दिन बीत गए लेकिन सुहानी ने फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नहीं की। अभिनव ने मन में सोचा कहीं ऐसा तो नहीं वो संपर्क रखना ही न चाहती हो ? फिर अगले पल उसे याद आया उसने अपनी कोई फोटो भी नहीं डाली है हो सकता है उसने पहचाना ही न हो। उसने तुरंत अपनी एक नयी फोटो प्रोफाइल में लगा दी। उसका सोचना शायद सही था अगले दिन ही सुहानी ने उसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली। अभिनव ने बस लॉगिन किया ही था कि सुहानी का चैट मैसेज आ गया, 'हैलो अभिनव सर, कैसे हैं आप ? पहले तो मैं आपको पहचान ही नहीं पाई थी बाद में आपका फोटो देख कर पहचाना ' (अभिनव सुहानी को ट्यूशन पढता था इसलिए वो उसे अभिनव सर ही बुलाती थी ) अभिनव ने भी उसे मैसेज भेजा, 'हैलो सुहानी, मैं अच्छा हूँ तुम कैसी हो ? कहाँ हो आजकल ?' सुहानी, 'मैं भी अच्छी हूँ शादी के बाद दिल्ली आ गयी थी मेरे पति का दिल्ली में अपना बिज़नेस है बस अब तो यहीं हैं। ' अभिनव, ' तो अब लखनऊ आना नहीं होता कभी ?' 'नहीं सर , 3 साल पहले आयी थी मेरी कजिन की शादी में ऐसे तो कभी आना होता नहीं। ' थोड़ा रुक कर फिर उसका मैसेज आया, 'अब वहाँ कोई रहा नहीं, पापा तो रहे नहीं और मम्मी दीदी के पास भोपाल में रहती हैं। कभी कभी मेरे पास घूमने के लिए आ जाती हैं। पर ज्यादा दिन उनका मन दीदी के बिना नहीं लगता।' ' ओह अच्छा ! तो कैसी हैं आंटी अभी ? बहुत दिन हुए उनको देखे आज भी उनके हाथ के बेसन के लड्डू याद हैं मुझे ?' अभिनव ने कहा। सुहानी का थोड़ी देर में जवाब आया, 'मम्मी अच्छी हैं बस पापा के बाद थोड़ी अकेली हो गयी हैं। ' थोड़ा रुक कर अभिनव ने लिखा, 'अच्छा सुहानी बाद में बात करता हूँ मेरे स्टूडेंट्स आ गए हैं मुझे जाना होगा , बाय टेक केयर। ' 'ओके बाय सर। ' सुहानी का जवाब भी आ गया। अभिनव कंप्यूटर ऑफ करके पढ़ाने चला गया।

अगले दिन अभिनव कंप्यूटर ऑन किया और फेसबुक लॉगिन किया तो देखा कि सुहानी ऑनलाइन नहीं थी। अचानक उसके दिमाग में ख्याल आया, 'अगर सुहानी फेसबुक पर है तो हो सकता है श्रद्धा भी.… , क्यों ना सुहानी की फ्रेंड लिस्ट में चेक करूँ ?' यह सोच कर उसने सुहानी का प्रोफाइल चेक किया और उसकी फ्रेंड लिस्ट चेक करना शुरू किया। उसका अंदाजा बिलकुल सही सही निकला, श्रद्धा उसे सुहानी की फ्रेंड लिस्ट में मिल गयी। उसने श्रद्धा का प्रोफाइल चेक किया उसकी फोटो, उसके पति और बच्चों की फोटो देखता गया। एक फोटो जिसमे श्रद्धा का पूरा परिवार था उसे बहुत अच्छी लगी और उसने फोटो पर लाइक कर दिया। इस बात को कई दिन बीत गए और अभिनव बिजी होने की वजह से फेसबुक भी लॉगिन नहीं कर पाया। एक दिन जब अभिनव ने फेसबुक लॉगिन किया तो देखा श्रद्धा का फ्रेंड रिक्वेस्ट आया हुआ था। उसने फटाफट श्रद्धा का फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किया तो देखा कि श्रद्धा ऑनलाइन थी। वो सोचने लगा कि अपनी तरफ से बात शुरू करूँ या नहीं आज इतने साल बाद क्या बात करूँ ? यही सब सोच रहा था कि श्रद्धा का मैसेज आ गया, 'हैलो अभी ! कैसे हो ?" श्रद्धा पहले भी उसे अभी कह कर ही बुलाती थी। अभिनव ने जवाब दिया, 'हैलो श्रद्धा ! मैं बहुत अच्छा हूँ तुम कैसी हो ?' श्रद्धा अपने उसी पुराने बिंदास अंदाज़ में, 'मैं तो मस्त हूँ लाइफ एन्जॉय कर रही हूँ। तुम्हारी कोई खबर ही नहीं मिली इतने सालों में। कहाँ हो आजकल ?' 'बिलकुल वैसी ही है आज तक ' सोचते हुए अभिनव के चेहरे पे मुस्कराहट आ गयी और उसने जवाब दिया, ' मैं तो यहीं लखनऊ में हूँ, और कहाँ जा सकता हूँ। तुमने इतने सालों में खबर ली कहाँ जो मिलेगी। ' थोड़ी देर में श्रद्धा का मैसेज आया , ' हाँ यार बात तो सही है मैं भी अपनी लाइफ में इतना बिजी हो गयी की संपर्क भी नहीं कर पायी फिर लखनऊ आना भी नहीं हुआ सालों से। खैर अब बात करते रहेंगे। अगर तुम्हें ऐतराज़ ना हो तो क्या तुम मुझे अपना मोबाइल नंबर दे सकते हो ?' अभिनव का जवाब आया, ' ऐतराज़ क्यों होगा बल्कि ये तो मेरे लिए ख़ुशी की बात है कि मैं अपनी सबसे पहली और सबसे अच्छी दोस्त से बात कर सकता हूँ। मेरा नंबर है 97*******5 तुम जब चाहे मुझे कॉल कर सकती हो ' श्रद्धा, ' थैंक यू वेरी मच ! मैं जल्दी ही तुम्हें कॉल करुँगी। अभी मैं जाती हूँ कुछ काम करने हैं, ओके बाय ' अभिनव ने भी जवाब दिया, ' बाय, टेक केयर ' और कंप्यूटर ऑफ दिया।

अगले कई दिनों तक फेसबुक लॉगिन करके अभिनव श्रद्धा के ऑनलाइन होने का इंतजार करता रहा पर वो ऑनलाइन नहीं हुई। अचानक हफ्ते बाद एक अनजान नंबर से कॉल आया , अभिनव ने कॉल उठाया तो दूसरी तरफ से श्रद्धा की आवाज़ आयी , 'हैलो अभी !' श्रद्धा की आवाज बिलकुल नहीं बदली थी, अभिनव ने तुरंत पहचान लिया और बोला , ' ;हैलो श्रद्धा ! कैसी हो? कहाँ गायब हो, बहुत दिनों से ऑनलाइन भी नहीं हुई। ' श्रद्धा हँसते हुए बोली, 'अरे यार इतना नाराज मत हो मैं असल में शहर से बाहर थी और कुछ बिजी चल रही थी इसीलिए ना तो फेसबुक लॉगिन कर पाई ना ही कॉल कर पाई, आज ही फुर्सत मिली है। अच्छा एक बात बताओ आज शाम को क्या कर रहे हो ?' अभिनव ने जवाब दिया, ' मेरा क्या है, बच्चे 6 बजे तक ट्यूशन पढ़ कर चले जाते हैं और मैं खाली। क्यों क्या करना है शाम को ?' श्रद्धा थोड़ा रुक कर बोली, 'तो ठीक है फिर शाम को 6:30 मुझे हजरतगंज में कैफ़े कॉफ़ी डे पर मिलो। ' अभिनव लगभग चौंकते हुए, 'तुम लखनऊ में हो ? कब आयी? कहाँ रुकी हो? अब तक मुझे बताया क्यों नहीं ?' 'शांत हो जाओ, शांत हो जाओ, सब कुछ इसी समय पूछ लोगे? शाम को मिलो सब बताती हूँ। ' आज इतने सालों के बाद श्रद्धा की आवाज़ सुनकर एक अजीब सी ख़ुशी का एहसास हो रहा था और ये सोचकर कि आज उससे मिलना भी होगा अभिनव की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।

किसी तरह से दिन बीता और शाम हुई, आज अभिनव ने ट्यूशन के बच्चों को जल्दी छोड़ दिया। ठीक 6 बजे स्कूटर स्टार्ट करके हजरतगंज की ओर चल पड़ा , हालाँकि उसे पता था कि हज़रतगंज का रास्ता 10 मिनट से ज्यादा का नहीं है पर वो देर से नहीं पहुंचना चाहता था। अभी 6 बज कर 15 मिनट ही हुए थे मतलब श्रद्धा आने में अभी समय था। अभिनव ने कैफ़े में जाकर एक टेबल बुक कर लिया और बैठ कर श्रद्धा का इन्तजार करने लगा। बैठे बैठे अभिनव पुरानी बातें याद करने लगा। अभिनव और श्रद्धा एक ही क्लास में पढ़ते थे दोनों की दोस्ती पूरे स्कूल में प्रसिद्ध थी। स्वाभाव में दोनों एक दुसरे से एकदम विपरीत थे , जहाँ अभिनव शांत स्वभाव का पढ़ाई में लगा रहने वाला लड़का था वहीँ श्रद्धा बिलकुल बिंदास तेज तर्रार लड़की थी, स्कूल के बच्चे उससे डरते थे। पढाई के लिए वो पूरी तरह से अभिनव पर आश्रित थी या यूँ कह लो की अगर श्रद्धा हर साल पास होकर अगले कक्षा में पहुँचती थी तो वो सिर्फ अभिनव की वजह से। अक्सर श्रद्धा पढ़ने के लिए उसे अपने घर पर बुला लेती थी। अभिनव के स्वभाव की वजह से श्रद्धा के घर में सभी अभिनव को बहुत पसंद करते थे। ऐसे ही दोनों बड़े हुए और कॉलेज जाने लगे। दोनों अलग कॉलेज में होकर भी उसी तरह दोस्त बने रहे और अभिनव का श्रद्धा के घर आना जाना लगा रहा। श्रद्धा की छोटी बहन सुहानी 10वीं में आ गयी थी और उसे पढाई में मदद की जरुरत थी उसकी माँ को पता था की श्रद्धा तो सुहानी को पढ़ा नहीं सकती इसलिए अभिनव से सुहानी को ट्यूशन पढ़ाने की बात की। अभिनव राज़ी हो गया तो अब कभी कभार का आना रोज़ के नियमित आने जाने में बदल गया। अभिनव और श्रद्धा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं दिन के ज्यादातर समय दोनों साथ ही होते थे। धीरे धीरे अभिनव को ऐसा लगने लगा कि वो श्रद्धा को पसंद करता है मगर कभी बोलने की हिम्मत नहीं हुई। श्रद्धा के पापा अक्सर बीमार रहते थे सो उनकी दवा लाना और डॉक्टर को मिलना अब अभिनव का ही काम था, ऐसे ही कई महीने गए। एक दिन श्रद्धा के माँ ने अभिनव को अकेले में बुलाया और श्रद्धा के बारे में उसके विचार जानने की कोशिश की क्योंकि वो अभिनव को श्रद्धा के लिए पसंद करने लगी थी। अभिनव ने अपने स्वाभाव के अनुरूप उन्हें बता दिया कि वो श्रद्धा को पसंद करता है पर श्रद्धा जैसे इंसान को पसंद करेगी वो वैसा नहीं है और हुआ भी बिलकुल वैसा ही जैसा अभिनव को लगता था। जैसे ही श्रद्धा की माँ ने श्रद्धा से अभिनव के बारे में बात की वो बिलकुल भड़क गयी, ' क्या बात कर रही हो मम्मी, मैं और अभी सिर्फ अच्छे दोस्त हैं, अभी उस तरह का लड़का नहीं है जिससे मैं शादी कर सकूँ। शादी तो मैं ऐसे इंसान से करुँगी जो अमीर हो , खूबसूरत हो और मॉडर्न हो मेरी तरह। ' अभिनव दुसरे कमरे में सारी बातें सुन रहा था और चुपचाप उठ कर चला गया। अभी ने श्रद्धा पे कभी ये जाहिर नहीं होने दिया कि उसके दिल में क्या है। धीरे धीरे उसने श्रद्धा के घर जाना कम कर दिया और कुछ समय के बाद श्रद्धा आगे पढ़ने के लिए शहर से बाहर चली गयी और दोनों का संपर्क टूट गया।

इतना सोचते सोचते अचानक किसी ने अभिनव के कंधे पर हाथ रखा तो जैसे वो नींद से जाग गया, आँख उठा कर देखा तो श्रद्धा खड़ी हुयी थी उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी। अभिनव हड़बड़ा कर खड़ा हो गया, 'हैलो श्रद्धा, कब आयी? बैठो। ' श्रद्धा बैठते हुए, 'बस पहुंची ही हूँ, तभी जब तुम मेरे ख्यालों में खोये थे। ' 'नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है, मैं तो बस ऐसे ही... ' अभिनव कहते कहते रुक गया। फिर एक छोटे अंतराल के बाद फिर बोला , 'अब बताओ यहां कैसे आना हुआ ?' श्रद्धा अभिनव की ओर देखते हुए बोली , 'मेरे एक दूर के रिश्तेदार के यहां शादी थी और माँ की तबियत ठीक नहीं चल रही इसलिए मुझे आना पड़ा फिर सोचा चलो अच्छा है तुमसे भी मिलना हो जायेगा।' 'ओह अच्छा , कैसी हैं आंटी अब बहुत समय हो गया उनको देखे ' थोड़ा रुक कर अभिनव फिर बोला , 'तुम अकेले ही आयी हो मतलब तुम्हारे पति......?' श्रद्धा के चेहरे के भाव थोड़ा अजीब हो गए, 'हम साथ नहीं रहते। कुछ साल पहले मेरा और मेरे पति का तलाक हो गया क्योंकि हमारे विचार नहीं मिलते।' अभिनव थोड़ा गंभीर होकर बोला , 'लेकिन तुमने तो अपनी पसंद से शादी की थी, फिर क्या हुआ ?' 'पसंद से नहीं मैंने अपनी ज़िद से शादी की थी , मैंने अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ उससे शादी इसलिए की क्योंकि मुझे लगता था कि पैसा ही सबकुछ है पर अब समझ में आया कि शादी उससे करनी चाहिए जो आपसे प्यार करे। माँ ने मेरे लिए तुम्हें पसंद किया था लेकिन मैंने नादानी में तुम्हें ठुकरा दिया। मैं जानती हूँ तुम अब भी मुझसे प्यार करते हो इसीलिए अब तक शादी नहीं की। क्या तुम मुझे अपनाओगे ?' अभिनव दुविधा में पड़ गया था क्योंकि एक तरफ तो उसका पहला प्यार उसकी तरफ वापस आ रहा था तो दूसरी तरफ वो ये भी जानता था कि जिस तरह के इंसान की चाहत श्रद्धा को है वो वैसा बिलकुल नहीं है। अभिनव थोड़ा सोच कर बोला, ' देखो श्रद्धा ये सच है कि मैं आज भी तुमसे प्यार करता हूँ लेकिन तुमसे इतना ज्यादा प्यार भी नहीं करता कि तुम्हारे लिए अपने आप बदल लूँ। मेरा रहन सहन बहुत साधारण है जिसके लिए मेरे स्कूल और ट्यूशन से आने वाले पैसे काफी हैं पर मैं तुम्हारे महंगे शौक पूरे नहीं कर सकता। इसलिए तुम एक बार फिर से सोच लो क्या तुम मुझे इसी रूप में अपना सकती हो ?' श्रद्धा खुश होते हुए बोली , 'तुम मेरी चिंता मत करो मैं खुद नौकरी करती हूँ और इतना कमाती हूँ कि अपने साथ साथ तुम्हारा खर्च भी उठा सकती हूँ तुम्हें ना तो ये नौकरी करने की जरूरत है ना ही इस शहर में रहने की जरूरत है, बस तुम मेरे साथ चलो वहाँ मेरे घर में माँ के साथ रहो बाकी सब मैं देख लूंगी। ' 'मुझे तुम्हारे विचार सुनकर अच्छा लगा, तुम मेरे बारे में इतना सोचती हो। लेकिन ना तो मैं ये नौकरी छोड़ सकता हूँ ना ही ये शहर इसलिए या तो तुम सब कुछ छोड़ कर यहाँ आ जाओ या फिर हमदोनो के लिए अच्छा यही है कि हम एक दुसरे को भूल जाये। फैसला तुम्हारा है। ' अभिनव ने थोड़ा दुखी होकर कहा। श्रद्धा गुस्से में बोली , 'तुम क्या समझते हो अपने आपको मैं तुम्हारे लिए सबकुछ छोड़छाड़ के यहाँ आ जाऊं तुम्हारे साथ गरीबी में मरने के लिए, कभी नहीं। मैं तुम्हें अपनी जिंदगी सुधारने का एक मौका देना चाहती थी लेकिन तुम जैसे लोग कभी आगे नहीं बढ़ सकते। ' अभिनव एक मुस्कराहट के साथ , 'बहुत बहुत धन्यवाद कि तुमने मेरे बारे में इंतना सोचा मेरे लिए इतना ही काफी है। ' इतना कहकर वो उठ कर चला गया। श्रद्धा अचंभित सी उसे देखती रही, उसने कभी नहीं सोचा था की उसके जैसी सुन्दर और अमीर लड़की को कोई ठुकरा सकता है।

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