कुंडली

कमरे में मुझे लेकर पांच लोग थे । उन चारों में एक महिला थी । दूसरा उसका पति था । दोनों मेरी तरह अधेड़ थे । शेष दो नौवजवान थे । एक महिला का पुत्र था और दूसरा देवर था । बारह बाई बारह का कमरा था । नीचे सफेद टायलस् लगा था । टायल सीसे की तरह चमक रहा था । शायद उस घर में नौकरानी आती हो । या वह महिला ही बहुत सफाई पसंद थी । कमरे की ट्यूब लाइट अपनी तेज़ रोशनी के साथ चमक रही थी । अधेड़ का नाम शिवचरन था । मैं उसे पिछले छ: महीने से जानता था । महिला के देवर से पहली बार मिल रहा था । सबके चेहरे पर बेचारगी चिपकी हुई थी । पर आंखों में खूंखार भेड़िए सी चमक थी । मैं हताश था । मेरा गला सूख रहा था और पांव में हल्की सी कंपन थी । शिवचरन ने एक बार फिर गला साफ किया और आदतन हल्की सी सिसकारी लेकर थूक सटका –‘क्या बताउं भाई साहब मैं असहाय हूं । मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि कैसे आपको बताउं । वह भी इतने एडवांस स्टेज़ में …?

‘हां ! भाई साहब मुझे तो कल रात से नींद ही नहीं आयी है ।’ महिला ने भी फौरन काउंटर किया । लड़का ज्यादा उत्तेजित था । वह कभी मां के पास जाता तो कभी पिता के पास । वह कुछ बोलना चाहता था , लेकिन उसे पिता ने घूर कर देखा । जो खामोश रहने का इशारा था । उन्हें डर था कि वह कहीं खेल न बिगाड़ दे । देवर अभी माहौल का आनंद ले रहा था । उसे लग रहा था कि ड्रामा सही चल रहा है ।

कल तक बहुत प्यारे लगने वाले इन चेहरों से मुझे घबराहट होने लगी थी । मुझे वहां बैठना कष्टकर होता जा रहा था । मैं झटके से उठा और साथ लाए मिठाई के दोनों डिब्बे उनकी तरफ बढ़ा दिए-‘रख लें.. आपके लिए ही लाया था । महिला मुस्कराई । लेकिन उसे याद आ गया कि यह मुस्कराने का समय नहीं है । और फौरन उसने चेहरे को उदास बना लिया । तभी वह पंडित भी आ गया । जिसने कि इस पूरी कहानी को अंजाम दिया था । उसका आना अब बेमानी हो गया था । पंडित साढ़े चार फुट का गोरा –चिट्टा ..गोल-मटोल सा आदमी था । उसने ऐसा गेटअप बना रखा कि मैं देखते ही समझ गया कि वह उनकी बातों को प्रमाणित करने के लिए आया है । चूंकि मैं पहले ही हथियार डाल चुका था । अत: विजय उसके पाले में थी ।

मुझे सब बाहर तक छोड़ने आये थे । पहली बार महिला भी गेट तक आयी थी । उसका चेहरा अभी-अभी दूध पीकर अघाई बिल्ली सा लग रहा था । हालांकि मैं बाईक चलाने की स्थिति में नहीं था । इसके बावज़ूद पूरी ताकत लगा कर किक मारा । मोटर साइकिल स्टार्ट हो गयी और मैं वहां से घर के लिए चल दिया । पांच किलोमीटर का ट्रैफिक का समंदर पार करके मुझे घर पहुंचना था । जबकि दिमाग बिल्कुल खाली-खाली सा लग रहा था । हवा में दिन की तपिश का असर अभी बाकि था । हैलमेट के नीचे पसीने की चिपचिपाहट कुछ ज्यादा बढ़ गयी थी ।

रात के साढ़े आठ बज रहे थे । सड़क पर इस समय भीड़ ज्यादा थी । मैंने मन को एकाग्र करने का प्रयास किया । शिवचरन का चेहरा मेरे सामने आ गया । पांच फीट तीन इंच का गाढ़ा गेहुंआ रंग । पचपन के आसपास का मोटापे की तरफ बढ़ता शरीर… । उसके सिर पर लगा खिजाब बालों आवश्यकता से ज्यादा काला कर देता, जिससे उसका व्यक्तित्व थोड़ा फूहड़ लगता । वह बात करते समय बीच-बीच में थूक निगलते हुए एक अजीब सी आवाज़ निकालता । उसकी इस आवाज़ से शुरू में बहुत चिढ़ होती । फिर पता नहीं वह कौन सी मनहूस घड़ी थी, जब उससे बातचीत का सिलसिला चल निकला ।

ग्यारह बजे कैंटीन में मैं चाय पीने जाता तो वह अक्सर मुझे मिला जाता । ऐसे ही किसी समय में मेरी-उसकी हेलो-हाय हो जाती । फिर हम कैंटीन की मेज पर अपनी पारिवारिक समस्याओं पर भी चर्चा करने लगें । वह मेरे बारे में सब कुछ जानता था । मैं जब भी कुछ बताने का प्रयास करता वह मुस्करा कर बोलता –‘जानता हूं ।’ पर आश्चर्य था कि मैं उसे बिल्कुल नहीं जानता था ।

उसके तीन बेटे थे । मेरी दो बेटियां.. मैं एक बेटी की शादी कर चुका था । छोटी के रिश्ते के लिए प्रयासरत था । उसे पिछले कई सालों से अपने बड़े बेटे के लिए बहू की तलाश थी । उसका बेटा किसी इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ा रहा था और उनतीस पार करने वाला था । उसने बहुत मायूसी से कहा –‘क्या बताउं ..भाई साहब मैं तो लड़की खोजते-खोजते परेशान हो गया हूं । मुझे तो बस एक अच्छा परिवार चाहिए । भगवान का दिया मेरे पास सब कुछ है ।’

वह मेरे ही बिरादरी का था । मुझे लड़का अपनी पुत्री के योग्य लगा । फौरन मेरे अंदर का पिता जागा –‘भाई साहब मैं अपनी छोटी बेटी के रिश्ते लिए आपको आमंत्रित कर रहा हूं । यदि आप मुझे इस लायक समझते हो तो ..’

‘हां …हां…क्यों नहीं..।’ वह थूक निगलते हुए आवाज निकाला । इस बार मुझको यह आदत अच्छी लगी ।

उसकी आंखों में एक शिकारी सी चमक थी । वह फिर थूक निगला और बोला –‘अभी दिन अच्छे नहीं हैं । मकरसंक्रांति के दिन अपनी बेटी की कुंडली लाइयेगा । ईश्वर का दिन है अपने बेटे की कुंडली से मिलाता हूं ।’

मकर संक्रांति में अभी दस दिन बाकि थे । इस दस दिन में जब भी वह मुझे मिलता मैं उसे पूरी श्रद्धा से नमस्कार करता । अब वह मेरे लिए विशिष्ठ हो गया था । निर्धारित दिन मैंने उसे बेटी की कुंडली और बायोडाटा पकड़ा दिया-‘देखिए मैं इस पर ज्यादा विश्वास नहीं करता । आप संतुष्ट हो जाइए तो खबर करियेगा । फिर जैसा होगा देखा जायेगा ।’

दूसरे ही दिन उसका फोन आया –भाई साहब कुंडली मिल गयी है । यदि लड़की की कोई फोटो हो तो लेकर आ जाइये ।’

‘जी बहुत अच्छा …कल आप से मिलता हूं ।’ मैं कहीं और व्यस्त था ।

‘अरे आज ही आ जाइए । आज का नक्षत्र बहुत उत्तम है । आज आप जो भी कार्य करेंगे । सफलता निश्चित है ।’ फोन पर भी थूक सटकते हुए आवाज़ निकालने से मेरे चेहरे पर मुस्कराहट रेंग गयी ।

मैं उसके घर पहुंचा तो प्रभावित हुए बिना न रह सका । कालोनी के पुराने मकान में अभी ताजा-ताजा महाराजा गेट लगा था । दो कमरे उसने अभी नये बनवाये थे । जिसके फर्श पर सफेद टायलस् चमक रहा था । यह सब काम उसने अपने छोटे भाई को अलग करने के बाद किया था । वह बताता रहा-‘मैंने बहुत कष्ट झेला है । अपनी छोटी सी नौकरी में दो बहनों की शादी की है । अपने एक भाई को पैरों पर खड़ा किया और तीन बेटों को उच्च शिक्षा दिलाई है । अब मेरे पास पैसा नहीं है । इसके बावज़ूद लड़की वाले जो भी देंगे, मैं तीन लाख रुपये अपनी जेब से लगाउंगा । मेरे पास एक से बढ़कर एक रिश्ते आये । लेकिन मैंने मना कर दिया । भाई जैसा मैं हूं …मुझे अपने ही स्तर का परिवार चाहिए । ’ शिवचरन अपनी बातों से भले मुझे प्रभावित करना चाहता हो, पर उसकी बातें मुझे उसके चरित्र अविश्वासनीय बना रही थी । उसने बताया कि वह साबुन का फारमूला प्राप्त करने के लिए एक प्रतिष्ठित कंपनी में हफ्तों मजदूर के रूप में काम किया । उसने वैक्स और स्टील का कोटा लेकर ब्लैक किया । पिता की जिम्मेदारी के निर्वाह के लिए तमाम छोटे-बड़े धंधे किए । वह बीमा एजेंट का भी काम किया ।

फिर भी उसकी साफ गोई से मैं अभिभूत था । वह अपनी कहानी टुकड़ों में सुनाता रहा । उसने लड़की देखने का प्रस्ताव रखा –‘ देखिए भाई साहब मेरी तो कोई लड़की नहीं है । फिर आपकी लड़की भी मेरे लिए बेटी जैसी ही है । उसे नहीं पता चलना चाहिए कि हम लड़की देखने आए हैं । जब हमें लड़की पसंद आ जायेगी तभी उसे बताइयेगा ।’

मैं भी उसकी बातों से सहमत था । अस्वीकृति भला किसे अच्छी लगती है । मैंने यह बात सिर्फ अपनी पत्नी को बताया था । जिससे वह उनके स्वागत की उचित व्यवस्था कर सके । शिवचरन पत्नी, सबसे छोटे बेटे और एक रिश्तेदार के साथ लड़की देखने आया था । तब पहली बार मैंने उसकी पत्नी को देखा था । वह आम घरेलू औरतों जैसी ही थी । उसकी कद-काठी पति जैसा ही थी । रंग जरूर साफ था । वह बहुत देर तक बैठे रहे । औरत बातूनी और मिलनसार लग रही थी । उसके चेहरे पर तीन-तीन लड़कों की मां होने का दर्प चमक रहा था । मेरी पत्नी उनसे प्रभावित थी और उनके जाने के बाद पूजा घर में जाकर भगवान से प्रार्थना किया –‘प्रभु कृपा करो । उन्हें हमारी बिटिया पसंद आ जाय । कृपा प्रभु..कृपा…।’

उन्हें लड़की पसंद थी । हम पहली बांधा पार कर चुके थे । अब दान-दहेज़ की बात करनी थी । होली वाले दिन शिवचरन शाम को बुलाया था । मैं त्यौहार के दिन शाम का बेचैनी से इंतज़ार कर रहा था । मैं शाम को उसके घर पहुंचा । वह दुकान सजाकर बैठा था । तीनों बेटे घर पर ही मौजूद थे । उसने मेरा भव्य स्वागत किया । त्योहार का दिन था । विभिन्न तरह के पकवान बने थे । वह सब ट्रे में सजाकर मेरे सामने रख दिया गया । मोल-भाव शुरू हो गया । उसे कार चाहिए था । ज्यादा बड़ी वाली नहीं ..। वह अपनी बातों में कह चुका था । मैंने उसे आज तक चौबीस इंच वाली साइकिल को उछल-उछल कर चलाते हुए देखा था ।

अंत में मैं हथियार डालते हुए दयनीय स्वर में बोला – ‘मेरे पास जो कुछ भी था वह बेटियों का ही तो है । बड़े भाई वर्तमान में मैं बस इतना ही कर पाऊंगा ।’

वह मेरी बात सुनकर मुस्कराया और एक बार फिर दोहराया-‘मुझे पैसे का कोई लालच नहीं है । बस एकाध लाख और बढ़ जाते । वैसे मैं भी तो ढाई–तीन लाख रुपया खर्च करूंगा । चलिए ठीक है ..।’

इसके बावजूद उसके चेहरे पर कहीं असंतुष्टि के भाव थे । औरत जरूर उत्साहित थी । लेकिन उसके बेटों का चेहरा भावहीन था ।

मैं जितना खर्च कर रहा था वह मेरी औकात से ज्यादा था । उतना खर्च करने पर मैं चार लाख का कर्ज लेना पड़ रहा था ।

उसने एक बार और लड़की को देखना चाहा । उसे संदेह था कि कहीं उसका बेटा लड़की को नापसंद कर दे । मुझे लगा कि यह शादी न करने का बहाना है । उसका बेटा लड़की को नापसंद कर देगा और वह मुझसे मुक्ति पा जायेगा । वह पूरी तरह संतुष्ट होने के लिए अपने बड़े बेटे के साथ दुबारा लड़की देखने आया । और मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि वह विवाह की मंजूरी दे दिया । कुछ दिन बाद एक अनुमानित तिथि की भी घोषणा कर दिया- इस वर्ष जू में छेका और गोद भराई करते है और दिसंबर में विवाह के लिए मौसम अच्छा रहेगा । जल्दी ही हम शुभ दिन निश्चित कर लेंगे ।’

मैं कुछ हद तक आश्वस्त था । अब बस तैयारी ही तो करनी है । कुछ पैसे कम पड़ सकते थे । इसके लिए मेरे मित्र थे । हमेशा गंभीर रहने वाली बेटी के होंठो पर भी मुस्कराहट रेंग गयी । सही समय पर रिश्ता मिल जाने पर पत्नी भी खुश थी । और मैं…. मुझे तो यही लग रहा था कि सारी जिंदगी कोल्हू के बैल की तरह घर-परिवार की धूरी पर घूमता रहा हूं । अब उसका प्रतिफल मिलने का समय आ गया है । हम चाहें जितना प्रगतिशील बन जाय । विवाह योग्य बेटी के बोझ से बाप का रोंवा-रोंवा दु:खता है ।

सब कुछ तो हवा में था । चार महीने बाद भी कुछ भी तो पक्का नहीं था । सिवाय उसकी मौखिक मंजूरी के… । बस यहीं एक खटका था । हम महानगर के जिस संस्कृति में जी रहे हैं वहां सामाजिक भय जैसा कुछ नहीं बचा है । यदि इस बीच शिवचरन को बेटे का ज्यादा दाम मिलने लगे ..। अगर उसने मुझे ना कर दिया तो..? फिर मन ही धिक्कारता –कैसे आदमी हो तुम ..? जिस आदमी ने आगे बढ़कर तुम्हारा हाथ थामा …उसी पर संदेह..।

और मेरा संदेह तो ठीक निकल गया । आज शिवचरन ने स्पष्ट कह दिया-‘भाई साहब पहले मैं कुंडली ठीक से नहीं देख पाया । दूबरा जब पंडित जी ने देखा तो आपकी बेटी मंगली है । मैं यह शादी भला कैसे कर सकता हूं ..। तो क्या सचमुच शिवचरन के बेटे की कीमत ज्यादा लग गयी थी ? क्या कुंडली एक बहाना था …….।

मुझे तो उसके बेटे के पैदा होने की तारिख मालूम नहीं था कि मैं कोई दावा पेश करता । अब वह जो बोल रहा था ..शायद वही सच था । मुझे रिश्ता टूटने से बेवकूफ बन जाने का दु:ख ज्यादा था । वह अच्छी तरह जानता था कि इस मामले में मैं उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था । वह तो शादी करने को हर तरह से तैयार बैठा था । अब जब कुंडली ही नहीं मिल रही तो वो भला क्या कर सकता है ।

सबसे बड़ा दोषी तो मैं स्वयं था । जिसे मैं शुरुआत में ही नापसंद करता था , सिर्फ इस लिए पसंद करने लगा था कि बिना भाग-दौड़ के यह रिश्ता मुझे आसानी से मिल रहा था ।

मेरा घर नजदीक आ गया था । अब मुझे अपने लोगों के सवालों का जवाब देना । बेटी का चेहरा आंखों के सामने कौंधा और बहुत देर से आंखों में मचलता आंसू गालों तक आ गया ।

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