अना

यह कहानी शुरू होती है पाषाण काल से | जब मानव ने पत्थर को नुकीला कर उसे हथियार के रूप में काम लाना सीख लिया था और शिकार करना उसका मुख्य काम था | जो उनके पेट भरने से लेकर तन ढंकने के काम में आता था |पशु चर्बी सुरक्षा के लिए उपयोग की जाने लगी थी |शायद तब शक्ल - सूरत भी इंसान की इतनी निखरकर नहीं आ पाई होगी और उसमें बंदर से मनुष्य होने के कुछ प्रमाण शेष रहे होंगे |खैर , यह सब जो भी हो | लेकिन एक बात तो कुछ इतिहासविदों ने बता दी है कि उस समय घर नाम की कोई अवधारणा विकसित नहीं हुई थी | आदमी - औरत सभी गुफाओं में रहते थे |उन दिनों आदमी अपने - आपको काफी बल शाली समझा करते थे | औरतें मुख्यत: जरुरत के लिए होती थीं - ऐसा वे मानते थे | और जब ,औरत अपनी सन्तति क्षमता खो देती थी ; उसे किसी भी प्रकार से मार डाला जाता था | इसके लिए या तो शिकार पर जाते हुए वे औरतों को किसी पहाड़ से नीचे धक्का दे देते थे या फिर किसी जंगली जानवर के सामने उसे फेंक दिया जाता था |

औरतों के नसीब के उसी घोर अन्धकार काल में एक औरत हुई थी - अना | उस समय हालांकि नाम रखने की कोई ख़ास प्रथा नहीं थी लेकिन अना की माँ को अपनी यह बेटी विशेष लगती रही थी | इस कारण वह उसे कुछ ख़ास कहकर बुलाना चाहती थी | और , वही ख़ास नाम था अना |

अना ,हालांकि अपने काल की अन्य स्त्रियों सी ही थी पर उसमें एक ख़ास बात थी कि उसे कोई भी बात जल्दी समझ आ जाती थी | वह घंटो चुपचाप अकेले बैठी जाने क्या सोचती रहती | उससे उसकी ही गुफा में रहने वाले कई आदमियों ने शारीर संपर्क करना चाहा | पर ,अना हर बार उन्हें झटक कर उठ खड़ी होती | सभी आदमी कहते - " यह कुछ समझती ही नहीं |इसे शायद जल्दी ही शिकार पर ले जाकर किसी पहाड़ से गिरा देना चाहिए |"

अना उनकी बातें सुनती और गुफा के अँधेरे कोने में जाकर रो लेती | एक दिन , अना की गुफा के मर्दों ने आना की माँ को अपने संग लिया और शिकार पर चले गए | अना ने माँ को रोका लेकिन अना की माँ के अन्दर इतनी हिम्मत न थी कि वह अपने गुफा के मर्दों का विरोध कर सके | हलांकि ,उनमें से कई मर्द आज की सभ्य भाषा में उसके पुत्र ही थे | शिकार से वापस आये मर्दों से एक - एक कर अना ने अपनी माँ के बारे में पूछा | जवाब में किसी ने उसे चपत लगाई तो किसी ने क्रूरता से हंसते हुए कहा - " जल्दी ही तुझे भी ले चलेंगे शिकार पर ,चिंता न कर |"

उस रात अना ने खाना नहीं खाया और जब देर रात गए गुफा में सभी सो गए तो अना चुपके से उठकर गुफा से निकल गई | जंगल के बीच जो राह सामने आई अना उसी पर तब तक चलती रही जबतक कि सबेरा नहीं हुआ | सूरज की किरण फूटते ही उसने अपने आपको एक अलग गुफा के सामने खडा पाया | वह कुछ सोच पाती कि उस गुफा से एक मर्द निकलकर बाहर आया और अना को देख आश्चर्य से बोला - " तुम कौन ? यहाँ कैसे ?"

अना ने अपने अपरिचय का फायदा उठाया और बोली - " मैं अना | ईश्वर ने भेजा | यह जो रौशनी चमक रही है ,मैं इसी के सहारे आई ऊपर से |"

आश्चर्य से मूंह फाड़े उस आदमी ने अना की बातें सुनीं और बिना जवाब दिए आगे बढ़कर उसे अपनी बांहों में भर लिया | अना थकी थी और भूखी भी | उसने कहा - " पहले मुझे शिकार खिलाओ फिर मैं तुम्हारे साथ रहूंगी |"

आदमी खुश हो अना को लेकर गुफा के अन्दर गया | गुफा में शिकार किये गए जानवरों के मांस एक तरफ रखे हुए थे और एक तरफ ढेरों खालें थीं |गुफा में चारो तरफ नजर दौड़ते हुए अना ने पूछा - " क्या तुम इस गुफा में अकेले रहते हो ?"

"हाँ , मेरे साथ के सभी लोग एक दिन शिकार के लिए गए थे | मैं बस रुक गया था उस दिन |बीच दुपहरी उस दिन जोर से धरती डोली और कोई लौटकर नहीं आया | तब से मैं अकेला ही हूँ | तू रहेगी मेरे साथ |"

"हाँ ,और मैं तुम्हें आज से अका कहकर बुलाऊंगी |"

अका ने हंसते हुए स्वीकृति दे दी | अना ने पहले जी भरकर अका के द्वारा आग पर पकाया शिकार खाया |फिर बोली ,"अका सुन ,आज से तुम अकेले नहीं |हम दोनों साथ है |और हम अपनी गिनती भी बढ़ाएंगे |"

अका ने दांत निकालकर अना को अपनी बांहों में भर लिया |

अना को जब दो बच्चे हो गए तो उसे यह डर सताने लगा कि अका भी उसे एक दिन अपने साथ शिकार पर ले जाकर कहीं मार न दे | वह खुद को बचाने के लिए कोई उपाय सोचने लगी | सोचते - सोचते उसने एक रास्ता निकाल ही लिया | अब वह अका का ख़याल रखने लगी | अका शिकार कर लौटता तो जल्दी से उसके हाथों से भारी मरे हुए जानवर को लेकर नीचे रखती | भाग कर खाल से बने बर्तन में पानी ला उसके पैर धोती | अका को इस समय बड़ा आराम मिलता | वह अका को गुफा का कोई काम नहीं करने देती और मृत जानवर शरीर से अकेले ही मांस तथा खाल अलग कर गुफा में रखती थीं | इधर कुछ दिनों से वह जंगली पत्तों से गुफा की सफाई करना भी स्वयं ही सीख गई थी | अका को अना की इस सेवा से बड़ा आनंद आने लगा | एक - एक कर अना को 20 पुत्र और एक पुत्री हुई | अना अकेले सबका ख़याल रखती थी | अका अना के बिना अपने आपको अशक्त समझने लगा था | अगर अना किसी समय जंगल में पत्ते तोड़ने या लकडियाँ लेने गई होती और उस समय अका शिकार कर आ जाता तो उसे बिना अना के काफी उलझन महसूस होती |अना के बेटे भी अना पर पूरी तरह से आश्रित थे | अका और उसके पुत्र इस कारण अना को कभी शिकार पर ले जाकर मारने की बात ही नहीं करते |

अना की बेटी चानी जब इतनी बड़ी हो गई कि वह अना की कही बात समझ सके तो अना ने उसे एकांत में बुलाकर कहा - " सुन चानी ,तू जीवन भर मर्दों की खूब मन लगाकर सेवा करती रहना | जैसे मैं अका और तेरे सभी भाईयों की करती हूँ | तभी ये लोग तुझे जान से नहीं मारेंगे और तू अपना पूरा जीवन जियेगी |"

चानी ने माँ की सीख गाँठ बाँध ली | चानी कुछ अल्हड किस्म की थी और अक्सर जंगल में पक्षियों के साथ चहकती रहती |कभी उनकी बोली में बोली मिलाकर बोलती तो कभी खूब सारे जंगली फूल तोड़कर ले आती और गुफा के दरवाजे पर रख देती |

अना ने अपनी गुफा के किसी भी मर्द से चानी को सम्बन्ध बनाने से मना कर रखा था |इसलिए जवान होती चानी जंगल में अपना जोड़ा भी ढूँढती |एक दिन उसे भी अना की तरह ही उसका भी जोड़ा मिल ही गया और वह उसे अपनी गुफा में ले गया | लेकिन , अना की तरह चानी को एक मर्द नहीं मिला | उसे इस गुफा के सभी मर्दों के साथ अभिसार करना होता था | जो जिस दिन शिकार अधिक लाता चानी उस दिन उसी मर्द के साथ होती | चानी कभी उनके साथ शिकार पर नहीं जाती और अपनी माँ की तरह प्रत्येक का ख़याल रखती | इस कारण गुफा के सभी मर्द हमेशा चानी को खोजते | पर , चानी तो थी अल्हड | एक दिन वह पूरे दिन गुफा से गायब रही | शाम में वापस आने पर मर्दों ने उससे पूछा कि - " वह पूरे दिन कहाँ थी ? क्या किसी और गुफा में जाना चाहती है ? अगर ऐसा है तो वे ऐसा नहीं करने देंगे क्योंकि उसने अभी तक इस गुफा को कोई बच्चा नहीं दिया है |"

मर्दों के तेवर देख चानी अन्दर से सिहर उठी | पर , वह अना की बेटी थी | अप्पने डर को अपने अन्दर दबा मुस्कुराती हुई बोली - " मैं आपलोगों के लिये ईश्वर से वरदान माँगने गई थी ?"

"कैसे ?"

"कहाँ ?"

क्या ईश्वर कहीं आसपास ही रहता है ?"

"कैसा वरदान चानी ?"

एक - एक कर कई मर्दों के प्रश्न आ गए | चानी ने कहा - " चलो सब लोग मेरे पीछे -पीछे | मैं तुम्हें बताती हूँ |"

चानी सबको लेकर नदी के किनारे पहुंची | वहां उसने एक जगह बालू जमा कर दिए थे उसके चारो ओर रंग - बिरंगे फूल बिखेर दिए थे | उसे ही दिखाकर वह बोली - "यह रहा ईश्वर | मैं उसे रंग - बिरंगे फूलों से सजाकर खुश कर तुम सबके लिए जीवन का वरदान मांग रही थी | यह देवता अगर खुश हो गया तो तुम लोग को खूब लंबा जीवन देगा |"

मर्द यह सुन खुश हो गए और उन्हों ने कहा - " ठीक है चानी ऐसा है तो तू अब रोज यहाँ आकर हमारे जीवन का वरदान देवता से मांगना |"

"हाँ , लेकिन तुम सब तो मुझे एक दिन मार डालोगे न | तब कौन मांगेगा यह वरदान |"

"नहीं चानी ,हम अधिक दिनों तक जीने के लिए तुम्हे नहीं मारेंगे | तू वरदान रोज मांग |"

समय बीता .चानी के भी 15 पुत्र और 4 पुत्रियाँ हुईं | चानी ने अपनी माँ अना की तरह ही अपनी चारों पुत्रियों को मर्दों की तीमारदारी और देवता बनाकर उनके जीवन के लिए वरदान मांगना सीखाया | ताकि, वे भी चानी और अना की तरह अपना पूरा जीवन जी सकें |

तबसे अब तक सदियाँ बीतीं , सभ्यताओं ने करवटें बदलीं - चेहरे बदल गए ,लिबास ,खान - पान सबकुछ बदल गया लेकिन गुफा के मर्दों की फितरत उनकी पीढ़ियों में बनी हुई है | इस कारण अना और चानी भी आज तक स्रियों के अन्दर साँसें ले रही हैं |

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