पूरे दिन की धींगा-मुस्ती से बेजार हो उठा। शैक्षिक प्रमाणपत्रों को प्रतिदिन निहारता गोया अलादीन का चिराग रगड़ रहा हो, किन्तु जिन्न प्रगट न होता। कभी इस दफ्तर कभी उस। रेडिओ, दूरदर्शन, सम्पादकीय कार्यालय, स्कूल कालेज के बोर्ड, कोचिंग सेंटर के विज्ञापन पढ़ते देखते आँखों ने सपनों की रील हज़म कर ली थी। भूख वहीँ खड़ी फुंकार रही थी। दो एक होम ट्यूशन और छह घंटे की नाइट ड्यूटी। प्राइवेट ऑफिस में निर्वाह करना एक सामाजिक अपराध था। करने पड़ते हैं ऐसे खूनी क़त्ल।
गाँव से आए बाबूजी के पत्र में बिगड़ी फसल का जिक्र था। माँ को गठिया हुआ है। बहन की जवानी फिसलने को है। दिल्ली छोड़ने की कशमकश गहराती है। गाँव की खेती सम्हालूँ ? क्या पाया पढ़ के इतना ? गहने गिरवी रखे। यही करना था तो ऐसे ही कर लेता। अब तो चिड़िया ...फुर्र ।
लस्त पस्त त्रस्त बिस्तर पर पड़ते ही पत्नी का सुनामी प्रश्न – “मिली कोई ढंग की नौकरी ?”
“ढंग की का क्या मतलब है ? देख तो रहा हूँ।” धकियाता है सुनामी को।
“चलो। गाँव चलते हैं।” पत्नी राह सुझाती है।
कब से यही विचार उसे मथे जा रहा था। पत्नी के उघाडते ही छोड़ दिया उसे।
“नहीं जाएँगे छोड़ दिल्ली। कोशिश की है। देखत बा का होत है।”
दिल्ली की जमीन लपेट सो जाता है वह। अगले दिन से लड़ने के लिए।

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